विनिर्माण उद्योग
यह क्यों ज़रूरी है
दिवाली के बाज़ार में घुसिए — वहाँ चीज़ों की भरमार है। जूते, कपड़े, बर्तन, चीनी, चाय, मिट्टी के दीये। कभी सोचा है कि इतनी सारी चीज़ें आती कहाँ से हैं? जूते और कपड़े बड़ी फ़ैक्ट्री की मशीनों से निकले; स्टील का कलछुल किसी छोटी कार्यशाला में बना; दीया घर में बैठे एक कुम्हार ने गढ़ा। तीन बिलकुल अलग पैमाने — पर तीनों ही कच्ची चीज़ को किसी ज़्यादा काम की चीज़ में बदलते हैं। यही है विनिर्माण।
यह अध्याय इसी कहानी का है कि भारत चीज़ें बनाता कैसे है। लकड़ी से कागज़, गन्ने से चीनी, लौह अयस्क से इस्पात, बॉक्साइट से ऐलुमिनियम, धागे से कपड़ा। यह बताता है कि इस्पात संयंत्र पठार पर क्यों बैठता है पर जूट मिल नदी के किनारे से क्यों चिपकी रहती है, चीनी मिल को सहकारी समिति क्यों चलाती है जबकि बड़े इस्पात संयंत्र को सरकार, और क्यों वही कारखाने जो हमारी प्रगति चलाते हैं, हमारी हवा और नदियों का दम भी घोंटते हैं।
यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि किसी देश की अर्थव्यवस्था की मज़बूती इसी से नापी जाती है कि वह कितना अच्छा विनिर्माण करता है। जो देश सिर्फ़ कच्चा माल बेचता है वह गरीब रहता है; जो उसे मूल्यवान तैयार माल में बदलता है वह समृद्ध होता है। भारत की आने वाली समृद्धि सचमुच उसके कारखानों में बन रही है।
मूल विचार
विनिर्माण का अर्थ है कच्चे माल को संसाधित कर बड़ी मात्रा में अधिक मूल्यवान तैयार उत्पाद बनाना। यह आर्थिक विकास की रीढ़ है — यह कृषि का आधुनिकीकरण करता है, खेती के बाहर रोज़गार देता है, निर्यात से विदेशी मुद्रा कमाता है, और क्षेत्रीय असमानता घटाता है। किसी कारखाने का स्थान कच्चे माल, ऊर्जा, श्रम, बाज़ार, परिवहन, पूँजी और जल की रस्साकशी से तय होता है। हज़ारों उद्योगों को हम पाँच आसान आधारों पर छाँटते हैं — किससे बने, क्या भूमिका, कितनी पूँजी, किसका स्वामित्व, और माल कितना भारी।
पूरे अध्याय में दो बातें याद रखिए। पहली, कृषि और उद्योग साथ-साथ चलते हैं, एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं — कृषि-उद्योग फ़सलों को कच्चे माल के रूप में लेते हैं और किसानों को पंप, उर्वरक और औज़ार बेचते हैं। दूसरी, हर उद्योग की एक कीमत भी है जिसे पाठ्यपुस्तक छिपाती नहीं: प्रदूषण। विकास और पर्यावरण में संतुलन रखना ही सतत विकास है।
आइए इसे समझें
विनिर्माण रीढ़ क्यों है
विनिर्माण द्वितीयक क्षेत्र में आता है — यहाँ श्रमिक प्राथमिक माल (खेती, खनन, वानिकी से) को तैयार माल में बदलते हैं। इस्पात कारखाने, कार संयंत्र, शराब-निर्माणशालाएँ, वस्त्र मिलें और बेकरी सब यहीं आते हैं। इसे विकास की रीढ़ इन कारणों से कहते हैं:
- यह कृषि का आधुनिकीकरण करता है और द्वितीयक व तृतीयक क्षेत्रों में रोज़गार देकर लोगों को केवल खेती की आय पर निर्भर रहने से मुक्त करता है।
- यह बेरोज़गारी और गरीबी मिटाने की पूर्व-शर्त है — यही सोच भारत के सार्वजनिक-क्षेत्र और संयुक्त-क्षेत्र उपक्रमों के पीछे थी, जिनका उद्देश्य आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग लगाकर क्षेत्रीय असमानता घटाना भी था।
- तैयार माल का निर्यात व्यापार और वाणिज्य बढ़ाता है और बहुत ज़रूरी विदेशी मुद्रा लाता है।
- जो देश कच्चे माल को तरह-तरह के अधिक मूल्य वाले तैयार माल में बदलते हैं वे समृद्ध होते हैं। भारत की समृद्धि इसी में है कि वह अपने विनिर्माण को जितनी जल्दी हो सके बढ़ाए और विविध बनाए।
वैश्वीकरण के इस दौर में सिर्फ़ आत्मनिर्भरता काफ़ी नहीं — हमारे माल की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर की होनी चाहिए, तभी हम विश्व बाज़ार में टिक सकेंगे।
कृषि और उद्योग एक ही मज़दूरों के लिए लड़ने वाले प्रतिद्वंद्वी हैं। सही या ग़लत?
