त्रिकोणमिति का परिचय
यह क्यों ज़रूरी है
क़ुतुब मीनार कितनी ऊँची है? तुम उसके 73 मीटर पर ठीक-ठीक नापने का फ़ीता तो नहीं चढ़ा सकते। पर कुछ दूरी पर खड़े हो जाओ, वह दूरी नापो, और जिस कोण पर तुम्हारी आँखें चोटी की ओर ऊपर उठती हैं वह कोण नापो — बिना कुछ चढ़े ही तुम ऊँचाई निकाल सकते हो। जिस नदी को पार नहीं कर सकते वह कितनी चौड़ी है? वही तरकीब। आसमान में तैरता गर्म-हवा का गुब्बारा कितना ऊँचा है? फिर वही तरकीब।
इन सबके पीछे का औज़ार है त्रिकोणमिति — ग्रीक शब्दों tri (तीन), gon (भुजाएँ), metron (माप) से: यानी सीधे-सीधे “त्रिभुजों को नापना”। इसकी बड़ी खोज यह है कि किसी समकोण त्रिभुज में कोण और भुजाएँ निश्चित अनुपातों से आपस में बँधी होती हैं। कोई कोण जान लो, तो त्रिभुज की आकृति तय हो जाती है — तो किन्हीं दो भुजाओं का अनुपात भी तय हो जाता है, चाहे तुम उसे कितना बड़ा या छोटा बनाओ।
शुरुआती खगोलविदों ने ठीक इसी से उन तारों और ग्रहों की दूरियाँ नापीं जिन तक वे कभी पहुँच ही नहीं सकते थे। आज वही अनुपात इंजीनियरिंग, भौतिकी, GPS और कंप्यूटर ग्राफ़िक्स के भीतर बैठे हैं। यह अध्याय नींव रखता है: छह अनुपात, सबसे उपयोगी कोणों पर उनके सटीक मान, और उन्हें जोड़ने वाली तीन सर्वसमिकाएँ — और यह सब एक पुराने दोस्त, पाइथागोरस प्रमेय, से।
मूल विचार
समकोण त्रिभुज में एक न्यून कोण चुनो। तीनों भुजाओं को उसी कोण के सापेक्ष नाम मिलते हैं: जो भुजा उसके सामने हो वह सम्मुख (opposite), जो भुजा उसके साथ (उसे छूती हुई, कर्ण को छोड़कर) हो वह संलग्न (adjacent), और सबसे लंबी तिरछी भुजा कर्ण (hypotenuse)। छह त्रिकोणमितीय अनुपात (sin, cos, tan, और इनके व्युत्क्रम cosec, sec, cot) बस इन्हीं भुजाओं के अनुपात हैं। इनका मुख्य जादू: ये केवल कोण पर निर्भर करते हैं, त्रिभुज के आकार पर नहीं — क्योंकि एक ही न्यून कोण वाले सभी समकोण त्रिभुज समरूप होते हैं, तो उनकी भुजाएँ एक ही अनुपात में रहती हैं।
आओ इसे समझें
छह त्रिकोणमितीय अनुपात
एक समकोण त्रिभुज लो और एक न्यून कोण पर ध्यान दो, उसे θ कहो (ग्रीक अक्षर थीटा)। θ से देखते हुए भुजाओं को नाम दो:
अब परिभाषाएँ। पहले तीन मुख्य अनुपात हैं:
- sin θ = सम्मुख / कर्ण
- cos θ = संलग्न / कर्ण
- tan θ = सम्मुख / संलग्न
बाक़ी तीन बस इनके व्युत्क्रम हैं (उल्टा कर दो):
- cosec θ = 1 / sin θ = कर्ण / सम्मुख
- sec θ = 1 / cos θ = कर्ण / संलग्न
- cot θ = 1 / tan θ = संलग्न / सम्मुख
दो और रिश्ते याद रखने लायक़ हैं, सीधे परिभाषाओं से:
tan θ = sin θ / cos θ और cot θ = cos θ / sin θ
(जाँचो: sin θ / cos θ = (सम्मुख/कर्ण) / (संलग्न/कर्ण) = सम्मुख/संलग्न = tan θ।)
तीन मुख्य अनुपातों के लिए एक याद रखने की चाबी: “SOH-CAH-TOA” — Sin = Opp/Hyp, Cos = Adj/Hyp, Tan = Opp/Adj।
