रीढ़ की हड्डी
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए। एक लड़की अपने ही घर में बैठी है। कुछ लोग उसे “देखने” आते हैं। वे उसके चेहरे को परखते हैं, उसके गाने को सुनते हैं, उसकी सिलाई-पेंटिंग गिनते हैं — ठीक वैसे ही जैसे कोई बाज़ार में सामान परखता है।
उस लड़की को कैसा लगता होगा? यही सवाल इस एकांकी के दिल में है।
यह एकांकी सन् 1939 में लिखी गई थी। उस ज़माने में लड़कियों को पढ़ने का बराबर मौका नहीं मिलता था। बहुत-से लोग सोचते थे कि “ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की” शादी के लिए ठीक नहीं। शादी में दिखावा होता था, और लड़की की राय कोई नहीं पूछता था।
इस एकांकी में एक पढ़ी-लिखी लड़की उमा इस पूरी सोच पर चोट करती है। वह कुछ ही शब्दों में दिखा देती है कि असली कमज़ोरी लड़की में नहीं, बल्कि उस समाज में और उन लोगों में है जो दिखावा करते हैं।
यह बात आज भी मायने रखती है। आत्म-सम्मान, बराबरी और सच बोलने की हिम्मत — ये कभी पुराने नहीं पड़ते।
मूल भाव
इस एकांकी का मूल भाव है — लड़की कोई बिकने वाली चीज़ नहीं; स्त्री की शिक्षा और आत्म-सम्मान का मज़ाक उड़ाने वाला समाज ही असल में रीढ़विहीन है। एक पढ़ी-लिखी लड़की उमा को “देखने” के बहाने लड़के वाले उसे परखने आते हैं। उमा के पिता रामस्वरूप दिखावा करते हैं और यह छिपाते हैं कि वह बी.ए. पास है, क्योंकि लड़के के पिता गोपालप्रसाद कम पढ़ी-लिखी बहू चाहते हैं। पूरी बातचीत में दोनों परिवार स्त्री-शिक्षा का खुलकर मज़ाक उड़ाते हैं। अंत में उमा खुद बोल उठती है। वह खुद की तुलना बिकती कुर्सी-मेज से करती है, और लड़के शंकर की कायरता खोलकर रख देती है — कि वह लड़कियों के होस्टल के पास से भागा था। वह तीखा व्यंग्य करती है कि घर जाकर पता लगाइए, आपके बेटे में रीढ़ की हड्डी (यानी आत्म-सम्मान और साहस) है भी या नहीं।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: यह एकांकी अभी कॉपीराइट में है, इसलिए इस पृष्ठ पर हमने इसका पूरा मूल पाठ दोबारा नहीं छापा है। पूरी एकांकी अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “गंगा” (कक्षा 9) में पढ़ें। यहाँ हमने उसका सरल सारांश, व्याख्या और पात्र-विश्लेषण अपने शब्दों में दिया है — इसे मूल एकांकी के साथ मिलाकर पढ़िए, सब साफ़ हो जाएगा।
लेखक से परिचय
कहानी में उतरने से पहले यह जान लेना अच्छा रहेगा कि इसे लिखा किसने।
इस एकांकी के लेखक हैं जगदीशचंद्र माथुर (1917–1978)। उनका जन्म शाहजहाँपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था और शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से।
वे भारतीय सिविल सर्विस (ICS) में चुने गए और बिहार के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक जैसे बड़े पदों पर रहे। इतने बड़े पदों पर रहते हुए भी वे जीवन भर लिखते रहे। हिंदी नाटक और रंगमंच को आगे बढ़ाने में उनके एकांकियों और नाटकों की बड़ी भूमिका रही।
उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं — कोणार्क, भोर का तारा, ओ मेरे सपने, शारदीया, पहला राजा। इनमें कोणार्क उनका सबसे चर्चित और मंचित नाटक है।
पाठ का सार
आइए अब पूरी एकांकी को धीरे-धीरे, क्रम से समझते हैं। पहले यह जान लें कि इसमें कौन-कौन है, वरना संवाद उलझ सकते हैं। नीचे का चित्र एकांकी के सभी पात्रों को एक साथ दिखाता है।