ग़लत। वे साथ-साथ चलते हैं। कृषि-उद्योग कच्चे माल के लिए खेतों पर निर्भर हैं और बदले में किसानों को सिंचाई पंप, उर्वरक, कीटनाशक, PVC पाइप, मशीनें और औज़ार बेचते हैं — जिससे खेती की उत्पादकता बढ़ती है और पूरी प्रक्रिया अधिक कुशल होती है।
कारखाना कहाँ बनेगा, यह क्या तय करता है
कारखाना कहीं भी यूँ ही नहीं खुलता। उसका स्थान वहाँ चुना जाता है जहाँ उत्पादन सबसे सस्ता और लाभदायक हो, और इसके लिए कई खिंचावों को एक साथ तौला जाता है:
- कच्चा माल — भारी, भारयुक्त और वज़न घटाने वाला माल कारखाने को अपने स्रोत के पास खींचता है (इस्पात संयंत्र कोयले व अयस्क के पास; चीनी मिल गन्ने के पास, क्योंकि कटे गन्ने का सुक्रोज़ देरी और दूरी से घट जाता है)।
- ऊर्जा — मशीनें चलाने के लिए (ऐलुमिनियम प्रगलन को स्थिर, बड़ी बिजली आपूर्ति चाहिए)।
- श्रम — सस्ते और उपलब्ध मज़दूर।
- बाज़ार — जहाँ माल बिकता है उसके पास होना।
- परिवहन — माल लाने-ले जाने के लिए सड़क, रेल, जल और बंदरगाह की कड़ियाँ।
- पूँजी — निवेश के लिए धन।
- जल — संसाधन के लिए (जूट मिलों को प्रचुर जल चाहिए)।
जब इनमें से कई चीज़ें एक ही जगह जुटती हैं, उद्योग वहीं इकट्ठा हो जाते हैं। यही कारण है कि छोटानागपुर पठार पर लोहा-इस्पात संयंत्रों का सबसे घना जमाव है — सस्ता लौह अयस्क, पास में उच्च कोटि का कच्चा माल, सस्ता श्रम और विशाल घरेलू बाज़ार।
उद्योगों को छाँटने के पाँच तरीके
चूँकि उद्योग हज़ारों हैं, हम उन्हें किसी चुने हुए आधार पर छाँटते हैं। एक ही उद्योग अलग-अलग आधार पर अलग-अलग वर्गों में पड़ेगा।
| आधार | श्रेणियाँ | उदाहरण |
|---|---|---|
| कच्चे माल का स्रोत | कृषि-आधारित / खनिज-आधारित | कृषि: सूती, जूट, रेशम, ऊनी वस्त्र, रबर, चीनी, चाय, कॉफ़ी, खाद्य तेल। खनिज: लोहा-इस्पात, सीमेंट, ऐलुमिनियम, मशीन औज़ार, पेट्रोरसायन। |
| मुख्य भूमिका | आधारभूत (कुंजी) / उपभोक्ता | आधारभूत: लोहा-इस्पात, ताँबा प्रगलन, ऐलुमिनियम प्रगलन (दूसरे उद्योगों को कच्चा माल देते हैं)। उपभोक्ता: चीनी, टूथपेस्ट, कागज़, सिलाई मशीन, पंखे (सीधे उपयोग के लिए)। |
| पूँजी निवेश | लघु / वृहत् | लघु = परिसंपत्तियों पर अधिकतम ₹1 करोड़ तक का निवेश (यह सीमा समय के साथ बदली है); इससे ऊपर वृहत्। |
| स्वामित्व | सार्वजनिक / निजी / संयुक्त / सहकारी | सार्वजनिक: BHEL, SAIL (सरकार)। निजी: TISCO, बजाज ऑटो, डाबर। संयुक्त: ऑयल इंडिया लि. (राज्य + निजी)। सहकारी: महाराष्ट्र की चीनी, केरल की कॉयर। |
| भार व वज़न | भारी / हल्के | भारी: लोहा-इस्पात। हल्के: विद्युत सामान। |
सहकारी क्षेत्र के बारे में एक बात: इसका स्वामित्व और संचालन कच्चे माल के उत्पादक या आपूर्तिकर्ता, श्रमिक, या दोनों मिलकर करते हैं — वे संसाधन जुटाते हैं और लाभ या हानि अनुपात में बाँटते हैं।
लोहा-इस्पात एक 'आधारभूत' उद्योग है। यह नाम क्यों?
