खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

अध्याय 5 · भूगोल · कक्षा 10 28 मिनट में पढ़ें

यह क्यों मायने रखता है

जिस कमरे में आप बैठे हैं, उस पर नज़र डालिए। अलमारी का स्टील, खिड़की के फ्रेम का एल्युमिनियम, हर तार के अंदर का तांबा, दीवारों का सीमेंट, खिड़की का शीशा — ये सब पृथ्वी की भूपर्पटी से निकाले गए किसी खनिज से बने हैं। एक छोटी-सी पिन और एक विशाल जहाज़, दोनों ही खनिजों से बनते हैं। कारें, बसें, रेलगाड़ियाँ और हवाई जहाज़ खनिजों से बनते भी हैं और पृथ्वी से निकाले गए ऊर्जा संसाधनों पर चलते भी हैं। यहाँ तक कि हम जो खाना खाते हैं उसमें भी खनिज होते हैं: हालाँकि वे हमारे कुल आहार का केवल लगभग 0.3 प्रतिशत हैं, फिर भी उनके बिना हमारा शरीर बाकी 99.7 प्रतिशत का उपयोग नहीं कर पाता।

तो खनिज कोई दूर का भूगर्भ-विज्ञान का विषय नहीं हैं — वे आधुनिक जीवन का कच्चा माल हैं। पर एक पेच है जो इस पूरे अध्याय में चलता है: खनिजों को बनने में करोड़ों साल लगे, वे देश भर में असमान रूप से फैले हैं, और हम उन्हें प्रकृति के दोबारा बनाने की रफ़्तार से कहीं तेज़ी से ख़त्म कर रहे हैं। उन सब मशीनों को चलाने के लिए जो ऊर्जा हम जलाते हैं, उसका भी यही हाल है। यह अध्याय असल में एक ही बड़े सवाल के बारे में है: ये संसाधन कहाँ से आते हैं, और हम इन्हें टिकाऊ कैसे बनाएँ?

मुख्य विचार

खनिज एक समरूप, प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पदार्थ है जिसकी एक निश्चित आंतरिक संरचना होती है; इसे आमतौर पर अयस्क (दूसरे तत्वों के साथ मिला हुआ खनिज) के रूप में पृथ्वी से निकाला जाता है। खनिजों को धात्विक (लौह — जिनमें लोहा हो — और अलौह), अधात्विक, और ऊर्जा/ईंधन खनिजों में बाँटा जाता है। ऊर्जा संसाधन दो भागों में हैं — परंपरागत स्रोत (लकड़ी, गोबर का उपला, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बिजली) और गैर-परंपरागत नवीकरणीय स्रोत (सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय, बायोगैस, नाभिकीय)। चूँकि खनिज और जीवाश्म ईंधन दोनों सीमित और गैर-नवीकरणीय हैं, इसलिए संरक्षण — पुनर्चक्रण, विकल्पों का उपयोग और नवीकरणीय स्रोतों की ओर बढ़ना — ही इस अध्याय का असली सबक है।

आइए इसे समझें

खनिज आख़िर है क्या?

भूवैज्ञानिक खनिज को परिभाषित करते हैं — “एक समरूप, प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पदार्थ जिसकी एक निश्चित आंतरिक संरचना हो।” चट्टानें खनिजों के मेल से बनती हैं: कुछ चट्टानें (जैसे चूना-पत्थर) एक ही खनिज की होती हैं, पर अधिकांश में कई खनिज भिन्न-भिन्न अनुपातों में होते हैं। अब तक 2000 से अधिक खनिज पहचाने जा चुके हैं, फिर भी ज़्यादातर चट्टानों में कुछ ही खनिज प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।

खनिज इतने विविध क्यों हैं — सबसे कठोर हीरे से लेकर सबसे मुलायम टैल्क तक? क्योंकि कौन-सा खनिज बनेगा, यह उन भौतिक और रासायनिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है जो मौजूद होती हैं। इसी से हर खनिज को उसका अपना रंग, कठोरता, क्रिस्टल रूप, चमक और घनत्व मिलता है — और इन्हीं गुणों से भूवैज्ञानिक खनिजों का वर्गीकरण करते हैं।

