आनुवंशिकता
यह क्यों ज़रूरी है
आपकी आँखें माँ जैसी हैं, शायद नाक पापा जैसी, और कद हो सकता है दादाजी जैसा। बच्चा साफ़ तौर पर अपने माता-पिता वाली ही प्रजाति का होता है — दो हाथ, दो आँखें, वही बुनियादी बनावट — फिर भी वो किसी एक की बिलकुल कॉपी नहीं दिखता। आख़िर ये होता कैसे है? लक्षण माँ-बाप से बच्चों में कैसे जाते हैं, और बच्चे फिर भी थोड़े अलग क्यों रहते हैं?
यही पूरा सवाल है आनुवंशिकता का: एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में लक्षणों (जिन्हें ट्रेट या लक्षण कहते हैं) का जाना। और ये कोई गोलमोल चीज़ नहीं है — ये हैरान कर देने वाले साफ़ नियमों से चलता है। एक सौ साल से भी पहले, ग्रेगर मेंडल नाम के एक पादरी ने धीरज से मटर के पौधे गिन-गिनकर ये नियम निकाले — तब किसी को DNA के बारे में पता तक नहीं था।
ये नियम बहुत कुछ समझाते हैं: एक लक्षण एक पीढ़ी “छोड़” कर पोते में फिर से क्यों आ जाता है, दो भूरी आँखों वाले माँ-बाप का बच्चा नीली आँखों वाला कैसे हो सकता है, और — ये सबसे बड़ी बात है — बच्चा लड़का होगा या लड़की, ये माँ नहीं बल्कि पिता तय करते हैं। इस अध्याय के आख़िर तक आप एक आसान-सी ग्रिड (पनेट वर्ग) से किसी क्रॉस का नतीजा खुद बता पाएँगे।
मुख्य विचार
लैंगिक जनन करने वाले जीव में हर लक्षण को जीन की दो प्रतियाँ चलाती हैं — एक माँ से, एक पिता से। ये दोनों एक जैसी हो सकती हैं या अलग। जब अलग होती हैं, तो जो रूप दिखता है वो प्रभावी लक्षण है और जो छिपा रहता है वो अप्रभावी लक्षण। अप्रभावी लक्षण खोता नहीं — वो किसी बाद की पीढ़ी में दोबारा आ सकता है।
तर्क की कड़ी ऐसे है। माँ और पिता दोनों बच्चे को लगभग बराबर आनुवंशिक पदार्थ देते हैं। तो हर लक्षण के लिए बच्चे के पास दो रूप होते हैं — एक माँ का, एक पिता का। अगर दोनों रूप अलग हों (मान लो “लंबा” और “बौना”), तो शरीर में सिर्फ़ एक ही दिखाई देता है। पर दोनों मौजूद रहते हैं, और दोनों आगे जाते हैं। इसीलिए एक छिपा लक्षण कई पीढ़ियों बाद फिर सामने आ सकता है।
बस यही एक विचार — हर लक्षण की दो प्रतियाँ, एक दिखती है, पर दोनों आगे जाती हैं — पूरे अध्याय की चाबी है।
आइए इसे समझें
पीढ़ियों में विविधता जमा होती है
जब भी कोई जीव जनन करता है, संतान को बुनियादी बनावट तो मिलती ही है, साथ में छोटे-छोटे नए फ़र्क़ भी (DNA की नकल में हुई ज़रा-सी ग़लतियों से)। अब ये संतान भी जनन करती है — और उनकी संतान पुराने फ़र्क़ और कुछ ताज़ा नए फ़र्क़, दोनों लेकर आती है। तो विविधता पीढ़ी-दर-पीढ़ी जमा होती जाती है।
अलैंगिक जनन में (एक जीवाणु टूटकर दो, फिर चार बनता है) फ़र्क़ बहुत मामूली होते हैं — बस नकल की छोटी चूकें। लैंगिक जनन में दो माता-पिता का DNA मिलने से कहीं ज़्यादा विविधता बनती है। इसीलिए गन्ने का खेत (जो अक्सर अलैंगिक तरीके से उगाया जाता है) एक-सा दिखता है, जबकि 40 बच्चों की क्लास में सब अलग-अलग दिखते हैं।
हर विविधता बराबर नहीं बचती — गर्मी झेल सकने वाला जीवाणु लू में बेहतर टिकता है। वातावरण द्वारा काम की विविधताओं का यही चुनाव विकास (evolution) की नींव है, जिसकी बात अगले अध्याय में है।
किसी अलैंगिक जनन करने वाली प्रजाति में लक्षण A आबादी के 10% में और लक्षण B 60% में मिलता है। कौन-सा लक्षण शायद पहले आया होगा?
