मैं और मेरा देश
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए। आप कौन हैं? “मैं हूँ — मेरा घर, मेरा परिवार, मेरे दोस्त।” बस इतना ही?
यह निबंध कहता है कि नहीं, आप इससे कहीं बड़े हैं। आपकी पहचान सिर्फ़ आपके घर तक नहीं रुकती। वह आपके पड़ोस, आपके शहर और आपके पूरे देश तक फैली है।
सोचिए, अगर आप किसी दूसरे देश में जाएँ और वहाँ कोई आपके देश का अपमान करे, तो आपको कैसा लगेगा? बुरा लगेगा, है ना? क्यों? क्योंकि वह अपमान आपका भी है। आप और आपका देश अलग नहीं हैं।
यही इस पाठ की सबसे ज़रूरी बात है। हर नागरिक अपने देश से एक अनदेखी डोर से बँधा है। आप जो भी अच्छा या बुरा करते हैं, उसका असर पूरे देश पर पड़ता है। और देश के मान-सम्मान का हिस्सा आपको मिलता है। यह बात आज भी उतनी ही सच है, जब आप एक छोटे नागरिक के रूप में सोचते हैं कि “मैं अकेला देश के लिए कर ही क्या सकता हूँ?”
मूल भाव (The Big Idea)
मूल भाव: व्यक्ति और उसका देश दो अलग चीज़ें नहीं हैं — वे एक ही हैं। नागरिक जो करता है, उसका फल पूरे देश को मिलता है, और देश की हीनता या गौरव का असर हर नागरिक पर पड़ता है। इसलिए देश का सम्मान बढ़ाना हर नागरिक का कर्तव्य है, और देश की शक्ति से अपनी रक्षा पाना उसका अधिकार। और देश के लिए कुछ करने को बड़ा वैज्ञानिक या धनी होना ज़रूरी नहीं — हर साधारण नागरिक भी, अपनी अच्छी भावना और सही आचरण से, देश का गौरव बढ़ा सकता है।
पाठ का सार
यह एक निबंध है। निबंध गद्य की वह विधा है जिसमें लेखक किसी एक विषय पर अपने विचार खुलकर, क्रम से और दिल से रखता है। इस निबंध का विषय है — व्यक्ति और देश का रिश्ता। आइए इसे क्रम से, सरल भाषा में समझते हैं।
शुरुआत — “मैं तो पूरा हो गया हूँ।” लेखक बताता है कि एक समय वह सोचता था कि वह अपने आप में पूरा है। उसका अपना घर है, प्यारा पड़ोस है, अपना नगर है, लोगों का सम्मान है। उसे और कुछ नहीं चाहिए। उसकी मनुष्यता में अब कोई कमी नहीं रही।
एक दरार। फिर एक दिन उसके इस सुख की दीवार में एक दरार पड़ गई। उसे महसूस हुआ कि घर, पड़ोस और नगर के सारे सुख पाकर भी उसकी हालत बहुत हीन है। कोई भी, कहीं भी उसका अपमान कर सकता है — और वह उसका बदला तो दूर, अपील या प्रार्थना तक नहीं कर सकता।
मानसिक भूकंप। यह दरार किसी ज़मीनी भूकंप से नहीं पड़ी। यह लेखक के मन में उठा एक “मानसिक भूकंप” था। यह भूकंप था लाला लाजपत राय के एक अनुभव का। लाजपत राय ने कहा था — “मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया, संसार के और भी देशों में घूमा, पर जहाँ भी गया, भारत की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।” यानी आपके पास संसार के सब साधन हों, पर अगर आपका देश गुलाम या हीन है, तो वे साधन आपको गौरव नहीं दे सकते।
छोटा आदमी क्या कर सकता है? यहाँ एक सवाल उठता है — “भला एक साधारण आदमी अपने इतने बड़े देश के लिए कर ही क्या सकता है?” लेखक कहता है कि यह सोच गलत है। जीवन एक युद्ध की तरह है। युद्ध में सिर्फ़ लड़ना ही काम नहीं होता। लड़ने वालों को राशन पहुँचाने वाले, खेती करने वाले किसान, और जय बोलने वाले — सबका महत्व है। जैसे मैच में दर्शकों की तालियाँ खिलाड़ियों में जान भर देती हैं, वैसे ही हर साधारण नागरिक देश के लिए बहुत कुछ कर सकता है।
