वन एवं वन्य जीव संसाधन

अध्याय 2 · भूगोल · कक्षा 10 24 मिनट में पढ़ें

यह क्यों ज़रूरी है

हम इस ग्रह को लाखों दूसरे जीवों के साथ साझा करते हैं — सूक्ष्म जीवों और बैक्टीरिया, लाइकेन और बरगद के पेड़ों से लेकर हाथियों और नीली व्हेल तक। ये सिर्फ़ नज़ारा नहीं हैं। हमारे आस-पास के पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव चुपचाप वही चीज़ें फिर से बनाते रहते हैं जिनके बिना हम जी ही नहीं सकते: साँस लेने की हवा, पीने का पानी, और हमारा भोजन उगाने वाली मिट्टी। हम इंसान इस विशाल जीवन-जाल का बस एक धागा हैं — और पूरी तरह उस पर निर्भर हैं।

भारत जीवन की इस विविधता के लिए दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। अपने ही इलाके में देखो तो ऐसे पौधे और जानवर मिलेंगे जो और कहीं नहीं उगते। फिर भी ये विविध वनस्पति और प्राणी हमारे रोज़मर्रा के जीवन में इतने घुले-मिले हैं कि हम इन्हें हल्के में ले लेते हैं — और हाल के दिनों में ये बहुत दबाव में हैं, ज़्यादातर पर्यावरण के प्रति हमारी अपनी असंवेदनशीलता के कारण।

यह अध्याय उसी जाल के बारे में है: यह कितना समृद्ध है, इसमें क्या गड़बड़ हो रही है, और भारत अपने वनों व वन्य जीवन को बचाने के लिए कौन-कौन से असली, व्यावहारिक तरीके अपना रहा है — इसमें आम गाँववालों की भूमिका भी शामिल है, जो अक्सर किसी सरकारी दफ़्तर से बेहतर जंगल की रक्षा करते हैं।

मूल विचार

जैव विविधता यानी जीवन की अपार विविधता — जंगली और उगाई गई प्रजातियाँ, जो रूप और कार्य में अलग-अलग हैं पर निर्भरताओं के एक जाल से कसकर जुड़ी हैं, और जिसका पूरा आधार प्राथमिक उत्पादक के रूप में वन हैं। प्रजातियों को इस आधार पर बाँटा जा सकता है कि वे कितने संकट में हैं — सामान्य से लेकर सुभेद्य, दुर्लभ और संकटग्रस्त होते हुए लुप्त तक (और स्थानिक प्रजातियाँ सिर्फ़ एक ही जगह पाई जाती हैं)। जब वन और वन्य जीवन घटते हैं, तो हम अपने जीवन-रक्षक तंत्र खो देते हैं, इसलिए भारत इन्हें कानून (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, प्रोजेक्ट टाइगर), वनों के वर्गीकरण और प्रबंधन (आरक्षित, रक्षित, अवर्गीकृत) और — बढ़ते रूप में — स्थानीय समुदायों के ज़रिए बचाता है, जो अपने ही वनों की रखवाली करते हैं।

आओ इसे समझें

वनस्पति, प्राणी और जैव विविधता

वनस्पति (फ्लोरा) का मतलब है किसी क्षेत्र का सारा पादप जीवन; प्राणी जात (फ़ौना) का मतलब है सारा जंतु जीवन। इन सबकी विविधता मिलाकर — जंगली प्रजातियाँ, उगाई गई फ़सलें, और उनके बीच के रिश्तों का जाल — जैव विविधता (जैविक विविधता) कहलाती है।

मूल बात है अंतर्निर्भरता। कोई प्रजाति अकेले नहीं रहती। पौधे सूरज की रोशनी से भोजन बनाते हैं और जानवरों का भोजन बनते हैं; जानवर बीज फैलाते हैं और मिट्टी को पोषक तत्व लौटाते हैं; सूक्ष्मजीव मृत चीज़ों को तोड़कर सब कुछ फिर से चक्र में डाल देते हैं। वन इस पूरे ढाँचे की नींव पर बैठे हैं — प्राथमिक उत्पादक के रूप में ये पूरी श्रृंखला को भोजन देते हैं, इसीलिए वन खोने से उनके ऊपर की हर चीज़ को नुकसान होता है।