क्योंकि यह अपना उत्पाद — इस्पात — दूसरे माल बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में देता है। भारी, मध्यम और हल्के सभी उद्योग अपनी मशीनरी के लिए इस पर निर्भर हैं, इसलिए यह उनका आधार, यानी ‘आधारभूत’ है।
कृषि-आधारित उद्योग: वस्त्र और चीनी
कृषि-आधारित उद्योग कृषि के कच्चे माल पर चलते हैं — सूती, जूट, रेशम, ऊनी वस्त्र, चीनी और खाद्य तेल।
वस्त्र उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था में एक अनोखा स्थान रखता है: यह औद्योगिक उत्पादन, रोज़गार और विदेशी-मुद्रा अर्जन में बहुत बड़ा योगदान देता है। यह देश का एकमात्र ऐसा उद्योग है जो आत्मनिर्भर है और मूल्य-श्रृंखला में पूर्ण — कच्चे माल से लेकर सर्वोच्च मूल्यवर्धित तैयार उत्पाद तक।
सूती वस्त्र। प्राचीन भारत में सूती कपड़ा हाथ से कताई और हथकरघा बुनाई से बनता था। 18वीं सदी के बाद विद्युत करघे (पावरलूम) आए। औपनिवेशिक काल में हमारे पारंपरिक उद्योग को भारी झटका लगा क्योंकि वे इंग्लैंड के मिल-निर्मित कपड़े से मुक़ाबला नहीं कर सके।
- पहली सफल वस्त्र मिल मुंबई में 1854 में स्थापित हुई।
- दोनों विश्व युद्ध (यूरोप में लड़े गए, जबकि भारत ब्रिटिश उपनिवेश था) से ब्रिटेन में कपड़े की माँग बढ़ी और इसने भारत के सूती वस्त्र उद्योग को बढ़ावा दिया।
शुरू में यह उद्योग महाराष्ट्र और गुजरात की कपास उगाने वाली पट्टी में केंद्रित था — कच्ची कपास, बाज़ार, परिवहन और बंदरगाह सुविधा, श्रम और नम जलवायु ने इसे वहाँ खींचा। यह कृषि से गहरे जुड़ा है और काम की एक लंबी कड़ी को रोज़गार देता है: कपास तोड़ने वाले, ओटाई, कताई, बुनाई, रंगाई, डिज़ाइनिंग, पैकेजिंग, सिलाई। यह दूसरे उद्योगों — रसायन व रंग, पैकेजिंग, इंजीनियरिंग — को भी आगे बढ़ाता है।
आज कताई महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु में केंद्रित है, जबकि बुनाई अत्यधिक विकेंद्रित है ताकि पारंपरिक कौशल और डिज़ाइन (सूती, रेशम, ज़री, कढ़ाई) बने रहें। भारत कताई में विश्व-स्तरीय है पर इसकी बुनाई अब भी निम्न गुणवत्ता का कपड़ा देती है, क्योंकि वह देश में बने उच्च कोटि के अधिकांश धागे का उपयोग नहीं कर पाती। बुनाई हथकरघा, पावरलूम और मिलों में होती है, और हाथ से काता खादी बुनकरों को घर पर ही बड़े पैमाने पर कुटीर रोज़गार देता है।
जूट वस्त्र। भारत कच्चे जूट और जूट सामान का सबसे बड़ा उत्पादक है और बांग्लादेश के बाद दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक। अधिकांश मिलें पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के किनारे एक संकरी पट्टी में हैं। पहली जूट मिल कोलकाता के पास रिशरा में 1855 में लगी। 1947 के विभाजन के बाद मिलें भारत में रहीं, पर जूट उगाने वाला तीन-चौथाई क्षेत्र बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में चला गया। हुगली बेसिन में इनके स्थान के कारण हैं: जूट उगाने वाले क्षेत्रों की निकटता, रेल व सड़क समर्थित सस्ता जल परिवहन, कच्चा जूट संसाधित करने को प्रचुर जल, पश्चिम बंगाल व पड़ोसी बिहार, ओडिशा और उत्तर प्रदेश का सस्ता श्रम, और बैंकिंग, बीमा व बंदरगाह सुविधा देने वाला बड़ा शहरी केंद्र कोलकाता।
चीनी उद्योग। भारत चीनी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है पर गुड़ और खांडसारी में पहला। इसका कच्चा माल, गन्ना, भारी होता है और ढुलाई में सुक्रोज़ खो देता है — इसलिए मिलें गन्ने के खेतों के पास बैठती हैं। मिलें उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश में हैं, जिनमें 60% मिलें उत्तर प्रदेश और बिहार में। यह उद्योग मौसमी है, जिससे यह सहकारी क्षेत्र के लिए आदर्श है। हाल के वर्षों में मिलें दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों, विशेषकर महाराष्ट्र की ओर खिसक रही हैं, क्योंकि वहाँ के गन्ने में सुक्रोज़ अधिक होता है, ठंडी जलवायु से पेराई का मौसम लंबा चलता है, और उन राज्यों में सहकारी समितियाँ अधिक सफल हैं।