लक्षण B। अलैंगिक जनन में कोई नई विविधता तभी फैलती है जब वो बँटती कोशिकाओं की कई पीढ़ियों से होकर आगे जाए। जो लक्षण आबादी के 60% में है, उसे फैलने का काफ़ी समय मिला है — यानी वो ज़्यादा संभावना से पहले आया होगा। लक्षण A सिर्फ़ 10% में है, तो वो शायद ज़्यादा नई विविधता है जो अभी उतना नहीं फैली।
मेंडल और मटर के पौधे
मेंडल ने बग़ीचे के मटर इसलिए चुने क्योंकि उनमें साफ़ या-तो-यह-या-वह वाले लक्षण थे: बीज गोल या झुर्रीदार, पौधे लंबे या बौने, फूल बैंगनी या सफ़ेद — बीच का कुछ नहीं। उन्होंने उल्टे लक्षणों वाले पौधों का क्रॉस कराया और — ये सबसे अहम बात है — हर पीढ़ी की संतान को गिना। इसी गिनती से उन्हें पैटर्न दिखा।
उन्होंने शुरुआत एक शुद्ध लंबे पौधे (TT) का एक शुद्ध बौने (tt) से क्रॉस कराकर की। पहली पीढ़ी की संतान को F1 पीढ़ी कहते हैं।
- F1 नतीजा: हर पौधा लंबा निकला। दरमियाने कद का नहीं — सब लंबे। यानी बौना लक्षण जैसे ग़ायब हो गया।
फिर उन्होंने F1 के लंबे पौधों को आपस में (स्व-परागण से) मिलाकर F2 पीढ़ी बनाई:
- F2 नतीजा: करीब तीन-चौथाई लंबे, एक-चौथाई बौने। बौना लक्षण लौट आया!
इससे मेंडल को दो बातें समझ आईं। पहली, बौना लक्षण कभी खोया नहीं था — वो बस F1 में छिपा था और F2 में फिर आ गया। दूसरी, हर पौधे में हर लक्षण के लिए दो कारक होने चाहिए (जिन्हें अब हम जीन कहते हैं)। लंबे वाला रूप “T” प्रभावी है — एक ही T पौधे को लंबा बना देता है। बौने वाला रूप “t” अप्रभावी है — पौधे को बौना होने के लिए दो t (tt) चाहिए।
तो F2 में: TT और Tt दोनों लंबे हैं, सिर्फ़ tt बौना है। ये मेल 1 : 2 : 1 के अनुपात में आते हैं (TT : Tt : tt), जो दिखने में 3 लंबे : 1 बौना लगता है।
बौना लक्षण F1 पीढ़ी में खो गया और F2 में कोई नया बौना लक्षण अचानक आ गया।
बौना लक्षण F1 पौधों में पूरी तरह ग़ायब हो जाता है — हर पौधा लंबा दिखता है — तो सचमुच ऐसा लगता है मानो 'बौना' खो गया और फिर F2 में कहीं से अचानक लौट आया।
कुछ खोया नहीं था: 'बौना' कारक (t) हर F1 पौधे में छिपा था (वे सब Tt हैं — दोनों कारक रखते हैं पर प्रभावी T दिखाते हैं)। जब दो Tt पौधे क्रॉस होते हैं, तो कुछ F2 संतान को tt मिलता है और अप्रभावी बौना लक्षण फिर दिख जाता है।
- युग्मक (जनन कोशिकाएँ) लिखें। हर Tt माता-पिता दो तरह के बनाता है: T और t।
- एक 2×2 पनेट वर्ग बनाएँ — एक माता-पिता के युग्मक ऊपर, दूसरे के बग़ल में, और हर खाने को दोनों मिलाकर भरें।
- चारों खाने पढ़ें: TT, Tt, Tt, tt — यानी 1 : 2 : 1 का अनुपात।
- दिखावट से समूह बनाएँ। TT, Tt, Tt सब लंबे हैं (इनमें कम-से-कम एक T है); सिर्फ़ tt बौना है।