मौजूदा प्रजातियों की श्रेणियाँ

संरक्षणवादी प्रजातियों को इस आधार पर बाँटते हैं कि वे कितने संकट में हैं — विलुप्त होने के कितने करीब हैं। यही बताता है कि किन प्रजातियों को तुरंत सुरक्षा चाहिए।

एक चार्ट जो प्रजातियों की श्रेणियाँ सबसे सुरक्षित से लुप्त तक दिखाता है: सामान्य, सुभेद्य, दुर्लभ, संकटग्रस्त और लुप्त, तथा स्थानिक प्रजातियों को अलग से दिखाया गया है जो सिर्फ़ एक ही क्षेत्र में पाई जाती हैं।
प्रजातियाँ कितने संकट में हैं इस आधार पर क्रम में — सामान्य (सुरक्षित) से लुप्त (खोई हुई) तक। स्थानिक एक अलग विचार है — यह इस बारे में है कि प्रजाति कहाँ रहती है, न कि कितने संकट में है।
मौजूदा प्रजातियों की श्रेणियाँ
श्रेणीइसका मतलबउदाहरण
सामान्य प्रजातियाँजिनकी संख्या उनके जीवित रहने के लिए पर्याप्त हैमवेशी, साल, चीड़, कृंतक (चूहे आदि)
संकटग्रस्त प्रजातियाँविलुप्त होने के संकट में; ख़तरे बने रहे तो नहीं बचेंगीकाला हिरण, मगरमच्छ, भारतीय गैंडा, शेर-पुच्छी मकाक, संगाई (मणिपुर का सींगदार हिरण)
सुभेद्य प्रजातियाँसंख्या घट रही है; जल्द ही संकटग्रस्त श्रेणी में जा सकती हैंनीली भेड़ (भरल), एशियाई हाथी, गंगा डॉल्फ़िन
दुर्लभ प्रजातियाँछोटी आबादी; छेड़छाड़ हुई तो संकटग्रस्त या सुभेद्य बन सकती हैंहिमालयी भूरा भालू, जंगली एशियाई भैंसा, रेगिस्तानी लोमड़ी, धनेश (हॉर्नबिल)
स्थानिक प्रजातियाँसिर्फ़ एक ही क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से पाई जाती हैं, और कहीं नहींअंडमान टील, निकोबार कबूतर, अंडमान जंगली सूअर, मिथुन (अरुणाचल प्रदेश)
लुप्त प्रजातियाँअब बिल्कुल नहीं पाई जातीं — किसी क्षेत्र, देश या पूरी पृथ्वी सेएशियाई चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख

यहाँ सबसे बड़ी उलझन है स्थानिक को बाकियों से मिला देना। पहली पाँच — सामान्य, सुभेद्य, दुर्लभ, संकटग्रस्त, लुप्त — ख़तरे की एक सीढ़ी बनाती हैं। स्थानिक जगह के बारे में है: ऐसी प्रजाति जो सिर्फ़ एक क्षेत्र में पाई जाती है। एक स्थानिक प्रजाति दुर्लभ या संकटग्रस्त भी हो सकती है; ये दोनों विचार आपस में टकराने के बजाय ओवरलैप करते हैं।

Concept check

एशियाई चीता अब भारत में नहीं पाया जाता। यह किस श्रेणी में आता है?