अब एकांकी शुरू करते हैं। चित्र 6.1 के पात्रों को ध्यान में रखकर पढ़िए।
तैयारी और दिखावा। बाबू रामस्वरूप के घर में हलचल है। लड़के वाले उनकी बेटी उमा को “देखने” आने वाले हैं। रामस्वरूप कमरे को सजाने में लगे हैं — तख्त बिछवाते हैं, हारमोनियम और सितार मँगवाते हैं, ताकि घर अच्छा दिखे। वे नौकर रतन पर बार-बार झुँझलाते हैं। उन्हें बस मेहमानों के सामने एक “सजी-सजाई” तस्वीर दिखानी है।
प्रेमा और रामस्वरूप की बातचीत। उमा की माँ प्रेमा परेशान है। वह कहती है कि उमा रूठकर पड़ी है, पाउडर तक नहीं लगाना चाहती। प्रेमा के मन में पुराने विचार हैं — वह कहती है कि “मेरी समझ में ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते ही नहीं।” उसे लगता है कि लड़की को बस थोड़ा-बहुत पढ़ा देना काफी था। यहीं से हमें उस ज़माने की स्त्री-शिक्षा की सोच का पता चलता है।
एक बड़ा झूठ। रामस्वरूप एक ज़रूरी बात बताते हैं। लड़के वाले — खासकर गोपालप्रसाद — ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहते। इसलिए रामस्वरूप ने झूठ बोल रखा है कि उमा सिर्फ़ मैट्रिक तक पढ़ी है, जबकि असल में उसने बी.ए. पास किया है। यह झूठ आगे चलकर पूरी कहानी को मोड़ देता है।
यहाँ एकांकी आगे बढ़ती है। पूरी घटना कैसे एक मोड़ से दूसरे मोड़ तक पहुँचती है, यह नीचे का कथानक-चक्र क्रम से दिखाता है।
जैसा चित्र 6.2 दिखाता है, अब असली घटनाएँ शुरू होती हैं।
लड़के वालों का आना। गोपालप्रसाद और उनका बेटा शंकर आते हैं। गोपालप्रसाद बहुत चालाक और अनुभवी आदमी हैं। शंकर मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है, पर वह डरपोक और झेंपू है — कमर झुकाए बैठता है। रामस्वरूप उनकी खूब खातिर करते हैं, चाय-नाश्ता पेश करते हैं।
दिखावे की बातें। दोनों बूढ़े अपने ज़माने की डींगें हाँकते हैं — कैसे पुराने ज़माने में पढ़ाई और सेहत बढ़िया थी। फिर गोपालप्रसाद सीधे “बिज़नेस” यानी असली बात पर आते हैं। वे साफ़ कहते हैं कि उन्हें ज्यादा पढ़ी-लिखी, “मेम साहब” जैसी बहू नहीं चाहिए, बस मैट्रिक तक पढ़ी हो। वे स्त्री-शिक्षा का मज़ाक उड़ाते हैं — “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं।” रामस्वरूप भी हाँ में हाँ मिलाते हैं।
उमा का आना। फिर उमा पान लेकर आती है। वह सादे कपड़ों में, गर्दन झुकाए हुए है। जैसे ही वह सिर उठाती है, उसकी आँखों पर सोने की रिम वाला चश्मा दिख जाता है। बाप-बेटे चौंककर एक साथ कह उठते हैं — “चश्मा!!!” चश्मा उन्हें पढ़ाई की निशानी लगता है, इसलिए वे घबरा जाते हैं। रामस्वरूप झूठ बोलते हैं कि आँखें दुखने के कारण कुछ दिन के लिए चश्मा लगा है।
परखना शुरू। गोपालप्रसाद उमा को परखने लगते हैं — गाना सुनते हैं, पेंटिंग, सिलाई, इनाम के बारे में पूछते हैं। उमा एक मीरा का भजन गाती है, पर बीच में शंकर से नज़र मिलते ही रुक जाती है। बार-बार सवालों पर वह चुप रहती है। उसका यह चुप रहना एक जलते हुए गुस्से की चुप्पी है।
यहाँ एकांकी अपने सबसे ज़रूरी मोड़ पर पहुँचती है — उमा का फट पड़ना।
उमा का फट पड़ना। आखिर उमा से सहा नहीं जाता। वह हल्की पर मज़बूत आवाज़ में कहती है — जब कुर्सी-मेज बिकती है, तब दुकानदार उससे कुछ नहीं पूछता, बस खरीदार को दिखा देता है। यानी वह खुद को बिकती हुई चीज़ की तरह महसूस कर रही है। वह पूछती है — क्या लड़कियों के दिल नहीं होते? क्या वे बेबस भेड़-बकरियाँ हैं, जिन्हें कसाई परख-परखकर खरीदते हैं?