खनिज-आधारित उद्योग
जो उद्योग कच्चे माल के रूप में खनिजों और धातुओं का उपयोग करते हैं वे खनिज-आधारित हैं।
लोहा-इस्पात आधारभूत उद्योग है, क्योंकि हर दूसरा उद्योग — भारी, मध्यम या हल्का — अपनी मशीनरी के लिए इस पर निर्भर है। इस्पात इंजीनियरिंग सामान, निर्माण, रक्षा, चिकित्सा, टेलीफ़ोनिक व वैज्ञानिक उपकरण, और अनगिनत उपभोक्ता वस्तुओं के लिए चाहिए। इसका उत्पादन और उपभोग किसी देश के विकास का सूचक माना जाता है। यह भारी उद्योग है: कच्चा माल और तैयार माल दोनों भारी और भारयुक्त हैं, इसलिए परिवहन लागत अधिक है। लौह अयस्क, कोककारी कोयला और चूना पत्थर लगभग 4 : 2 : 1 के अनुपात में चाहिए, और इस्पात को कठोर करने को कुछ मैंगनीज़। आदर्श रूप से इस्पात संयंत्र वहाँ बनने चाहिए जहाँ ये सामग्री और वितरण के लिए कुशल परिवहन तंत्र मिलें — इसीलिए छोटानागपुर पठार पर लोहा-इस्पात संयंत्रों का सबसे घना जमाव है।
ऐलुमिनियम प्रगलन भारत का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण धात्विक उद्योग है। ऐलुमिनियम हल्का, संक्षारण-रोधी, ऊष्मा का अच्छा चालक, आघातवर्ध्य, और मिश्रित करने पर मज़बूत होता है — विमान, बर्तन और तार बनाने में, और इस्पात, ताँबा, ज़िंक व सीसे के विकल्प के रूप में तेज़ी से प्रयोग होता है। इसका कच्चा माल बॉक्साइट है, एक बहुत भारी, गहरी लालिमा वाली चट्टान। प्रगलन संयंत्र ओडिशा, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में हैं। दो मुख्य स्थान-कारक हैं: बिजली की नियमित आपूर्ति और न्यूनतम लागत पर कच्चे माल का सुनिश्चित स्रोत।
रासायनिक उद्योग। तेज़ी से बढ़ता और विविध, जिसमें बड़ी और छोटी दोनों इकाइयाँ, और अकार्बनिक व कार्बनिक दोनों क्षेत्र आते हैं।
- अकार्बनिक रसायन — सल्फ़्यूरिक अम्ल (उर्वरक, संश्लिष्ट रेशे, प्लास्टिक, चिपकाने वाले, पेंट, रंग के लिए), नाइट्रिक अम्ल, क्षार, सोडा ऐश (काँच, साबुन, अपमार्जक, कागज़ के लिए) और कास्टिक सोडा। ये पूरे देश में फैले हैं।
- कार्बनिक रसायन — पेट्रोरसायन, जिनसे संश्लिष्ट रेशे, संश्लिष्ट रबर, प्लास्टिक, रंग, दवाएँ व औषधियाँ बनती हैं। इनके संयंत्र तेल शोधनशालाओं या पेट्रोरसायन संयंत्रों के पास होते हैं।
रासायनिक उद्योग अपना सबसे बड़ा उपभोक्ता ख़ुद है — मूल रसायन संसाधित होकर उद्योग, कृषि या उपभोक्ताओं के लिए दूसरे रसायन बनाते हैं।
उर्वरक उद्योग। नाइट्रोजनी उर्वरक (मुख्यतः यूरिया), फ़ॉस्फ़ेटी उर्वरक, अमोनियम फ़ॉस्फ़ेट (DAP) और नाइट्रोजन (N), फ़ॉस्फ़ेट (P) व पोटाश (K) को मिलाने वाले जटिल उर्वरकों के इर्द-गिर्द केंद्रित। पोटाश पूरी तरह आयात होता है — भारत में व्यापारिक रूप से प्रयोग योग्य पोटाश भंडार नहीं हैं। हरित क्रांति के बाद यह उद्योग फैला; गुजरात, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पंजाब और केरल देश के लगभग आधे उर्वरक का उत्पादन करते हैं।
सीमेंट उद्योग। निर्माण के लिए सीमेंट अनिवार्य है — घर, कारखाने, पुल, सड़क, हवाई अड्डे, बाँध। इसे भारी, भारयुक्त कच्चा माल चाहिए जैसे चूना पत्थर, सिलिका और जिप्सम, साथ ही कोयला, बिजली और रेल परिवहन। पहला सीमेंट संयंत्र चेन्नई में 1904 में लगा, और स्वतंत्रता के बाद उद्योग फैला। गुजरात के संयंत्र खाड़ी देशों के बाज़ार के लिए रणनीतिक रूप से स्थित हैं।