दो युवकों की कहानियाँ। लेखक दो छोटी कहानियाँ सुनाता है। (1) स्वामी रामतीर्थ जापान में थे। उन्हें फल नहीं मिले, तो वे बोले — “जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते।” यह सुनकर एक जापानी युवक दौड़कर ताज़े फल लाया, दाम नहीं लिए, बस कहा — “देश जाकर यह मत कहिएगा कि जापान में फल नहीं मिलते।” इस युवक ने अपने देश का सिर ऊँचा कर दिया। (2) दूसरी ओर, एक विदेशी छात्र ने जापान के पुस्तकालय की किताब से दुर्लभ चित्र चुरा लिए। पकड़े जाने पर उसे निकाल दिया गया, और पुस्तकालय के बाहर बोर्ड लग गया कि उस देश का कोई भी अंदर नहीं आ सकता। इस छात्र ने अपने देश के माथे पर कलंक लगा दिया।
भावना का महत्व। लेखक कहता है कि काम बड़ा या छोटा होने से कुछ नहीं होता — असली बात है उसके पीछे की भावना। वह तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा और एक बूढ़े किसान के पाव-भर शहद की कहानी सुनाता है, और भारत के प्रधानमंत्री नेहरू और एक किसान की रंगीन खाट की कहानी भी। दोनों जगह छोटा-सा उपहार सिर्फ़ अपनी भावना के कारण बहुत बड़ा बन गया।
शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध। अंत में लेखक बताता है कि अपने देश को सबसे ज़्यादा दो चीज़ों की ज़रूरत है — शक्ति-बोध (आत्मविश्वास) और सौंदर्य-बोध (सुरुचि और सफ़ाई)। हमें कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे देश में कमज़ोरी की भावना या गंदगी बढ़े। और देश की ऊँचाई-हीनता की कसौटी है — चुनाव। इसलिए हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह हर चुनाव में सही व्यक्ति को वोट दे।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने निबंध का सरल सारांश और व्याख्या अपने शब्दों में दी है। पूरा मूल निबंध अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “गंगा” (कक्षा 9) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। यहाँ हम लेखक का मूल पाठ दोबारा नहीं छाप रहे — बस उसका भाव अपने शब्दों में खोल रहे हैं।
लेखक से परिचय
इससे पहले कि हम निबंध की गहराई में उतरें, यह जान लेना अच्छा रहेगा कि इसे लिखा किसने।
इस निबंध के लेखक हैं कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ (1906–1995)। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले में हुआ था। वे हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार थे, और उनका मुख्य काम पत्रकारिता था।
प्रभाकर जी शुरू से ही स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। इसी कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। उन्होंने राजनीति और समाज से जुड़े बहुत-से निबंध लिखे। उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया। दीप जले शंख बजे, जिंदगी मुसकराई और माटी हो गई सोना उनके प्रसिद्ध निबंध-संग्रह हैं।
मूल पाठ और व्याख्या
यह निबंध कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की रचना है, जिनका निधन सन् 1995 में हुआ। यानी यह रचना अभी भी कॉपीराइट में है। इसलिए हम यहाँ उसका पूरा मूल पाठ दोबारा नहीं छाप रहे।
📖 पूरा मूल पाठ अपनी पाठ्यपुस्तक “गंगा” (कक्षा 9) में पढ़ें। नीचे हम निबंध के मुख्य भागों को क्रम से लेकर, हर भाग का भाव सरल भाषा में खोल रहे हैं। इसे अपनी किताब के साथ मिलाकर पढ़िए — तब हर पंक्ति का अर्थ खुलकर सामने आएगा।