शंकर की पोल। फिर वह शंकर की पोल खोल देती है — कि पिछली फरवरी में यही शंकर लड़कियों के होस्टल के इर्द-गिर्द घूम रहा था और वहाँ से भगाया गया था। वह बताती है कि वह खुद कॉलेज में पढ़ी है, बी.ए. पास है, और उसने कोई पाप या चोरी नहीं की। उसे अपने मान का पूरा खयाल है।
रिश्ता टूटना। सच खुलते ही गोपालप्रसाद आग-बबूला हो जाते हैं। वे रामस्वरूप पर “दगा” (धोखा) देने का आरोप लगाते हैं — कि लड़की बी.ए. पास है और उन्हें मैट्रिक बताया गया। वे छड़ी उठाकर बेटे को लेकर चल देते हैं।
आखिरी चोट। जाते-जाते उमा उन पर आखिरी और सबसे तीखा व्यंग्य करती है — “घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं — यानी बैकबोन, बैकबोन!” यह वाक्य पूरी एकांकी का सार है।
मक्खन वाला अंत। लड़के वाले चले जाते हैं। रामस्वरूप कुर्सी पर धम से बैठ जाते हैं। उमा की चुप्पी सिसकियों में बदल जाती है। तभी नौकर रतन दौड़ता हुआ आता है — “बाबूजी, मक्खन!” सब उसकी तरफ देखते हैं और परदा गिर जाता है। सुबह से जिस मक्खन के पीछे इतनी भागदौड़ हुई, वह अब बिल्कुल बेकार हो चुका है।
पात्र-परिचय
एकांकी के मुख्य पात्र पाँच हैं। आइए हर एक को थोड़ा क़रीब से देखें — कौन क्या चाहता है और क्यों वैसा करता है।
- उमा — एकांकी की नायिका। पढ़ी-लिखी (बी.ए. पास), आत्म-सम्मानी और निडर। वह दिखावे और “बिकने” वाली रस्म से चिढ़ती है। पहले वह पिता का मान रखने के लिए चुप रहती है, पर जब अपमान हद से बढ़ जाता है, तो खुलकर बोल उठती है। वह नई, सशक्त नारी का प्रतीक है।
- रामस्वरूप (बाबू) — उमा के पिता। ऊपर से वे आधुनिक दिखते हैं — बेटी को पढ़ाया भी है। पर अंदर से वे भी समाज की रूढ़ियों के दबाव में हैं। इसी कारण वे उमा के बी.ए. पास होने का झूठ बोलते हैं और दिखावा करते हैं। उनके भीतर एक अंतर्द्वंद्व है।
- प्रेमा — उमा की माँ। पुराने विचारों वाली। उसे लड़कियों की ज्यादा पढ़ाई “जंजाल” लगती है। वह उस पूरी पीढ़ी की सोच दिखाती है जो स्त्री-शिक्षा को ज़रूरी नहीं मानती थी।
- गोपालप्रसाद — शंकर के पिता। चालाक, अनुभवी और बहुत रूढ़िवादी। वे खुद पढ़े-लिखे वकील हैं, पर बहू कम पढ़ी-लिखी चाहते हैं। वे लड़की को सिर्फ़ एक “सामान” की तरह परखते हैं। वे दोहरे चरित्र वाले हैं।
- शंकर — गोपालप्रसाद का बेटा, मेडिकल का छात्र। ऊपर से पढ़ा-लिखा, पर अंदर से डरपोक और कायर। वह कमर झुकाए बैठता है और अपनी ही गलती पर मुँह छिपाता है। उसी की कायरता पर “रीढ़ की हड्डी” वाला व्यंग्य कसा जाता है।
परिवेश — समय और जगह
एकांकी को सही ढंग से समझने के लिए उसका परिवेश (समय और जगह) जानना ज़रूरी है।
यह एकांकी सन् 1939 के आसपास के भारत की है। पूरी घटना एक ही जगह घटती है — रामस्वरूप के घर का एक मामूली तरह से सजा हुआ कमरा, एक ही बैठक के दौरान।