खनिज कैसे पाए जाते हैं (प्राप्ति के ढंग)

खनिज आमतौर पर अयस्कों में मिलते हैं — यानी किसी खनिज का दूसरे तत्वों के साथ ऐसा जमाव जिसमें खनिज की मात्रा इतनी सांद्र हो कि उसे निकालना व्यावसायिक रूप से फ़ायदेमंद हो। वे जिस प्रकार की संरचना में पाए जाते हैं, वही तय करती है कि उन्हें कितनी आसानी से और कितने सस्ते में निकाला जा सकता है। पाँच मुख्य ढंग हैं:

खनिजों की प्राप्ति के पाँच ढंग
ढंगकहाँ / कैसे बनते हैंउदाहरण
शिराएँ और निक्षेप (वेन और लोड)आग्नेय और कायांतरित चट्टानों की दरारों, संधियों या भ्रंशों में; तरल/गैसीय खनिज ऊपर ठेले जाते हैं, फिर ठंडे होकर जम जाते हैं। छोटे = शिराएँ, बड़े = निक्षेपटिन, तांबा, ज़िंक, सीसा
संस्तर और परतेंअवसादी चट्टानों में, ताप और दाब के तहत क्षैतिज परतों में जमाव और सांद्रण से; या शुष्क क्षेत्रों में वाष्पीकरण सेकोयला, कुछ लौह अयस्क; जिप्सम, पोटाश नमक, सोडियम नमक
सतही चट्टानों का अपघटनसतही चट्टानें अपघटित होती हैं, घुलनशील भाग हट जाते हैं, और अयस्क वाला अवशिष्ट अपक्षयित द्रव्य बच जाता हैबॉक्साइट
जलोढ़ (प्लेसर) निक्षेपघाटियों के तल की रेत और पहाड़ियों के आधार पर जलोढ़ निक्षेपों के रूप में; केवल वे खनिज जो जल से संक्षारित नहीं होतेसोना, चांदी, टिन, प्लैटिनम
महासागरीय जलसमुद्री जल में घुले हुए (ज़्यादातर बहुत बिखरे, इसलिए बेकार) और समुद्र-तल की गुलिकाओं मेंसाधारण नमक, मैग्नीशियम, ब्रोमीन; मैंगनीज गुलिकाएँ
खनिजों के वर्गीकरण का वृक्ष-चित्र: खनिज धात्विक और अधात्विक में बँटते हैं; धात्विक लौह (लौह अयस्क, मैंगनीज) और अलौह (तांबा, बॉक्साइट, सीसा, ज़िंक, सोना) में बँटते हैं; अधात्विक में अभ्रक और चूना-पत्थर आते हैं; कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे ऊर्जा या ईंधन खनिज एक अलग समूह बनाते हैं।
खनिजों को धात्विक (लौह और अलौह), अधात्विक, और ऊर्जा या ईंधन खनिजों में बाँटा जाता है। धात्विक खनिजों के उत्पादन के मूल्य का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा लौह खनिजों का है।

भारत खनिजों के मामले में काफ़ी समृद्ध और विविध है, पर ये असमान रूप से बँटे हैं। मोटे तौर पर: प्रायद्वीपीय चट्टानों में अधिकांश कोयला, धात्विक खनिज, अभ्रक और कई अधात्विक खनिज हैं; प्रायद्वीप के पश्चिमी और पूर्वी किनारों की अवसादी चट्टानों (गुजरात, असम) में अधिकांश पेट्रोलियम है; राजस्थान में कई अलौह खनिज हैं; और उत्तर भारत के विशाल जलोढ़ मैदान आर्थिक खनिजों से लगभग खाली हैं।

लौह खनिज: लौह अयस्क और मैंगनीज

लौह खनिजों में लोहा होता है और धात्विक-खनिज उत्पादन के मूल्य का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा इन्हीं का है, जो धातुकर्म उद्योगों को मज़बूत आधार देता है। भारत अपनी ज़रूरत पूरी करने के बाद इन्हें निर्यात भी करता है।