निबंध को समझने का सबसे आसान तरीका है — इसकी एक खास शैली पर ध्यान देना। पूरा निबंध प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया है। यानी लेखक खुद ही एक सवाल उठाता है (मानो पाठक पूछ रहा हो), फिर उसका जवाब देता है। यह “बातचीत वाली शैली” निबंध को सजीव और दिलचस्प बना देती है। आइए, इसी क्रम से भाव समझें।
भाग 1 — “मैं पूरा हो गया हूँ।” लेखक अपनी बात अपने घर से शुरू करता है। वह अपने घर में जन्मा, पड़ोस में खेलकर बड़ा हुआ, और नगर के समाज से जुड़कर एक पूरा इंसान बन गया। वह दूसरों का सम्मान करता था, दूसरे उसका। उसे लगता था कि अब उसकी ज़िंदगी पूरी, सुंदर और संगठित है। उसे और कुछ नहीं चाहिए।
व्यक्ति की यह पहचान कैसे घर से शुरू होकर देश तक फैलती है, यह नीचे का चित्र 7.1 दिखाता है।
भाग 2 — दीवार में दरार। एक दिन इस सुख की दीवार में एक दरार पड़ गई। लेखक को महसूस हुआ कि सब सुख पाकर भी उसकी हालत बहुत हीन है। कोई भी, कहीं भी उसका अपमान कर सकता है — एक मामूली अपराधी की तरह — और वह बदला लेना तो दूर, अपील तक नहीं कर सकता। यह दरार किसी धरती के भूकंप से नहीं, उसके अपने मन में उठे एक भूकंप से पड़ी थी।
भाग 3 — मानसिक भूकंप और लाला लाजपत राय। यह मानसिक भूकंप था लाला लाजपत राय के एक अनुभव का। लाजपत राय एक तेजस्वी (तेज से भरे) पुरुष थे, जो गुलामी के दिनों में देश के गौरव के दीपक जलाते रहे। वे संसार के कई देशों में घूमे थे। लौटकर उन्होंने अपना सारा अनुभव एक वाक्य में रख दिया — “जहाँ भी गया, भारत की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।” इस वाक्य ने लेखक की “मैं पूरा हूँ” वाली सोच को तोड़ दिया।
यह “मानसिक भूकंप” कैसे लेखक के मन में पूर्णता को अपूर्णता में बदल देता है, यह चित्र 7.2 दिखाता है।
भाग 4 — मेरा कर्तव्य और मेरा अधिकार। इस अनुभव के बाद लेखक सोचता है — मुझे चाहे सारे संसार का राज्य भी मिल जाए, मैं ऐसा कोई काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता या सम्मान को धक्का लगे। यह उसका कर्तव्य है। साथ ही, एक नागरिक के नाते उसका यह अधिकार भी है कि देश के सम्मान का पूरा हिस्सा उसे मिले, और देश की शक्ति से उसकी रक्षा का भरोसा रहे।
भाग 5 — “छोटा आदमी क्या कर सकता है?” यहाँ लेखक एक सवाल उठाता है — एक साधारण आदमी, जो अपनी रोटी की फ़िक्र में लगा है, देश के लिए क्या कर सकता है? लेखक इसका जवाब देता है — यह सोच जीवन को न समझने वाली है। जीवन एक विशाल समुद्र का किनारा है, जिस पर हर कोई अपनी जगह पा सकता है। जीवन एक युद्ध है, और युद्ध में सिर्फ़ लड़ना ही काम नहीं होता। राशन पहुँचाने वाले, किसान, और जय बोलने वाले — सबका महत्व है। जैसे मैच में दर्शकों की तालियाँ खिलाड़ियों के पैरों में बिजली भर देती हैं, वैसे ही हर साधारण नागरिक देश के सम्मान के लिए बहुत कुछ कर सकता है। “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता” — यह कहावत लेखक के अनुभव में सौ फीसदी झूठ है।
