प्रकाश — परावर्तन तथा अपवर्तन
यह क्यों ज़रूरी है
स्टील के चम्मच की पीठ में देखिए — आप सीधे पर छोटे दिखते हैं। पानी के गिलास में डुबोई पेंसिल सतह पर टूटी हुई दिखती है। बाल्टी की तली में पड़ा सिक्का असल से कम गहरा लगता है। और गाड़ी के साइड मिरर पर लिखा होता है “objects are closer than they appear”।
ये सब बस प्रकाश के दो काम हैं: सतहों से टकराकर लौटना (परावर्तन) और एक माध्यम से दूसरे में जाते वक़्त मुड़ना (अपवर्तन)। और कमाल की बात ये कि दोनों पक्के नियमों से चलते हैं — इतने पक्के कि आप हिसाब लगाकर बता सकते हैं कि प्रतिबिंब कहाँ बनेगा, कितना बड़ा होगा, और सीधा होगा या उल्टा — बस दो सूत्रों से।
ये अध्याय टॉर्च, शेविंग दर्पण, आवर्धक लेंस, कैमरा, दूरबीन और करोड़ों लोगों के चश्मों के पीछे का औज़ार है। चिह्न परिपाटी (sign convention) ठीक से समझ लो, तो बाकी सब सावधानी से किया गया गणित भर है।
मुख्य विचार
प्रकाश सीधी रेखाओं में चलता है जब तक किसी सतह से न टकराए। दर्पण पर वो परावर्तित होता है (आपतन कोण = परावर्तन कोण); नए माध्यम में जाते वक़्त अपवर्तित होता है (मुड़ता है) क्योंकि उसकी चाल बदल जाती है। घुमावदार दर्पण और लेंस इन्हीं नियमों से किरणों को मिलाकर (या फैलाकर) प्रतिबिंब बनाते हैं — जिसे हम दर्पण सूत्र और लेंस सूत्र से ढूँढते हैं।
पूरे अध्याय को दो विचार सँभालते हैं:
- परावर्तन प्रकाश को वापस मोड़ता है; अपवर्तन प्रकाश को आर-पार मोड़ता है। अपवर्तन होता ही इसलिए है क्योंकि अलग-अलग पदार्थों में प्रकाश की चाल अलग होती है।
- “ये धन है या ऋण?” वाली उलझन से बचने के लिए हम एक सख़्त हिसाब-किताब वाली व्यवस्था इस्तेमाल करते हैं — नई कार्तीय चिह्न परिपाटी। इसे एक बार पकड़ लो, फिर हर न्यूमेरिकल मशीनी हो जाता है।
आइए इसे समझें
परावर्तन और उसके दो नियम
जब प्रकाश किसी चमकदार सतह से टकराता है तो परावर्तन के दो नियमों के अनुसार लौटता है:
- आपतन कोण परावर्तन कोण के बराबर होता है (दोनों अभिलंब से नापे जाते हैं — अभिलंब यानी टकराव के बिंदु पर सतह के लंबवत रेखा)।
- आपतित किरण, परावर्तित किरण और अभिलंब — तीनों एक ही तल में होते हैं।
समतल (सपाट) दर्पण ऐसा प्रतिबिंब देता है जो आभासी, सीधा, वस्तु के बराबर आकार का होता है, दर्पण के पीछे उतनी ही दूर जितनी वस्तु आगे है, और पार्श्व उल्टा (बायाँ↔दायाँ बदला हुआ — इसीलिए एम्बुलेंस के आगे “AMBULANCE” उल्टा लिखा होता है)।
गोलीय दर्पण — शब्दावली
गोलीय दर्पण किसी चमकती गेंद (गोले) का एक टुकड़ा है। इसके दो प्रकार हैं:
- अवतल दर्पण — परावर्तक सतह अंदर की ओर मुड़ी (चम्मच की कटोरी जैसी)। ये प्रकाश को एकत्र करता है।
- उत्तल दर्पण — परावर्तक सतह बाहर की ओर मुड़ी (चम्मच की पीठ जैसी)। ये प्रकाश को फैलाता है।
इन पाँच शब्दों को याद कर लो — हर सवाल इन्हीं को इस्तेमाल करता है:
- ध्रुव (P): दर्पण की सतह का केंद्र।
- वक्रता केंद्र (C): जिस गोले का दर्पण हिस्सा है, उसका केंद्र।
- वक्रता त्रिज्या (R): दूरी PC।
- मुख्य फोकस (F): जहाँ अक्ष के समानांतर किरणें मिलती हैं (अवतल) या जहाँ से आती हुई लगती हैं (उत्तल)।
- फोकस दूरी (f): दूरी PF।
जो एक रिश्ता ज़रूर याद रखना है: f = R/2। फोकस ठीक ध्रुव और वक्रता केंद्र के बीचोबीच होता है।
घुमावदार दर्पण इस तरह परावर्तन क्यों करता है
यहाँ वो बात है जो छात्रों को उलझाती है: किसी घुमावदार दर्पण से किरण किस ओर टकराकर लौटेगी, यह कैसे पता चले? राहत की बात ये है कि घुमावदार दर्पण भी सपाट दर्पण वाला वही नियम मानता है — आपतन कोण = परावर्तन कोण — बस तुम्हें उस बिंदु पर अभिलंब ढूँढना है जहाँ किरण असल में टकराती है।
गोलीय दर्पण के लिए वो अभिलंब ढूँढना बहुत आसान है: वह उस टकराव बिंदु से वक्रता केंद्र C तक खींची त्रिज्या है। त्रिज्या गोले से हमेशा समकोण पर मिलती है, इसलिए वही उस बिंदु पर लंब — यानी अभिलंब — है। एक बार अभिलंब मिल गया, तो आपतित किरण को ऐसे परावर्तित करो कि i = r, और परावर्तित दिशा तय हो जाती है। कोई अंदाज़ा नहीं।
कई समानांतर किरणों के लिए आज़माओ: अक्ष से दूर जाते हर किरण का अभिलंब थोड़ा और झुकता है, इसलिए हर एक थोड़ी और तीखी परावर्तित होती है, और सब F पर मिलती हैं। यही वजह है कि अवतल दर्पण प्रकाश एकत्र करता है। उत्तल दर्पण इसका उल्टा है — इसका वक्रता केंद्र सतह के पीछे होता है, तो अभिलंब बाहर की ओर इशारा करते हैं और परावर्तित किरणें फैल जाती हैं (पीछे F से आती हुई लगती हैं)। तो जब भी संशय हो कि किरण घुमावदार दर्पण से किस ओर जाएगी: पहले C की ओर अभिलंब खींचो, फिर i = r लगाओ।
वास्तविक और आभासी प्रतिबिंब — फ़र्क़ क्या है?