लौह अयस्क औद्योगिक विकास की रीढ़ है, और भारत अच्छी गुणवत्ता के अयस्कों में समृद्ध है:

लौह अयस्क के दो मुख्य प्रकार
प्रकारलौह की मात्राविशेष गुण
मैग्नेटाइटबहुत अधिक, 70% तकसबसे बढ़िया लौह अयस्क; उत्कृष्ट चुंबकीय गुण, विद्युत उद्योग में मूल्यवान
हेमेटाइटकम, 50–60%उपयोग की मात्रा के लिहाज़ से औद्योगिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण

2018–19 में लौह अयस्क का लगभग पूरा उत्पादन (97%) ओडिशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और झारखंड से आया। चार प्रमुख लौह अयस्क पेटियाँ हैं:

भारत की चार प्रमुख लौह अयस्क पेटियाँ
पेटीराज्यप्रमुख खानें / तथ्य
ओडिशा–झारखंड पेटीओडिशा, झारखंडबादाम पहाड़ (मयूरभंज, केंदुझर) में उच्च-कोटि हेमेटाइट; सिंहभूम में गुआ और नोआमुंडी
दुर्ग–बस्तर–चंद्रपुर पेटीछत्तीसगढ़, महाराष्ट्रबैलाडीला श्रेणी (बस्तर) में बहुत उच्च-कोटि हेमेटाइट — 14 निक्षेप; विशाखापत्तनम बंदरगाह से जापान और दक्षिण कोरिया को निर्यात
बेल्लारी–चित्रदुर्ग–चिक्कमगलूरु–तुमकुरु पेटीकर्नाटकविशाल भंडार; कुद्रेमुख खानें (पश्चिमी घाट) 100% निर्यात इकाई; अयस्क पाइपलाइन से घोल (स्लरी) के रूप में मंगलुरु के पास बंदरगाह तक
महाराष्ट्र–गोवा पेटीगोवा, रत्नागिरी (महाराष्ट्र)अयस्क बहुत उच्च-कोटि के नहीं पर कुशलता से उपयोग; मरमागाओ बंदरगाह से निर्यात

मैंगनीज मुख्यतः इस्पात (स्टील) और फेरो-मैंगनीज मिश्रधातु बनाने में काम आता है — एक टन इस्पात बनाने में लगभग 10 किग्रा मैंगनीज चाहिए। यह विरंजक चूर्ण, कीटनाशकों और रंगों में भी काम आता है। (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा प्रमुख उत्पादक हैं।)

अलौह खनिज: तांबा और बॉक्साइट

भारत में अलौह खनिजों (तांबा, बॉक्साइट, सीसा, ज़िंक, सोना) के भंडार और उत्पादन बहुत संतोषजनक नहीं हैं, फिर भी ये धातुकर्म, इंजीनियरिंग और विद्युत उद्योगों के लिए अहम हैं।

  • तांबा — भारत इसमें बेहद कमी झेलता है। आघातवर्धनीय, तन्य और अच्छा सुचालक होने के कारण तांबा बिजली के तारों, इलेक्ट्रॉनिक्स और रासायनिक उद्योग में काम आता है। प्रमुख उत्पादक: बालाघाट खानें (मध्य प्रदेश), खेतड़ी खानें (राजस्थान) और सिंहभूम ज़िला (झारखंड)।
  • बॉक्साइट — मिट्टी जैसा वह अयस्क जिससे एल्युमिना और फिर एल्युमिनियम प्राप्त होता है। यह एल्युमिनियम-सिलिकेट वाली चट्टानों के अपघटन से बनता है। एल्युमिनियम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसमें लोहे जैसी मज़बूती के साथ-साथ बहुत हल्कापन, अच्छी चालकता और बढ़िया आघातवर्धनीयता है। निक्षेप अमरकंटक पठार, मैकाल पहाड़ियों और बिलासपुर–कटनी पठार में हैं; 2018–19 में ओडिशा सबसे बड़ा उत्पादक था (कोरापुट ज़िले के पंचपटमाली निक्षेप)।

