धातु एवं अधातु
ये क्यों ज़रूरी है
अभी अपने चारों ओर देखिए — धातुएँ हर जगह चुपचाप काम कर रही हैं: इमारत का स्टील, तारों का ताँबा, कड़ाही का ऐलुमिनियम, अँगूठी का सोना, मंदिर की घंटी का काँसा। हमने हर धातु किसी वजह से चुनी — ताँबा बिजली ढोता है, ऐलुमिनियम गर्मी फैलाता है, सोना कभी मटमैला नहीं होता, स्टील बोझ उठाता है।
पर एक पहेली है। 2,000 साल पुराना सोने का गहना आज भी चमकता है, जबकि बारिश में पड़ा लोहे का गेट कुछ ही महीनों में लाल-भूरी परत ओढ़ लेता है। सोडियम इतना उतावला है कि उसे मिट्टी के तेल में डुबोकर रखते हैं ताकि हवा में आग न पकड़ ले — पर प्लैटिनम धरती में चमकती गाँठों की तरह यूँ ही पड़ा रहता है, अछूता। कुछ धातुएँ इतनी क्रियाशील और कुछ इतनी शांत क्यों? और अधातुएँ इतनी कम क्यों हैं, और लगभग उल्टा बर्ताव क्यों करती हैं?
यह अध्याय इन सबका जवाब एक ही व्यवस्थित विचार से देता है — क्रियाशीलता श्रेणी (reactivity series) — और इसी से सब समझाता है: लोहे में जंग क्यों, हम चट्टान से धातु कैसे निकालते हैं, और आपका स्टेनलेस-स्टील चम्मच दही में क्यों नहीं गलता।
असली बात
धातु और अधातु एक गहरी बात में विपरीत हैं — वे इलेक्ट्रॉनों के साथ क्या करती हैं:
धातुएँ इलेक्ट्रॉन खोकर धनात्मक आयन (cation) बनाती हैं; अधातुएँ इलेक्ट्रॉन पाकर ऋणात्मक आयन (anion) बनाती हैं। धातु अपने इलेक्ट्रॉन कितनी आसानी से छोड़ती है — यही उसकी क्रियाशीलता है।
परमाणु चाहते हैं कि उनका बाहरी कोश भरा हो (उत्कृष्ट गैसों की तरह)। सोडियम परमाणु (2,8,1) यह अपने अकेले बाहरी इलेक्ट्रॉन को खोकर पा लेता है → Na⁺। क्लोरीन परमाणु (2,8,7) इसे एक इलेक्ट्रॉन पाकर पाता है → Cl⁻। तो जब धातु अधातु से मिलती है, इलेक्ट्रॉन हस्तांतरित हो जाते हैं, और विपरीत आवेशित आयन जुड़कर एक आयनिक यौगिक बनाते हैं (जैसे NaCl)।
धातुओं को इस आधार पर क्रम में लगाइए कि वे कितनी आसानी से इलेक्ट्रॉन छोड़ती हैं, और आपको मिलती है क्रियाशीलता श्रेणी — और यही एक सूची चुपचाप लगभग पूरा अध्याय बता देती है: कौन-सी धातुएँ जलती या झाग देती हैं, कौन किसको घोल से विस्थापित करती है, हम हर धातु को उसके अयस्क से कैसे निकालते हैं, और किसमें संक्षारण होता है। श्रेणी सीख लीजिए, बाकी अपने आप समझ आ जाएगा।
आओ इसे आसान करके समझें
भौतिक गुण: धातु कैसे पहचानें
ज़्यादातर धातुओं में भौतिक गुणों का एक जाना-पहचाना समूह होता है:
- धात्विक चमक — ताज़ा काटने या पॉलिश करने पर चमकीली सतह।
- आघातवर्ध्य (malleable) — पीटकर पतली चादर बनाई जा सकती है (सोना और चाँदी सबसे ज़्यादा आघातवर्ध्य)।
- तन्य (ductile) — पतले तार में खींची जा सकती है (सोना सबसे तन्य — 1 ग्राम से 2 किमी लंबा तार!)।
- गर्मी और बिजली के अच्छे चालक (चाँदी और ताँबा सबसे बेहतर)।
- ध्वनिमय (sonorous) — ठोकने पर बजती हैं (इसीलिए घंटियाँ धातु की होती हैं)।
- कठोर, ऊँचे गलनांक, और कमरे के तापमान पर ठोस।