नीचे की तालिका की हर पंक्ति में वास्तविक और आभासी शब्द दिखेंगे, तो पहले यह साफ़ कर लें कि इनका मतलब क्या है। जब कोई दर्पण या लेंस प्रकाश को मोड़ता है, तो किरणें या तो किसी बिंदु पर सचमुच मिलती हैं या सिर्फ़ वहाँ से आती हुई लगती हैं:
- वास्तविक प्रतिबिंब वहाँ बनता है जहाँ परावर्तित (या अपवर्तित) किरणें सचमुच मिलती हैं। वहाँ असली प्रकाश पहुँच रहा होता है, इसलिए आप उसे परदे पर पकड़ सकते हैं। एक अकेले दर्पण या लेंस से बना वास्तविक प्रतिबिंब उल्टा होता है।
- आभासी प्रतिबिंब वहाँ बनता है जहाँ किरणें मिलतीं नहीं — वे फैल जाती हैं, और सिर्फ़ उनकी पीछे की ओर खींची रेखाएँ (आरेखों में धराशायी रेखाएँ) दर्पण के पीछे या लेंस की वस्तु-वाली तरफ़ मिलती दिखती हैं। उस जगह कोई प्रकाश सचमुच नहीं पहुँचता, तो आप उसे परदे पर नहीं पकड़ सकते — सिर्फ़ दर्पण/लेंस में झाँककर देख सकते हैं। आभासी प्रतिबिंब सीधा होता है।
एक-पंक्ति की कसौटी: अगर प्रतिबिंब की जगह काग़ज़ का परदा रखो और उस पर साफ़ तस्वीर बने, तो वह वास्तविक है; न बने, तो आभासी।
आसपास के वास्तविक प्रतिबिंब:
- सिनेमा प्रोजेक्टर परदे पर जो तस्वीर फेंकता है। (ध्यान दो, अंदर फ़िल्म उल्टी लगाई जाती है — क्योंकि बना वास्तविक प्रतिबिंब उल्टा होता है।)
- तुम्हारा कैमरा सेंसर पर जो प्रतिबिंब बनाता है, और तुम्हारी आँख रेटिना पर जो बनाती है — दोनों वास्तविक और उल्टे (दिमाग़ चुपचाप उसे सीधा कर लेता है)।
आसपास के आभासी प्रतिबिंब:
- सपाट बाथरूम दर्पण में तुम्हारा अक्स। लगता है तुम शीशे के पीछे उतनी ही दूर खड़े हो — पर वहाँ तो बस दीवार है; उस बिंदु पर कोई प्रकाश नहीं पहुँचता, और तुम उसे कभी परदे पर नहीं पकड़ सकते। आभासी (और सीधा)।
- आवर्धक लेंस के नीचे दिखता बड़ा अक्षर, और उत्तल रियर-व्यू / दुकान के दर्पण का चौड़ा नज़ारा — दोनों आभासी, दोनों सीधे।
आगे आने वाले गणित से एक बढ़िया जोड़: ऋणात्मक आवर्धन m यानी वास्तविक और उल्टा; धनात्मक m यानी आभासी और सीधा। बस यही एक चिह्न पूरी कहानी बता देता है।
अवतल दर्पण में प्रतिबिंब
अवतल दर्पण ही मज़ेदार है — इसका प्रतिबिंब पूरी तरह बदल जाता है इस बात पर कि वस्तु कहाँ रखी है। पूरी तस्वीर यह रही:
| वस्तु की स्थिति | प्रतिबिंब की स्थिति | आकार | प्रकृति |
|---|---|---|---|
| अनंत पर | F पर | बिंदु जितना | वास्तविक, उल्टा |
| C से परे | F और C के बीच | छोटा | वास्तविक, उल्टा |
| C पर | C पर | बराबर | वास्तविक, उल्टा |
| C और F के बीच | C से परे | बड़ा | वास्तविक, उल्टा |
| F पर | अनंत पर | बहुत बड़ा | वास्तविक, उल्टा |
| P और F के बीच | दर्पण के पीछे | बड़ा | आभासी, सीधा |
पैटर्न देखिए: जैसे-जैसे वस्तु दर्पण के पास आती है, प्रतिबिंब दूर जाता है और बड़ा होता जाता है — जब तक वस्तु फोकस के अंदर न आ जाए, और तब प्रतिबिंब पलटकर आभासी, सीधा और बड़ा हो जाता है (यही शेविंग/मेकअप दर्पण वाली स्थिति है)।
किसी पास की वस्तु का प्रतिबिंब ढूँढने के लिए वस्तु की चोटी से सिर्फ़ दो किरणें चाहिए: एक अक्ष के समानांतर (जो परावर्तित होकर F से गुज़रती है), और एक ध्रुव P की ओर (जो अक्ष के सापेक्ष सममित परावर्तित होती है)। जहाँ दोनों परावर्तित किरणें मिलती हैं वहीं प्रतिबिंब की चोटी है।
एक स्थिति ख़ास है और इस “चोटी से दो किरणें” वाली विधि में ठीक नहीं बैठती: एक बहुत दूर की वस्तु, जिसका प्रकाश चोटी से फैलती किरणों के बजाय एक समानांतर पुंज के रूप में दर्पण तक पहुँचता है (नीचे पहला आरेख)।
वस्तु अनंत पर → F पर एक बिंदु प्रतिबिंब
अनंत पर रखी वस्तु से समानांतर किरणें क्यों? वस्तु के हर बिंदु से प्रकाश चारों दिशाओं में फैलता है — पर वस्तु जितनी दूर होगी, दर्पण तक पहुँचते-पहुँचते वे किरणें उतनी ही कम फैली होंगी। किसी बहुत दूर की चीज़ से — सूरज, दूर की पहाड़ी, कोई तारा — किसी बिंदु से आती किरणें इतनी दूर चल चुकी होती हैं कि वे लगभग समानांतर आती हैं (इसीलिए हम सूरज की रोशनी को समानांतर पुंज मानते हैं)। तो “अनंत पर वस्तु” के लिए हम चोटी से दो किरणें नहीं खींचते; हम समानांतर किरणों का एक पुंज खींचते हैं, और अवतल दर्पण उन सबको F पर एक बिंदु पर ले आता है।
असल ज़िंदगी में: यही परावर्ती दूरबीन (telescope) और सौर कुकर / सौर भट्ठी का सिद्धांत है — एक बड़ा अवतल दर्पण दूर के स्रोत से आती लगभग-समानांतर किरणों को फोकस पर इकट्ठा कर देता है।
वस्तु C से परे → प्रतिबिंब F और C के बीच