अधात्विक खनिज: अभ्रक और चूना-पत्थर

  • अभ्रक (माइका) परतों या पत्तियों की एक श्रृंखला से बना होता है, जो आसानी से बहुत पतली चादरों में फट जाता है — हज़ार पतली चादरें कुछ ही सेंटीमीटर ऊँचे टुकड़े में जमी हो सकती हैं। यह पारदर्शी, काला, हरा, लाल, पीला या भूरा हो सकता है। अपनी उत्कृष्ट परावैद्युत शक्ति, कम विद्युत-हानि, विद्युतरोधी गुण और उच्च वोल्टता के प्रति प्रतिरोध के कारण अभ्रक विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों के लिए अनिवार्य है। प्रमुख पेटी झारखंड की कोडरमा–गया–हज़ारीबाग पेटी है (छोटा नागपुर पठार का उत्तरी किनारा); अन्य उत्पादक अजमेर (राजस्थान) के आस-पास और नेल्लोर पेटी (आंध्र प्रदेश) हैं।
  • चूना-पत्थर कैल्सियम कार्बोनेट (या कैल्सियम और मैग्नीशियम कार्बोनेट) वाली चट्टानों में, अधिकांश भूवैज्ञानिक रचनाओं की अवसादी चट्टानों में मिलता है। यह सीमेंट उद्योग का मूल कच्चा माल है और झमेले (ब्लास्ट फर्नेस) में लौह अयस्क के प्रगलन के लिए ज़रूरी है।
Concept check

एक खनिज मुख्यतः विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में काम आता है क्योंकि उसे बहुत पतली चादरों में फाड़ा जा सकता है और वह उच्च वोल्टता का प्रतिरोध करता है। यह कौन-सा खनिज है, और किस श्रेणी में आता है?

खनन के ख़तरे और खनिजों का संरक्षण

खनन की एक मानवीय और एक पर्यावरणीय क़ीमत है। धूल और ज़हरीले धुएँ से खननकर्मी फेफड़ों के रोगों के शिकार हो जाते हैं; छतों का ढहना, बाढ़ और कोयला-खानों में आग खननकर्मियों के लिए लगातार ख़तरा हैं। जल-स्रोत दूषित हो जाते हैं, और कचरे व घोल को फेंकने से भूमि का क्षरण होता है तथा नदी-नालों का प्रदूषण बढ़ता है। खनन को “घातक उद्योग” बनने से रोकने के लिए कड़े सुरक्षा नियम और पर्यावरण क़ानून ज़रूरी हैं।

खनिजों का संरक्षण क्यों? उपयोग में आने योग्य खनिज निक्षेप पृथ्वी की भूपर्पटी का बहुत छोटा हिस्सा — लगभग एक प्रतिशत — हैं। इन्हें बनने में करोड़ों साल लगे, पर प्रकृति इन्हें इतनी धीमी गति से दोबारा भरती है कि हमारी खपत की तुलना में वह रफ़्तार लगभग शून्य है। इसलिए खनिज सीमित और गैर-नवीकरणीय हैं। जैसे-जैसे हम अयस्क के लिए गहराई में जाते हैं, लागत बढ़ती है और गुणवत्ता घटती है। संरक्षण का अर्थ है एक नियोजित, टिकाऊ तरीक़ा: निम्न-कोटि अयस्कों को सस्ते में इस्तेमाल करने की तकनीक विकसित करना, धातुओं का पुनर्चक्रण, रद्दी धातु का उपयोग, और विकल्प ढूँढ़ना।

ऊर्जा संसाधन: परंपरागत बनाम गैर-परंपरागत

हर काम के लिए ऊर्जा चाहिए — खाना पकाना, रोशनी, गरमी, वाहन चलाना, मशीनें चलाना। यह ईंधन खनिजों (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम) से और बिजली से मिलती है। ऊर्जा संसाधन दो समूहों में बाँटे जाते हैं:

ऊर्जा संसाधनों का वृक्ष-चित्र: ऊर्जा संसाधन परंपरागत स्रोतों (लकड़ी, गोबर का उपला, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, जल-विद्युत और तापीय से बिजली) और गैर-परंपरागत स्रोतों (सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय, बायोगैस, नाभिकीय या परमाणु ऊर्जा) में बँटते हैं।
परंपरागत स्रोत लंबे समय से इस्तेमाल होते आए हैं और ज़्यादातर गैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधन हैं। गैर-परंपरागत स्रोत नए, नवीकरणीय और साफ़ हैं। ग्रामीण भारत में लकड़ी और गोबर का उपला आज भी घरेलू ऊर्जा की 70 प्रतिशत से अधिक ज़रूरत पूरी करते हैं।
परंपरागत बनाम गैर-परंपरागत ऊर्जा
परंपरागतगैर-परंपरागत
स्रोतलकड़ी, गोबर का उपला, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बिजली (जल-विद्युत और तापीय)सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय, बायोगैस, नाभिकीय/परमाणु
नवीकरणीय?ज़्यादातर गैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधन (जल-विद्युत को छोड़कर)ज़्यादातर नवीकरणीय और साफ़
प्रदूषणजीवाश्म ईंधन जलाने से गंभीर पर्यावरणीय समस्याएँबहुत साफ़
स्थितिआज भारत की अधिकांश ऊर्जा ज़रूरत पूरी करते हैंतेज़ी से बढ़ रहे; भारत में सबसे बड़े नवीकरणीय-ऊर्जा कार्यक्रम

परंपरागत स्रोत विस्तार से:

  • कोयला — भारत में सबसे प्रचुर जीवाश्म ईंधन, जो बिजली उत्पादन, उद्योग और घरेलू ज़रूरतों में काम आता है। यह करोड़ों साल में पौधों के दबने से बनता है, इसलिए दबाव की मात्रा के अनुसार इसके रूप अलग होते हैं: पीट (कम कार्बन, अधिक नमी, कम ऊष्मा) → लिग्नाइट (निम्न-कोटि भूरा कोयला, मुलायम, अधिक नमी; नेवेली, तमिलनाडु में भंडार, बिजली बनाने में उपयोग) → बिटुमिनस (गहराई में दबा, अधिक गरम; व्यावसायिक रूप से सबसे लोकप्रिय; धातुकर्म कोयला उच्च-कोटि बिटुमिनस है जो लोहे के प्रगलन में काम आता है) → एन्थ्रेसाइट (सबसे उच्च-कोटि का कठोर कोयला)। भारतीय कोयला दो आयु-वर्गों में मिलता है: गोंडवाना (20 करोड़ साल से अधिक पुराना — दामोदर घाटी में धातुकर्म कोयला: झरिया, रानीगंज, बोकारो; साथ ही गोदावरी, महानदी, सोन, वर्धा घाटियाँ) और टर्शियरी (लगभग 5.5 करोड़ साल पुराना — मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड)। चूँकि कोयला भारी होता है और जलकर राख बनने पर वज़न खो देता है, भारी उद्योग और तापीय बिजलीघर कोयला-क्षेत्रों पर या उनके पास बनाए जाते हैं।
  • पेट्रोलियम (खनिज तेल) — कोयले के बाद अगला प्रमुख स्रोत; यह ईंधन, स्नेहक और कच्चा माल देता है, इसलिए रिफाइनरियाँ कृत्रिम वस्त्र, उर्वरक और रासायनिक उद्योगों के लिए “नोडल उद्योग” हैं। यह टर्शियरी चट्टानों के अभिनतियों (एंटीक्लाइन) और भ्रंश-जालों में, सरंध्र चूना-पत्थर या बलुआ-पत्थर में फँसा रहता है जिसे अपरंध्र परतें सील कर देती हैं; गैस हल्की होने के कारण तेल के ऊपर बैठती है। प्रमुख क्षेत्र: मुंबई हाई, गुजरात (अंकलेश्वर) और असम (सबसे पुराना तेल-उत्पादक राज्य — डिगबोई, नहरकटिया, मोरान-हुगरीजान)।
  • प्राकृतिक गैसपेट्रोलियम के साथ मिलती है, जो कच्चे तेल को सतह पर लाने पर निकलती है। बिजली बनाने, उद्योगों में गरमी, रासायनिक/उर्वरक कच्चे माल के रूप में, और तेज़ी से परिवहन-ईंधन (CNG) तथा रसोई-ईंधन (PNG) के रूप में काम आती है। प्रमुख भंडार: मुंबई हाई और पश्चिमी तट के क्षेत्र, कैम्बे बेसिन, और पूर्वी तट का कृष्णा–गोदावरी बेसिन। GAIL की 1700 किमी लंबी हजीरा–विजयपुर–जगदीशपुर (HVJ) पाइपलाइन इन क्षेत्रों को उद्योगों से जोड़ती है।
  • बिजली — इसकी प्रति-व्यक्ति खपत विकास का सूचकांक मानी जाती है। यह दो तरीक़ों से बनती है: जल-विद्युत (तेज़ बहता पानी टरबाइन घुमाता है — यह नवीकरणीय संसाधन है; जैसे भाखड़ा नांगल, दामोदर घाटी निगम, कोपिली जल-विद्युत परियोजना) और तापीय (कोयला, पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस जलाकर — यह गैर-नवीकरणीय जीवाश्म ईंधन का उपयोग करती है)। एक बार बन जाने पर बिजली बिल्कुल एक जैसी होती है।