ऑटोमोबाइल उद्योग। माल और यात्रियों के तेज़ परिवहन के लिए ट्रक, बस, कार, मोटरसाइकिल, स्कूटर, तिपहिया और बहुउपयोगी वाहन बनाता है। उदारीकरण के बाद नए समकालीन मॉडलों ने माँग बढ़ाई और उद्योग स्वस्थ रूप से बढ़ा। यह दिल्ली, गुरुग्राम, मुंबई, पुणे, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ, इंदौर, हैदराबाद, जमशेदपुर और बेंगलुरु के आस-पास स्थित है।
सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक उद्योग। यह एक विस्तृत श्रेणी है — ट्रांज़िस्टर सेट, टेलीविज़न, टेलीफ़ोन, सेल्युलर टेलिकॉम, टेलीफ़ोन एक्सचेंज, राडार, कंप्यूटर और दूरसंचार उपकरण। बेंगलुरु भारत की इलेक्ट्रॉनिक राजधानी बन गया है; अन्य महत्वपूर्ण केंद्र मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ और कोयंबटूर हैं, जबकि सबसे बड़ा जमाव बेंगलुरु, नोएडा, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे में है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव रोज़गार सृजन पर पड़ा है, और हार्डवेयर व सॉफ़्टवेयर में लगातार वृद्धि इसकी सफलता की कुंजी है।
चीनी मिल और लोहा-इस्पात संयंत्र दोनों अपने कच्चे माल के पास होते हैं, पर कारण थोड़े अलग हैं। दोनों समझाइए।
- गन्ना भारी होता है और काटने के बाद जितनी देर रुके और जितनी दूर जाए, उसका सुक्रोज़ उतना घटता है। सुक्रोज़ बचाने को मिल खेतों के पास होनी ही चाहिए।
- लोहा-इस्पात लौह अयस्क, कोककारी कोयला और चूना पत्थर (लगभग 4 : 2 : 1) उपयोग करता है — सभी भारी और भारयुक्त, इसलिए इन्हें दूर ढोना महँगा है। तैयार इस्पात भी भारी है।
- इसलिए दोनों लागत घटाने को कच्चे माल के पास बैठते हैं — पर चीनी मिल सुक्रोज़ की हानि से दौड़ लगा रही है, जबकि इस्पात संयंत्र भारी कच्चे माल की भारी परिवहन लागत से लड़ रहा है। यही कारण है कि अयस्क व कोयले से समृद्ध छोटानागपुर पठार पर अधिकांश इस्पात संयंत्र हैं।
औद्योगिक प्रदूषण और उसका नियंत्रण
उद्योग भारत की प्रगति चलाते हैं, पर प्रदूषण भी फैलाते हैं। प्रदूषण चार प्रकार का होता है, और तापीय विद्युत संयंत्र भी प्रदूषक हैं।
| प्रकार | कारण | मुख्य प्रभाव |
|---|---|---|
| वायु | अवांछित गैसों (सल्फ़र डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड) का अधिक अनुपात, रासायनिक व कागज़ कारखानों, ईंट-भट्टों, शोधनशालाओं, प्रगलन संयंत्रों से धुआँ व धूल; विषैली गैस रिसाव | मानव स्वास्थ्य, जीव-जंतु, पौधे, इमारतें और पूरे वायुमंडल को नुकसान। उदाहरण: भोपाल गैस त्रासदी। |
| जल | कार्बनिक व अकार्बनिक अपशिष्ट और बहिःस्राव — रंग, अपमार्जक, अम्ल, लवण, सीसा व पारा जैसी भारी धातुएँ — कागज़, लुगदी, रासायनिक, वस्त्र व रंगाई, शोधनशाला, चर्मशोधन, विद्युत-लेपन उद्योगों से; उड़न राख, फ़ॉस्फ़ो-जिप्सम, धातुमल जैसे ठोस अपशिष्ट | नदियाँ और जल-स्रोत दूषित। तापीय प्रदूषण (बिना ठंडा किए बहाया गर्म पानी) जलीय जीवन को हानि पहुँचाता है। |
| भूमि / मृदा | काँच, हानिकारक रसायन, औद्योगिक बहिःस्राव, पैकेजिंग, लवण और कूड़े का ढेर; वर्षा-जल प्रदूषकों को ज़मीन में ले जाता है | मृदा को बेकार कर देता है और भूजल दूषित करता है। नाभिकीय अपशिष्ट कैंसर, जन्म-दोष और गर्भपात का कारण बनते हैं। |
| ध्वनि | औद्योगिक व निर्माण गतिविधि, मशीनरी, कारखाना उपकरण, जनरेटर, आरी, वायवीय व विद्युत ड्रिल | चिड़चिड़ाहट, क्रोध, तनाव, श्रवण-दोष, हृदय गति व रक्तचाप का बढ़ना। |