असल ज़िंदगी में: जब तुम शेविंग दर्पण से काफ़ी दूर खड़े होते हो तो अपना यही छोटा, उल्टा रूप दिखता है — और किसी दूर के दृश्य का यही छोटा, वास्तविक प्रतिबिंब परावर्ती दूरबीन का मुख्य दर्पण बनाता है, जिसे फिर नेत्रिका बड़ा कर देती है।
वस्तु C पर → प्रतिबिंब C पर (बराबर आकार)
असल ज़िंदगी में: चूँकि वस्तु और उसका प्रतिबिंब दोनों C पर साथ बैठते हैं, यही प्रयोगशाला में अवतल दर्पण की वक्रता त्रिज्या नापने की सीधी तरकीब है — परदा तब तक खिसकाओ जब तक तीखा प्रतिबिंब वस्तु के ठीक बग़ल में न बने, और वह दूरी R है (तो f = R/2)।
वस्तु C और F के बीच → प्रतिबिंब C से परे
असल ज़िंदगी में: वास्तविक और बड़ा प्रतिबिंब वहाँ चाहिए जहाँ तेज़, बड़ा प्रकाश-धब्बा फेंकना हो — जैसे सौर सांद्रक (सोलर कुकर की डिश सूरज की गर्मी का बड़ा, तीव्र प्रतिबिंब बनाती है) और परावर्ती प्रोजेक्टर / फ्लडलाइट परावर्तक।
वस्तु F पर → प्रतिबिंब अनंत पर
तो प्रतिबिंब बनता है या नहीं? जब परावर्तित किरणें ठीक समानांतर निकलती हैं, तो वे कभी सचमुच मिलतीं नहीं — वे बस अनंत दूरी पर ही “मिलेंगी”। “अनंत पर प्रतिबिंब” का बस यही मतलब है: किसी सामान्य दूरी पर कोई वास्तविक प्रतिबिंब नहीं बनता जिसे तुम परदे पर पकड़ सको। यह वास्तविक प्रतिबिंब (F से परे वस्तु) और आभासी प्रतिबिंब (F के अंदर वस्तु) के बीच की धार-जैसी सीमा-स्थिति है। इसका फ़ायदा उल्टी दिशा में है — F पर रखा एक तेज़ स्रोत उसी समानांतर पुंज के रूप में निकलता है — और अगर तुम ऐसे दर्पण में देखो, तो तुम्हारी विश्रांत आँख उन समानांतर किरणों को रेटिना पर फोकस कर लेती है, तो स्रोत अनंत दूर बैठा-सा दिखता है।
असल ज़िंदगी में: इसे उल्टा चलाओ — फोकस पर ठीक एक बल्ब रखो और दर्पण हर किरण को एक ही तेज़ समानांतर किरण-पुंज के रूप में बाहर भेजता है जो दूर तक मुश्किल से फैलता है। टॉर्च, गाड़ी की हेडलाइट, सर्चलाइट और लाइटहाउस परावर्तक इसी तरह दूर तक जाने वाली किरण फेंकते हैं।
वस्तु P और F के बीच → प्रतिबिंब दर्पण के पीछे
असल ज़िंदगी में: तुम्हें पास से अपने चेहरे का सीधा और बड़ा नज़ारा चाहिए — तो यही शेविंग / मेकअप दर्पण वाली स्थिति है, और यही सीधा-बड़ा करने का गुण डेंटिस्ट के दर्पण को दाँत का बड़ा नज़ारा दिखाने देता है।
उत्तल दर्पण में प्रतिबिंब
उत्तल दर्पण आसान है: आप कुछ भी करें, प्रतिबिंब हमेशा आभासी, सीधा और छोटा होता है, दर्पण के पीछे P और F के बीच। ये चौड़ा, सिकुड़ा हुआ नज़ारा ही वजह है कि इसे गाड़ी के रियर-व्यू दर्पण में लगाते हैं — ये बड़ा इलाक़ा दिखाता है, भले चीज़ें छोटी (और इसलिए “लगने से ज़्यादा पास”) दिखें।
वस्तु अनंत पर → दर्पण के पीछे F पर एक बिंदु प्रतिबिंब
वस्तु किसी निश्चित दूरी पर → प्रतिबिंब P और F के बीच (पीछे)
असल ज़िंदगी में: चूँकि प्रतिबिंब हमेशा सिकुड़ा और सीधा होता है, उत्तल दर्पण एक बहुत बड़ा इलाक़ा छोटे शीशे में समेट लेता है — इसलिए गाड़ी के रियर-व्यू / साइड दर्पण (कई लेन एक साथ दिखें), दुकानों के चोरी-रोधी दर्पण, और अंधे मोड़ों पर लगे दर्पणों के लिए एकदम सही। इस चौड़े नज़ारे की क़ीमत यह है कि चीज़ें छोटी और इसलिए दूर लगती हैं — इसीलिए साइड मिरर पर चेतावनी होती है “objects are closer than they appear”।
टॉर्च या गाड़ी की हेडलाइट में अवतल दर्पण क्यों लगाते हैं, पर साइड-व्यू दर्पण में उत्तल क्यों?
टॉर्च का बल्ब अवतल दर्पण के फोकस पर रखा जाता है, जिससे परावर्तित किरणें समानांतर निकलती हैं — एक तेज़, दूर तक जाने वाली किरण-पुंज। उत्तल दर्पण हमेशा सीधा, छोटा प्रतिबिंब देता है और इसका दृष्टि क्षेत्र चौड़ा होता है, जिससे ड्राइवर पीछे का बड़ा इलाक़ा देख पाता है — आकार से ज़्यादा सुरक्षा ज़रूरी है।
नई कार्तीय चिह्न परिपाटी
किसी भी हिसाब से पहले बही-खाता तय कर लो। ध्रुव को मूल बिंदु मानो और मुख्य अक्ष को x-अक्ष:
- वस्तु हमेशा बाईं ओर होती है, तो प्रकाश बाएँ → दाएँ चलता है।
- आते प्रकाश के उल्टी दिशा में नापी दूरियाँ (बाईं ओर) ऋणात्मक; उसी दिशा में (दाईं ओर) धनात्मक।
- अक्ष के ऊपर की ऊँचाइयाँ धनात्मक; नीचे ऋणात्मक।
जो नतीजे आप बार-बार इस्तेमाल करोगे: वस्तु दूरी u हमेशा ऋणात्मक होती है। अवतल दर्पण की फोकस दूरी ऋणात्मक (F आगे है); उत्तल दर्पण की धनात्मक (F पीछे है)। लेंस के लिए, उत्तल लेंस का f धनात्मक, अवतल लेंस का f ऋणात्मक।
वस्तु दूरी को सूत्र में धनात्मक रखना, जैसे u = +25 cm।
तुम वस्तु दूरी को रूलर पर एक सीधी-सादी लंबाई — 25 cm — की तरह नापते हो, तो उसे धनात्मक +25 लिखना बिल्कुल स्वाभाविक लगता है।