उस ज़माने में लड़कियों को बराबर शिक्षा का मौका नहीं मिलता था। बहुत-से लोग मानते थे कि ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की “घर के लिए ठीक नहीं।” शादी में लड़की को “देखने” की रस्म होती थी, जहाँ लड़की की राय कोई नहीं पूछता था। यही परिवेश पूरी कहानी को आकार देता है। उमा का गुस्सा इसी सोच के खिलाफ़ है। अगर यह आज की कहानी होती, तो शायद उमा को इतना सहना ही न पड़ता।
काव्य/भाषा सौंदर्य — एकांकी के शिल्प की बातें
अब देखते हैं कि लेखक ने अपनी बात कहने के लिए कौन-कौन से शिल्प (तरीके) इस्तेमाल किए, और क्यों।
व्यंग्य (Satire)। व्यंग्य यानी हँसी-हँसी में किसी की कमज़ोरी या बुराई पर चोट करना। जैसे रामस्वरूप कहते हैं — “मर्द के दाढ़ी होती है, औरत के नहीं।” यह बात हँसाती है, पर साथ ही उस सोच की पोल खोलती है जो स्त्री-पुरुष में फ़र्क़ करती है। लेखक ने व्यंग्य इसलिए चुना, क्योंकि सीधे उपदेश देने से ज्यादा असर हँसी-हँसी में की गई चोट का होता है।
प्रतीक (Symbol)। प्रतीक यानी कोई चीज़ जो अपने से बड़ी बात की ओर इशारा करे। यहाँ “रीढ़ की हड्डी” एक प्रतीक है। यह शरीर के अंग की नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और साहस की बात है। जिसमें हिम्मत और सच का सामना करने का दम हो, उसकी “रीढ़ मज़बूत” कही जाती है।
सजीव संवाद। एकांकी की भाषा बिल्कुल बोलचाल की, स्वाभाविक हिंदी है, जिसमें उर्दू के शब्द भी घुले हैं (तशरीफ़, माफ़िक, मुखातिब)। संवाद इतने सजीव हैं कि पात्र हमारे सामने जीते-जागते लगते हैं। लेखक ने ऐसी भाषा इसलिए चुनी, ताकि मंच पर अभिनय असली लगे।
रंग-निर्देश का कमाल। कोष्ठक () में लिखे रंग-निर्देश सिर्फ़ अभिनय के लिए नहीं हैं — वे चरित्र भी खोलते हैं। जैसे “झुकी कमर इनकी खासियत है” — यह एक पंक्ति शंकर की पूरी कायरता बता देती है।
आइए गहराई से समझें — चुनावों और संदेश के पीछे का “क्यों”
अब एकांकी के दिल तक पहुँचते हैं। हम सिर्फ़ क्या हुआ नहीं, बल्कि क्यों हुआ समझेंगे।
“रीढ़ की हड्डी” का दोहरा अर्थ
यह शीर्षक एकांकी में दो अलग-अलग जगह आता है, और दोनों जगह इसका अर्थ अलग है। यही इसका कमाल है। नीचे का चित्र इस दोहरे अर्थ को साफ़ करता है।
जैसा चित्र 6.3 दिखाता है, गोपालप्रसाद शरीर की रीढ़ की बात करते हैं, पर उमा चरित्र की रीढ़ की। शंकर की कमर तो झुकी ही है, पर उमा कहती है कि असली झुकाव उसके चरित्र में है। उसमें सच का सामना करने का साहस ही नहीं।
रामस्वरूप का अंतर्द्वंद्व — दिखावा बनाम असलियत
रामस्वरूप एक दिलचस्प पात्र हैं। वे समाज में आधुनिक दिखना चाहते हैं, पर उनके काम पुराने विचारों वाले हैं। यह अंतर्द्वंद्व (अंदरूनी टकराव) ही उन्हें जीवंत बनाता है। नीचे का द्वंद्व-चित्र इसे साफ़ करता है।
जैसा चित्र 6.4 दिखाता है, रामस्वरूप दो नावों पर सवार हैं। उन्होंने बेटी को पढ़ाया — यह अच्छी बात है। पर जब समाज के दबाव की बारी आई, तो वे उसी पढ़ाई को छिपाने लगे। यही उनकी कमज़ोरी है। वे बुरे आदमी नहीं हैं, बस समाज के डर से झुके हुए हैं।
एक छोटी जाँच करते हैं, ताकि यह बात पक्की हो जाए।
रामस्वरूप ने उमा के बी.ए. पास होने का झूठ क्यों बोला?