- तो 4 में से 3 लंबे, 4 में से 1 बौना — ठीक वही 3:1 अनुपात जो मेंडल ने गिना था। पनेट वर्ग एक उलझे नतीजे को आसान गणित में बदल देता है।
दोनों F1 माता-पिता Tt हैं। हर माता-पिता हर संतान को एक कारक देता है, बराबर मौके से या तो T या t। आइए हर संभव मेल निकालें।
| T | t | |
|---|---|---|
| T | TT | Tt |
| t | Tt | tt |
एक साथ दो लक्षण — स्वतंत्र वंशागति
अगर आप एक साथ दो लक्षण देखें तो? मेंडल ने गोल-पीले बीज वाले पौधे (RRYY) का क्रॉस झुर्रीदार-हरे बीज वाले (rryy) से कराया। F1 सब गोल और पीले निकले — यानी गोल (R) और पीला (Y) प्रभावी हैं।
पर F2 पीढ़ी में एक चौंकाने वाली बात हुई: गोल-पीले और झुर्रीदार-हरे के साथ-साथ उसे नए मेल भी मिले — गोल-हरे और झुर्रीदार-पीले — जो किसी भी मूल माता-पिता में नहीं थे। बीज के आकार वाला लक्षण और बीज के रंग वाला लक्षण एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से वंशागत हुए, करीब 9 : 3 : 3 : 1 के अनुपात में।
सबक यह: लक्षण बँधे-बँधाए बंडल में नहीं चलते। लैंगिक जनन के दौरान जीन फिर से फेंट दिए जाते हैं, और इसीलिए संतान में ऐसे ताज़ा मेल दिखते हैं जो उनके माता-पिता में कभी नहीं थे — विविधता का एक और स्रोत।
एक लंबा, गोल-बीज वाला पौधा (TtRr) क्रॉस होता है। संतान कितनी तरह की अलग-दिखने वाली हो सकती है, और क्यों?
चार तरह की: लंबा-गोल, लंबा-झुर्रीदार, बौना-गोल, बौना-झुर्रीदार। क्योंकि कद और बीज का आकार स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं, मेल आज़ादी से मिलते हैं — आपको लंबे पौधे झुर्रीदार बीज के साथ और बौने पौधे गोल बीज के साथ मिल सकते हैं, सिर्फ़ दो मूल मेल ही नहीं।
जीन, प्रोटीन और गुणसूत्र
जीन आख़िर लक्षण को चलाता कैसे है? जीन DNA का एक हिस्सा है जो एक प्रोटीन — अक्सर एक एंज़ाइम — बनाने का निर्देश रखता है। पौधे के कद को लें: एक हार्मोन बढ़ोतरी करवाता है, और एक एंज़ाइम वो हार्मोन बनाता है। अगर जीन कारगर एंज़ाइम बनाता है, तो ढेर सारा हार्मोन बनता है और पौधा लंबा होता है। अगर जीन में कोई बदलाव हो जिससे एंज़ाइम कमज़ोर बने, तो कम हार्मोन बनता है और पौधा बौना रहता है। तो जीन प्रोटीन को चलाकर काम करते हैं, और प्रोटीन लक्षण बनाते हैं।
अब, अगर दोनों माता-पिता बराबर देते हैं, तो हर कोशिका में हर जीन की दो प्रतियाँ होनी चाहिए — एक हर माता-पिता से। ये प्रतियाँ DNA के अलग-अलग धागों पर बैठती हैं जिन्हें गुणसूत्र कहते हैं। हर शरीर-कोशिका में गुणसूत्र जोड़ों में होते हैं (हर जोड़े का एक हिस्सा हर माता-पिता से)। पर हर जनन कोशिका (अंडाणु या शुक्राणु) हर जोड़े से सिर्फ़ एक गुणसूत्र रखती है। जब अंडाणु और शुक्राणु मिलते हैं, जोड़े फिर पूरे हो जाते हैं — और चूँकि हर जोड़ा किसी भी माता-पिता से आ सकता है, जीन स्वतंत्र रूप से फेंटे जाते हैं। यही मेंडल के नतीजों के पीछे की मशीनरी है।