परिपाटी में वस्तु दर्पण/लेंस के बाईं ओर, आते प्रकाश की उल्टी दिशा में होती है, तो उसकी दूरी ऋणात्मक है: वास्तविक वस्तु के लिए हमेशा u = −25 cm लिखो। फिर v और m के चिह्न सूत्र को तय करने दो।
दर्पण सूत्र और आवर्धन
दर्पण सूत्र तीनों दूरियों को जोड़ता है:
1/v + 1/u = 1/f
जहाँ u = वस्तु दूरी, v = प्रतिबिंब दूरी, f = फोकस दूरी। आवर्धन बताता है कि प्रतिबिंब वस्तु के मुक़ाबले कितना बड़ा है:
m = h′/h = −v/u
यहाँ h वस्तु की ऊँचाई, h′ प्रतिबिंब की ऊँचाई है। ऋणात्मक m का मतलब वास्तविक, उल्टा प्रतिबिंब; धनात्मक m का मतलब आभासी, सीधा प्रतिबिंब।
4.0 cm ऊँची एक वस्तु एक अवतल दर्पण से 25.0 cm आगे रखी है, जिसकी फोकस दूरी 15.0 cm है। प्रतिबिंब दूरी, प्रकृति और आकार निकालिए।
- मानों को चिह्न के साथ लिखो। वस्तु बाईं ओर: u = −25.0 cm। अवतल दर्पण: f = −15.0 cm। वस्तु ऊँचाई h = +4.0 cm।
- v निकालने के लिए दर्पण सूत्र। 1/v + 1/u = 1/f से, 1/v = 1/f − 1/u = 1/(−15.0) − 1/(−25.0) = −1/15 + 1/25।
- ल.स. (75): 1/v = (−5 + 3)/75 = −2/75, तो v = −37.5 cm। ऋण चिह्न यानी प्रतिबिंब दर्पण के 37.5 cm आगे है — यानी वास्तविक।
- आवर्धन: m = −v/u = −(−37.5)/(−25.0) = −1.5। ऋणात्मक → वास्तविक और उल्टा। प्रतिबिंब 1.5 गुना ऊँचा, तो h′ = −1.5 × 4.0 = −6.0 cm।
- तो 6.0 cm ऊँचा एक वास्तविक, उल्टा प्रतिबिंब दर्पण के 37.5 cm आगे बनता है — ठीक वहीं जहाँ आप उसे पकड़ने के लिए परदा रखेंगे।
अपवर्तन — प्रकाश क्यों मुड़ता है
अब मुड़ने की बात। जब प्रकाश एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे में तिरछा जाता है, तो वो दिशा बदल लेता है। क्यों? क्योंकि उसकी चाल बदल जाती है। प्रकाश निर्वात में सबसे तेज़ (3 × 10⁸ m/s) चलता है और काँच या पानी में धीमा हो जाता है।
- विरल माध्यम से सघन माध्यम में जाते वक़्त (हवा → काँच) प्रकाश धीमा होता है और अभिलंब की ओर मुड़ता है।
- सघन से विरल में जाते वक़्त (काँच → हवा) वो तेज़ होता है और अभिलंब से दूर मुड़ता है।
पर चाल बदलने से प्रकाश मुड़ता क्यों है?
सिर्फ़ धीमा होना अपने-आप मुड़ना नहीं है — सीधी लाइन में ब्रेक लगाती कार बस धीमी होती है, बग़ल में नहीं मुड़ती। प्रकाश तभी मुड़ता है जब वह सीमा को तिरछा पार करता है, और वजह तब बेहद आसान लगती है जब तुम एक पतली किरण की जगह साथ-साथ बढ़ता एक चौड़ा मोर्चा सोचो — जैसे कंधे से कंधा मिलाकर क़दम-ताल करती सैनिकों की एक पंक्ति।
अब उस पंक्ति को तिरछे, सख़्त सड़क से नरम कीचड़ की ओर मार्च कराओ (कीचड़ = धीमा, सघन माध्यम)। सारे सैनिक एक ही पल में कीचड़ में नहीं घुसते: एक छोर वाले पहले पहुँचकर धीमे हो जाते हैं, जबकि बाक़ी अभी सड़क पर तेज़ क़दम बढ़ा रहे होते हैं। एक छोर पिछड़ता है और दूसरा आगे — तो पूरी पंक्ति घूम जाती है, दिशा बदल देती है, कीचड़ की ओर मुड़ती हुई। बाद में जब सैनिक वापस सख़्त सड़क पर क़दम रखते हैं, तो पहले पहुँचने वाले फिर तेज़ हो जाते हैं और पंक्ति उल्टी ओर घूम जाती है।
प्रकाश का तरंगाग्र (wavefront) बिल्कुल यही करता है। मोर्चे को सैनिकों की पंक्ति की तरह सोचो: जो किनारा सघन माध्यम में पहले घुसता है वह पहले धीमा होता है, तो मोर्चा घूम जाता है — सघन माध्यम में जाते वक़्त अभिलंब की ओर, बाहर आते वक़्त अभिलंब से दूर। धीमे माध्यम में मोर्चे आपस में पास-पास सिमट भी जाते हैं (छोटी तरंगदैर्घ्य), ठीक उन सिमटे सैनिकों की तरह।
इससे एक ख़ास बात भी समझ आती है: अगर प्रकाश सतह पर सीधा (अभिलंब के साथ) टकराए, तो पूरा मोर्चा एक ही पल में धीमा होता है, कोई किनारा पिछड़ता नहीं, और किरण बिना ज़रा भी मुड़े सीधी निकल जाती है — ठीक वैसे ही जैसे तालाब में सीधे नीचे झाँकने पर दिखता है।
बस इसीलिए पानी में पेंसिल मुड़ी दिखती है, तालाब असल से कम गहरा लगता है, और पानी डालने पर सिक्का “ऊपर उठ” आता है — पानी के नीचे से आता प्रकाश सतह छोड़ते वक़्त मुड़ता है, तो वस्तु खिसकी हुई दिखती है।
स्नेल का नियम और अपवर्तनांक
मुड़ने की मात्रा अपवर्तन के नियमों से चलती है:
- आपतित किरण, अपवर्तित किरण और अभिलंब — तीनों एक तल में।
- स्नेल का नियम: किसी दिए माध्यम-युग्म के लिए sin i / sin r = स्थिरांक। वही स्थिरांक अपवर्तनांक (n) है।
अपवर्तनांक चालों की तुलना करता है। किसी माध्यम का (निरपेक्ष) अपवर्तनांक है:
n = (निर्वात में प्रकाश की चाल) / (माध्यम में प्रकाश की चाल) = c/v
तो पानी का n = 1.33 का मतलब प्रकाश निर्वात में पानी से 1.33 गुना तेज़ चलता है। ज़्यादा अपवर्तनांक = प्रकाशिक रूप से सघन = प्रकाश ज़्यादा धीमा = ज़्यादा मुड़ता है।