वन और वन्य जीवन क्यों घट रहे हैं

भारत में जीवन की विविधता घट रही है, और इसके कारण लगभग सभी इंसानी हैं:

  • आवास का नुकसान — खेती, फैलते शहरों, सड़कों, बाँधों, खदानों और उद्योगों के लिए वन साफ़ किए जाते हैं। जब घर ही चला जाए, तो जानवर भी चले जाते हैं।
  • अति-उपयोग और शिकार — खाल, हड्डियों, सींगों और मांस के लिए अवैध शिकार, और वन्यजीवों का व्यापार, कई प्रजातियों को कगार पर ले आया।
  • वन की आग और चराई — बार-बार लगने वाली आग और भारी पशु-चराई वनों को फिर से उभरने नहीं देती।
  • प्रदूषण — रसायन, प्लास्टिक और गंदा पानी नदियों और मिट्टी को ज़हरीला कर देते हैं, जिससे जल और थल का जीवन नुकसान झेलता है।
  • बढ़ती आबादी का दबाव — ज़्यादा लोग यानी ज़मीन, जलावन और संसाधनों की ज़्यादा माँग, और यह सब वनों से ही लिया जाता है।

याद रखने वाली बात: यह कोई एक बड़ा कारण नहीं बल्कि कई इंसानी दबाव मिलकर वनों और वन्य जीवन को धीरे-धीरे उनकी ज़रूरी जगह से बाहर निचोड़ रहे हैं।

संरक्षण — और हमें इसकी ज़रूरत क्यों है

संरक्षण का मतलब है अपने वनों और वन्य जीवन की रक्षा करना और उन्हें समझदारी से इस्तेमाल करना ताकि वे भविष्य के लिए बचे रहें। यह ज़रूरी क्यों है? क्योंकि:

  • यह पारिस्थितिक विविधता और हमारे जीवन-रक्षक तंत्र — पानी, हवा और मिट्टी — को बचाता है।
  • यह पौधों और जानवरों की आनुवंशिक विविधता को बचाता है, जो प्रजातियों की स्वस्थ वृद्धि और प्रजनन के लिए ज़रूरी है। खेती में हम आज भी पारंपरिक फ़सल किस्मों पर निर्भर हैं, और मत्स्य पालन जलीय जैव विविधता को बचाए रखने पर निर्भर है।

1960 और 1970 के दशकों में संरक्षणवादियों ने एक राष्ट्रीय वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम की माँग की। इसका नतीजा था भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972, जिसमें आवासों की रक्षा के प्रावधान थे। इसने संरक्षित प्रजातियों की अखिल भारतीय सूची प्रकाशित की, उनके शिकार पर रोक लगाई, उनके आवासों को कानूनी सुरक्षा दी, और वन्यजीवों के व्यापार पर पाबंदी लगाई।

इसके बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य बनाए, और केंद्र ने कुछ गंभीर रूप से ख़तरे में पड़े विशिष्ट जानवरों के लिए विशेष परियोजनाएँ घोषित कीं — बाघ, एक-सींग वाला गैंडा, कश्मीरी हिरण (हंगुल), तीन तरह के मगरमच्छ (मीठे पानी का मगर, खारे पानी का मगर और घड़ियाल), एशियाई शेर, और अन्य। हाल ही में भारतीय हाथी, काला हिरण (चिंकारा), सोन चिड़िया / गोडावन (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) और हिम तेंदुआ को पूरे भारत में शिकार और व्यापार के विरुद्ध पूर्ण या आंशिक कानूनी सुरक्षा दी गई है।

ज़रूरी बात — संरक्षण कुछ बड़े जानवरों से बढ़कर अब पूरी जैव विविधता तक फैल गया है। वन्यजीव अधिनियम की 1980 और 1986 की अधिसूचनाओं में सैकड़ों तितलियाँ, पतंगे, भृंग और एक ड्रैगनफ़्लाई संरक्षित सूची में जोड़े गए। 1991 में पहली बार पौधे भी जोड़े गए — छह प्रजातियों से शुरुआत हुई।

प्रोजेक्ट टाइगर

बाघ प्राणी-जाल की एक प्रमुख प्रजाति है — बाघ को बचाओ, तो उस पूरे जंगल को बचा लोगे जिसमें वह रहता है। 1973 तक अधिकारियों को एहसास हुआ कि बाघों की संख्या गिरकर सिर्फ़ 1,827 रह गई है, जबकि सदी की शुरुआत में यह अनुमानित 55,000 थी।