मनुष्यों में लिंग कैसे तय होता है
अब सबसे मशहूर हिस्सा। मनुष्यों में गुणसूत्रों के 23 जोड़े होते हैं। बाईस जोड़े पूरी तरह मेल खाते हैं। पर आख़िरी जोड़ा — लिंग गुणसूत्र — ख़ास होता है:
- स्त्रियाँ XX होती हैं — दो मेल खाते X गुणसूत्र।
- पुरुष XY होते हैं — एक X और एक छोटा-सा Y।
अब तर्क पर चलें। माँ (XX) हर अंडाणु में सिर्फ़ X डाल सकती है। पिता (XY) अपने आधे शुक्राणुओं में X और बाकी आधे में Y डालते हैं। तो:
- अंडाणु (X) + X वाला शुक्राणु → XX → लड़की
- अंडाणु (X) + Y वाला शुक्राणु → XY → लड़का
तो हर बच्चे को माँ से X मिलता ही है, चाहे कुछ भी हो। ये पिता का गुणसूत्र — X या Y — है जो बच्चे का लिंग तय करता है, और हर बार ये 50:50 का मौका है।
बच्चा लड़का होगा या लड़की, इसकी ज़िम्मेदार माँ होती है।
चूँकि माँ ही बच्चे को गर्भ में रखती और जन्म देती है, यह मान लेना स्वाभाविक लगता है कि लिंग भी वही तय करती होगी — और दोष अक्सर अनुचित रूप से उसी पर मढ़ दिया जाता है।
माँ XX है, तो वो सिर्फ़ X ही दे सकती है। लिंग पिता (XY) तय करता है, जो या तो X देता है (→ लड़की) या Y (→ लड़का) — यानी पिता का शुक्राणु ही बच्चे का लिंग 50:50 की संभावना से तय करता है।
आम ग़लतियाँ
'प्रभावी' का मतलब है कि वो लक्षण ज़्यादा ताक़तवर, सेहतमंद या आबादी में ज़्यादा आम है।
रोज़मर्रा की भाषा में 'प्रभावी (dominant)' का मतलब ज़्यादा ताक़तवर या दमदार होता है, तो यह मान लेना स्वाभाविक लगता है कि आनुवंशिकी वाला शब्द भी वही मतलब रखता होगा।
प्रभावी सिर्फ़ ये बताता है कि जब दोनों रूप मौजूद हों तो कौन-सा दिखता है (अप्रभावी तब तक छिपा रहता है जब तक अपने ही जैसे रूप के साथ न हो)। इसका ताक़त या आम होने से कोई लेना-देना नहीं — एक प्रभावी लक्षण दुर्लभ हो सकता है और एक अप्रभावी बहुत आम; कितना आम है ये आबादी पर निर्भर करता है, प्रभाविता पर नहीं।
लंबा पौधा ज़रूर TT ही होगा।
हम उम्मीद करते हैं कि लक्षण की शक्ल किसी एक जीनोटाइप से मेल खाए, तो 'लंबा' लगता है मानो उसका मतलब दो एक जैसे अक्षर, TT, ही होना चाहिए।
पौधे को लंबा दिखने के लिए सिर्फ़ एक T काफ़ी है, तो लंबा पौधा TT भी हो सकता है और Tt भी — सिर्फ़ देखकर बताना नामुमकिन है। सिर्फ़ बौना पौधा पक्का tt होता है।
झटपट जाँच
मेंडल के शुद्ध लंबे (TT) × शुद्ध बौने (tt) क्रॉस में पूरी F1 पीढ़ी कैसी दिखी?
