संसाधन एवं विकास

अध्याय 1 · भूगोल · कक्षा 10 26 मिनट में पढ़ें

यह क्यों ज़रूरी है

ज़रा अपने आसपास देखिए। दरवाज़े की लकड़ी, खिड़की की जाली का लोहा, आपकी कमीज़ का सूत, पेन का प्लास्टिक, गिलास का पानी, और पन्ने पर रोशनी डालती बिजली — इनमें से हर चीज़ कभी प्रकृति में पड़ी किसी कच्ची चीज़ से शुरू हुई थी। अकेले में इनमें से कुछ भी काम का नहीं था। ज़मीन में पड़ा लोहे का अयस्क अपने आप आपके किसी काम का नहीं; वह खिड़की इसलिए बना क्योंकि किसी के पास उसे खोदने, गलाने और आकार देने की तकनीक थी, और एक ऐसा समाज था जो इस मेहनत को सार्थक बनाता था।

यही इस अध्याय का छुपा हुआ राज़ है: “संसाधन” सिर्फ़ प्रकृति में पड़ी कोई चीज़ नहीं है — यह वह चीज़ है जिसका उपयोग करना हमने सीख लिया है। भाप के इंजन ने कोयले को कीमती बनाने से पहले वह बस एक बेकार पत्थर था। परमाणु को समझने से पहले यूरेनियम भारी पत्थर भर था। तो संसाधन असल में जितनी कहानी धरती की है, उतनी ही हमारी — हमारे हुनर, ज़रूरत और चुनाव की।

और इस कहानी के साथ एक चेतावनी भी जुड़ी है। क्योंकि हमने प्रकृति की देन को मुफ़्त और अनंत मान लिया, इसलिए हमने उसका लापरवाही से इस्तेमाल किया — उसे खाली करते गए, कुछ ही हाथों में जमा करते गए, और इस चक्कर में धरती को नुकसान पहुँचाते गए। संसाधनों का नियोजन और संरक्षण करना सीखना — ताकि आज सबके लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्याप्त रहे — आपके पढ़े सबसे ज़रूरी विचारों में से एक है। यह अध्याय वहीं से शुरू होता है।

मूल विचार

संसाधन हमारे पर्यावरण में मौजूद कोई भी ऐसी चीज़ है जिसका उपयोग हमारी ज़रूरतें पूरी करने में हो सके — पर तभी जब वह तकनीकी रूप से सुलभ, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हो। संसाधन प्रकृति की मुफ़्त देन नहीं हैं; मनुष्य तकनीक और संस्थाओं के ज़रिए कच्चे पदार्थों को संसाधन में बदलते हैं। हर संसाधन को हम चार तरह से छाँट सकते हैं — उत्पत्ति, समाप्यता, स्वामित्व और विकास की स्थिति के आधार पर — और चूँकि ये सीमित और असमान रूप से फैले हैं, इसलिए हमें इन्हें सोच-समझकर नियोजन और संरक्षण के साथ इस्तेमाल करना होगा, ताकि आज का विकास भविष्य को न लूट ले। यही आख़िरी विचार सतत विकास है।

आइए इसे समझें

संसाधन आख़िर है क्या?

हमारे पर्यावरण में मौजूद हर वह चीज़ जो हमारी ज़रूरतें पूरी करने में काम आ सके, संसाधन है — बशर्ते तीन शर्तें पूरी हों: वह तकनीकी रूप से सुलभ हो (हम उस तक पहुँचकर उसका उपयोग कर सकें), आर्थिक रूप से व्यवहार्य हो (लागत के लायक हो) और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हो (हमारा समाज उसके उपयोग पर सहमत हो)।

असली बात यह है: संसाधन मानव क्रियाकलाप का परिणाम हैं। मनुष्य खुद संसाधनों का एक ज़रूरी हिस्सा है, क्योंकि वही पर्यावरण के कच्चे माल को उपयोगी चीज़ में बदलता है। इस प्रक्रिया में तीन चीज़ों का आपसी रिश्ता होता है — प्रकृति (कच्चा माल), तकनीक (उपयोग का साधन) और संस्थाएँ (वे नियम और संगठन जो विकास को संभव बनाते हैं)। मनुष्य तकनीक के ज़रिए प्रकृति से जुड़ता है और अपने आर्थिक विकास को तेज़ करने के लिए संस्थाएँ बनाता है।

Concept check

समुद्र के पानी में हमेशा से सोने के बेहद सूक्ष्म कण रहे हैं। फिर भी आज उस सोने को उपयोगी संसाधन क्यों नहीं माना जाता?