अधातुएँ ज़्यादातर उल्टी होती हैं: मटमैली, भंगुर (न आघातवर्ध्य न तन्य), ख़राब चालक, और ठोस/तरल/गैस हो सकती हैं।
पर प्रकृति को अपवाद बहुत पसंद हैं — सिर्फ़ भौतिक गुणों पर भरोसा मत कीजिए:
- पारा धातु है पर कमरे के तापमान पर तरल।
- सोडियम/पोटैशियम इतनी नरम धातुएँ हैं कि चाकू से कट जाती हैं; गैलियम और सीज़ियम हथेली पर ही पिघल जाते हैं।
- आयोडीन अधातु है पर चमकीली।
- कार्बन के अपररूप हैं: हीरा (सबसे कठोर प्राकृतिक पदार्थ) और ग्रेफ़ाइट (एक अधातु जो बिजली चलाती है)।
| गुण | धातु | अधातु |
|---|---|---|
| चमक | चमकीली | आमतौर पर मटमैली (आयोडीन को छोड़कर) |
| आघातवर्ध्य / तन्य | हाँ | नहीं — भंगुर |
| गर्मी व बिजली का चालन | अच्छा | ख़राब (ग्रेफ़ाइट को छोड़कर) |
| ठोकने पर ध्वनि | ध्वनिमय | ध्वनिमय नहीं |
| कमरे के तापमान पर अवस्था | ठोस (पारे को छोड़कर) | ठोस, तरल या गैस |
एक धातु बताइए जो कमरे के तापमान पर तरल है, एक जिसे चाकू से काटा जा सके, गर्मी का सबसे अच्छा चालक, और गर्मी का ख़राब चालक।
- तरल धातु: पारा।
- चाकू से कटने वाली: सोडियम (या पोटैशियम)।
- गर्मी का सबसे अच्छा चालक: चाँदी।
- गर्मी का ख़राब चालक: लेड (या पारा)।
धातुओं के रासायनिक गुण
भौतिक गुणों में बहुत अपवाद हैं, इसलिए हम धातुओं को इस आधार पर ज़्यादा भरोसे से बाँटते हैं कि वे कैसे अभिक्रिया करती हैं।
ऑक्सीजन के साथ → धातु ऑक्साइड (ज़्यादातर क्षारकीय)
लगभग हर धातु ऑक्सीजन से मिलकर धातु ऑक्साइड बनाती है:
धातु + ऑक्सीजन → धातु ऑक्साइड 2Cu + O₂ → 2CuO (काला) | 4Al + 3O₂ → 2Al₂O₃
धातु ऑक्साइड आमतौर पर क्षारकीय होते हैं (अध्याय 2 याद कीजिए: वे अम्ल से अभिक्रिया करके लवण + पानी देते हैं)। कुछ — जैसे Al₂O₃ और ZnO — अम्ल और क्षारक दोनों से अभिक्रिया करते हैं, इसलिए इन्हें उभयधर्मी ऑक्साइड (amphoteric) कहते हैं:
Al₂O₃ + 6HCl → 2AlCl₃ + 3H₂O Al₂O₃ + 2NaOH → 2NaAlO₂ + H₂O (सोडियम ऐलुमिनेट)
कुछ ऑक्साइड (Na₂O, K₂O) तो पानी में घुलकर क्षार बनाते हैं (Na₂O + H₂O → 2NaOH)।
ऑक्सीजन के प्रति क्रियाशीलता बहुत बदलती है: Na, K इतनी ज़ोर से अभिक्रिया करते हैं कि हवा में आग पकड़ लेते हैं (इसलिए मिट्टी के तेल में रखे जाते हैं); Mg, Al, Zn पर एक पतली सुरक्षात्मक ऑक्साइड परत बन जाती है (इसीलिए ऐलुमिनियम के बर्तन संक्षारण से बचते हैं — ऐनोडीकरण इस परत को जानबूझकर मोटा करता है); Cu बस काली परत ले लेता है; Ag, Au गरम करने पर भी अभिक्रिया नहीं करते।
पानी के साथ → हाइड्रॉक्साइड/ऑक्साइड + हाइड्रोजन (सिर्फ़ कुछ धातुएँ)
2Na + 2H₂O → 2NaOH + H₂ + ऊष्मा (इतनी ज़ोरदार कि H₂ आग पकड़ लेती है) Ca + 2H₂O → Ca(OH)₂ + H₂ (कैल्शियम तैरने लगता है — H₂ के बुलबुले चिपक जाते हैं)
- K, Na ठंडे पानी से ज़ोरदार अभिक्रिया करते हैं; Ca कम।
- Mg सिर्फ़ गरम पानी से अभिक्रिया करता है।
- Al, Zn, Fe सिर्फ़ भाप से अभिक्रिया करते हैं (जैसे 3Fe + 4H₂O → Fe₃O₄ + 4H₂)।
- Pb, Cu, Ag, Au पानी से बिलकुल अभिक्रिया नहीं करते।