गैर-परंपरागत स्रोत विस्तार से:

  • नाभिकीय / परमाणु — परमाणुओं की संरचना बदलने से प्राप्त ऊर्जा, जो ऊष्मा के रूप में निकलकर बिजली बनाती है। इसमें यूरेनियम और थोरियम काम आते हैं (झारखंड और राजस्थान की अरावली श्रेणियों में मिलते हैं); केरल की मोनाज़ाइट रेत थोरियम से समृद्ध है।
  • सौर — भारत एक उष्णकटिबंधीय देश है, इसलिए यहाँ बहुत संभावनाएँ हैं। फोटोवोल्टाइक तकनीक सूर्य के प्रकाश को सीधे बिजली में बदल देती है; यह ग्रामीण और दूरदराज़ इलाक़ों में फैल रही है और लकड़ी व गोबर के उपले पर निर्भरता घटा रही है।
  • पवन — बड़ी संभावना; सबसे बड़ा पवन-फार्म समूह तमिलनाडु में नागरकोइल से मदुरै तक फैला है। नागरकोइल और जैसलमेर पवन ऊर्जा के लिए प्रसिद्ध हैं; अन्य फार्म आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र और लक्षद्वीप में हैं।
  • बायोगैस — झाड़ियाँ, खेती का कचरा और पशु/मानव अपशिष्ट सड़ाकर ऐसी गैस बनाई जाती है जिसकी ऊष्मीय क्षमता मिट्टी का तेल, उपला या लकड़ी के कोयले से अधिक है। गोबर वाले संयंत्रों को ‘गोबर गैस संयंत्र’ कहते हैं; ये दोहरा लाभ देते हैं — ऊर्जा और बेहतर खाद।
  • ज्वारीय — खाड़ियों के आर-पार बने बाढ़-द्वार बाँध उच्च ज्वार पर पानी रोक लेते हैं; ज्वार उतरने पर रुका हुआ पानी टरबाइन से होकर वापस बहता है। उपयुक्त स्थान: खंभात की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी (गुजरात) और सुंदरबन का गांगेय डेल्टा (पश्चिम बंगाल)
  • भूतापीय — पृथ्वी के भीतर की ऊष्मा। जहाँ भूतापीय प्रवणता अधिक हो, वहाँ भूजल भाप में बदल जाता है जो टरबाइन घुमाती है। दो प्रयोगात्मक परियोजनाएँ: मणिकरण के पास पार्वती घाटी (हिमाचल प्रदेश) और पुगा घाटी, लद्दाख

ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण

हर क्षेत्र — कृषि, उद्योग, परिवहन, वाणिज्य, घर — को ऊर्जा चाहिए, और खपत लगातार बढ़ती रही है। चूँकि भारत आज दुनिया के सबसे कम ऊर्जा-कुशल देशों में है, आगे का रास्ता एक टिकाऊ राह है: ऊर्जा संरक्षण और नवीकरणीय स्रोतों को साथ-साथ बढ़ावा देना। नागरिक के तौर पर हम सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर सकते हैं, बेकार जलती बत्तियाँ बंद कर सकते हैं, ऊर्जा-बचत उपकरण इस्तेमाल कर सकते हैं, और गैर-परंपरागत स्रोतों को तरजीह दे सकते हैं। आख़िरकार, “बचाई गई ऊर्जा ही उत्पादित ऊर्जा है।“

सामान्य गलतियाँ

⚠️ Common mistake
What students think

खनिज नवीकरणीय हैं — पृथ्वी और बना ही लेगी, इसलिए ख़त्म होने की चिंता बेकार है।

Why it seems right

पृथ्वी बहुत बड़ी है और हम हमेशा से उसमें से खनिज निकालते आए हैं, इसलिए लगता है कि यह कभी न ख़त्म होने वाला भंडार है जो चुपचाप भरता रहता है।

What actually happens

उपयोग योग्य निक्षेप भूपर्पटी का केवल लगभग एक प्रतिशत हैं और इन्हें बनने में करोड़ों साल लगे। प्रकृति इन्हें इतनी धीमी गति से भरती है कि हमारी खपत की तुलना में रफ़्तार लगभग शून्य है। खनिज सीमित और गैर-नवीकरणीय हैं — इसीलिए पुनर्चक्रण और विकल्प ज़रूरी हैं।

⚠️ Common mistake
What students think

लौह और अलौह का मतलब बस 'धातु' और 'अधातु' है।

Why it seems right

शब्द धातु/अधातु के बँटवारे जैसे दिखते हैं, और लौह खनिज सचमुच धातुएँ हैं, इसलिए लगता है कि वही पैटर्न आगे चल रहा है।

What actually happens

लौह और अलौह दोनों ही धात्विक हैं। फ़र्क़ लोहे का है: लौह खनिजों में लोहा होता है (लौह अयस्क, मैंगनीज), अलौह खनिजों में नहीं (तांबा, बॉक्साइट, सीसा, ज़िंक, सोना)। असली अधात्विक समूह अलग है — अभ्रक और चूना-पत्थर।

⚠️ Common mistake
What students think

सभी गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत नवीकरणीय और साफ़ होते हैं।

Why it seems right

सौर, पवन, ज्वारीय और बायोगैस सचमुच नवीकरणीय हैं, इसलिए पूरे समूह को वैसा ही मान लेना आसान है।

What actually happens

ज़्यादातर गैर-परंपरागत स्रोत नवीकरणीय हैं, पर नाभिकीय (परमाणु) ऊर्जा यूरेनियम और थोरियम जैसे सीमित खनिज ईंधनों का उपयोग करती है। इसे गैर-परंपरागत इसलिए गिना जाता है क्योंकि यह एक नया, वैकल्पिक स्रोत है, इसलिए नहीं कि यह नवीकरणीय है।

⚠️ Common mistake
What students think

जल-विद्युत और तापीय बिजली अलग-अलग तरह की बिजली हैं।

Why it seems right

ये बहुत अलग तरीक़ों से बनती हैं — एक गिरते पानी से, एक ईंधन जलाने से — इसलिए अंतिम उत्पाद भी अलग लगता है।

What actually happens

सिर्फ़ तरीक़ा अलग है: जल-विद्युत तेज़ बहते पानी का उपयोग करती है (नवीकरणीय) और तापीय कोयला, तेल या गैस जलाती है (गैर-नवीकरणीय)। एक बार बन जाने पर बिजली बिल्कुल एक जैसी होती है।

अब ख़ुद को परखें

सतही चट्टानों के अपघटन से, अपक्षयित द्रव्य का अवशिष्ट ढेर छोड़ते हुए, कौन-सा खनिज बनता है?