संसाधनों का वर्गीकरण — चार अलग नज़रिए

संसाधन इतने तरह के होते हैं कि भूगोलवेत्ता उन्हें चार तरीकों से छाँटते हैं। समझने की अहम बात यह है कि ये एक ही संसाधन के बारे में चार अलग-अलग सवाल हैं — एक ही संसाधन को हर शीर्षक के नीचे एक साथ एक लेबल मिलता है।

एक वृक्ष-आरेख जो संसाधनों को चार आधारों पर वर्गीकृत करता है। उत्पत्ति के आधार पर: जैव और अजैव। समाप्यता के आधार पर: नवीकरणीय और अनवीकरणीय। स्वामित्व के आधार पर: व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय। विकास की स्थिति के आधार पर: संभाव्य, विकसित, भंडार और संचित कोष। नोट बताते हैं कि आधार आपस में मिलते हैं और भंडार संचित कोष से कैसे अलग है।
संसाधनों के वर्गीकरण के चार आधार। जैसे एक जंगल एक ही समय में जैव, नवीकरणीय और सामुदायिक या राष्ट्रीय — तीनों है; ये आधार एक ही चीज़ के बारे में अलग-अलग सवाल हैं।

(क) उत्पत्ति के आधार पर — संसाधन जीवित स्रोत से है या निर्जीव से।

उत्पत्ति के आधार पर संसाधन
प्रकारमतलबउदाहरण
जैवजीवित जगत (जैवमंडल) से प्राप्तमनुष्य, वनस्पति और जीव-जंतु, मत्स्य, पशुधन
अजैवनिर्जीव चीज़ों से बनेचट्टानें और धातुएँ, जल, वायु, खनिज

(ख) समाप्यता के आधार पर — संसाधन ख़त्म होता है या नहीं।

समाप्यता के आधार पर संसाधन
प्रकारमतलबउदाहरण
नवीकरणीयभौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं से फिर बन जाते हैं — बार-बार लौट आते हैंसौर और पवन ऊर्जा, जल, वन, वन्य जीवन
अनवीकरणीयबनने में लाखों साल लगते हैं; एक बार ख़त्म होने पर मानव समय-पैमाने पर वापस नहीं आतेखनिज, जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम)

(ग) स्वामित्व के आधार पर — संसाधन किसका है।

स्वामित्व के आधार पर संसाधन
प्रकारकिसका हैउदाहरण
व्यक्तिगतकिसी व्यक्ति की निजी संपत्तिकिसान की ज़मीन, मकान, निजी कुआँ या बाग़
सामुदायिकसमुदाय के सभी सदस्यों के लिए उपलब्धगाँव की चरागाह, सार्वजनिक उद्यान, तालाब, पिकनिक स्थल
राष्ट्रीयराष्ट्र के अधीन; देश को इन पर कानूनी अधिकारभूमि, जल, खनिज, सड़क-रेल, और समुद्र में तट से 12 समुद्री मील तक के संसाधन
अंतर्राष्ट्रीयअंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा नियंत्रितअनन्य आर्थिक क्षेत्र (200 समुद्री मील) से परे महासागरीय संसाधन

(घ) विकास की स्थिति के आधार पर — हमने संसाधन को कितना खोजा और इस्तेमाल करना शुरू किया है।

विकास की स्थिति के आधार पर संसाधन
प्रकारमतलबउदाहरण
संभाव्यकिसी क्षेत्र में मौजूद हैं पर अभी उपयोग नहीं हो रहेराजस्थान और गुजरात की सौर और पवन ऊर्जा — भरपूर है, पर अभी पूरी तरह विकसित नहीं
विकसितसर्वेक्षण कर मात्रा और गुणवत्ता तय हो चुकी और उपयोग में हैंउत्पादन में चल रहे कोयला-क्षेत्र और तेल-क्षेत्र
भंडार (स्टॉक)पदार्थ मौजूद है पर उसके उपयोग की तकनीक हमारे पास नहींपानी में मौजूद हाइड्रोजन और ऑक्सीजन — विशाल ऊर्जा-स्रोत, पर ईंधन की तरह अभी इस्तेमाल नहीं कर सकते
संचित कोष (रिज़र्व)विकसित भंडार का वह हिस्सा जिसे मौजूदा तकनीक से उपयोग कर सकते हैं, पर भविष्य के लिए बचाकर रखा हैबाँधों का पानी, वन, ज्ञात भंडार का एक हिस्सा अलग रखना