ख़तरे कई थे: व्यापार के लिए अवैध शिकार, सिकुड़ता आवास, शिकार आधार (प्रे) प्रजातियों का घटना, और बढ़ती मानव आबादी। बाघ की खाल का व्यापार और पारंपरिक दवाओं में उसकी हड्डियों का उपयोग, ख़ासकर एशियाई देशों में, बाघ को विलुप्ति की कगार पर ले आया था। चूँकि भारत और नेपाल मिलकर दुनिया के बचे हुए बाघों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा रखते हैं, इसलिए ये दोनों अवैध शिकारियों के मुख्य निशाने बन गए।

इसलिए “प्रोजेक्ट टाइगर” — दुनिया के सबसे प्रसिद्ध वन्यजीव अभियानों में से एक — 1973 में शुरू किया गया। इसे सिर्फ़ एक संकटग्रस्त प्रजाति को बचाने के रूप में नहीं, बल्कि बड़े और महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्रों (बायोटाइप्स) को समग्र रूप से बचाने के तरीके के रूप में देखा गया। भारत के कुछ बाघ रिज़र्व इस प्रकार हैं:

भारत के कुछ बाघ रिज़र्व
बाघ रिज़र्व / उद्यानराज्य
कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यानउत्तराखंड
सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यानपश्चिम बंगाल
बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यानमध्य प्रदेश
सरिस्का वन्यजीव अभयारण्यराजस्थान
मानस बाघ रिज़र्वअसम
पेरियार बाघ रिज़र्वकेरल

वनों के प्रकार — कौन प्रबंधन करता है के आधार पर

वनों को संरक्षित करना चाहें तब भी इन्हें संभालना और नियंत्रित करना मुश्किल है। भारत में अधिकांश वन और वन्य जीव संसाधन सरकार के स्वामित्व या प्रबंधन में हैं, मुख्यतः वन विभाग के ज़रिए। प्रबंधन के आधार पर वनों को तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है:

एक वर्गीकरण चार्ट जो सारी वन-भूमि को तीन श्रेणियों में बाँटता है: आरक्षित वन (आधे से ज़्यादा वन-भूमि, संरक्षण के लिए सबसे मूल्यवान), रक्षित वन (लगभग एक-तिहाई, आगे की क्षति से बचाए गए), और अवर्गीकृत वन (बाकी वन और बंजर भूमि जो सरकार, निजी व्यक्तियों और समुदायों की हैं)। आरक्षित और रक्षित वन मिलकर स्थायी वन सम्पदा बनाते हैं।
भारत के वन — कौन प्रबंधन करता है के आधार पर: आरक्षित, रक्षित और अवर्गीकृत। आरक्षित और रक्षित वन मिलकर स्थायी वन सम्पदा कहलाते हैं।
प्रबंधन के आधार पर वनों का वर्गीकरण
प्रकारहिस्सा / स्थितिकौन स्वामी या प्रबंधक है
आरक्षित वनकुल वन-भूमि के आधे से ज़्यादा; वन और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए सबसे मूल्यवानसरकार (वन विभाग)
रक्षित वनवन क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई; आगे की किसी भी क्षति से बचाया गयासरकार (वन विभाग)
अवर्गीकृत वनबाकी वन और बंजर भूमिसरकार तथा निजी व्यक्ति और समुदाय — दोनों

आरक्षित और रक्षित वन मिलकर स्थायी वन सम्पदा कहलाते हैं — जिन्हें मुख्यतः इमारती लकड़ी और अन्य वन उत्पाद बनाने तथा सुरक्षा के लिए रखा जाता है। कुछ जानने योग्य तथ्य:

  • मध्य प्रदेश में स्थायी वनों के अंतर्गत सबसे बड़ा क्षेत्र है — उसके कुल वन क्षेत्र का लगभग 75%
  • जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में आरक्षित वनों का बड़ा हिस्सा है।
  • बिहार, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान में अधिकांश वन रक्षित वन हैं।
  • सभी पूर्वोत्तर राज्यों और गुजरात के कुछ हिस्सों में बहुत बड़ा हिस्सा अवर्गीकृत वनों का है, जिन्हें स्थानीय समुदाय संभालते हैं।