भाग 6 — दो युवकों की दो कहानियाँ। लेखक नागरिक और देश की गाँठ को दिखाने के लिए दो छोटी कहानियाँ सुनाता है। पहली — जापान का वह युवक, जिसने स्वामी रामतीर्थ को बिना दाम लिए ताज़े फल दिए और सिर्फ़ इतना कहा कि देश जाकर जापान के फलों की बुराई न करना। दूसरी — वह विदेशी छात्र, जिसने जापान के पुस्तकालय से चित्र चुराए और अपने पूरे देश को कलंकित कर गया।
ये दो उल्टी कहानियाँ नागरिक और देश की गाँठ को साफ़ दिखाती हैं — चित्र 7.3 दोनों को आमने-सामने रखता है।
भाग 7 — भावना ही असली चीज़ है। लेखक कहता है कि किसी काम का महत्व उसकी विशालता में नहीं, उसके पीछे की भावना में है। बड़े से बड़ा काम भी हीन है अगर उसके पीछे अच्छी भावना नहीं, और छोटे से छोटा काम भी महान है अगर भावना अच्छी है। इसे समझाने के लिए वह तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा और एक बूढ़े किसान की कहानी सुनाता है — बूढ़ा तीस मील पैदल चलकर पाव-भर शहद उपहार में लाया, और कमालपाशा ने उसे सबसे बड़ा उपहार कहा क्योंकि उसमें शुद्ध प्यार था। वैसी ही कहानी भारत में नेहरू और एक किसान की रंगीन खाट की है।
भाग 8 — शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध। आखिर में लेखक बताता है कि हम कैसे जानें कि हमारा काम देश के अनुकूल है या नहीं। इसके लिए देश की भीतरी ज़रूरत समझनी होगी। देश को सबसे ज़्यादा दो चीज़ें चाहिए — शक्ति-बोध (आत्मविश्वास और मानसिक बल) और सौंदर्य-बोध (सुरुचि और सफ़ाई)। बार-बार अपने देश को हीन बताना शक्ति-बोध को चोट पहुँचाता है (जैसे शल्य की बातों ने कर्ण का आत्मविश्वास तोड़ दिया था)। सड़क पर कूड़ा फेंकना, थूकना, गंदगी फैलाना सौंदर्य-बोध को चोट पहुँचाता है। और देश की ऊँचाई-हीनता की असली कसौटी है — चुनाव। इसलिए हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह सही व्यक्ति को वोट दे, और अधिकार है कि उसका वोट लिए बिना कोई अधिकार की कुर्सी पर न बैठे।
निबंध के मुख्य भाव
इस छोटे-से निबंध में एक साथ कई भाव बुने हुए हैं। आगे बढ़ने से पहले इन्हें एक साथ देख लेना अच्छा रहेगा — नीचे का भाव-जाल इन्हें एक नज़र में दिखाता है।
जैसा चित्र 7.4 दिखाता है, यह निबंध सिर्फ़ “देश से प्यार करो” कहने तक नहीं रुकता। आइए हर भाव को थोड़ा गहराई से देखें।
देश-प्रेम — मेरा सम्मान, देश का सम्मान
लेखक का देश-प्रेम भावुक नारेबाज़ी नहीं है। वह तर्क से कहता है — मेरी पहचान मेरे देश से जुड़ी है। अगर मेरा देश गुलाम या हीन है, तो मेरे पास चाहे संसार के सारे साधन हों, मुझे सच्चा गौरव नहीं मिल सकता। इसीलिए लाजपत राय को विदेश में भी गुलामी का कलंक माथे पर लगा महसूस होता था।
कर्तव्य और अधिकार — दोनों साथ चलते हैं
यह निबंध की बहुत समझदार बात है। लेखक सिर्फ़ कर्तव्य की बात नहीं करता, अधिकार की भी करता है। कर्तव्य — मैं ऐसा कोई काम न करूँ जिससे देश के सम्मान या शक्ति को धक्का लगे। अधिकार — देश के सम्मान का पूरा हिस्सा मुझे मिले, और देश की शक्ति से, मैं जहाँ भी रहूँ, मेरी रक्षा का भरोसा रहे। कर्तव्य और अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
वक्ता और उसका स्वर
यह निबंध आत्मकथा जैसी “मैं” शैली में लिखा गया है। बोलने वाला यानी वक्ता खुद लेखक है, जो अपने मन की यात्रा सुनाता है — पहले “मैं पूरा हूँ” से, फिर “मैं अधूरा हूँ” तक, और आखिर में एक ज़िम्मेदार नागरिक बनने तक। उसका स्वर गर्मजोशी भरा और बातचीत वाला है। वह पाठक को डाँटता नहीं, बल्कि उससे बातें करता-सा, सवाल-जवाब करता-सा समझाता है।