संसाधनों का विकास — और यह कहाँ ग़लत हुआ

बहुत समय तक लोग मानते रहे कि संसाधन प्रकृति की मुफ़्त देन हैं, इसलिए उन्होंने बिना रोक-टोक उनका इस्तेमाल किया। इस लापरवाह रवैये ने तीन बड़ी समस्याएँ पैदा कीं:

  • कुछ ही लोगों के लालच को पूरा करने के लिए संसाधनों का ह्रास (समाप्ति)
  • संसाधनों का कुछ ही हाथों में जमा होना, जिसने समाज को “है” और “नहीं है” वालों — अमीर और गरीब — में बाँट दिया।
  • अंधाधुंध दोहन, जिसने वैश्विक पारिस्थितिक संकट खड़े किए — जैसे वैश्विक तापन, ओज़ोन परत का क्षय, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण।

अगर कुछ लोगों और देशों द्वारा संसाधन खाली करने का यह सिलसिला चलता रहा, तो धरती का भविष्य ख़तरे में है। इसलिए जीवन की निरंतर गुणवत्ता और वैश्विक शांति के लिए संसाधनों का समान वितरण ज़रूरी हो गया है। यही वजह है कि संसाधन नियोजन ज़रूरी है — जीवन के सभी रूपों के सतत अस्तित्व के लिए।

सतत विकास और रियो पृथ्वी सम्मेलन

सतत विकास का मतलब है — “विकास इस तरह हो कि पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे, और वर्तमान का विकास भविष्य की पीढ़ियों की ज़रूरतों से समझौता न करे।” सीधे शब्दों में: आज की ज़रूरतें पूरी करें, पर कल से चुराकर नहीं।

जून 1992 में, 100 से ज़्यादा राष्ट्राध्यक्ष ब्राज़ील के रियो डी जेनेरो में पहले अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन के लिए मिले। यह सम्मेलन वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक विकास की तत्काल समस्याओं को सुलझाने के लिए बुलाया गया था। नेताओं ने वैश्विक जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता पर घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए। रियो सम्मेलन ने वैश्विक वन सिद्धांतों का समर्थन किया और एजेंडा 21 को अपनाया।

एजेंडा 21 रियो में हुए संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन (UNCED) में हस्ताक्षरित घोषणा-पत्र है। इसका लक्ष्य वैश्विक सतत विकास हासिल करना है — साझा हितों, परस्पर ज़रूरतों और साझा ज़िम्मेदारियों पर आधारित वैश्विक सहयोग से पर्यावरण क्षति, गरीबी और बीमारी से लड़ने का एजेंडा। इसका एक बड़ा उद्देश्य: हर स्थानीय सरकार अपना स्थानीय एजेंडा 21 बनाए।

Concept check

एक पंक्ति में, सतत विकास का मुख्य वादा क्या है?

भारत में संसाधन नियोजन

संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए नियोजन सबसे मान्य रणनीति है। भारत जैसे देश में यह ख़ास तौर पर ज़रूरी है, जहाँ संसाधन बहुत असमान रूप से फैले हैं:

  • झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश खनिज और कोयले के भंडार में समृद्ध हैं।
  • अरुणाचल प्रदेश में जल संसाधन भरपूर हैं पर ढाँचागत विकास की कमी है।
  • राजस्थान सौर और पवन ऊर्जा से संपन्न है पर जल की कमी है।
  • लद्दाख का शीत मरुस्थल सांस्कृतिक विरासत से समृद्ध है पर वहाँ जल, ढाँचे और कुछ अहम खनिजों की कमी है।

इसी असमानता के कारण भारत को राष्ट्रीय, राज्य, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर संतुलित संसाधन नियोजन की ज़रूरत है। भारत में संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है जो तीन चरणों में होती है:

भारत में संसाधन नियोजन के तीन चरण
चरणक्या होता है
1. संसाधनों की पहचान और सूचीदेश के विभिन्न क्षेत्रों में संसाधनों का सर्वेक्षण, मानचित्रण, और गुणात्मक एवं मात्रात्मक आकलन और मापन
2. नियोजन ढाँचा तैयार करनायोजनाओं को सचमुच लागू करने के लिए उपयुक्त तकनीक, कौशल और संस्थागत ढाँचा खड़ा करना
3. राष्ट्रीय विकास से तालमेलसंसाधन विकास योजनाओं को समग्र राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ मिलाना