क्योंकि लड़के के पिता गोपालप्रसाद ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहते थे — उन्हें बस मैट्रिक तक पढ़ी लड़की चाहिए थी। रामस्वरूप को डर था कि अगर उमा के बी.ए. पास होने की बात खुल गई, तो रिश्ता टूट जाएगा। इसलिए उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई को कमज़ोरी समझकर छिपाया। यह उनके भीतर के दिखावे और समाज के दबाव को दिखाता है।
उमा की चुप्पी और फिर फट पड़ना — पूरे एकांकी का दिल
यह एकांकी का सबसे गहरा सवाल है। उमा पहले इतनी देर तक चुप क्यों रहती है, और फिर अचानक क्यों फट पड़ती है?
इसका जवाब है — उमा का आत्म-सम्मान। शुरू में वह अपने पिता का मान रखने के लिए चुप रहती है। वह नहीं चाहती कि उसके बोलने से पिता शर्मिंदा हों। पर जब लड़के वाले उसे चीज़ की तरह परखते जाते हैं — गाना, पेंटिंग, इनाम, सब गिनते हैं — तब उसका सब्र टूट जाता है।
उसका वह वाक्य — “जब कुर्सी-मेज बिकती है, तब दुकानदार उससे कुछ नहीं पूछता” — पूरी रस्म की असलियत खोल देता है। उमा कह रही है कि यह “देखने” की रस्म असल में एक इंसान को सामान की तरह बेचना है।
और शंकर की पोल खोलकर वह एक ज़रूरी बात कहती है — जो लड़का खुद कायर है, जो लड़कियों के होस्टल के पास से भागा, वह किस मुँह से एक पढ़ी-लिखी लड़की को परख रहा है? उमा यह नहीं कह रही कि वह बेहतर है। वह बस यह दिखा रही है कि परखने का यह पूरा तरीका ही गलत है।
यही एकांकी की सबसे बड़ी सीख है — किसी इंसान की कीमत उसके चेहरे, हुनर या डिग्री से नहीं, बल्कि उसके आत्म-सम्मान से होती है। और जो समाज एक लड़की को सामान समझता है, वही असल में रीढ़विहीन है।
आम भूलें
कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें विद्यार्थी अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें।
'रीढ़ की हड्डी' शीर्षक का मतलब शंकर की शारीरिक कमज़ोरी या झुकी कमर है।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि एकांकी में सच में शंकर की 'झुकी कमर' का ज़िक्र है और गोपालप्रसाद उसे 'कमर सीधी करके बैठो' भी कहते हैं।
शीर्षक का असली मतलब आत्म-सम्मान और नैतिक साहस है। उमा कहना चाहती है कि शंकर में सच का सामना करने की हिम्मत यानी नैतिक रीढ़ नहीं है। यह शरीर की नहीं, चरित्र की बात है।
रामस्वरूप एक खुले विचारों वाले, आधुनिक पिता हैं क्योंकि उन्होंने बेटी को बी.ए. तक पढ़ाया।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि उस ज़माने में बेटी को बी.ए. तक पढ़ाना सच में आगे की सोच लगती है, तो लगता है पिता पूरी तरह आधुनिक होंगे।
रामस्वरूप का चरित्र दोहरा है। पढ़ाया ज़रूर, पर समाज के दबाव में आकर उन्होंने उसी पढ़ाई का झूठ बोला और दिखावे की रस्म में पूरा साथ दिया। वे आधुनिकता का सिर्फ़ दिखावा करते हैं।
यह एकांकी सिर्फ़ एक टूटे हुए रिश्ते (शादी न होने) की कहानी है।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कहानी की सारी घटनाएँ शादी तय करने की बैठक के इर्द-गिर्द घूमती हैं और अंत में रिश्ता टूट जाता है।
रिश्ता टूटना तो बस ऊपरी घटना है। असली बात है — स्त्री-शिक्षा का मज़ाक, लड़की को सामान समझना, और एक लड़की का आत्म-सम्मान के लिए खड़ा होना। यह समाज की गलत सोच पर व्यंग्य है।
उमा शुरू में चुप रहती है क्योंकि वह डरपोक और कमज़ोर लड़की है।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि वह गर्दन झुकाए आती है, सवालों पर चुप रहती है, और तुरंत जवाब नहीं देती — तो लगता है शायद वह डरी हुई है।
उमा की चुप्पी डर नहीं, बल्कि सब्र और पिता का मान रखने की कोशिश है। उसके अंदर गुस्सा भरा है। जैसे ही अपमान हद से बढ़ता है, वह निडर होकर फट पड़ती है — यह उसकी ताकत है, कमज़ोरी नहीं।
झटपट जाँच
अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।
लड़के वाले (गोपालप्रसाद) कैसी बहू चाहते थे?