भाषा और शैली का सौंदर्य
अब निबंध की भाषा-कला पर ध्यान दें। लेखक ने कुछ खास तरीकों से अपनी बात को असरदार बनाया है।
- प्रश्नोत्तर (संवाद) शैली — पूरा निबंध सवाल-जवाब के रूप में चलता है। लेखक खुद सवाल उठाता है (जैसे “एक आदमी देश के लिए क्या कर सकता है?”) और फिर जवाब देता है। लेखक ने यह क्यों चुना? क्योंकि इससे पाठक को लगता है कि लेखक उसी से बात कर रहा है। बात उबाऊ नहीं रहती, ज़िंदा लगती है।
- प्रतीक (Symbol) — प्रतीक का मतलब है, एक चीज़ जो किसी बड़ी बात की ओर इशारा करे। जैसे यहाँ “मानसिक भूकंप” प्रतीक है उस झटके का जो लेखक की सोच को हिला देता है। और “दीवार में दरार” प्रतीक है उसकी पूरी सोच के टूटने का।
- दृष्टांत (उदाहरण-कथा) — लेखक अपनी बात साबित करने के लिए छोटी-छोटी सच्ची कहानियाँ देता है — दो युवक, कमालपाशा का शहद, नेहरू की खाट। क्यों? क्योंकि कोरी बात से ज़्यादा एक कहानी दिल पर असर करती है और बात याद रह जाती है।
- लोकोक्ति और मुहावरे — “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता” जैसी कहावत का इस्तेमाल। लेखक उसे उलटकर कहता है कि कई बार अकेले चने ने ही भाड़ फोड़ा है। इससे उसकी बात में चुटीलापन और ताज़गी आ जाती है।
चुनावों और संदेश के पीछे का “क्यों” — निबंध का हृदय
अब निबंध के सबसे गहरे सवाल पर आते हैं। एक टोकरी मिट्टी की तरह, यहाँ भी एक बात अपने-आप मान लेने जैसी लगती है — “देश से प्यार करो।” पर लेखक इसे यहीं नहीं छोड़ता। वह क्यों बताता है।
क्यों एक आदमी अकेला फ़र्क डाल सकता है? क्योंकि देश सिर्फ़ चंद बड़े लोगों से नहीं चलता। वह करोड़ों छोटे-छोटे कामों से चलता है। हर साफ़-सुथरा नागरिक, हर ईमानदार वोट, हर अच्छा बर्ताव देश की ताकत में जुड़ता है। इसलिए “मैं अकेला क्या कर सकता हूँ” सोचना गलत है।
क्यों भावना काम से बड़ी है? क्योंकि एक ही काम अच्छी या बुरी भावना से बहुत अलग हो जाता है। बूढ़े का पाव-भर शहद इसलिए कीमती था कि उसमें शुद्ध प्यार था। अगर वही शहद किसी दिखावे या लालच से दिया जाता, तो उसका कोई मोल न होता।
क्यों शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध ज़रूरी हैं? क्योंकि एक देश सिर्फ़ ज़मीन का टुकड़ा नहीं, वह अपने लोगों के मन और आदतों से बनता है। अगर लोग बार-बार अपने देश को हीन कहेंगे, तो देश सच में कमज़ोर महसूस करेगा — ठीक जैसे शल्य के बार-बार ताने सुनकर कर्ण का आत्मविश्वास टूट गया था। और अगर लोग गंदगी फैलाएँगे, तो देश की सुंदरता और संस्कृति को चोट लगेगी।
देश को आत्मविश्वास और सुंदरता — दोनों चाहिए, और दोनों को बचाने का रास्ता क्या है, यह चित्र 7.5 साफ़ करता है।
जैसा चित्र 7.5 दिखाता है, देश-प्रेम कोई बड़ी बलिदान की बात नहीं — वह रोज़मर्रा के छोटे कामों में है। सड़क पर कूड़ा न फेंकना, अपने देश को हीन न कहना, और सोच-समझकर वोट देना — यही असली देश-सेवा है।
यहाँ एक छोटी जाँच कर लेते हैं, ताकि शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध का फ़र्क पक्का हो जाए।
शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध में क्या फ़र्क है?