हीरे का बहुत बड़ा n = 2.42 उसे चमकीला क्यों बनाता है
हीरे का अपवर्तनांक 2.42 रोज़मर्रा की किसी भी चीज़ में सबसे ज़्यादा में से है, और यही एक अकेला आँकड़ा वजह है कि हीरा वैसे चमकता है जैसे काँच का टुकड़ा कभी नहीं चमक सकता। दो बातें मिलकर यह करती हैं:
- प्रकाश उसके अंदर ही फँस जाता है। जब प्रकाश किसी सघन माध्यम के अंदर से वापस हवा में निकलने की कोशिश करता है, तो एक हद होती है: एक ख़ास तिरछेपन — क्रांतिक कोण (critical angle) — के बाद वो बाहर निकल ही नहीं पाता और पूरी तरह वापस अंदर परावर्तित हो जाता है। (इसे पूर्ण आंतरिक परावर्तन कहते हैं, जिसे तुम अध्याय 10 में ठीक से पढ़ोगे।) अपवर्तनांक जितना बड़ा, यह क्रांतिक कोण उतना ही छोटा: हीरे के लिए यह सिर्फ़ लगभग 24° है, जबकि काँच के लिए क़रीब 42°। तो हीरे में घुसी लगभग हर किरण किसी पिछली सतह पर इतनी तिरछी टकराती है कि निकल नहीं पाती, अंदर ही उछलती रहती है, और आख़िर ऊपर से तुम्हारी आँख की ओर निकलती है। हीरे को बड़ी सावधानी से चुने गए फलक-कोणों पर तराशा जाता है ताकि यही फँसा प्रकाश सीधा ऊपर लौटाया जा सके — यही उसकी प्रदीप्ति (brilliance) यानी तेज़ सफ़ेद चमक है।
- यह सफ़ेद प्रकाश को रंगों में बाँट देता है। बड़ा अपवर्तनांक अलग-अलग रंगों को अलग-अलग मात्रा में मोड़ता है (बैंगनी सबसे ज़्यादा धीमा होकर सबसे ज़्यादा मुड़ता है, लाल सबसे कम)। तो हर बार अपवर्तन पर सफ़ेद प्रकाश एक नन्हे वर्णक्रम में फैल जाता है — यही इंद्रधनुषी झलकें जौहरी हीरे की आग (fire) कहते हैं।
काँच (n ≈ 1.5) ये दोनों काम कहीं कमज़ोर ढंग से करता है — उसका क्रांतिक कोण बड़ा है, तो ज़्यादा प्रकाश अंदर उछलने के बजाय बाहर रिस जाता है — इसीलिए तराशा हुआ काँच थोड़ा टिमटिमाता तो है पर असली हीरे की बराबरी कभी नहीं करता।
प्रकाशिक रूप से सघन माध्यम भारी (ज़्यादा द्रव्यमान घनत्व वाला) ही होगा।
रोज़मर्रा की भाषा में 'सघन' का मतलब भारी होता है, और अक्सर दोनों साथ-साथ बढ़ते भी हैं — काँच हवा से भारी भी है और प्रकाशिक रूप से सघन भी — तो यह मान लेना स्वाभाविक लगता है कि 'प्रकाशिक रूप से सघन' यानी 'ज़्यादा द्रव्यमान भरा हुआ'।
प्रकाशिक घनत्व इस बारे में है कि माध्यम प्रकाश को कितना धीमा करता है, न कि उसका प्रति आयतन द्रव्यमान। मिट्टी के तेल का अपवर्तनांक पानी से ज़्यादा है (वो प्रकाशिक रूप से सघन है) फिर भी वो हल्का है और पानी पर तैरता है। तो प्रकाशिक रूप से सघन = बड़ा अपवर्तनांक = प्रकाश को ज़्यादा धीमा करता है, इसका द्रव्यमान घनत्व से कोई लेना-देना नहीं।
प्रकाश हवा से 1.50 अपवर्तनांक वाले काँच में जाता है। वो अभिलंब की ओर मुड़ेगा या दूर, और काँच में उसकी चाल क्या होगी? (c = 3 × 10⁸ m/s)
हवा → काँच यानी विरल → सघन, तो प्रकाश धीमा होकर अभिलंब की ओर मुड़ेगा। उसकी चाल v = c/n = (3 × 10⁸)/1.50 = 2 × 10⁸ m/s होगी।
लेंस — अभिसारी और अपसारी
लेंस एक पारदर्शी पदार्थ है जिसकी कम-से-कम एक सतह घुमावदार होती है। दो प्रकार:
- उत्तल (अभिसारी) लेंस — बीच में मोटा; समानांतर किरणों को फोकस पर मिलाता है। (आवर्धक लेंस।)
- अवतल (अपसारी) लेंस — बीच में पतला; समानांतर किरणों को फैलाता है ताकि वो फोकस से आती हुई प्रतीत हों।
उत्तल लेंस के दो फोकस होते हैं (F₁ और F₂, हर तरफ़ एक) और बीच में एक बिंदु, प्रकाशिक केंद्र (O), जिससे होकर किरण बिना मुड़े गुज़रती है।
लेंस इस तरह प्रकाश क्यों मोड़ता है
लेंस अपवर्तन से काम करता है, और नियम वही है जो काँच के स्लैब में मिला था: काँच में घुसते वक़्त प्रकाश धीमा होकर अभिलंब की ओर मुड़ता है; निकलते वक़्त तेज़ होकर अभिलंब से दूर मुड़ता है। लेंस की सतह पर किसी बिंदु का अभिलंब बस वहाँ सतह के लंबवत रेखा है — तो घुमावदार सतह पर वह बिंदु-दर-बिंदु झुकता रहता है, और इसी से लेंस अलग-अलग किरणों को अलग-अलग मात्रा में मोड़ता है।
नतीजा देखने का सबसे तेज़ तरीक़ा है लेंस को प्रिज़्मों के ढेर की तरह सोचना। उत्तल लेंस का ऊपरी आधा हिस्सा एक ऐसे प्रिज़्म जैसा है जिसका आधार अक्ष की ओर है, और निचला आधा एक ऐसे प्रिज़्म जैसा जिसका आधार नीचे से अक्ष की ओर है। चूँकि प्रिज़्म हमेशा प्रकाश को अपने मोटे आधार की ओर मोड़ता है, ऊपरी आधा किरणों को नीचे मोड़ता है और निचला आधा ऊपर — दोनों अक्ष की ओर — तो किरणें F पर मिल जाती हैं। अवतल लेंस उल्टा है: उसके प्रिज़्मों के आधार बाहर की ओर हैं, इसलिए वह प्रकाश को फैला देता है।