नुकसान का नियंत्रण। हमारे उद्योग द्वारा छोड़ा गया हर लीटर अपशिष्ट जल उससे आठ गुना ताज़ा पानी प्रदूषित करता है। उपाय:
- पानी को दो या अधिक चरणों में पुनः उपयोग व पुनर्चक्रित करके ताज़े जल का उपयोग घटाएँ, और वर्षा-जल संचयन करें।
- गर्म पानी और बहिःस्राव को छोड़ने से पहले उपचारित करें — तीन चरणों में: (क) प्राथमिक (यांत्रिक: छानना, पीसना, स्कंदन, अवसादन), (ख) द्वितीयक (जैविक), (ग) तृतीयक (जैविक, रासायनिक व भौतिक, अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण)।
- जहाँ भूजल भंडार को ख़तरा हो वहाँ उद्योग द्वारा भूजल के अति-दोहन को कानूनन नियंत्रित करें।
- वायु प्रदूषण घटाएँ — चिमनियों में विद्युत-स्थैतिक अवक्षेपक, कपड़े के फ़िल्टर, स्क्रबर और जड़त्वीय पृथक्कारक लगाएँ; धुआँ घटाने को कोयले की जगह तेल या गैस का उपयोग करें।
- ध्वनि घटाएँ — जनरेटर में साइलेंसर लगाएँ, मशीनरी को ऊर्जा-कुशल व शांत बनाएँ, ध्वनि-शोषक सामग्री, इयरप्लग व इयरफ़ोन का उपयोग करें।
सतत विकास की चुनौती आर्थिक वृद्धि को पर्यावरणीय चिंताओं के साथ जोड़ने की है। एक बड़ी विद्युत निगम NTPC राह दिखाती है: इसके पास पर्यावरण प्रबंधन प्रणाली के लिए ISO 14001 प्रमाणन है और यह उपकरणों के अनुकूलतम उपयोग, अपशिष्ट न्यूनीकरण, राख-तालाब व राख-जल पुनर्चक्रण, हरित पट्टियों व वनरोपण, और सभी संयंत्रों पर पारिस्थितिक निगरानी से प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करती है।
आम ग़लतियाँ
विनिर्माण का मतलब है कोई भी चीज़ बनाना, चाहे हाथ से एक ही टुकड़ा क्यों न हो।
रोज़मर्रा की बातचीत में किसी भी वस्तु के बनने को हम 'विनिर्माण' कह देते हैं, और एक दीया गढ़ने वाला कुम्हार कुछ बनाता तो है ही — इसलिए 'एक चीज़ = विनिर्माण' सही लगता है।
परिभाषा पैमाने और मूल्य पर ज़ोर देती है: विनिर्माण कच्चे माल को संसाधित कर बड़ी मात्रा में अधिक मूल्यवान तैयार उत्पाद बनाना है। मुख्य विचार हैं भारी उत्पादन और मूल्यवर्धन, न कि हाथ से बना एक टुकड़ा।
कारखाना हमेशा अपने बाज़ार के ठीक पास या जहाँ ज़मीन सस्ती हो वहाँ बनना चाहिए।
ख़रीदारों के पास होना कुशल लगता है, और सस्ती ज़मीन ज़ाहिर तौर पर लागत घटाती है, इसलिए स्थान सिर्फ़ बाज़ार और ज़मीन की कीमत का मामला लगता है।
स्थान कई कारकों का संतुलन है — कच्चा माल, ऊर्जा, श्रम, बाज़ार, परिवहन, पूँजी और जल। कौन-सा कारक भारी पड़ेगा यह उद्योग पर निर्भर है: भारी या वज़न घटाने वाला कच्चा माल (अयस्क, गन्ना) कारखाने को बाज़ार की नहीं, अपने स्रोत की ओर खींचता है।
भारत उर्वरकों के लिए कोई कच्चा माल आयात नहीं करता क्योंकि वह आत्मनिर्भर है।
भारत एक बड़ा कृषि देश है और इसका उर्वरक उद्योग भी बड़ा है, इसलिए ज़ाहिर लगता है कि वह अपना सारा कच्चा माल ख़ुद बनाता होगा।
भारत पोटाश (NPK का 'K') पूरी तरह आयात करता है, क्योंकि उसके पास व्यापारिक रूप से प्रयोग योग्य पोटाश या पोटैशियम-यौगिक भंडार नहीं हैं। नाइट्रोजनी और फ़ॉस्फ़ेटी उर्वरक देश बनाता है, पर पोटाश बाहर से लाना पड़ता है।
तापीय प्रदूषण का मतलब है कारखाने के पास हवा का गर्म होना।
'तापीय' का अर्थ ऊष्मा है, और कारखाने गर्म लगते हैं, इसलिए 'तापीय प्रदूषण' हवा की गर्मी जैसा लगता है।
तापीय प्रदूषण एक जल-समस्या है: यह तब होता है जब कारखानों और तापीय संयंत्रों का गर्म पानी ठंडा हुए बिना नदियों-तालाबों में बहा दिया जाता है, जिससे जलीय जीवन को नुकसान होता है। यह वायु नहीं, जल प्रदूषण के अंतर्गत आता है।
झटपट जाँच
निम्न में से कौन-सा उद्योग बॉक्साइट को कच्चे माल के रूप में उपयोग करता है?