हर F1 पौधा Tt है। चूँकि T (लंबा) प्रभावी है, सब लंबे हैं — बौना लक्षण छिपा है, खोया नहीं। वो सिर्फ़ F2 पीढ़ी में फिर दिखता है।
दो माता-पिता जिनके दोनों के कान की लोलकी मुक्त (आज़ाद) है, उनका बच्चा जुड़ी लोलकी (अप्रभावी लक्षण) वाला होता है। ये आपको माता-पिता के बारे में क्या बताता है?
बच्चे के अप्रभावी होने के लिए (दो अप्रभावी प्रतियाँ) उसे हर माता-पिता से एक अप्रभावी कारक मिला होगा। तो दोनों मुक्त-लोलकी वाले माता-पिता वाहक हैं — वो प्रभावी लक्षण दिखाते हैं पर चुपके से अप्रभावी रखते हैं।
मनुष्यों में बच्चे का लिंग कौन तय करता है, और क्यों?
माँ (XX) हमेशा X देती है। पिता (XY) या तो X देता है (→ लड़की) या Y (→ लड़का), तो पिता का गुणसूत्र लिंग तय करता है।
अभ्यास के सवाल
एक मेंडलीय क्रॉस में बैंगनी फूल वाले लंबे मटर के पौधों का सफ़ेद फूल वाले बौने मटर के पौधों से प्रजनन कराया गया। सारी संतान बैंगनी फूल वाली निकली, पर करीब आधी बौनी थी। लंबे, बैंगनी माता-पिता का जीनोटाइप लिखें।
हर लक्षण को अलग-अलग देखें।
फूल का रंग: सारी संतान बैंगनी थी → बैंगनी प्रभावी है और बैंगनी माता-पिता शुद्ध रूप से ही चला, तो वो WW (दो बैंगनी प्रतियाँ) होगा।
कद: करीब आधी संतान बौनी थी। बौना अप्रभावी है (tt), तो संतान को लंबे माता-पिता से एक “t” मिला होगा। यानी लंबा माता-पिता एक T और एक t रखता है → Tt।
तो लंबा, बैंगनी माता-पिता TtWW है। (ये NCERT अभ्यास का विकल्प (c) है।)
रक्त समूह A वाला एक पुरुष रक्त समूह O वाली स्त्री से विवाह करता है, और उनकी बेटी का रक्त समूह O है। सिर्फ़ इस एक परिवार से क्या आप तय कर सकते हैं कि रक्त समूह A प्रभावी है या O? समझाइए।
नहीं, ये एक परिवार तय करने के लिए काफ़ी नहीं है।
बेटी समूह O की है, तो वो दो O कारक रखती है — एक हर माता-पिता से। उसे एक O माँ (समूह O) से मिला और एक O पिता से। तो पिता, हालाँकि समूह A दिखाता है, चुपके से एक O कारक भी रखता है।
ये बताता है कि पिता एक वाहक है, पर ये नहीं बताता कि कौन-सा लक्षण प्रभावी है। ये जानने के लिए हमें कई परिवारों में देखना पड़ेगा कि क्या होता है — ठीक वैसे ही जैसे मेंडल ने आबादी के स्तर पर गिनती की थी। एक अकेला क्रॉस प्रभाविता साबित नहीं कर सकता।
(असल में A, O पर प्रभावी होता है, पर यह अकेला परिवार ये साबित नहीं करता।)
एक अध्ययन में पाया गया कि हल्के रंग की आँखों वाले बच्चों के माता-पिता आमतौर पर हल्के रंग की आँखों वाले होते हैं। क्या सिर्फ़ इस बात से हम तय कर सकते हैं कि हल्की-आँख वाला लक्षण प्रभावी है या अप्रभावी? क्यों या क्यों नहीं?