तनु अम्लों के साथ → लवण + हाइड्रोजन
धातु + तनु अम्ल → लवण + हाइड्रोजन Mg + 2HCl → MgCl₂ + H₂
तीव्रता का क्रम Mg > Al > Zn > Fe है; ताँबा तनु HCl से बिलकुल अभिक्रिया नहीं करता। (तनु नाइट्रिक अम्ल अपवाद है — यह ऑक्सीकारक है और आमतौर पर H₂ की जगह नाइट्रोजन के ऑक्साइड देता है।)
लवण-घोल के साथ → विस्थापन
एक ज़्यादा क्रियाशील धातु किसी कम क्रियाशील धातु को उसके लवण-घोल से बाहर धकेल देती है:
धातु A + B का लवण → A का लवण + धातु B Fe + CuSO₄ → FeSO₄ + Cu (लोहा ताँबे से ज़्यादा क्रियाशील है)
ये विस्थापन प्रयोग धातुओं को क्रम में लगाने का सबसे साफ़ तरीक़ा हैं।
क्रियाशीलता श्रेणी — मास्टर सूची
इन सबको जोड़िए और धातुएँ सबसे ज़्यादा से सबसे कम क्रियाशील तक क़तार में लग जाती हैं:
K > Na > Ca > Mg > Al > Zn > Fe > Pb > (H) > Cu > Hg > Ag > Au
धातु जहाँ बैठती है, वही उसका बर्ताव बताती है: हाइड्रोजन से ऊपर की कोई भी धातु तनु अम्लों से H₂ विस्थापित करती है; कोई भी धातु अपने से नीचे वालों को उनके लवणों से विस्थापित कर देती है।
चार धातुएँ A, B, C, D ये नतीजे देती हैं: A ताँबा विस्थापित करती है पर लोहा नहीं; B लोहा (और ताँबा) विस्थापित करती है; C सिर्फ़ चाँदी विस्थापित करती है; D कुछ भी नहीं। इन्हें क्रम में लगाइए और बताइए B कॉपर सल्फेट में क्या करेगी।
-
D किसी से अभिक्रिया नहीं करती → सबसे कम क्रियाशील (Cu/Ag से भी नीचे)।
-
C सिर्फ़ चाँदी विस्थापित करती है → यह Ag से ठीक ऊपर पर Cu से नीचे है (सिर्फ़ सबसे कम क्रियाशील लवण ही हटता है)।
-
A ताँबा विस्थापित करती है पर लोहा नहीं → A Fe से नीचे पर Cu से ऊपर है।
-
B लोहा (और ताँबा) विस्थापित करती है → B Fe से ऊपर, यहाँ सबसे क्रियाशील।
-
क्रम (ज़्यादा → कम): B > A > C > D। चूँकि B ताँबे से ऊपर है, B को कॉपर सल्फेट में डालने पर ताँबा विस्थापित होगा — नीला रंग फीका पड़ेगा और ताँबा जमेगा।
धातु और अधातु असल में कैसे जुड़ते हैं: आयनिक यौगिक
धातुएँ धनात्मक आयन क्यों बनाती हैं? इलेक्ट्रॉन खोकर भरा बाहरी कोश पाने के लिए; अधातुएँ इलेक्ट्रॉन पाकर। जब सोडियम क्लोरीन से मिलता है, इलेक्ट्रॉन बस सौंप दिया जाता है:
Na → Na⁺ + e⁻ | Cl + e⁻ → Cl⁻ ⟹ Na⁺ और Cl⁻ आकर्षित होकर → NaCl
धातु से अधातु को इलेक्ट्रॉन के इस हस्तांतरण से बने यौगिक आयनिक (वैद्युत संयोजी) यौगिक कहलाते हैं। इनमें गुणों का एक पहचाना समूह होता है:
| गुण | कैसा दिखता है | क्यों |
|---|---|---|
| भौतिक अवस्था | कठोर, भंगुर ठोस | + और − आयनों के बीच प्रबल आकर्षण |
| गलनांक/क्वथनांक | ऊँचे | आयनिक बंध तोड़ने में बहुत ऊर्जा चाहिए |
| विलेयता | पानी में घुलनशील; पेट्रोल/मिट्टी के तेल में नहीं | पानी आयनों को अलग कर देता है |
| बिजली का चालन | पिघले या घुले रूप में चालन, ठोस में नहीं | आयन तभी चलते हैं जब मुक्त हों |
आयनिक यौगिक पिघले या घुले रूप में बिजली क्यों चलाते हैं, पर ठोस अवस्था में नहीं?