समुदाय और संरक्षण

भारत में संरक्षण सिर्फ़ सरकार का काम नहीं है। वन कई पारंपरिक समुदायों के घर हैं, और कई जगहों पर स्थानीय लोग खुद वन की रक्षा करते हैं — कभी अधिकारियों के साथ, कभी सरकारी दख़ल को पूरी तरह ठुकराते हुए — क्योंकि वे समझते हैं कि उनका अपना दीर्घकालिक जीवन इसी पर निर्भर है।

  • सरिस्का बाघ रिज़र्व (राजस्थान) — गाँववालों ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का हवाला देकर खनन के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी।
  • अलवर ज़िला (राजस्थान) — पाँच गाँवों के लोगों ने 1,200 हेक्टेयर वन को भैरोदेव डाकव ‘सोंचुरी’ घोषित किया, शिकार पर रोक लगाने वाले अपने नियम बनाए, और बाहरी लोगों से वन्य जीवन की रखवाली करते हैं।
  • चिपको आंदोलन ने हिमालय में न सिर्फ़ कई जगहों पर वन-कटाई का सफल विरोध किया, बल्कि यह भी दिखाया कि देशी (स्थानीय) प्रजातियों से सामुदायिक वनरोपण ज़बरदस्त रूप से सफल हो सकता है।
  • बीज बचाओ आंदोलन (टिहरी में) और नवधान्य — किसानों और नागरिक समूहों ने दिखाया कि कृत्रिम रसायनों के बिना विविध फ़सल उत्पादन संभव भी है और फ़ायदेमंद भी।

संयुक्त वन प्रबंधन (JFM)

संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) कार्यक्रम क्षतिग्रस्त (बंजर होते) वनों को फिर से उभारने में स्थानीय समुदायों को जोड़ने का अच्छा उदाहरण है। यह औपचारिक रूप से 1988 से मौजूद है, जब ओडिशा ने पहला JFM प्रस्ताव पारित किया। विचार सरल है: गाँव की संस्थाएँ बनती हैं जो ज़्यादातर वन विभाग द्वारा प्रबंधित क्षतिग्रस्त वन-भूमि की रक्षा करती हैं, और बदले में समुदाय के सदस्यों को गैर-इमारती वन उत्पाद और सफल रखवाली के बाद काटी गई इमारती लकड़ी में हिस्सा जैसे लाभ मिलते हैं।

पवित्र उपवन (सेक्रेड ग्रोव्स)

प्रकृति-पूजा एक पुरानी आदिवासी मान्यता है: कि प्रकृति की हर रचना की रक्षा होनी चाहिए। इसी मान्यता ने कुछ कुँवारे वनों को उनके मूल, अछूते रूप में बचाए रखा है — जिन्हें पवित्र उपवन (“देवी-देवताओं के वन”) कहते हैं, जहाँ किसी भी दख़ल पर रोक है।

कुछ समुदाय विशेष पेड़ों को भी पूजते हैं। छोटा नागपुर क्षेत्र के मुंडा और संथाल महुआ और कदंब के पेड़ों को पूजते हैं; ओडिशा और बिहार के आदिवासी विवाहों में इमली और आम के पेड़ों को पूजते हैं; और हममें से कई के लिए पीपल और बरगद पवित्र हैं। झरनों, पर्वत-शिखरों और जानवरों को भी पवित्र माना जाता है — आपको मंदिरों के आस-पास मकाक और लंगूरों के झुंड संभाले हुए मिलेंगे, और राजस्थान के बिश्नोई गाँवों के आस-पास काला हिरण (चिंकारा), नीलगाय और मोर समुदाय के हिस्से के रूप में सुरक्षित रहते हैं।

साफ़ सबक यह है कि प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में हर जगह स्थानीय समुदायों को जोड़ना ज़रूरी है, और हमें केवल वही विकास-गतिविधियाँ स्वीकार करनी चाहिए जो लोग-केंद्रित, पर्यावरण-अनुकूल और आर्थिक रूप से लाभकारी हों।