तो दर्पण की तरह, अंदाज़ा कभी नहीं लगाना पड़ता: सतह का अभिलंब ढूँढो, मुड़ने का नियम लगाओ (काँच में अभिलंब की ओर, बाहर निकलते दूर), और उत्तल लेंस हमेशा किरणों को अक्ष की ओर खिसका देता है।
उत्तल लेंस में प्रतिबिंब
वस्तु की चोटी से दो किरणें लो: एक अक्ष के समानांतर (जो मुड़कर F₂ से गुज़रती है), और एक प्रकाशिक केंद्र O से होकर (जो सीधी जाती है)। जहाँ वे मिलती हैं वहीं प्रतिबिंब है।
वस्तु अनंत पर → F₂ पर एक बिंदु प्रतिबिंब
असल ज़िंदगी में: दूरबीन (और बाइनॉक्युलर) का अभिदृश्यक (objective) लेंस किसी दूर के तारे, ग्रह या पहाड़ी से आती लगभग-समानांतर किरणों को इकट्ठा करके अपने फोकस पर एक तीखा वास्तविक प्रतिबिंब बनाता है, जिसे फिर नेत्रिका बड़ा कर देती है। इसी “समानांतर किरणों को एक बिंदु पर लाने” से एक आतशी शीशा (burning glass) या सौर सांद्रक सूरज की किरणों को इतने नन्हे गरम धब्बे पर इकट्ठा कर देता है कि काग़ज़ झुलस जाए या पानी खौल उठे। चूँकि स्रोत बहुत दूर है, प्रतिबिंब बस एक बिंदु जितना होता है — इतनी सारी रोशनी एक जगह समेटने की यही क़ीमत है।
वस्तु 2F₁ से परे → F₂ और 2F₂ के बीच प्रतिबिंब
असल ज़िंदगी में: कैमरा — और तुम्हारे फ़ोन का लेंस, और यहाँ तक कि तुम्हारी अपनी आँख भी (अध्याय 10)। दृश्य सेंसर, फ़िल्म या रेटिना से कहीं बड़ा होता है, इसलिए तुम्हें एक वास्तविक प्रतिबिंब चाहिए (जो सचमुच सेंसर पर पड़े) जो सिकुड़ा हो ताकि फ़िट हो जाए। चूँकि वस्तु के पास या दूर खिसकने पर प्रतिबिंब की दूरी थोड़ी बदल जाती है, कैमरा अपने लेंस को आगे-पीछे सरकाकर दोबारा फ़ोकस करता है — और तुम्हारी आँख यही काम अपने लेंस का आकार बदलकर करती है।
वस्तु 2F₁ पर → 2F₂ पर प्रतिबिंब (बराबर आकार)
असल ज़िंदगी में: 1:1 पर सेट किया गया फ़ोटोकॉपियर या स्कैनर, जहाँ नक़ल असली से बिल्कुल बराबर आकार की निकलनी चाहिए। यही ख़ास स्थिति प्रयोगशाला में उत्तल लेंस की फोकस दूरी नापने की मानक विधि भी है: वस्तु और परदा तब तक खिसकाओ जब तक प्रतिबिंब वास्तविक, उल्टा और बराबर आकार का न बने — तब जो वस्तु-दूरी मिलती है वह 2f होती है, यानी f उसका आधा।
वस्तु F₁ और 2F₁ के बीच → 2F₂ से परे प्रतिबिंब
असल ज़िंदगी में: स्लाइड / फ़िल्म प्रोजेक्टर, सिनेमा प्रोजेक्टर, ओवरहेड प्रोजेक्टर और फ़ोटो एनलार्जर — सभी को एक वास्तविक प्रतिबिंब चाहिए (जो किसी दूर के परदे या काग़ज़ पर पकड़ा जाए) जो छोटी मूल चीज़ से बड़ा हो। चूँकि प्रतिबिंब उल्टा बनता है, स्लाइड और फ़िल्म जान-बूझकर उल्टी लगाई जाती हैं ताकि तस्वीर परदे पर सीधी पड़े। स्लाइड जितनी F₁ के पास खिसकती है, प्रक्षेपित प्रतिबिंब उतना ही बड़ा — और दूर — होता जाता है, इसीलिए बड़े परदे को भरने के लिए प्रोजेक्टर पीछे सरकाते हैं।
वस्तु F₁ पर → प्रतिबिंब अनंत पर
असल ज़िंदगी में: इस स्थिति को उल्टा चलाओ। F₁ पर ठीक एक तेज़ स्रोत रखो और किरणें लेंस से एक ऐसे समानांतर किरण-पुंज के रूप में निकलती हैं जो चाहे कितना भी दूर जाए, मुश्किल से फैलता है — लेंस से बनी सर्चलाइट, स्पॉटलाइट या लाइटहाउस की किरण का, और स्पेक्ट्रोमीटर जैसे प्रकाशिक यंत्रों में स्थिर समानांतर पुंज भेजने वाले कोलिमेटर / कंडेंसर का यही सिद्धांत है। यह अवतल दर्पण के फोकस पर बल्ब रखने का लेंस-वाला जुड़वाँ है।
वस्तु F₁ के अंदर → उसी ओर प्रतिबिंब (आवर्धक लेंस)
असल ज़िंदगी में: आवर्धक लेंस (magnifying glass) और जौहरी का लूप — लेंस को पास रखो ताकि वस्तु फोकस के ठीक अंदर बैठे, और तुम्हें एक सीधा, बड़ा प्रतिबिंब दिखे जिसे सीधे देखा जा सके। यहाँ कुछ प्रक्षेपित नहीं होता: बड़ा प्रतिबिंब आभासी है, वस्तु की उसी ओर, इसलिए उसे सिर्फ़ देखा जा सकता है, परदे पर कभी पकड़ा नहीं जा सकता। यही “वस्तु फोकस के ठीक अंदर” वाली तरकीब सूक्ष्मदर्शी या दूरबीन की नेत्रिका में पहले लेंस के बने वास्तविक प्रतिबिंब को बड़ा करने में, और फ़ोन-कैमरे के क्लिप-ऑन मैक्रो लेंस में इस्तेमाल होती है।
अवतल लेंस में प्रतिबिंब
अवतल (अपसारी) लेंस सबसे आसान है: वस्तु कहीं भी रखो, प्रतिबिंब आभासी, सीधा और छोटा होता है, जो लेंस और F₁ के बीच, वस्तु की उसी ओर बनता है। वस्तु हिलाने पर ये मुश्किल से बदलता है — बस थोड़ा और सिकुड़कर लेंस की ओर खिसक जाता है। वही दो किरणें इसे बनाती हैं (समानांतर किरण F₁ से आती हुई फैलती है; केंद्रीय किरण सीधी जाती है), और प्रतिबिंब वहाँ बनता है जहाँ उनकी पीछे की ओर खींची रेखाएँ मिलती हैं।
वस्तु अनंत पर → F₁ पर एक बिंदु प्रतिबिंब
वस्तु 2F₁ से परे → O और F₁ के बीच प्रतिबिंब