आयनिक यौगिकों में आयन दोनों हालत में होते हैं, पर चालन के लिए आयनों का चलना ज़रूरी है। ठोस में प्रबल बल उन्हें एक तय जालक में रोके रखते हैं। पिघलने या घुलने पर ये बल टूट जाते हैं, तो आयन मुक्त होकर धारा ढोते हैं।
धातुएँ कहाँ से आती हैं, और हम उन्हें कैसे निकालते हैं (धातुकर्म)
धातुएँ भू-पर्पटी में खनिज (minerals) के रूप में मिलती हैं; जो खनिज इतना समृद्ध हो कि उससे धातु लाभप्रद ढंग से निकाली जा सके, वह अयस्क (ore) है। अयस्क के साथ मिट्टी जैसी अशुद्धियाँ — गैंग (gangue) — मिली होती हैं, जिन्हें पहले हटाया जाता है। फिर धातु को बाहर निकालना पूरी तरह उसकी क्रियाशीलता पर निर्भर करता है:
- कम क्रियाशील (Cu, Ag, Au, Hg): मुक्त अवस्था में मिलती हैं, या ऑक्साइड/सल्फाइड को केवल गरम करके अपचयित कर लिया जाता है — जैसे सिनेबार: 2HgS + 3O₂ → 2HgO + 2SO₂, फिर 2HgO → 2Hg + O₂।
- मध्यम (Zn, Fe, Pb, Cu): सल्फाइड/कार्बोनेट अयस्क को पहले ऑक्साइड में
बदला जाता है — भर्जन (roasting) (सल्फाइड, अधिक हवा में) या निस्तापन
(calcination) (कार्बोनेट, सीमित हवा में) — फिर ऑक्साइड को कार्बन से अपचयित:
ZnO + C → Zn + CO ज़्यादा क्रियाशील धातुएँ भी ऑक्साइड अपचयित कर सकती हैं — थर्मिट अभिक्रिया (Fe₂O₃ + 2Al → 2Fe + Al₂O₃ + ऊष्मा) इतनी ऊष्माक्षेपी है कि लोहा पिघला हुआ निकलता है, जिससे रेल की पटरियाँ जोड़ी जाती हैं।
- ज़्यादा क्रियाशील (K, Na, Ca, Mg, Al): कार्बन के लिए बहुत क्रियाशील, तो इन्हें पिघले अयस्क के विद्युत-अपघटन से निकाला जाता है (जैसे पिघला NaCl → कैथोड पर Na, एनोड पर Cl₂)।
कच्ची धातु को फिर शुद्ध किया जाता है, आमतौर पर विद्युत-अपघटनी परिष्करण से (अशुद्ध धातु एनोड, शुद्ध धातु कैथोड, लवण-घोल विद्युत-अपघट्य; शुद्ध धातु कैथोड पर जमती है, अशुद्धियाँ एनोड पंक के रूप में बैठ जाती हैं)।
| क्रियाशीलता | धातुएँ | कैसे निकाली जाती हैं |
|---|---|---|
| ज़्यादा | K, Na, Ca, Mg, Al | पिघले अयस्क का विद्युत-अपघटन |
| मध्यम | Zn, Fe, Pb, Cu | भर्जन/निस्तापन से ऑक्साइड, फिर कार्बन से अपचयन |
| कम | Cu, Hg, Ag, Au | मुक्त अवस्था में / केवल गरम करके अपचयन |
संक्षारण और मिश्रातु
जब किसी धातु को उसका आसपास धीरे-धीरे खा जाता है, वह संक्षारण (corrosion) है: लोहे में नम हवा में जंग लगती है (लाल-भूरी), चाँदी काली पड़ती है, ताँबे पर हरी परत आती है। क्लासिक प्रयोग दिखाता है कि जंग लगने के लिए लोहे को हवा और पानी दोनों चाहिए:
जंग से हम पेंट, तेल/ग्रीस लगाकर, गैल्वनीकरण (ज़िंक की परत — खरोंच लगने पर भी लोहे की रक्षा करती है, क्योंकि ज़िंक ज़्यादा क्रियाशील है और पहले संक्षारित होता है), क्रोम-प्लेटिंग, या मिश्रातु बनाकर लड़ते हैं।