संकेतन पर एक ज़रूरी बात: sin θ एक ही राशि है — “θ का साइन”। यह “sin” को θ से गुणा करना नहीं है; अकेला “sin” कुछ मायने नहीं रखता। साथ ही, हम sin²θ लिखते हैं जिसका मतलब (sin θ)² है, और बाक़ियों के लिए भी यही।
अनुपात केवल कोण पर ही क्यों निर्भर करते हैं
यही वह विचार है जिससे त्रिकोणमिति काम करती है। एक ही न्यून कोण θ वाले दो समकोण त्रिभुज खींचो — एक बहुत छोटा, एक बहुत बड़ा। AA समरूपता कसौटी से (दोनों में एक समकोण और कोण θ है), ये दोनों त्रिभुज समरूप हैं। समरूप त्रिभुजों की भुजाएँ समानुपाती होती हैं, तो सम्मुख/कर्ण दोनों में एक जैसा आता है, और हर दूसरा अनुपात भी। इसीलिए sin θ, cos θ आदि कोण से जुड़े निश्चित अंक हैं — त्रिभुज का आकार बस मायने ही नहीं रखता।
इससे एक त्वरित तथ्य भी समझ आता है: चूँकि कर्ण सबसे लंबी भुजा है, सम्मुख/कर्ण और संलग्न/कर्ण हमेशा 1 से कम रहते हैं। तो sin θ और cos θ कभी 1 से ज़्यादा नहीं हो सकते।
किसी समकोण त्रिभुज में tan A = 4/3 है। A के बाक़ी पाँच त्रिकोणमितीय अनुपात निकालो।
- tan A = सम्मुख/संलग्न = 4/3। तो A के सम्मुख भुजा 4k और संलग्न भुजा 3k है, किसी धन संख्या k के लिए (कोण, और इसलिए हर अनुपात, k चाहे जो हो, वही रहता है)।
- पाइथागोरस से कर्ण निकालो: कर्ण² = (4k)² + (3k)² = 16k² + 9k² = 25k², तो कर्ण = 5k।
- अब मुख्य अनुपात पढ़ लो: sin A = सम्मुख/कर्ण = 4k/5k = 4/5, और cos A = संलग्न/कर्ण = 3k/5k = 3/5।
- व्युत्क्रम इनसे मिलते हैं: cosec A = 1/sin A = 5/4, sec A = 1/cos A = 5/3, cot A = 1/tan A = 3/4। तो sin A = 4/5, cos A = 3/5, tan A = 4/3, cosec A = 5/4, sec A = 5/3, cot A = 3/4।
अगर किसी समकोण त्रिभुज में sin θ = 1/3 है, तो cosec θ क्या है?
कुछ विशेष कोणों के त्रिकोणमितीय अनुपात
कुछ कोण बार-बार आते हैं: 0°, 30°, 45°, 60° और 90°। 30°, 45° और 60° के लिए हमें दो विशेष त्रिभुजों से सटीक मान मिल जाते हैं, जिन्हें तुम रूलर और परकार से बना सकते हो।
45° कोण। एक ऐसा समकोण त्रिभुज लो जिसके दोनों न्यून कोण दोनों 45° हों। तब दोनों भुजाएँ बराबर होती हैं — हर एक को 1 कहो।
पाइथागोरस से, कर्ण² = 1² + 1² = 2, तो कर्ण = √2। अब पढ़ लो, कोई भी 45° कोण लेकर (सम्मुख = 1, संलग्न = 1, कर्ण = √2):
- sin 45° = सम्मुख/कर्ण = 1/√2
- cos 45° = संलग्न/कर्ण = 1/√2
- tan 45° = सम्मुख/संलग्न = 1/1 = 1
30° और 60° कोण। भुजा 2 वाले एक समबाहु त्रिभुज (सभी कोण 60°) से शुरू करो। ऊपरी शीर्ष से आधार पर लंब डालो; वह आधार को ठीक आधा-आधा काटता है और त्रिभुज को दो एक जैसे समकोण त्रिभुजों में बाँट देता है। हर एक में नीचे 60° कोण, ऊपर 30° कोण, आधार = 1 (2 का आधा), और कर्ण = 2 (मूल भुजा) है।
खड़ी भुजा: पाइथागोरस से यह √(2² − 1²) = √(4 − 1) = √3 है। अब दोनों कोण पढ़ लो।