शक्ति-बोध का मतलब है देश का आत्मविश्वास और मानसिक बल। इसे चोट तब लगती है जब हम बार-बार अपने देश को हीन और दूसरे देश को श्रेष्ठ कहते हैं। सौंदर्य-बोध का मतलब है देश की सफ़ाई, सुरुचि और संस्कृति। इसे चोट तब लगती है जब हम कूड़ा फैलाते हैं, थूकते हैं या गंदगी करते हैं। यानी एक देश के मन से जुड़ा है, दूसरा देश की सुंदरता और आदतों से।
आम भूलें
कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें विद्यार्थी अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।
निबंध में जो 'भूकंप' आया, वह किसी असली, ज़मीनी भूकंप की बात है।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि 'भूकंप' शब्द का रोज़मर्रा का मतलब धरती का हिलना ही होता है, तो पहली बार पढ़ने पर मन वहीं चला जाता है।
यहाँ भूकंप एक प्रतीक है। यह लेखक के मन यानी 'मानस' में उठा एक झटका था। लाला लाजपत राय के एक वाक्य ने उसकी सोच को इतना हिला दिया कि वह असली भूकंप जैसा लगा।
निबंध कहता है कि देश के लिए कुछ करने को बड़ा वैज्ञानिक, धनी या नेता होना ज़रूरी है।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि बड़े काम अक्सर बड़े लोग ही करते दिखते हैं, तो लगता है कि साधारण आदमी का कोई योगदान नहीं हो सकता।
निबंध का ठीक उल्टा संदेश है। लेखक कहता है कि हर साधारण नागरिक भी देश के लिए बहुत कुछ कर सकता है — सफ़ाई रखकर, सही वोट देकर, अच्छा बर्ताव करके। जय बोलने वाले और दर्शक भी उतने ही ज़रूरी हैं जितने खिलाड़ी।
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को फल इसलिए दिए ताकि उससे कुछ पैसे या कोई फ़ायदा मिले।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि अनजान को मुफ़्त में कीमती चीज़ देना आम बात नहीं, तो मन सोचता है कि ज़रूर कोई स्वार्थ होगा।
युवक ने दाम लेने से साफ़ इनकार कर दिया। उसने सिर्फ़ इतना चाहा कि स्वामी जी अपने देश जाकर जापान के फलों की बुराई न करें। उसका मकसद पैसा नहीं, अपने देश का सम्मान बचाना था।
भावना का महत्व का मतलब है कि काम चाहे जैसा भी हो, अगर मन अच्छा है तो काफ़ी है।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि 'भावना बड़ी होती है' सुनकर लगता है कि अब काम करने की ज़रूरत ही नहीं, बस अच्छा सोचना काफ़ी है।
लेखक काम और भावना दोनों की बात करता है। उसका मतलब है कि एक ही काम अच्छी भावना से किया जाए तो वह महान बन जाता है। बूढ़े ने शहद लाने का काम किया भी और उसमें शुद्ध प्यार भी था — दोनों मिलकर उसे कीमती बनाते हैं।
झटपट जाँच
अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।
निबंध में 'दीवार में दरार' किस बात की ओर इशारा करती है?
दीवार में दरार एक प्रतीक है। यह लेखक की उस सोच के टूटने को दिखाती है कि “मैं अपने आप में पूरा हूँ”। लाजपत राय के अनुभव से उसे अपनी हीनता और अधूरेपन का एहसास हुआ।
लेखक के अनुसार देश की ऊँचाई और हीनता की कसौटी क्या है?
लेखक कहता है कि जिस देश के नागरिक समझते हैं कि वोट किसे देना चाहिए, वह ऊँचा है। और जो गलत नारों या गलत असर में आकर वोट देते हैं, वह देश हीन है। इसलिए कसौटी चुनाव है।
शल्य के उदाहरण से लेखक क्या समझाना चाहता है?
शल्य कर्ण का सारथी होकर बार-बार अर्जुन की अजेयता का ज़िक्र करता रहा। इससे कर्ण के आत्मविश्वास में संदेह की दरार पड़ गई। लेखक इससे समझाता है कि बार-बार अपने देश को हीन कहना उसके शक्ति-बोध को चोट पहुँचाता है।
अभ्यास (परीक्षा-शैली)
अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।
लघु उत्तर
लेखक के मन में मानसिक भूकंप किसके अनुभव से उठा, और वह अनुभव क्या था?
लेखक के मन में मानसिक भूकंप लाला लाजपत राय के अनुभव से उठा। उनका अनुभव यह था — वे अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस और संसार के कई देशों में घूमे, पर जहाँ भी गए, भारत की गुलामी की लज्जा का कलंक उनके माथे पर लगा रहा। इस वाक्य ने लेखक को एहसास कराया कि देश गुलाम हो तो सब साधन पाकर भी गौरव नहीं मिलता।
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को फलों के बदले क्या माँगा? इससे उसके बारे में क्या पता चलता है?