सामान्य गलतियाँ

⚠️ Common mistake
What students think

'स्थानिक' और 'संकटग्रस्त' का मतलब एक ही है।

Why it seems right

दोनों शब्द तकनीकी लगते हैं और दोनों ही ऐसी प्रजातियों के बारे में हैं जिन पर नज़र रखनी पड़ती है, इसलिए इन्हें एक ही समझ लेना आसान है।

What actually happens

ये अलग-अलग सवालों के जवाब देते हैं। 'संकटग्रस्त' ख़तरे के बारे में है — विलुप्ति के संकट में पड़ी प्रजाति। 'स्थानिक' जगह के बारे में है — सिर्फ़ एक ही क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रजाति। एक स्थानिक प्रजाति (जैसे निकोबार कबूतर) पूरी तरह सुरक्षित भी हो सकती है, या संकटग्रस्त भी; ये दोनों विचार ओवरलैप करते हैं पर एक नहीं हैं।

⚠️ Common mistake
What students think

आरक्षित वन जनता के लिए 'आरक्षित' हैं, और रक्षित वन जनता से 'रक्षित' (दूर रखे गए) हैं।

Why it seems right

शब्दों के रोज़मर्रा के अर्थ इसी ओर खींचते हैं — 'आरक्षित' लगता है लोगों के लिए बुक किया हुआ और 'रक्षित' लगता है घेर कर रखा हुआ।

What actually happens

दोनों सरकारी प्रबंधन की श्रेणियाँ हैं। आरक्षित वन संरक्षण के लिए सबसे मूल्यवान हैं और कुल वन-भूमि के आधे से ज़्यादा हैं; रक्षित वन आगे की क्षति से बचाए जाते हैं और लगभग एक-तिहाई हैं। ये जनता के लिए ज़मीन आरक्षित करने के बारे में नहीं — दोनों मिलकर 'स्थायी वन सम्पदा' हैं।

⚠️ Common mistake
What students think

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1973 में पारित हुआ, उसी साल जब प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ।

Why it seems right

प्रोजेक्ट टाइगर (1973) इस अध्याय की सबसे प्रसिद्ध तारीख़ है, इसलिए अधिनियम को भी उसी से जोड़ने का मन करता है।

What actually happens

भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 में पारित हुआ। प्रोजेक्ट टाइगर अगले साल, 1973 में शुरू हुआ। पौधे संरक्षित सूची में और बाद में, 1991 में जोड़े गए।

⚠️ Common mistake
What students think

संरक्षण पूरी तरह सरकार का काम है, जो कानूनों और उद्यानों के ज़रिए होता है।

Why it seems right

अध्याय वन्यजीव अधिनियम, प्रोजेक्ट टाइगर और राष्ट्रीय उद्यानों पर काफ़ी ज़ोर देता है, इसलिए यह ऊपर-से-नीचे चलने वाली सरकारी कहानी लगती है।

What actually happens

समुदाय केंद्र में हैं। सरिस्का के गाँववालों ने खनन के ख़िलाफ़ कानून का इस्तेमाल किया; अलवर के लोगों ने अपना अभयारण्य बनाया; चिपको आंदोलन और JFM स्थानीय लोगों को वन बचाते और उभारते दिखाते हैं। अक्सर सबसे असरदार संरक्षण नीचे-से-ऊपर होता है।

झटपट जाँच

1972 में पारित कौन-सा अधिनियम सूचीबद्ध प्रजातियों के शिकार पर रोक लगाता है और उनके आवासों को कानूनी सुरक्षा देता है?

भारत की कुल वन-भूमि का आधे से ज़्यादा हिस्सा किस श्रेणी में आता है?

वह प्रजाति जो सिर्फ़ एक ही क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से पाई जाती है और पृथ्वी पर और कहीं नहीं, कहलाती है:

इनमें से कौन-सी संरक्षण रणनीति सीधे तौर पर समुदाय की भागीदारी से नहीं जुड़ी है?