वस्तु 2F₁ पर → O और F₁ के बीच प्रतिबिंब
वस्तु F₁ और 2F₁ के बीच → O और F₁ के बीच प्रतिबिंब
वस्तु F₁ के अंदर → लेंस के बहुत पास प्रतिबिंब
असल ज़िंदगी में — हर वस्तु-स्थिति पर एक जैसा। चूँकि अवतल लेंस वस्तु चाहे कहीं भी हो, एक ही तरह का प्रतिबिंब बनाता है — आभासी, सीधा और छोटा — इसके सारे काम वस्तु-दूरी पर नहीं, बस इसी एक गुण पर टिके हैं:
- निकट-दृष्टि दोष (मायोपिया) का चश्मा। निकट-दृष्टि वाली आँख प्रकाश को ज़रूरत से ज़्यादा मोड़कर दूर की वस्तु को रेटिना के आगे फ़ोकस कर देती है। अवतल लेंस आती किरणों को पहले थोड़ा फैला देता है, ताकि विश्रांत आँख फिर उन्हें ठीक रेटिना पर फ़ोकस कर सके। (मायोपिया का सुधार अध्याय 10 में फिर मिलेगा।)
- दरवाज़े का पीपहोल / “डोर व्यूअर”। इसका चौड़ा, सिकुड़ा, हमेशा-सीधा नज़ारा पूरे गलियारे को एक नन्हे छेद में समेट देता है, ताकि बिना दरवाज़ा खोले तुम बाहर खड़े व्यक्ति का चौड़ा चित्र देख सको।
- गैलीलियो दूरबीन (और पुरानी ओपेरा-दूरबीन) की नेत्रिका। अपसारी नेत्रिका एक सीधा नज़ारा देती है — साधारण उत्तल नेत्रिका के उल्टे नज़ारे के बजाय — जो धरती पर दूर की चीज़ें देखने के लिए ठीक रहता है।
- प्रकाशिक तंत्रों में किरण फैलाना। अवतल लेंस किसी पतली किरण को चौड़ा करने (लेज़र और प्रोजेक्टर प्रकाशिकी का “बीम एक्सपैंडर”) और अच्छे कैमरा व बाइनॉक्युलर लेंसों के अंदर अंतिम प्रतिबिंब को तीखा रखने वाले सुधारक तत्व के रूप में इस्तेमाल होता है।
संक्षेप में, अवतल लेंस तब चुनो जब चाहिए हो एक छोटा, सीधा, चौड़ा-पर-सिकुड़ा नज़ारा, या बस प्रकाश को फैलाना हो।
लेंस सूत्र, आवर्धन और क्षमता
लेंस सूत्र दर्पण सूत्र जैसा ही दिखता है पर ऋण के साथ:
1/v − 1/u = 1/f
और लेंस के लिए आवर्धन है m = h′/h = v/u (ध्यान दें: यहाँ ऋण चिह्न नहीं, दर्पण के उलट)।
2.0 cm ऊँची एक वस्तु एक उत्तल लेंस से 15 cm आगे रखी है, जिसकी फोकस दूरी 10 cm है। प्रतिबिंब की स्थिति, प्रकृति और आकार निकालिए।
- चिह्न: u = −15 cm, f = +10 cm (उत्तल), h = +2.0 cm।
- लेंस सूत्र: 1/v − 1/u = 1/f, तो 1/v = 1/f + 1/u = 1/10 + 1/(−15) = 1/10 − 1/15।
- ल.स. (30): 1/v = (3 − 2)/30 = 1/30, तो v = +30 cm। धनात्मक → प्रतिबिंब लेंस की दूसरी तरफ़ → वास्तविक।
- आवर्धन: m = v/u = 30/(−15) = −2। ऋणात्मक → वास्तविक, उल्टा। प्रतिबिंब ऊँचाई h′ = m × h = −2 × 2.0 = −4.0 cm।
- तो 4.0 cm ऊँचा एक वास्तविक, उल्टा प्रतिबिंब लेंस से 30 cm परे बनता है — वस्तु से दोगुना बड़ा। इसी तरह प्रोजेक्टर परदे पर बड़ा प्रतिबिंब फेंकता है।
आख़िर में, लेंस की क्षमता बताती है कि लेंस प्रकाश को कितनी ज़ोर से मोड़ता है:
P = 1/f (f मीटर में), जिसकी इकाई डायोप्टर (D) है।
उत्तल लेंस की क्षमता धनात्मक, अवतल की ऋणात्मक। +2.0 D लेंस उत्तल है जिसका f = +0.50 m। जब लेंस साथ रखे जाएँ, तो क्षमताएँ बस जुड़ जाती हैं: P = P₁ + P₂ + … — ठीक इसी तरह नेत्र-परीक्षक टेस्ट लेंस जमाकर आपका नंबर निकालते हैं।
आम ग़लतियाँ
अवतल दर्पण के लिए f = +15 cm रखना क्योंकि 15 धनात्मक संख्या है।
15 एक धनात्मक संख्या के रूप में लिखी है और f बस एक लंबाई जैसी दिखती है, तो उसे सीधे +15 रख देना स्वाभाविक लगता है।
f का चिह्न परिपाटी से आता है, उस संख्या से नहीं जो आपको बताई गई। अवतल दर्पण का फोकस उसके आगे (बाईं ओर, प्रकाश की उल्टी दिशा) होता है, तो f ऋणात्मक है: अवतल दर्पण और अवतल लेंस → f ऋणात्मक, उत्तल दर्पण और उत्तल लेंस → f धनात्मक। मान रखने से पहले चिह्न तय करो।
लेंस के लिए दर्पण वाला आवर्धन सूत्र m = −v/u इस्तेमाल करना।
दर्पण और लेंस दोनों एक ही चिह्न m, v और u इस्तेमाल करते हैं, और इनके सूत्र लगभग एक जैसे दिखते हैं, तो यह मान लेना आसान है कि एक ही सूत्र दोनों पर चलेगा।
ये अलग हैं: दर्पण m = −v/u, पर लेंस m = v/u। इसी तरह दर्पण सूत्र जोड़ता है (1/v + 1/u) जबकि लेंस सूत्र घटाता है (1/v − 1/u)।
झटपट जाँच
एक अवतल दर्पण की वक्रता त्रिज्या 20 cm है। उसकी फोकस दूरी क्या है?
f = R/2 = 20/2 = 10 cm। फोकस हमेशा ध्रुव और वक्रता केंद्र के बीचोबीच होता है।
आप किसी दर्पण से चाहे कितनी भी दूर खड़े हों, आपका प्रतिबिंब हमेशा सीधा दिखता है। ये कौन-सा दर्पण हो सकता है?
अवतल दर्पण दूर की वस्तु का उल्टा (वास्तविक) प्रतिबिंब देता है, तो वो हट गया। समतल और उत्तल दोनों किसी भी स्थिति की वस्तु का सीधा (आभासी) प्रतिबिंब देते हैं।
शब्दकोश की छोटी छपाई पढ़ने के लिए आप कौन-सा लेंस चुनेंगे?