मिश्रातु (alloy) किसी धातु का अन्य धातुओं या किसी अधातु के साथ समांगी मिश्रण है, जो गुण सुधारने के लिए बनाया जाता है:
- स्टील = लोहा + थोड़ा कार्बन (कठोर, मज़बूत); स्टेनलेस स्टील = लोहा + निकल + क्रोमियम (जंग नहीं लगती)।
- पीतल = ताँबा + ज़िंक; काँसा = ताँबा + टिन; सोल्डर = लेड + टिन (कम गलनांक — तार जोड़ने के लिए)।
- पारे वाला मिश्रातु अमलगम कहलाता है। मिश्रातु शुद्ध धातु से कम चालन करते और कम तापमान पर पिघलते हैं।
आम गलतियाँ
अभिक्रियाओं में धातुएँ इलेक्ट्रॉन पाती हैं, जैसे हर कोई और इलेक्ट्रॉन चाहता है।
हम सुनते हैं कि परमाणु 'भरा कोश चाहते हैं', और पाना ही उसका तरीक़ा लगता है।
धातुएँ अपने कुछ बाहरी इलेक्ट्रॉन खोकर धनात्मक आयन बनाती हैं (Na → Na⁺)। इलेक्ट्रॉन तो अधातुएँ पाती हैं और ऋणात्मक आयन बनाती हैं (Cl → Cl⁻)। धातु इलेक्ट्रॉन देने वाली है।
सारी धातुएँ पानी और अम्ल से अभिक्रिया करके हाइड्रोजन देती हैं।
'धातु + अम्ल → लवण + हाइड्रोजन' एक नियम की तरह पढ़ाया जाता है, तो यह सबपर लागू लगता है।
सिर्फ़ क्रियाशीलता श्रेणी में हाइड्रोजन से ऊपर वाली धातुएँ ऐसा करती हैं। ताँबा, चाँदी, सोना (H से नीचे) तनु अम्लों से हाइड्रोजन विस्थापित नहीं करते, और कई धातुएँ ठंडे पानी से बिलकुल अभिक्रिया नहीं करतीं।
सोडियम और ऐलुमिनियम जैसी ज़्यादा क्रियाशील धातुएँ भी लोहे की तरह उनके ऑक्साइड को कार्बन से अपचयित करके निकाली जाती हैं।
कार्बन से अपचयन मशहूर तरीक़ा है, तो लगता है यह सबके लिए चलेगा।
श्रेणी में ऊँची धातुएँ (K, Na, Ca, Mg, Al) ऑक्सीजन को इतनी कसकर पकड़ती हैं कि कार्बन उसे नहीं छीन पाता। इन्हें पिघले अयस्क के विद्युत-अपघटन से निकाला जाता है। कार्बन से अपचयन मध्यम धातुओं (Zn, Fe...) के लिए चलता है।
आयनिक यौगिक ठोस अवस्था में बिजली चलाते हैं।
वे आवेशित आयनों से बने हैं, तो लगता है कभी भी चलाने चाहिए।
आयनों का मुक्त होकर चलना ज़रूरी है। ठोस में वे कठोर जालक में बँधे होते हैं, तो चालन नहीं होता। सिर्फ़ पिघले या पानी में घुले रूप में आयन मुक्त होकर धारा ढोते हैं।
नाइट्रिक अम्ल + धातु से हाइड्रोजन गैस मिलती है, बाक़ी अम्लों की तरह।
हर दूसरा तनु अम्ल + धातु H₂ देता है, तो नियम यहाँ भी लगता है।
तनु HNO₃ प्रबल ऑक्सीकारक है — यह बनी H₂ को पानी में ऑक्सीकृत कर देता है और खुद नाइट्रोजन का ऑक्साइड बन जाता है। तो धातुएँ नाइट्रिक अम्ल के साथ आमतौर पर हाइड्रोजन नहीं छोड़तीं (कुछ अपवाद, जैसे बहुत तनु HNO₃ के साथ Mg/Mn)।
झटपट जाँच
कौन-सा जोड़ा विस्थापन अभिक्रिया देगा?