झारखंड का कोडरमा किस खनिज का प्रमुख उत्पादक है?

क्षैतिज परतों में जमा और सांद्रित खनिज मुख्यतः किन चट्टानों में मिलते हैं?

केरल की मोनाज़ाइट रेत किस खनिज का महत्वपूर्ण स्रोत है?

अभ्यास प्रश्न

आसान

easy

खनिज क्या है?

easy

लौह और अलौह खनिजों में अंतर बताइए (लगभग 30 शब्दों में)।

मध्यम

medium

आग्नेय और कायांतरित चट्टानों में खनिज कैसे बनते हैं?

medium

हमें खनिज संसाधनों का संरक्षण क्यों करना चाहिए? (लगभग 30 शब्दों में)

चुनौती

challenge

भारत में कोयले के वितरण का वर्णन कीजिए (लगभग 120 शब्दों में)।

challenge

आपको क्यों लगता है कि भारत में सौर ऊर्जा का भविष्य उज्ज्वल है? (लगभग 120 शब्दों में)

सारांश

अब आप समझा पाएँगे कि:

  • खनिज एक समरूप, प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पदार्थ है जिसकी निश्चित आंतरिक संरचना होती है; इसे आमतौर पर अयस्क (दूसरे तत्वों के साथ मिला, इतना सांद्र कि निकालना फ़ायदेमंद हो) से निकाला जाता है।
  • खनिज पाँच ढंगों से मिलते हैं: शिराएँ और निक्षेप (आग्नेय/कायांतरित — टिन, तांबा, ज़िंक, सीसा), संस्तर और परतें (अवसादी — कोयला, कुछ लौह अयस्क), अपघटन (बॉक्साइट), जलोढ़ निक्षेप (सोना, चांदी, टिन, प्लैटिनम), और महासागरीय जल (नमक, मैग्नीशियम, ब्रोमीन, मैंगनीज गुलिकाएँ)।
  • खनिज धात्विक (लौह = लोहे वाले: लौह अयस्क, मैंगनीज; अलौह = बिना लोहे के: तांबा, बॉक्साइट, सीसा, ज़िंक, सोना), अधात्विक (अभ्रक, चूना-पत्थर) और ऊर्जा/ईंधन खनिजों में बँटते हैं।
  • लौह अयस्क के प्रकार: मैग्नेटाइट (70% तक लोहा, चुंबकीय) और हेमेटाइट (50–60%, सबसे अधिक उपयोग में)। चार पेटियाँ: ओडिशा–झारखंड, दुर्ग–बस्तर–चंद्रपुर, बेल्लारी–चित्रदुर्ग–चिक्कमगलूरु–तुमकुरु, महाराष्ट्र–गोवा
  • खनिज सीमित और गैर-नवीकरणीय हैं, इसलिए हम निम्न-कोटि अयस्कों के उपयोग, पुनर्चक्रण, रद्दी धातु और विकल्पों से इनका संरक्षण करते हैं।
  • ऊर्जा संसाधन परंपरागत (लकड़ी, उपला, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, जल-विद्युत और तापीय बिजली) और गैर-परंपरागत (सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय, बायोगैस, नाभिकीय) हैं।
  • नई आपूर्ति जितना ही ज़रूरी है संरक्षण — “बचाई गई ऊर्जा ही उत्पादित ऊर्जा है।“

आगे क्या

आपने देख लिया कि कच्चा माल और ऊर्जा कहाँ से आते हैं। अब, विनिर्माण उद्योग में, आप उन्हीं खनिजों और उस ऊर्जा का कारख़ाने तक का सफ़र देखेंगे — कैसे लौह अयस्क और कोयला मिलकर इस्पात बनते हैं, कैसे कच्ची कपास कपड़ा बनती है, उद्योग कहाँ और क्यों एक जगह जमा होते हैं, और कैसे विनिर्माण अर्थव्यवस्था को आगे भी बढ़ाता है और जिस हवा, पानी व ज़मीन पर हम निर्भर हैं उसे प्रदूषित भी करता है।