जापानी युवक ने फलों के दाम लेने से इनकार कर दिया। बहुत आग्रह करने पर उसने सिर्फ़ इतना माँगा कि स्वामी जी अपने देश जाकर किसी से यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।
इससे पता चलता है कि वह युवक अपने देश से बहुत प्यार करता था और उसके सम्मान के प्रति बहुत सजग था। उसके लिए पैसे से ज़्यादा ज़रूरी अपने देश की अच्छी छवि थी।
दीर्घ उत्तर / ससंदर्भ व्याख्या
'बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज़ें तो हैं ही नहीं।' इस कथन का आशय उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
इस कथन का आशय है कि व्यक्ति और उसका देश एक-दूसरे से इतने जुड़े हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। आइए तर्कों और उदाहरणों से समझें:
- पहचान का फैलाव — मेरी पहचान सिर्फ़ मुझ तक नहीं रुकती। वह मेरे घर, पड़ोस, नगर और देश तक फैली है। मैं जहाँ भी जाऊँ, अपने देश का प्रतिनिधि होता हूँ।
- फल का दोनों ओर जाना — देश की हीनता या गौरव का फल मुझे मिलता है (जैसे गुलाम देश का नागरिक होने पर लाजपत राय को कलंक महसूस हुआ)। और मेरी हीनता या गौरव का फल देश को मिलता है (जैसे जापानी युवक ने देश का मान बढ़ाया, विदेशी छात्र ने घटाया)।
- निष्कर्ष — इसलिए जैसे मैं अपने सम्मान और लाभ का ध्यान रखता हूँ, वैसे ही देश के सम्मान और लाभ का ध्यान रखना मेरा कर्तव्य है, और देश की शक्ति से अपनी रक्षा पाना मेरा अधिकार।
तो मैं और मेरा देश दो अलग चीज़ें नहीं, एक ही हैं।
लेखक कहता है कि देश को सबसे ज़्यादा शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध की ज़रूरत है। दोनों को समझाते हुए बताइए कि एक साधारण नागरिक इन्हें कैसे बचा सकता है।
लेखक के अनुसार देश को दो चीज़ों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। नीचे की तालिका दोनों का फ़र्क और बचाने के तरीके साफ़ करती है:
| आधार | शक्ति-बोध | सौंदर्य-बोध |
|---|---|---|
| मतलब | देश का आत्मविश्वास और मानसिक बल | देश की सफ़ाई, सुरुचि और संस्कृति |
| चोट कैसे लगती है | बार-बार देश को हीन और दूसरे को श्रेष्ठ कहना | कूड़ा फेंकना, थूकना, गंदगी और धक्का-मुक्की |
| उदाहरण | शल्य की बातों से कर्ण का आत्मविश्वास टूटना | सड़कों और सार्वजनिक जगहों का गंदा होना |
| नागरिक क्या करे | अपने देश पर भरोसा रखे, हीन भावना न फैलाए | अपने आस-पास सफ़ाई और सुंदरता बनाए रखे |
इस तरह एक साधारण नागरिक भी, बिना किसी बड़ी ताकत या धन के, अपने देश के शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध को बचा सकता है। उसे बस अपने देश को हीन कहने से बचना है और अपने आस-पास गंदगी नहीं फैलानी है।
ससंदर्भ व्याख्या
ससंदर्भ व्याख्या कीजिए — 'महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है।'
प्रसंग: यह पंक्ति कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के निबंध मैं और मेरा देश से ली गई है। लेखक यहाँ यह समझा रहा है कि देश-सेवा या किसी भी अच्छे काम का मोल किससे तय होता है।
व्याख्या: लेखक कहता है कि किसी काम की कीमत इस बात से नहीं तय होती कि वह कितना बड़ा या छोटा है। उसकी असली कीमत उसके पीछे की भावना से तय होती है।
- बड़े से बड़ा काम भी हीन है, अगर उसके पीछे अच्छी भावना नहीं है। दिखावे या स्वार्थ से किया गया बड़ा काम भी बेमोल है।
- छोटे से छोटा काम भी महान है, अगर उसके पीछे शुद्ध और सच्ची भावना है।
लेखक इसे दो उदाहरणों से साबित करता है। तुर्की के बूढ़े किसान का पाव-भर शहद कमालपाशा के लिए सबसे बड़ा उपहार बन गया, क्योंकि उसमें शुद्ध प्यार था। वैसे ही भारत में एक किसान की रंगीन खाट नेहरू के लिए कीमती थी, उसकी भावना के कारण।
संदेश: इसलिए देश के लिए कुछ करने को बड़ा वैज्ञानिक या धनी होना ज़रूरी नहीं। हर साधारण नागरिक अपनी सच्ची भावना और अच्छे आचरण से देश का गौरव बढ़ा सकता है।
सारांश