भारत ने आज़ादी के बाद शुरू हुई पहली पंचवर्षीय योजना से ही इन लक्ष्यों की दिशा में काम किया है।

पर पेच यहीं है: सिर्फ़ संसाधनों का उपलब्ध होना काफ़ी नहीं। मिलती-जुलती तकनीक और संस्थाओं के बिना विकास रुक सकता है — भारत के कई संसाधन-समृद्ध क्षेत्र आर्थिक रूप से पिछड़े हैं, जबकि कुछ संसाधन-गरीब क्षेत्र आर्थिक रूप से विकसित हैं। इतिहास भी यही दिखाता है: उपनिवेशवादी अपने उपनिवेशों के समृद्ध संसाधनों की ओर आकर्षित हुए, पर उन्हें इनका दोहन उनकी ऊँची तकनीक ने करवाया। इसलिए संसाधन विकास में तभी योगदान देते हैं जब साथ में उपयुक्त तकनीक और संस्थागत बदलाव हों।

संसाधनों का संरक्षण

संसाधन विकास के लिए ज़रूरी हैं, पर बेहिसाब अति-उपयोग सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याएँ खड़ी करता है — इसलिए हर स्तर पर संरक्षण ज़रूरी है। यह चिंता बड़े विचारकों की भी रही:

  • महात्मा गांधी ने तीखे शब्दों में कहा: “प्रकृति के पास सबकी ज़रूरत के लिए पर्याप्त है, पर किसी के लालच के लिए नहीं।” उन्होंने वैश्विक संसाधन-ह्रास के लिए लालची व्यक्तियों और शोषक आधुनिक तकनीक को दोषी ठहराया, और बड़े पैमाने के उत्पादन की जगह “जनता द्वारा उत्पादन” चाहा।
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्लब ऑफ़ रोम ने 1968 में व्यवस्थित ढंग से संसाधन संरक्षण की वकालत की।
  • 1974 में शूमाख़र ने अपनी किताब Small is Beautiful में गांधीवादी दर्शन फिर सामने रखा।
  • ब्रंटलैंड आयोग रिपोर्ट, 1987 ने मील का पत्थर योगदान दिया: इसने सतत विकास की अवधारणा पेश की, जो किताब Our Common Future में छपी।
  • और फिर आया रियो डी जेनेरो का पृथ्वी सम्मेलन, 1992।

भू-संसाधन और भूमि उपयोग

हम भूमि पर रहते हैं, खेती करते हैं, निर्माण करते हैं और उस पर यात्रा करते हैं — भूमि अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, जो प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीवन, मानव जीवन, आर्थिक गतिविधियों, परिवहन और संचार को सहारा देती है। पर भूमि सीमित मात्रा की संपत्ति है, इसलिए इसका उपयोग सावधानी से नियोजन करके करना चाहिए।

भारत में भूमि कई उच्चावच रूपों में बँटी है:

उच्चावच के आधार पर भारत की भूमि
उच्चावचक्षेत्र का हिस्साक्या देता है
मैदानलगभग 43%कृषि और उद्योग की सुविधा
पर्वतलगभग 30%नदियों का सदाबहार प्रवाह, पर्यटन, पारिस्थितिक महत्व
पठारलगभग 27%खनिज, जीवाश्म ईंधन और वनों के समृद्ध भंडार

भूमि कई उपयोगों में लगती है: वन; कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि (बंजर और व्यर्थ भूमि, और भवन-सड़क-कारखानों जैसे गैर-कृषि उपयोग की भूमि); अन्य अकृषित भूमि जैसे स्थायी चरागाह, विविध वृक्ष-फ़सलें, और कृष्य व्यर्थ भूमि (5 कृषि वर्षों से अधिक अकृषित); परती भूमि (चालू परती — एक वर्ष या उससे कम तक अकृषित; और अन्य परती — 1 से 5 वर्ष तक अकृषित); और शुद्ध बोया गया क्षेत्र — वह वास्तविक भूमि जिस पर फ़सल बोई और काटी जाती है।

एक उपयोगी जोड़ी: शुद्ध बोया गया क्षेत्र वह भूमि है जो साल में कम से कम एक बार बोई गई, जबकि सकल बोया गया क्षेत्र शुद्ध बोए गए क्षेत्र जमा साल में एक से अधिक बार बोए गए क्षेत्र को मिलाकर होता है।