कौन-सा उद्योग टेलीफ़ोन, कंप्यूटर और इसी तरह के उपकरण बनाता है?
भारत में अधिकांश जूट मिलें किस नदी के किनारे स्थित हैं?
चीनी उद्योग सहकारी क्षेत्र के लिए उपयुक्त क्यों है?
अभ्यास प्रश्न
आसान
विनिर्माण क्या है? (30 शब्दों से अधिक में नहीं।)
विनिर्माण कच्चे माल को संसाधित कर बड़ी मात्रा में अधिक मूल्यवान तैयार उत्पाद बनाना है — जैसे गन्ने से चीनी, लौह अयस्क से इस्पात, या बॉक्साइट से ऐलुमिनियम।
आधारभूत उद्योग क्या हैं? एक उदाहरण दीजिए।
आधारभूत (या कुंजी) उद्योग वे हैं जिनके उत्पाद दूसरे माल बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में उपयोग होते हैं। दूसरे भारी, मध्यम और हल्के उद्योग इन पर निर्भर रहते हैं।
उदाहरण: लोहा-इस्पात उद्योग — इसका इस्पात लगभग हर दूसरे उद्योग की मशीनरी और सामग्री बनता है।
मध्यम
सूती वस्त्र उद्योग को आत्मनिर्भर और मूल्य-श्रृंखला में पूर्ण क्यों कहा जाता है, और उन तीन राज्यों के नाम बताइए जहाँ कताई केंद्रित है।
सूती वस्त्र उद्योग देश का एकमात्र ऐसा उद्योग है जो आत्मनिर्भर और मूल्य-श्रृंखला में पूर्ण है — यह कच्चे माल से लेकर सर्वोच्च मूल्यवर्धित तैयार उत्पाद तक सब कुछ भारत में ही समेटता है। यह औद्योगिक उत्पादन, रोज़गार सृजन और विदेशी-मुद्रा अर्जन में बहुत बड़ा योगदान देता है।
कताई महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु में केंद्रित है, जबकि बुनाई अत्यधिक विकेंद्रित है ताकि सूती, रेशम, ज़री और कढ़ाई के पारंपरिक कौशल व डिज़ाइन बने रहें।
छोटानागपुर पठार पर लोहा-इस्पात उद्योगों का सबसे घना जमाव क्यों है, समझाइए।
छोटानागपुर पठार को इस उद्योग के लिए कई सापेक्ष लाभ मिलते हैं:
- क्षेत्र में लौह अयस्क की कम लागत।
- पास में ही उच्च कोटि का कच्चा माल (कोककारी कोयला, चूना पत्थर) — यह महत्वपूर्ण है क्योंकि लोहा-इस्पात भारी उद्योग है और ये सामग्री भारयुक्त हैं।
- सस्ता श्रम।
- घरेलू बाज़ार में विशाल वृद्धि की संभावना।
मिलकर ये यहाँ उत्पादन को कहीं और से सस्ता बनाते हैं, इसलिए अधिकांश संयंत्र पठार पर इकट्ठा हैं।
चुनौती
उद्योग पर्यावरण को कैसे प्रदूषित करते हैं? चारों प्रकार पर चर्चा कीजिए। (लगभग 120 शब्द।)
उद्योग चार प्रकार के प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार हैं — वायु, जल, भूमि और ध्वनि — और तापीय विद्युत संयंत्र इसमें और जोड़ते हैं।
वायु प्रदूषण सल्फ़र डाइऑक्साइड व कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी अवांछित गैसों, और रासायनिक व कागज़ कारखानों, ईंट-भट्टों, शोधनशालाओं व प्रगलन संयंत्रों के धुएँ व धूल से होता है; विषैली गैस रिसाव (जैसे भोपाल गैस त्रासदी) विशेष रूप से ख़तरनाक हैं।
जल प्रदूषण कागज़, रासायनिक, वस्त्र, चर्मशोधन व विद्युत-लेपन इकाइयों द्वारा नदियों में छोड़े कार्बनिक-अकार्बनिक अपशिष्ट, रंग, अम्ल, लवण और सीसा-पारा जैसी भारी धातुओं से होता है; गर्म पानी से तापीय प्रदूषण जलीय जीवन को हानि पहुँचाता है।
भूमि/मृदा प्रदूषण काँच, रसायन, बहिःस्राव, उड़न राख व धातुमल के ढेर से होता है, जो भूजल भी दूषित करता है।
ध्वनि प्रदूषण मशीनरी, जनरेटर व ड्रिल से होता है, जिससे श्रवण-दोष, बढ़ा रक्तचाप और तनाव होता है।