60° कोण के लिए (सम्मुख = √3, संलग्न = 1, कर्ण = 2):
- sin 60° = √3/2, cos 60° = 1/2, tan 60° = √3/1 = √3।
30° कोण के लिए (अब सम्मुख = 1, संलग्न = √3, कर्ण = 2):
- sin 30° = 1/2, cos 30° = √3/2, tan 30° = 1/√3।
0° और 90° कोण। कल्पना करो कि कोण A को 0° की ओर सिकोड़ रहे हैं: सम्मुख भुजा घटकर कुछ नहीं रह जाती, जबकि कर्ण और संलग्न लगभग बराबर हो जाते हैं। तो sin 0° = 0 और cos 0° = 1। A को 90° की ओर धकेलने पर उल्टा होता है — संलग्न भुजा सिकुड़ जाती है — देता है sin 90° = 1 और cos 90° = 0। इनसे, tan 0° = 0/1 = 0, जबकि tan 90° = 1/0 परिभाषित नहीं है। (जिस अनुपात में 0 से भाग देना पड़े वह “परिभाषित नहीं” होता है।)
ये रहे सारे मान एक तालिका में — इसे याद कर लो, पर पैटर्न पर ध्यान दो: sin जाता है 0, 1/2, 1/√2, √3/2, 1 और cos वही सूची उल्टी है।
| ∠A | 0° | 30° | 45° | 60° | 90° |
|---|---|---|---|---|---|
| sin A | 0 | 1/2 | 1/√2 | √3/2 | 1 |
| cos A | 1 | √3/2 | 1/√2 | 1/2 | 0 |
| tan A | 0 | 1/√3 | 1 | √3 | परिभाषित नहीं |
| cosec A | परिभाषित नहीं | 2 | √2 | 2/√3 | 1 |
| sec A | 1 | 2/√3 | √2 | 2 | परिभाषित नहीं |
| cot A | परिभाषित नहीं | √3 | 1 | 1/√3 | 0 |
sin 60° cos 30° + sin 30° cos 60° का मान निकालो।
- तालिका से रखो: sin 60° = √3/2, cos 30° = √3/2, sin 30° = 1/2, cos 60° = 1/2।
- पहला गुणनफल: sin 60° cos 30° = (√3/2)(√3/2) = 3/4। दूसरा गुणनफल: sin 30° cos 60° = (1/2)(1/2) = 1/4।
- इन्हें जोड़ो: 3/4 + 1/4 = 4/4 = 1।
किसी समकोण त्रिभुज में एक न्यून कोण के सम्मुख भुजा कर्ण की आधी है। वह कोण क्या है?
- सम्मुख/कर्ण अनुपात ठीक उस कोण का sin होता है। यहाँ सम्मुख/कर्ण = 1/2, तो sin (कोण) = 1/2।
- तालिका से, जिस न्यून कोण का साइन 1/2 है वह 30° है।
- तो कोण 30° है।
त्रिकोणमितीय सर्वसमिकाएँ — पाइथागोरस से सिद्ध
सर्वसमिका वह समीकरण है जो कोण के हर अनुमत मान के लिए सच होती है। तीन प्रसिद्ध त्रिकोणमितीय सर्वसमिकाएँ हैं, और हैरानी की बात है कि तीनों एक ही स्रोत से आती हैं: पाइथागोरस प्रमेय। एक समकोण त्रिभुज ABC लो, B पर समकोण। a = संलग्न (AB), b = सम्मुख (BC) और h = कर्ण (AC) लेकर पाइथागोरस कहता है:
a² + b² = h² … (★)
सर्वसमिका 1: sin²A + cos²A = 1। (★) के हर पद को h² से भाग दो:
a²/h² + b²/h² = h²/h²
यानी (a/h)² + (b/h)² = 1। पर a/h = cos A और b/h = sin A, तो
cos²A + sin²A = 1, यानी sin²A + cos²A = 1।
यह उन सभी A के लिए सच है जहाँ 0° ≤ A ≤ 90°।
सर्वसमिका 2: 1 + tan²A = sec²A। इस बार (★) को a² से भाग दो:
a²/a² + b²/a² = h²/a²
यानी 1 + (b/a)² = (h/a)²। अब b/a = tan A और h/a = sec A, तो
1 + tan²A = sec²A।
(0° ≤ A < 90° के लिए मान्य; 90° पर tan और sec दोनों अपरिभाषित हैं।)