अभ्यास प्रश्न

आसान

easy

जैव विविधता क्या है? मानव जीवन के लिए जैव विविधता क्यों महत्वपूर्ण है? (लगभग 30 शब्द)

easy

प्रत्येक वन-प्रकार को उसके विवरण से मिलाइए: (क) आरक्षित वन (ख) रक्षित वन (ग) अवर्गीकृत वन।

मध्यम

medium

मानवीय गतिविधियों ने वनस्पति और प्राणी जात के ह्रास को कैसे प्रभावित किया है? समझाइए। (लगभग 30 शब्द)

medium

प्रोजेक्ट टाइगर क्या था, इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी, और यह कब शुरू हुआ?

चुनौती

challenge

भारत में समुदायों ने वनों और वन्य जीवन का संरक्षण और रक्षा कैसे की है, वर्णन कीजिए। (लगभग 120 शब्द)

challenge

वन और वन्य जीवन के संरक्षण की अच्छी पद्धतियों पर एक टिप्पणी लिखिए। (लगभग 120 शब्द)

सारांश

  • हम इस ग्रह को लाखों प्रजातियों के साथ साझा करते हैं; जीवन की पूरी विविधता — जंगली और उगाई गई, अंतर्निर्भरताओं से जुड़ी — जैव विविधता है, जिसका आधार प्राथमिक उत्पादक के रूप में वन हैं।
  • वनस्पति यानी पादप जीवन, प्राणी जात यानी जंतु जीवन। भारत जैव विविधता में दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक है।
  • प्रजातियाँ ख़तरे के स्तर पर बँटती हैं: सामान्य, सुभेद्य, दुर्लभ, संकटग्रस्त, लुप्तस्थानिक प्रजातियाँ (सिर्फ़ एक क्षेत्र में) एक अलग विचार हैं — जगह की, न कि ख़तरे की।
  • वनस्पति और प्राणी जात मुख्यतः मानवीय गतिविधियों से घट रहे हैं: आवास का नुकसान, अवैध शिकार और अति-उपयोग, आग व चराई, प्रदूषण, और आबादी का दबाव।
  • संरक्षण पारिस्थितिक व आनुवंशिक विविधता और हमारे जीवन-रक्षक तंत्र को बचाता है। भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 ने शिकार पर रोक लगाई, आवास बचाए और व्यापार पर पाबंदी लगाई; पौधे 1991 में संरक्षित सूची में जोड़े गए
  • प्रोजेक्ट टाइगर (1973 में शुरू) ने बाघ और बड़े प्राकृतिक क्षेत्रों को बचाया; रिज़र्व में कॉर्बेट, सुंदरबन, बांधवगढ़, सरिस्का, मानस और पेरियार शामिल हैं।
  • वन आरक्षित (सबसे मूल्यवान, आधे से ज़्यादा), रक्षित (लगभग एक-तिहाई) और अवर्गीकृत (सरकार, निजी और समुदाय) के रूप में प्रबंधित होते हैं। आरक्षित + रक्षित = स्थायी वन सम्पदा
  • संरक्षण में समुदाय केंद्रीय हैं: सरिस्का, अलवर की ‘सोंचुरी’, चिपको आंदोलन, संयुक्त वन प्रबंधन (1988, ओडिशा) और पवित्र उपवन

आगे क्या

आपने देखा कि वन और वन्य जीवन ऐसे जीवंत संसाधन हैं जिन्हें हमें समझदारी से इस्तेमाल करना और बचाना है। अब हम एक ऐसे संसाधन की ओर बढ़ते हैं जो उतना ही ज़रूरी और उतना ही दबाव में है — पानीजल संसाधन में आप जानेंगे कि भारी मानसूनी बारिश वाला देश भी जल-संकट क्यों झेल सकता है, बाँध और वर्षा जल संचयन कैसे काम करते हैं, और साझा संसाधन को बचाने में समुदाय फिर से कैसे एक अहम भूमिका निभाते हैं।