भूमि उपयोग का स्वरूप भौतिक कारकों (उच्चावच, जलवायु, मृदा) और मानवीय कारकों (जनसंख्या घनत्व, तकनीक, संस्कृति और परंपराएँ) पर निर्भर करता है। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 3.28 मिलियन वर्ग किमी है, पर भूमि-उपयोग के आँकड़े इसके लगभग 93% के ही उपलब्ध हैं — पूर्वोत्तर राज्यों (असम को छोड़कर) की पूरी रिपोर्टिंग नहीं हुई, और जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान व चीन द्वारा अधिकृत हिस्से का सर्वेक्षण नहीं हुआ। शुद्ध बोया गया क्षेत्र पंजाब और हरियाणा में 80% से अधिक है, पर अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, मणिपुर और अंडमान-निकोबार में 10% से कम। वन क्षेत्र अब भी राष्ट्रीय वन नीति (1952) द्वारा पारिस्थितिक संतुलन के लिए वांछित 33% से काफ़ी कम है।

भूमि निम्नीकरण और संरक्षण

लंबे समय तक बिना देखभाल भूमि का लगातार उपयोग भूमि निम्नीकरण की ओर ले जाता है — और मानव गतिविधियों जैसे वनोन्मूलन, अति-चराई, खनन और उत्खनन ने यह नुकसान और तेज़ कर दिया:

भारत में भूमि निम्नीकरण — कारण और स्थान
कारणसबसे प्रभावित राज्य
खनन से वनोन्मूलन (गहरे ज़ख़्म और मलबा छोड़ देना)झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा
अति-चराईगुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र
अति-सिंचाई (जलभराव → लवणता और क्षारीयता)पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश
खनिज-प्रसंस्करण की धूल (सीमेंट, सिरेमिक उद्योग) का भूमि पर जमनाकई क्षेत्र — यह पानी को मिट्टी में रिसने से रोकती है

कचरे के रूप में फेंके गए औद्योगिक बहिःस्राव भी भूमि और जल प्रदूषण के बड़े स्रोत बन गए हैं। संरक्षण के उपाय व्यावहारिक हैं:

  • वनरोपण और चराई का उचित प्रबंधन।
  • शुष्क क्षेत्रों में: पौधों की रक्षक मेखला (शेल्टर बेल्ट) लगाना, अति-चराई पर नियंत्रण, और काँटेदार झाड़ियाँ उगाकर बालू के टीलों को स्थिर करना।
  • औद्योगिक और उपनगरीय क्षेत्रों में: व्यर्थ भूमि का उचित प्रबंधन, खनन गतिविधियों पर नियंत्रण, और औद्योगिक बहिःस्राव व कचरे को शोधन के बाद ही उचित ढंग से छोड़ना।

मृदा — सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन

मृदा पौधों की वृद्धि का माध्यम है और असंख्य जीवों को सहारा देती है — यह एक जीवंत तंत्र है। फिर भी कुछ सेंटीमीटर मृदा बनने में लाखों साल लगते हैं। इसका बनना उच्चावच, जनक चट्टान (आधार-शैल), जलवायु, वनस्पति व अन्य जीव, और समय पर निर्भर करता है, जहाँ प्राकृतिक शक्तियाँ (तापमान का बदलाव, बहता पानी, हवा, हिमनद, और अपघटक) चट्टान को तोड़ती हैं और कार्बनिक ह्यूमस मिलाती हैं।

मृदा परिच्छेदिका को ऊपर से नीचे की परतों के रूप में दिखाया गया है: ह्यूमस से भरपूर ऊपरी मृदा जहाँ पौधे उगते हैं, रेत-गाद-चिकनी मिट्टी वाली अधोमृदा, अपक्षयित जनक-चट्टान की निचली परत, और सबसे नीचे अनपक्षयित जनक आधार-शैल। एक नोट बताता है कि कुछ सेंटीमीटर मृदा बनने में लाखों साल लगते हैं और बनने के पाँच कारक गिनाता है।
सतह से ठोस चट्टान तक मृदा परिच्छेदिका। पतली, उपजाऊ ऊपरी मृदा को ही अपरदन सबसे पहले बहा ले जाता है — इसीलिए संरक्षण इतना ज़रूरी है।

भारत की प्रमुख मृदाएँ

भारत के विविध उच्चावच, जलवायु और वनस्पति ने कई तरह की मृदाएँ बनाई हैं। यह तालिका इस अध्याय का दिल है — हर मृदा के लिए कहाँ, क्यों और क्या उगता है याद कर लीजिए।