सर्वसमिका 3: 1 + cot²A = cosec²A। (★) को b² से भाग दो:
a²/b² + b²/b² = h²/b²
यानी (a/b)² + 1 = (h/b)²। अब a/b = cot A और h/b = cosec A, तो
1 + cot²A = cosec²A।
(0° < A ≤ 90° के लिए मान्य; 0° पर cot और cosec दोनों अपरिभाषित हैं।)
यही पूरे अध्याय का इंजन है: एक पाइथागोरस समीकरण, तीन अलग ढंग से भाग दिया गया, तीन सर्वसमिकाएँ देता है। ये तुम्हें अनुपातों के बीच अदला-बदली कराते हैं — एक जान लो, और कोई भी दूसरा निकाल सकते हो।
C पर समकोण वाले एक समकोण त्रिभुज में AB = 29 और BC = 21, कोण B = θ। दिखाओ कि cos²θ + sin²θ = 1।
- पाइथागोरस से तीसरी भुजा AC निकालो: AC = √(AB² − BC²) = √(29² − 21²) = √(841 − 441) = √400 = 20।
- कोण B (θ) के लिए: सम्मुख = AC = 20, संलग्न = BC = 21, कर्ण = AB = 29। तो sin θ = 20/29 और cos θ = 21/29।
- तब sin²θ + cos²θ = (20/29)² + (21/29)² = (400 + 441)/29² = 841/841 = 1 — ठीक वैसा ही जैसा सर्वसमिका कहती है।
sin A = 3/5 दिया है, सर्वसमिकाओं से cos A और tan A निकालो (A न्यून है)।
- सर्वसमिका 1 से, cos²A = 1 − sin²A = 1 − (3/5)² = 1 − 9/25 = 16/25।
- चूँकि A न्यून है, cos A धनात्मक है, तो cos A = √(16/25) = 4/5।
- तब tan A = sin A / cos A = (3/5) / (4/5) = 3/4। तो cos A = 4/5 और tan A = 3/4।
सिद्ध करो कि sec A (1 − sin A)(sec A + tan A) = 1।
- सब कुछ sin और cos में लिखो: sec A = 1/cos A और tan A = sin A/cos A। तो बायाँ पक्ष बनता है (1/cos A)(1 − sin A)(1/cos A + sin A/cos A)।
- आख़िरी कोष्ठक जोड़ो: 1/cos A + sin A/cos A = (1 + sin A)/cos A। तो व्यंजक है (1/cos A)(1 − sin A)(1 + sin A)/cos A।
- दोनों कोष्ठक गुणा करो: (1 − sin A)(1 + sin A) = 1 − sin²A। तो हमारे पास है (1 − sin²A)/cos²A।
- सर्वसमिका 1 से, 1 − sin²A = cos²A। तो (1 − sin²A)/cos²A = cos²A/cos²A = 1, जो दायाँ पक्ष है। सिद्ध।
आम ग़लतियाँ
sin A का मतलब है 'sin' को A से गुणा, तो समीकरण के दोनों ओर से 'sin' काटा जा सकता है।
यह गुणनफल जैसा लिखा है, sin × A, और बीजगणित में हम सर्वत्र उभयनिष्ठ गुणनखंड काटते रहते हैं — तो लगता है 'sin' बस A के बगल बैठा कोई गुणनखंड है।
sin A एक अविभाज्य संकेत है जिसका मतलब है 'कोण A का साइन'। अकेले 'sin' का कोई मान नहीं और इसे काटा नहीं जा सकता। तुम केवल असली अनुपात-मानों या सर्वसमिकाओं से ही सरलीकरण कर सकते हो, कभी 'sin काटकर' नहीं।
सम्मुख और संलग्न भुजाएँ त्रिभुज के पक्के नाम हैं, तो तुम चाहे जो कोण लो ये वही रहती हैं।
एक बार किसी त्रिभुज की भुजाओं को कोण A के लिए नाम दे दिया, तो वे नाम स्थायी लगते हैं — कर्ण की तरह, जो सचमुच स्थिर रहता है।