अभिक्रिया तभी होगी जब डाली गई धातु लवण वाली धातु से ज़्यादा क्रियाशील हो। ताँबा चाँदी से ऊपर है, तो ताँबा चाँदी को विस्थापित करता है AgNO₃ से। बाक़ी में डाली गई धातु कम क्रियाशील है (Cu, Na से नीचे; Al, Mg से नीचे; Ag, Fe से नीचे), तो कोई अभिक्रिया नहीं।
खाने के डिब्बों पर टिन की परत चढ़ाई जाती है, ज़िंक की नहीं, क्योंकि:
ज़िंक टिन से ज़्यादा क्रियाशील है। ज़्यादा क्रियाशील परत अम्लीय खाने से अभिक्रिया करके उसे दूषित कर सकती है, इसलिए खाने के डिब्बों के अंदर कम क्रियाशील टिन इस्तेमाल होता है।
उभयधर्मी ऑक्साइड (amphoteric oxides) क्या हैं?
उभयधर्मी ऑक्साइड अम्लीय और क्षारकीय दोनों की तरह बर्ताव करते हैं — वे अम्ल और क्षारक दोनों से अभिक्रिया करके लवण और पानी बनाते हैं। ऐलुमिनियम ऑक्साइड (Al₂O₃) और ज़िंक ऑक्साइड (ZnO) इसके क्लासिक उदाहरण हैं।
अभ्यास के सवाल
“हल देखें” दबाने से पहले हर सवाल ख़ुद कोशिश कीजिए। ये सवाल Curriv के अपने हैं और पूरी तरह मुफ़्त हैं।
आसान
दो धातुएँ बताइए जो तनु अम्लों से हाइड्रोजन विस्थापित करती हैं, और दो जो नहीं करतीं।
हाइड्रोजन विस्थापित करती हैं (श्रेणी में H से ऊपर): मैग्नीशियम, ज़िंक (Al, Fe भी)।
नहीं करतीं (H से नीचे): ताँबा, चाँदी (सोना भी)।
सोडियम को मिट्टी के तेल में डुबोकर क्यों रखा जाता है?
सोडियम बेहद क्रियाशील है — यह हवा की ऑक्सीजन और नमी से ज़ोरदार अभिक्रिया करता है और आग पकड़ सकता है। मिट्टी के तेल में रखने से हवा और पानी दूर रहते हैं, जिससे अभिक्रिया (और आकस्मिक आग) रुक जाती है।
मध्यम
लोहे की तनु सल्फ्यूरिक अम्ल से अभिक्रिया का बैलेंस समीकरण लिखिए, और बनी गैस व उसकी जाँच बताइए।
धातु + तनु अम्ल → लवण + हाइड्रोजन:
Fe + H₂SO₄ → FeSO₄ + H₂ ✓
गैस हाइड्रोजन है। जाँच: इसके पास जलती तीली लाइए — यह ‘पॉप’ आवाज़ के साथ जलती है।
गैल्वनीकरण लोहे पर ज़िंक की परत चढ़ाता है। ज़िंक की परत खरोंच जाने पर भी यह लोहे की रक्षा क्यों करता है?
क्योंकि ज़िंक लोहे से ज़्यादा क्रियाशील है। खरोंच से लोहा खुल जाने पर भी ज़िंक पहले संक्षारित होता है (वह इलेक्ट्रॉन ज़्यादा आसानी से छोड़ता है), तो वह लोहे की रक्षा करता रहता है — इसे बलिदानी सुरक्षा कहते हैं। लोहे में जंग ज़िंक के ख़त्म होने के बाद ही लगती है।
चुनौती
एक नक़ली सुनार ने एक महिला की सोने की चूड़ियाँ किसी घोल में डुबोईं; वे चमक उठीं पर वज़न घट गया। वह घोल क्या था, और क्यों?