भारत की प्रमुख मृदाएँ
मृदाकहाँ मिलती हैमुख्य विशेषताएँकिसके लिए सर्वोत्तम
जलोढ़पूरे उत्तरी मैदान (सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र द्वारा जमा); राजस्थान–गुजरात गलियारा; और पूर्वी तट के महानदी, गोदावरी, कृष्णा व कावेरी के डेल्टाबहुत उपजाऊ; रेत, गाद और चिकनी मिट्टी का मिश्रण; पोटाश, फ़ॉस्फ़ोरिक अम्ल और चूने से भरपूर; पुरानी = बांगर (अधिक कंकर ग्रंथिकाएँ), नई = खादर (बारीक, अधिक उपजाऊ)गन्ना, धान, गेहूँ और अन्य अनाज व दलहन; सघन खेती और घनी आबादी
काली (रेगुर)दक्कन ट्रैप क्षेत्र — महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़; गोदावरी और कृष्णा घाटियों के साथबारीक चिकनी मिट्टी की बनी; नमी रोकने में सक्षम; कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूने से समृद्ध; फ़ॉस्फ़ोरस में कम; गर्मी में गहरी दरारेंकपास (इसीलिए काली कपास मृदा भी कहते हैं)
लाल और पीलीकम वर्षा वाले पूर्वी और दक्षिणी दक्कन पठार; ओडिशा, छत्तीसगढ़, दक्षिणी मध्य गंगा मैदान, पश्चिमी घाट की गिरिपद के हिस्सेरवेदार आग्नेय चट्टानों पर बनती है; लोहे के विसरण से लाल; जलयोजित रूप में पीलीउपचार के साथ कई फ़सलें
लैटेराइटअधिक वर्षा और बारी-बारी से नम-शुष्क ऋतु वाले क्षेत्र — दक्षिणी राज्य, महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के हिस्सेभारी निक्षालन से बनती है; अम्लीय (pH 6.0 से कम); पोषक तत्वों में कम; वन के नीचे ह्यूमस-समृद्ध, विरल वनस्पति में ह्यूमस-गरीब; अपरदन के लिए संवेदनशीलचाय और कॉफ़ी (पहाड़ी कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु); काजू (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल की लाल लैटेराइट)
शुष्क (मरुस्थलीय)पश्चिमी राजस्थान और अन्य शुष्क क्षेत्रलाल से भूरी; रेतीली और लवणीय; शुष्क जलवायु और तेज़ वाष्पीकरण से ह्यूमस और नमी की कमी; नीचे कंकर परत पानी का रिसाव रोकती हैउचित सिंचाई के बाद कृषि योग्य
वनपर्याप्त वर्षा-वन वाले पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रघाटी की ढलानों पर दोमट और गादयुक्त, ऊपरी ढलानों पर मोटे कण; बर्फ़ ढके हिमालय में अम्लीय व कम ह्यूमस; निचली नदी छतों व जलोढ़ पंखों पर उपजाऊपर्वतीय परिवेश के अनुसार बदलती है

मृदा अपरदन और संरक्षण

मृदा आवरण के अपक्षरण (छिल जाना) और बह या उड़ जाना को मृदा अपरदन कहते हैं। आम तौर पर मृदा निर्माण और अपरदन में संतुलन बना रहता है — पर वनोन्मूलन, अति-चराई, निर्माण और खनन जैसी मानव गतिविधियाँ, और हवा, हिमनद व पानी जैसी प्राकृतिक शक्तियाँ इस संतुलन को बिगाड़ देती हैं।

मृदा अपरदन के प्रकार
प्रकारकैसे होता हैपरिणाम
अवनालिका (गली) अपरदनबहता पानी चिकनी मिट्टी में गहरी नालियाँ काट देता हैभूमि कृषि के अयोग्य हो जाती है — इसे बेकार भूमि कहते हैं; चंबल बेसिन में इन्हें खड्ड (ravine) कहते हैं
चादर अपरदनपानी एक बड़े ढालू क्षेत्र पर चादर की तरह बहता हैऊपरी मृदा समान रूप से बह जाती है
वायु अपरदनहवा समतल या ढालू ज़मीन से ढीली मिट्टी उड़ा ले जाती हैउपजाऊ मिट्टी हवा में खो जाती है

ख़राब खेती से भी मृदा कटती है — ढलान के ऊपर-नीचे की दिशा में जुताई पानी के तेज़ बहाव के लिए नालियाँ बना देती है। संरक्षण के तरीके इन्हीं समस्याओं का हल हैं:

मृदा संरक्षण के तरीके
तरीकाकैसे काम करता हैकहाँ इस्तेमाल
समोच्च जुताईढलान के आर-पार, समोच्च रेखाओं के साथ जुताई कर पानी का नीचे बहाव धीमा करनाढालू खेत
सीढ़ीदार खेतीढलान में सीढ़ियाँ (छतें) काटकर अपरदन रोकनापश्चिमी और मध्य हिमालय में ख़ूब विकसित
पट्टी खेती (स्ट्रिप क्रॉपिंग)फ़सलों के बीच घास की पट्टियाँ छोड़कर हवा का ज़ोर तोड़नाबड़े खुले खेत
रक्षक मेखला (शेल्टर बेल्ट)हवा रोकने के लिए पेड़ों की कतारें लगानापश्चिमी भारत में बालू के टीलों और मरुस्थल को स्थिर करना

सामान्य गलतियाँ

⚠️ Common mistake
What students think

प्रकृति की हर चीज़ — धूप, नदियाँ, खनिज — अपने आप संसाधन है।

Why it seems right

रोज़मर्रा की भाषा में हम प्रकृति की हर उपयोगी चीज़ को 'प्राकृतिक संसाधन' कह देते हैं, इसलिए लगता है कि पूरी प्रकृति इसमें गिनी जाती है।

What actually happens

कोई पदार्थ संसाधन तभी बनता है जब वह तकनीकी रूप से सुलभ, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हो। समुद्र में घुला सोना या किसी दूर पहाड़ की बर्फ़ तब तक संसाधन नहीं जब तक हम उसका उपयोगी और किफ़ायती ढंग से इस्तेमाल न कर सकें। संसाधन मानव क्रियाकलाप का परिणाम हैं, सिर्फ़ प्रकृति का भंडार नहीं।

⚠️ Common mistake
What students think

एक संसाधन सिर्फ़ एक ही श्रेणी में आता है — वह या तो जैव है, या नवीकरणीय, या राष्ट्रीय, और यही उसका 'प्रकार' है।

Why it seems right

पाठ्यपुस्तक चारों आधारों को एक के बाद एक गिनाती है, इसलिए लगता है कि संसाधन एक ही डिब्बा चुन लेता है और वहीं टिक जाता है।

What actually happens

ये चारों आधार एक ही समय पर पूछे गए चार अलग सवाल हैं। एक ही जंगल एक साथ जैव (उत्पत्ति), नवीकरणीय (समाप्यता), और सामुदायिक या राष्ट्रीय (स्वामित्व) — सब है। हर संसाधन को हर शीर्षक के नीचे एक लेबल मिलता है।

⚠️ Common mistake
What students think

भंडार (स्टॉक) और संचित कोष (रिज़र्व) एक ही चीज़ हैं — बाद के लिए बचाकर रखे संसाधन।

Why it seems right

दोनों शब्द 'भविष्य के लिए जमा कुछ' जैसे लगते हैं, इसलिए आपस में बदले जाने योग्य महसूस होते हैं।

What actually happens

ये तकनीक के आधार पर अलग हैं। भंडार वह पदार्थ है जिसे हम अभी इस्तेमाल नहीं कर सकते क्योंकि तकनीक नहीं है (जैसे पानी में हाइड्रोजन को ईंधन की तरह)। संचित कोष विकसित संसाधन का वह हिस्सा है जिसे हम अभी इस्तेमाल कर सकते हैं पर बचाकर रखते हैं (जैसे बाँध का पानी)। संचित कोष = तैयार पर बचाया; भंडार = मौजूद पर अभी अनुपयोगी।

⚠️ Common mistake
What students think

काली मृदा काली इसलिए है क्योंकि वह बाग़ की गहरी मिट्टी की तरह ह्यूमस या सड़े कार्बनिक पदार्थ से भरपूर है।

Why it seems right

बाग़ों में सबसे गहरे रंग की मिट्टी सचमुच सबसे ज़्यादा ह्यूमस वाली होती है, इसलिए 'रंग बराबर ह्यूमस' का नियम सार्वभौमिक लगता है।

What actually happens

काली (रेगुर) मृदा का रंग उसकी जनक चट्टान — दक्कन ट्रैप के लावा (बेसाल्ट) — और जलवायु से आता है, ह्यूमस से नहीं। असल में इसकी बारीक चिकनी प्रकृति और कैल्शियम कार्बोनेट जैसे खनिज मायने रखते हैं; कपास के लिए इसे आदर्श इसकी नमी रोकने की क्षमता बनाती है, ह्यूमस नहीं।

झटपट जाँच

किसी चीज़ को 'संसाधन' मानने से पहले कौन-सी तीन शर्तें पूरी होनी चाहिए?