केवल कर्ण स्थिर है (वह हमेशा समकोण के सामने रहता है)। 'सम्मुख' और 'संलग्न' चुने हुए कोण के सापेक्ष हैं: कोण A से कोण C पर जाओ और ये अदल-बदल जाते हैं। A का सम्मुख ही C का संलग्न है।
सर्वसमिका sin²A + cos²A = 1 है, तो sin A² + cos A² = 1 लिखना भी वही बात है।
छोटा 2 उन्हीं संकेतों के इर्द-गिर्द घूमता है, तो उसकी ठीक जगह बेअसर लगती है।
sin²A का मतलब है (sin A)² — तुम sin A के मान का वर्ग करते हो। 'sin A²' पढ़ा जाता है 'A² का साइन', यानी एक वर्ग किए गए कोण का साइन, जो बिलकुल अलग और यहाँ निरर्थक राशि है। हमेशा पूरे अनुपात का वर्ग करो: (sin A)²।
चूँकि sin θ और cos θ कुछ भी हो सकते हैं, किसी कोण के लिए sin θ = 3/2 ठीक है।
sin 'बस एक अनुपात' है, और 3/2 बिलकुल ठीक अनुपात है, तो यह मान्य लगता है।
sin θ = सम्मुख/कर्ण, और कर्ण सबसे लंबी भुजा है, तो यह अनुपात कभी 1 से ज़्यादा नहीं हो सकता। यही cos θ पर भी लागू है। 3/2 (> 1) जैसा मान किसी साइन या कोसाइन के लिए असंभव है।
झटपट जाँच
किसी समकोण त्रिभुज में कौन-सा अनुपात संलग्न / कर्ण के बराबर है?
tan 60° का सटीक मान क्या है?
a² + b² = h² को संलग्न भुजा के वर्ग से भाग देने पर कौन-सी सर्वसमिका मिलती है?
अगर किसी न्यून कोण A के लिए cos A = 4/5 है, तो sin A क्या है?
अभ्यास प्रश्न
आसान
B पर समकोण वाले समकोण त्रिभुज ABC में AB = 24 cm और BC = 7 cm है। sin A और cos A निकालो।
पहले कर्ण: AC = √(AB² + BC²) = √(24² + 7²) = √(576 + 49) = √625 = 25 cm।
कोण A के लिए: सम्मुख = BC = 7, संलग्न = AB = 24, कर्ण = AC = 25।
तो sin A = 7/25 और cos A = 24/25। (जाँचो: (7/25)² + (24/25)² = (49 + 576)/625 = 625/625 = 1 ✓।)
2 tan²45° + cos²30° − sin²60° का मान निकालो।
तालिका से: tan 45° = 1, cos 30° = √3/2, sin 60° = √3/2।
2 tan²45° = 2 × 1² = 2।
cos²30° = (√3/2)² = 3/4, और sin²60° = (√3/2)² = 3/4।
तो cos²30° − sin²60° = 3/4 − 3/4 = 0।
कुल = 2 + 0 = 2।
मध्यम
15 cot A = 8 दिया है, sin A और sec A निकालो (A न्यून है)।
15 cot A = 8 यानी cot A = 8/15, यानी संलग्न/सम्मुख = 8/15।
तो संलग्न = 8k और सम्मुख = 15k लो। कर्ण = √((8k)² + (15k)²) = √(64 + 225)k = √289 k = 17k।
तब sin A = सम्मुख/कर्ण = 15/17, और sec A = कर्ण/संलग्न = 17/8, तो sec A = 17/8।
अगर sin(A − B) = 1/2 और cos(A + B) = 1/2, जहाँ 0° < A + B ≤ 90° और A > B, तो A और B निकालो।
sin(A − B) = 1/2। जिस न्यून कोण का साइन 1/2 है वह 30° है, तो A − B = 30° … (1)।
cos(A + B) = 1/2। जिस कोण का कोसाइन 1/2 है वह 60° है, तो A + B = 60° … (2)।
(1) और (2) जोड़ो: 2A = 90° → A = 45°। (2) में से (1) घटाओ: 2B = 30° → B = 15°।
तो A = 45° और B = 15°।
अगर 3 cot A = 4, तो जाँचो कि (1 − tan²A)/(1 + tan²A) क्या cos²A − sin²A के बराबर है।
3 cot A = 4 → cot A = 4/3, तो tan A = 3/4। सम्मुख = 3k, संलग्न = 4k लो; कर्ण = √(9 + 16)k = 5k।