उद्योग से होने वाले पर्यावरणीय क्षरण को कम करने के उपायों पर चर्चा कीजिए। (लगभग 120 शब्द।)
ताज़े जल का औद्योगिक प्रदूषण पानी का उपयोग घटाकर — उसे दो या अधिक चरणों में पुनः उपयोग व पुनर्चक्रित करके — और वर्षा-जल संचयन से घटाया जा सकता है। गर्म पानी और बहिःस्राव को छोड़ने से पहले तीन चरणों में उपचारित करना चाहिए: प्राथमिक (यांत्रिक — छानना, पीसना, स्कंदन, अवसादन), द्वितीयक (जैविक), और तृतीयक (जैविक, रासायनिक व भौतिक, अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण)। उद्योग द्वारा भूजल के अति-दोहन को कानूनन नियंत्रित किया जाना चाहिए।
वायु के लिए, कणिकीय पदार्थ चिमनियों में विद्युत-स्थैतिक अवक्षेपक, कपड़े के फ़िल्टर, स्क्रबर व जड़त्वीय पृथक्कारक लगाकर घटाया जा सकता है, और धुआँ कोयले की जगह तेल या गैस के उपयोग से। ध्वनि जनरेटर में साइलेंसर लगाकर, मशीनरी को नया रूप देकर और ध्वनि-शोषक सामग्री व इयरप्लग से घटाई जाती है।
अंततः सतत विकास का अर्थ है आर्थिक वृद्धि को पर्यावरणीय चिंताओं के साथ जोड़ना।
सारांश
अब आपको यह समझाना आना चाहिए:
- विनिर्माण कच्चे माल को संसाधित कर बड़ी मात्रा में अधिक मूल्यवान तैयार उत्पाद बनाना है; यह आर्थिक विकास की रीढ़ है (कृषि का आधुनिकीकरण, रोज़गार, विदेशी मुद्रा, क्षेत्रीय असमानता में कमी)।
- कारखाने का स्थान कच्चे माल, ऊर्जा, श्रम, बाज़ार, परिवहन, पूँजी और जल का संतुलन है — भारी या वज़न घटाने वाला कच्चा माल इसे अपने स्रोत की ओर खींचता है।
- उद्योग पाँच आधारों पर वर्गीकृत होते हैं: कच्चे माल का स्रोत (कृषि/खनिज), मुख्य भूमिका (आधारभूत/उपभोक्ता), पूँजी (लघु/वृहत्), स्वामित्व (सार्वजनिक/निजी/संयुक्त/सहकारी), और भार-वज़न (भारी/हल्के)।
- कृषि-आधारित: वस्त्र उद्योग (सूती — पहली मिल मुंबई 1854, कताई महाराष्ट्र/गुजरात/तमिलनाडु में; जूट — अधिकतर पश्चिम बंगाल में हुगली किनारे, पहली मिल रिशरा 1855) और चीनी (मौसमी, सहकारी के लिए उपयुक्त, अधिक सुक्रोज़ के लिए महाराष्ट्र की ओर खिसकती)।
- खनिज-आधारित: लोहा-इस्पात (आधारभूत उद्योग, छोटानागपुर पठार पर केंद्रित), ऐलुमिनियम प्रगलन (बॉक्साइट से, बिजली चाहिए), रासायनिक, उर्वरक (पोटाश पूरी तरह आयातित), सीमेंट (चूना पत्थर, सिलिका, जिप्सम), ऑटोमोबाइल, और IT व इलेक्ट्रॉनिक (बेंगलुरु, इलेक्ट्रॉनिक राजधानी)।
- उद्योग चार प्रकार का प्रदूषण फैलाते हैं — वायु, जल, भूमि, ध्वनि (साथ ही जल का तापीय प्रदूषण) — जिसे जल का पुनर्चक्रण व उपचार, अवक्षेपक व फ़िल्टर लगाकर, मशीनरी को शांत करके, और सतत विकास अपनाकर नियंत्रित किया जाता है।
आगे क्या
कारखाने माल बनाते हैं, पर वह माल बेकार है यदि वह चल न सके — कच्चा माल संयंत्र तक पहुँचना चाहिए और तैयार उत्पाद बाज़ार तक। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ में आप देखेंगे कि सड़क, रेल, जल, वायु मार्ग, पाइपलाइन और संचार पूरे देश को कैसे जोड़ते हैं, और क्यों व्यापार — देश के भीतर और सीमाओं के पार माल का आदान-प्रदान — वह असली जीवन रेखा है जो इस अध्याय में बने सब कुछ को उन लोगों तक पहुँचाती है जिन्हें उसकी ज़रूरत है।