अनन्य आर्थिक क्षेत्र के 200 समुद्री मील से परे के महासागरीय संसाधन स्वामित्व के आधार पर किस प्रकार के संसाधन हैं?

इनमें से किस राज्य में काली मृदा मुख्य रूप से पाई जाती है?

पंजाब में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण क्या है?

अभ्यास प्रश्न

आसान

easy

काली मृदा वाले तीन राज्यों के नाम बताइए, और इसमें मुख्य रूप से उगाई जाने वाली फ़सल।

easy

सीढ़ीदार खेती किन राज्यों में की जाती है, और यह क्यों उपयोगी है?

मध्यम

medium

पूर्वी तट के नदी डेल्टाओं में किस प्रकार की मृदा पाई जाती है? इस मृदा की तीन मुख्य विशेषताएँ बताइए।

medium

पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा अपरदन रोकने के लिए कौन-से कदम उठाए जा सकते हैं?

चुनौती

challenge

भारत में भूमि उपयोग के स्वरूप की व्याख्या कीजिए, और 1960-61 के बाद वन के अधीन भूमि अधिक क्यों नहीं बढ़ी?

challenge

तकनीकी और आर्थिक विकास ने संसाधनों की अधिक खपत कैसे करवाई है?

सारांश

अब आपको ये समझाना आना चाहिए:

  • संसाधन हमारे पर्यावरण की कोई भी ऐसी चीज़ है जिसका उपयोग ज़रूरतें पूरी करने में हो सके, बशर्ते वह तकनीकी रूप से सुलभ, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हो — संसाधन मानव क्रियाकलाप का परिणाम हैं, प्रकृति की मुफ़्त देन नहीं।
  • संसाधनों का वर्गीकरण चार आधारों पर होता है: उत्पत्ति (जैव / अजैव), समाप्यता (नवीकरणीय / अनवीकरणीय), स्वामित्व (व्यक्तिगत / सामुदायिक / राष्ट्रीय / अंतर्राष्ट्रीय), और विकास की स्थिति (संभाव्य / विकसित / भंडार / संचित कोष) — और एक ही संसाधन को हर आधार पर एक लेबल मिलता है।
  • संसाधनों को मुफ़्त मानने से ह्रास, असमान संचय और पारिस्थितिक संकट हुए; इसका हल है समान वितरण, संसाधन नियोजन और संरक्षण
  • सतत विकास का मतलब है पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए या भविष्य की पीढ़ियों से समझौता किए बिना विकास करना; रियो पृथ्वी सम्मेलन (1992) ने इसे वैश्विक स्तर पर अपनाने के लिए एजेंडा 21 अपनाया।
  • भारत में संसाधन नियोजन के तीन चरण हैं — पहचान/सूची, नियोजन ढाँचा बनाना, और राष्ट्रीय विकास से तालमेल — और यह तभी काम करता है जब संसाधनों के साथ तकनीक और संस्थाएँ हों।
  • भूमि एक सीमित संसाधन है (मैदान ~43%, पर्वत ~30%, पठार ~27%); इसका उपयोग वन, कृषि, चरागाह और गैर-कृषि कार्यों में होता है, और वनोन्मूलन, अति-चराई, अति-सिंचाई व खनन से इसका निम्नीकरण होता है।
  • भारत की प्रमुख मृदाएँ हैं जलोढ़, काली (रेगुर), लाल और पीली, लैटेराइट, शुष्क और वन — हर एक का अपना क्षेत्र, विशेषताएँ और फ़सलें।
  • मृदा अपरदन (अवनालिका, चादर, वायु) को समोच्च जुताई, सीढ़ीदार खेती, पट्टी खेती और रक्षक मेखला से रोका जाता है।

आगे क्या

अब आप जानते हैं कि संसाधन सीमित हैं और इन्हें समझदारी से इस्तेमाल करना होगा। अगला अध्याय, वन और वन्य जीव संसाधन, सबसे कीमती जैव संसाधनों में से एक — भारत के वनों और वन्य जीवन — पर नज़र डालता है। आप देखेंगे कि जैव विविधता क्यों घट रही है, प्रजातियों को ख़तरे के स्तर के अनुसार कैसे वर्गीकृत किया जाता है, और प्रोजेक्ट टाइगर व सामुदायिक वानिकी जैसे संरक्षण प्रयास इस जीवंत विरासत को भविष्य के लिए कैसे बचा रहे हैं।