तो sin A = 3/5, cos A = 4/5।
बायाँ पक्ष: tan²A = 9/16, तो (1 − 9/16)/(1 + 9/16) = (7/16)/(25/16) = 7/25।
दायाँ पक्ष: cos²A − sin²A = 16/25 − 9/25 = 7/25।
दोनों 7/25 के बराबर, तो हाँ, यहाँ दोनों व्यंजक बराबर हैं।
चुनौती
P पर समकोण वाले समकोण त्रिभुज OPQ में OP = 7 cm और OQ − PQ = 1 cm है। sin Q और cos Q निकालो।
OQ कर्ण है। पाइथागोरस से: OQ² = OP² + PQ²। OQ = 1 + PQ लिखो (क्योंकि OQ − PQ = 1)।
तो (1 + PQ)² = 7² + PQ² → 1 + 2PQ + PQ² = 49 + PQ² → 1 + 2PQ = 49 → 2PQ = 48 → PQ = 24 cm।
तब OQ = 1 + 24 = 25 cm।
कोण Q के लिए: सम्मुख = OP = 7, संलग्न = PQ = 24, कर्ण = OQ = 25।
तो sin Q = 7/25 और cos Q = 24/25।
सिद्ध करो कि (cot A − cos A)/(cot A + cos A) = (cosec A − 1)/(cosec A + 1)।
बायें पक्ष से शुरू करो और cot A = cos A/sin A लिखो:
अंश: cot A − cos A = cos A/sin A − cos A = cos A(1/sin A − 1) = cos A(1 − sin A)/sin A।
हर: cot A + cos A = cos A/sin A + cos A = cos A(1/sin A + 1) = cos A(1 + sin A)/sin A।
भाग दो — उभयनिष्ठ गुणनखंड cos A/sin A कट जाता है:
(cot A − cos A)/(cot A + cos A) = (1 − sin A)/(1 + sin A) = (1/sin A − 1)/(1/sin A + 1)।
चूँकि 1/sin A = cosec A, यह (cosec A − 1)/(cosec A + 1) है, यानी दायाँ पक्ष। सिद्ध।
सारांश
अब तुम यह समझा सकने योग्य हो:
- समकोण त्रिभुज में, किसी न्यून कोण के सापेक्ष: sin = सम्मुख/कर्ण, cos = संलग्न/कर्ण, tan = सम्मुख/संलग्न, और व्युत्क्रम cosec = 1/sin, sec = 1/cos, cot = 1/tan। साथ ही tan = sin/cos और cot = cos/sin।
- अनुपात केवल कोण पर निर्भर करते हैं, त्रिभुज के आकार पर नहीं, क्योंकि एक ही कोण वाले समकोण त्रिभुज समरूप (AA) होते हैं, तो उनकी भुजाएँ समानुपाती रहती हैं।
- चूँकि कर्ण सबसे लंबा है, sin और cos कभी 1 से ज़्यादा नहीं होते।
- 0°, 30°, 45°, 60°, 90° के सटीक मान, 45-45-90 त्रिभुज (भुजाएँ 1, 1, √2) और 30-60-90 त्रिभुज (भुजाएँ 1, √3, 2) से निकले।
- तीनों सर्वसमिकाएँ, सभी a² + b² = h² को भाग देकर सिद्ध: sin²A + cos²A = 1 (÷h²), 1 + tan²A = sec²A (÷a²), 1 + cot²A = cosec²A (÷b²)।
- किसी एक से हर अनुपात कैसे निकाला जाए, और सब कुछ sin और cos में बदलकर सर्वसमिकाएँ कैसे सिद्ध की जाएँ।
आगे क्या
अब तुम्हारे पास अनुपात और सर्वसमिकाएँ हैं। आगे, त्रिकोणमिति के कुछ अनुप्रयोग में, तुम इन्हें उन्हीं समस्याओं पर लगाओगे जिनसे हमने शुरुआत की थी — ऊँचाइयाँ और दूरियाँ। तुम उन्नयन कोण (किसी मीनार की चोटी की ओर ऊपर देखना) और अवनमन कोण (किसी चट्टान से नीचे नाव की ओर देखना) से मिलोगे, और एक ही त्रिकोणमितीय अनुपात से वह ऊँचाई या दूरी निकालोगे जिसे तुम सीधे कभी नाप ही नहीं सकते।