नहीं, सिर्फ़ इस अवलोकन से हम प्रभाविता तय नहीं कर सकते।
हल्की-आँख वाले बच्चों के माता-पिता का हल्की-आँख वाला होना सिर्फ़ ये दिखाता है कि लक्षण वंशागत होता है — परिवारों में चलता है। ये नहीं बताता कि हल्का रंग प्रभावी है या अप्रभावी।
सोचिए क्यों: अगर हल्का रंग अप्रभावी होता, तो हल्की-आँख वाला बच्चा (दो अप्रभावी प्रतियाँ) हर माता-पिता से एक अप्रभावी प्रति लेगा — और अगर दोनों माता-पिता भी हल्की-आँख वाले हों, तो ये पैटर्न ठीक बैठता है। पर यही पारिवारिक पैटर्न तब भी दिख सकता है अगर हल्का रंग प्रभावी हो। तय करने के लिए आपको पीढ़ियों में क्रॉस देखने और संतान के प्रकारों के अनुपात गिनने होंगे — मसलन, अलग-अलग आँख-रंग वाले माता-पिता के बच्चों को देखकर कि कौन-सा रूप छिपता है। परिवारों के अंदर का तालमेल वंशागति दिखाता है, प्रभाविता नहीं।
सारांश
- आनुवंशिकता माता-पिता से संतान में लक्षणों का जाना है, और ये पक्के नियमों से चलती है — जिन्हें सबसे पहले मेंडल ने मटर के पौधे गिनकर निकाला।
- हर लक्षण को जीन की दो प्रतियाँ चलाती हैं, एक हर माता-पिता से। जब प्रतियाँ अलग हों, तो प्रभावी रूप दिखता है और अप्रभावी छिपा रहता है — पर खोता नहीं।
- शुद्ध लंबा (TT) × शुद्ध बौना (tt) क्रॉस पूरी तरह लंबी F1 (Tt) देता है; F1 के स्व-परागण से F2 में 3 : 1 का अनुपात (लंबे : बौने) मिलता है, जीनोटाइप 1 TT : 2 Tt : 1 tt से। एक पनेट वर्ग इसे पहले से बता देता है।
- दो लक्षण स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं (≈ 9:3:3:1), जिससे F2 में नए मेल बनते हैं — विविधता का बड़ा स्रोत।
- जीन DNA के हिस्से हैं जो प्रोटीन का निर्देश रखते हैं; ये गुणसूत्रों पर बैठते हैं, जो जोड़ों में होते हैं। जनन कोशिकाएँ हर जोड़े से एक गुणसूत्र रखती हैं, और निषेचन पर जोड़ा फिर पूरा हो जाता है।
- मनुष्यों में स्त्रियाँ XX और पुरुष XY होते हैं। बच्चे को माँ से हमेशा X मिलता है; पिता का शुक्राणु (X या Y) लिंग तय करता है — 50:50 का मौका।
आगे क्या?
अब आपने देख लिया कि विविधताएँ कैसे बनती और वंशागत होती हैं — जीवन का कच्चा माल। पर हज़ारों पीढ़ियों में इन विविधताओं का होता क्या है? अध्याय 9: प्रकाश — परावर्तन तथा अपवर्तन में पाठ्यक्रम भौतिकी की ओर मुड़ता है: दर्पण और लेंस प्रकाश को मोड़कर प्रतिबिंब कैसे बनाते हैं, पानी के गिलास में रखा चम्मच मुड़ा हुआ क्यों दिखता है, और वो सूत्र जिनसे आप ठीक-ठीक बता सकते हैं कि प्रतिबिंब कहाँ बनेगा। पनेट वर्ग में जो सोच आपने इस्तेमाल की, वही सोच किरण आरेखों में काम आएगी।