वह घोल ऐक्वा रेजिया था — सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और नाइट्रिक अम्ल का 3:1 मिश्रण। यह उन गिने-चुने अभिकर्मकों में है जो सोना घोल सकते हैं। चूड़ियाँ डुबोने पर सोने की पतली बाहरी परत घुल गई (जिससे वे चमकीं) पर असली धातु निकल गई, इसलिए उनका वज़न घट गया। घुला सोना सुनार के घोल में रह गया।
गरम पानी की टंकियाँ ताँबे की क्यों बनाई जाती हैं, स्टील (लोहे का मिश्रातु) की क्यों नहीं?
क्योंकि लोहा (और स्टील) गरम पानी/भाप से अभिक्रिया करता है, आयरन ऑक्साइड और हाइड्रोजन बनाता है — समय के साथ यह संक्षारित होकर टंकी कमज़ोर कर देगा। ताँबा ठंडे या गरम पानी से अभिक्रिया नहीं करता (यह श्रेणी में हाइड्रोजन से नीचे है), तो वह सही-सलामत रहता है। ताँबा गर्मी का अच्छा चालक भी है, गरम पानी की टंकी के लिए आदर्श।
सारांश
इस अध्याय के बाद आपको ये सब अपने शब्दों में समझा पाना चाहिए:
- धातुएँ चमकीली, आघातवर्ध्य, तन्य, ध्वनिमय, अच्छी चालक, ठोस (पारे को छोड़कर) होती हैं; अधातुएँ ज़्यादातर उल्टी (ग्रेफ़ाइट चालक; आयोडीन चमकीली) — पर भौतिक गुणों में कई अपवाद हैं।
- धातुएँ इलेक्ट्रॉन खोती हैं → धनात्मक आयन; अधातुएँ इलेक्ट्रॉन पाती हैं → ऋणात्मक आयन। इनकी अभिक्रियाओं से इन्हें बेहतर क्रम में लगाया जाता है।
- धातुएँ ऑक्सीजन (→ ऑक्साइड, ज़्यादातर क्षारकीय; कुछ उभयधर्मी जैसे Al₂O₃, ZnO), पानी और तनु अम्ल (→ लवण + H₂), और लवण-घोल (विस्थापन) के साथ अलग-अलग हद तक अभिक्रिया करती हैं।
- क्रियाशीलता श्रेणी (K > Na > … > Cu > Hg > Ag > Au) विस्थापन, अम्ल से हाइड्रोजन कौन छोड़ता है, और हर धातु कैसे निकाली जाती है — सब बताती है।
- धातु + अधातु → आयनिक (वैद्युत संयोजी) यौगिक (इलेक्ट्रॉन हस्तांतरण); ये कठोर, ऊँचे गलनांक वाले, पानी में घुलनशील, और सिर्फ़ पिघले/घुले रूप में चालन करते हैं।
- धातुकर्म: अयस्क → समृद्धन → क्रियाशीलता के अनुसार निष्कर्षण (सबसे क्रियाशील के लिए विद्युत-अपघटन; मध्यम के लिए भर्जन/निस्तापन + कार्बन अपचयन; सबसे कम के लिए गरम करना) → परिष्करण (अक्सर विद्युत-अपघटनी)।
- संक्षारण (जंग के लिए हवा + पानी चाहिए) से पेंट, तेल, गैल्वनीकरण और मिश्रातु बनाकर लड़ा जाता है; मिश्रातु (स्टील, स्टेनलेस स्टील, पीतल, काँसा, सोल्डर, अमलगम) धातु के गुण सुधारते हैं।
आगे क्या?
अब आपने तत्वों के दो बड़े परिवार और धातु-अधातु के बीच बनने वाले आयनिक बंध देख लिए। पर एक अधातु सारे नियम तोड़ देती है: कार्बन। यह न इलेक्ट्रॉन सौंपती है न छीनती है — यह उन्हें साझा करती है, और यही एक तरकीब इसे लाखों यौगिक बनाने देती है, चूल्हे के ईंधन से लेकर आपके शरीर के प्रोटीन तक। अध्याय 4: कार्बन एवं उसके यौगिक में आप सहसंयोजी बंधन और वह अद्भुत रसायन सीखेंगे जो कार्बन को जीवन का तत्व बनाता है।