आपको आवर्धक चाहिए → उत्तल (अभिसारी) लेंस, जिसे वस्तु को फोकस के अंदर रखकर बड़ा, सीधा, आभासी प्रतिबिंब पाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। छोटी फोकस दूरी (5 cm) ज़्यादा आवर्धन देती है।
अभ्यास के सवाल
रियर-व्यू दर्पण के रूप में इस्तेमाल एक उत्तल दर्पण की वक्रता त्रिज्या 3.00 m है। एक बस 5.00 m दूर है। प्रतिबिंब की स्थिति, प्रकृति और आकार-गुणक निकालिए।
चिह्न: उत्तल दर्पण, तो f = +R/2 = +3.00/2 = +1.50 m। वस्तु: u = −5.00 m।
दर्पण सूत्र: 1/v = 1/f − 1/u = 1/1.50 − 1/(−5.00) = 1/1.50 + 1/5.00।
समान हर: 1/v = (5.00 + 1.50)/7.50 = 6.50/7.50, तो v = +1.15 m। धनात्मक → प्रतिबिंब दर्पण के 1.15 m पीछे → आभासी।
आवर्धन: m = −v/u = −(1.15)/(−5.00) = +0.23। धनात्मक → आभासी और सीधा; 0.23 → प्रतिबिंब करीब चौथाई आकार में सिकुड़ा।
तो प्रतिबिंब आभासी, सीधा और छोटा है — ठीक जैसा रियर-व्यू दर्पण देता है।
5 cm लंबी एक वस्तु एक अभिसारी (उत्तल) लेंस से 25 cm दूर रखी है, जिसकी फोकस दूरी 10 cm है। प्रतिबिंब की स्थिति, आकार और प्रकृति निकालिए।
चिह्न: u = −25 cm, f = +10 cm (उत्तल), h = +5 cm।
लेंस सूत्र: 1/v = 1/f + 1/u = 1/10 + 1/(−25) = 1/10 − 1/25।
ल.स. (50): 1/v = (5 − 2)/50 = 3/50, तो v = +50/3 ≈ +16.7 cm। धनात्मक → वास्तविक प्रतिबिंब दूसरी तरफ़।
आवर्धन: m = v/u = (16.7)/(−25) = −0.67। ऋणात्मक → वास्तविक, उल्टा। प्रतिबिंब ऊँचाई h′ = m × h = −0.67 × 5 = −3.3 cm।
तो करीब 3.3 cm ऊँचा एक वास्तविक, उल्टा, छोटा प्रतिबिंब लेंस से ~16.7 cm परे बनता है। (वस्तु 2F से परे → प्रतिबिंब F और 2F के बीच, छोटा — तालिका से मेल खाता है।)
7.0 cm आकार की एक वस्तु एक अवतल दर्पण से 27 cm आगे रखी है, जिसकी फोकस दूरी 18 cm है। तीखे प्रतिबिंब के लिए परदा कहाँ रखें? प्रतिबिंब का आकार और प्रकृति निकालिए।
चिह्न: अवतल दर्पण, f = −18 cm। वस्तु: u = −27 cm, h = +7.0 cm।
दर्पण सूत्र: 1/v = 1/f − 1/u = 1/(−18) − 1/(−27) = −1/18 + 1/27।
ल.स. (54): 1/v = (−3 + 2)/54 = −1/54, तो v = −54 cm। ऋणात्मक → प्रतिबिंब दर्पण के 54 cm आगे, तो परदा वहीं रखें — ये वास्तविक प्रतिबिंब है।
आवर्धन: m = −v/u = −(−54)/(−27) = −54/27 = −2.0। ऋणात्मक → वास्तविक और उल्टा। प्रतिबिंब ऊँचाई h′ = m × h = −2.0 × 7.0 = −14.0 cm।
14 cm ऊँचा एक वास्तविक, उल्टा, बड़ा प्रतिबिंब दर्पण के 54 cm आगे बनता है। (वस्तु C और F के बीच — यहाँ C = 36 cm, F = 18 cm, और 27 इनके बीच है — तो प्रतिबिंब C से परे और बड़ा, जैसा तालिका बताती है।)
सारांश
- प्रकाश दर्पणों से परावर्तित होता है (आपतन कोण = परावर्तन कोण) और माध्यमों के बीच जाते वक़्त अपवर्तित (मुड़ता) है क्योंकि उसकी चाल बदलती है।
- अवतल दर्पण प्रकाश को एकत्र करते हैं; उत्तल दर्पण फैलाते हैं। दोनों के लिए फोकस दूरी f = R/2।
- अवतल दर्पण का प्रतिबिंब वस्तु की स्थिति से बदलता है (ज़्यादातर स्थितियों में वास्तविक/उल्टा, वस्तु F के अंदर हो तो आभासी/सीधा/बड़ा)। उत्तल दर्पण का प्रतिबिंब हमेशा आभासी, सीधा, छोटा।
- दर्पण सूत्र: 1/v + 1/u = 1/f, आवर्धन m = −v/u। नई कार्तीय चिह्न परिपाटी इस्तेमाल करो (वस्तु दूरी ऋणात्मक; अवतल f ऋणात्मक, उत्तल f धनात्मक)।
- सघन माध्यम में घुसते वक़्त प्रकाश अभिलंब की ओर मुड़ता है, छोड़ते वक़्त दूर। अपवर्तनांक n = c/v; ज़्यादा n = प्रकाशिक रूप से सघन = ज़्यादा मुड़ता है।
- उत्तल लेंस एकत्र करते हैं (धनात्मक f), अवतल लेंस फैलाते हैं (ऋणात्मक f)। लेंस सूत्र: 1/v − 1/u = 1/f, आवर्धन m = v/u।
- क्षमता P = 1/f (f मीटर में), इकाई डायोप्टर; उत्तल धनात्मक, अवतल ऋणात्मक; साथ रखे लेंसों की क्षमताएँ जुड़ जाती हैं।
आगे क्या?
अब आप समझ गए कि कोई एक दर्पण या लेंस प्रकाश को मोड़कर प्रतिबिंब कैसे बनाता है। पर आपके पास सबसे बढ़िया प्रकाशिक यंत्र है आपकी आँख — एक जीवित उत्तल लेंस जो अपने आप फोकस करता है। अध्याय 10: मानव नेत्र तथा रंगबिरंगा संसार में आप देखेंगे कि आँख प्रतिबिंब कैसे बनाती है, कुछ लोगों को वही चश्मे के लेंस क्यों चाहिए जो आपने अभी पढ़े (निकट-दृष्टि और दूर-दृष्टि दोष ठीक करने को), और अपवर्तन आसमान को नीला, सूर्यास्त को लाल कैसे रंगता है और प्रिज़्म से श्वेत प्रकाश को इंद्रधनुष में कैसे बाँटता है।