- “मैं और मेरा देश” कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ (1906–1995) का निबंध है, जो प्रश्नोत्तर (संवाद) शैली में लिखा गया है।
- निबंध का मूल भाव है — व्यक्ति और देश दो अलग चीज़ें नहीं, एक ही हैं। नागरिक की हीनता या गौरव का फल देश को, और देश का फल नागरिक को मिलता है।
- शुरू में लेखक खुद को पूरा समझता था; लाला लाजपत राय के एक अनुभव ने उसके मन में मानसिक भूकंप लाकर उसे अपने अधूरेपन का एहसास कराया।
- लेखक कहता है — देश का सम्मान बढ़ाना मेरा कर्तव्य है, और देश की शक्ति से मेरी रक्षा होना मेरा अधिकार।
- हर साधारण नागरिक देश के लिए बहुत कुछ कर सकता है — जैसे मैच में दर्शक खिलाड़ियों में जान भर देते हैं। “अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता” — यह कहावत झूठी है।
- दो युवकों की कहानियाँ यह सिखाती हैं कि एक नागरिक अपने काम से देश का सिर ऊँचा या नीचा कर सकता है।
- भावना ही असली चीज़ है — काम बड़ा-छोटा नहीं, उसके पीछे की अच्छी भावना उसे महान बनाती है (बूढ़े का शहद, किसान की खाट)।
- देश को सबसे ज़्यादा शक्ति-बोध (आत्मविश्वास) और सौंदर्य-बोध (सुरुचि-सफ़ाई) की ज़रूरत है, और देश की ऊँचाई-हीनता की कसौटी है — चुनाव, जहाँ सही व्यक्ति को वोट देना हर नागरिक का कर्तव्य है।
आगे क्या?
देश और नागरिक के रिश्ते को समझने के बाद, अगला पाठ हमें भक्ति और समता की दुनिया में ले जाता है। अगला पाठ है पाठ 8 — पद (रैदास)। जैसे इस निबंध ने सबको बराबर का नागरिक माना, वैसे ही संत रैदास अपने पदों में ऊँच-नीच के भेद से ऊपर उठकर, भक्ति और इंसानियत की बात करते हैं।
Frequently Asked Questions
मैं और मेरा देश निबंध का मुख्य भाव क्या है?
इस निबंध का मुख्य भाव है कि व्यक्ति और उसका देश दो अलग चीज़ें नहीं हैं। नागरिक जो करता है उसका फल पूरे देश को मिलता है, और देश की हीनता या गौरव का असर हर नागरिक पर पड़ता है। इसलिए देश का सम्मान बढ़ाना हर नागरिक का कर्तव्य है और देश की शक्ति से अपनी रक्षा पाना उसका अधिकार।
निबंध में लेखक के मन में भूकंप किसकी बात से उठा?
लेखक के मन में भूकंप लाला लाजपत राय के एक अनुभव से उठा। लाजपत राय ने कहा था कि वे अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस और कई देशों में घूमे, पर जहाँ भी गए, भारत की गुलामी की लज्जा का कलंक उनके माथे पर लगा रहा। इस वाक्य ने लेखक की 'मैं पूरा हूँ' वाली सोच को हिला दिया और उसे अपनी अधूरेपन का एहसास हुआ।
शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध से लेखक का क्या मतलब है?
शक्ति-बोध का मतलब है देश का आत्मविश्वास और सामूहिक मानसिक बल। सौंदर्य-बोध का मतलब है देश की सफ़ाई, संस्कृति और सुंदर रहन-सहन। लेखक कहता है कि नागरिक कोई ऐसा काम न करे जिससे देश में कमज़ोरी की भावना बढ़े या गंदगी और कुरुचि फैले।
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ से फलों के बदले क्या माँगा?
जापानी युवक ने फलों के दाम लेने से इनकार कर दिया। बहुत आग्रह करने पर उसने सिर्फ़ इतना कहा कि स्वामी जी अपने देश जाकर किसी से यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। इस छोटे-से अनुरोध से उसने अपने देश का गौरव बहुत बढ़ा दिया।
निबंध के अनुसार देश की ऊँचाई और हीनता की कसौटी क्या है?
लेखक के अनुसार देश की ऊँचाई और हीनता की कसौटी चुनाव है। जिस देश के नागरिक समझते हैं कि वोट किसे देना चाहिए और किसे नहीं, वह देश ऊँचा है। और जहाँ नागरिक गलत नारों या गलत असर में आकर वोट देते हैं, वह देश हीन है।
मैं और मेरा देश के लेखक कौन हैं?
इस निबंध के लेखक कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' (1906–1995) हैं। वे हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार और पत्रकार थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया और कई बार जेल भी गए। उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए उन्हें 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।