गोपालप्रसाद साफ़ कहते हैं कि उन्हें ‘मेम साहब’ जैसी ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहिए, बस हद से हद मैट्रिक-पास। वे स्त्री-शिक्षा को ज़रूरी नहीं मानते।
उमा को देखकर बाप-बेटे क्यों चौंके?
जैसे ही उमा सिर उठाती है, उसका सोने की रिम वाला चश्मा दिख जाता है। दोनों एक साथ ‘चश्मा!!!’ कह उठते हैं, क्योंकि चश्मा उन्हें ज्यादा पढ़ाई की निशानी लगता है, और वे यही नहीं चाहते थे।
'रीढ़ की हड्डी' शीर्षक किसका प्रतीक है?
यहाँ ‘रीढ़ की हड्डी’ शरीर के अंग की नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और सच का सामना करने के साहस की बात है। उमा शंकर पर व्यंग्य करती है कि उसमें यही नैतिक रीढ़ नहीं।
अभ्यास (परीक्षा-शैली)
अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।
लघु उत्तर
एकांकी के पाँच मुख्य पात्र कौन हैं? हर एक के बारे में एक-एक वाक्य लिखिए।
एकांकी के पाँच मुख्य पात्र हैं:
- उमा — पढ़ी-लिखी (बी.ए. पास), आत्म-सम्मानी और निडर लड़की, जो अंत में दिखावे और अपमान के खिलाफ़ खड़ी हो जाती है।
- रामस्वरूप — उमा के पिता, जो आधुनिक दिखते हैं पर समाज के दबाव में बेटी की पढ़ाई का झूठ बोलते हैं।
- प्रेमा — उमा की माँ, पुराने विचारों वाली, जिसे लड़कियों की पढ़ाई ‘जंजाल’ लगती है।
- गोपालप्रसाद — शंकर के पिता, चालाक और रूढ़िवादी, जो कम पढ़ी-लिखी बहू चाहते हैं।
- शंकर — गोपालप्रसाद का बेटा, मेडिकल का छात्र पर डरपोक और कायर।
शब्दार्थ लिखिए: (क) तालीम (ख) दकियानूसी (ग) फितरती (घ) तशरीफ़।
- तालीम — शिक्षा, पढ़ाई।
- दकियानूसी — पुराने विचारों वाला, पुरानेपन से चिपका हुआ।
- फितरती — चालबाज़, स्वभाव से ही चालाक।
- तशरीफ़ — आदर, सम्मान (जैसे “तशरीफ़ लाइए” = आदर के साथ आइए)।
एकांकी के अंत में रतन 'बाबूजी, मक्खन!' कहता है और परदा गिर जाता है। लेखक ने ऐसा अंत क्यों रखा होगा?
लेखक ने यह अंत हास्य और व्यंग्य पैदा करने के लिए रखा है।
- सुबह से पूरे घर में उस मक्खन के पीछे भागदौड़ हो रही थी, ताकि मेहमानों की अच्छी खातिर हो।
- पर अब रिश्ता ही टूट चुका है, मेहमान जा चुके हैं। उस घड़ी रतन का मक्खन लेकर आना बिल्कुल बेमतलब हो जाता है।
- यह दिखाता है कि दिखावे की पूरी कोशिश कितनी व्यर्थ थी। एक छोटे-से संवाद से लेखक तनाव के बीच एक चुटीला कटाक्ष कर देता है।
दीर्घ उत्तर / ससंदर्भ व्याख्या
रामस्वरूप के चरित्र का अंतर्द्वंद्व उदाहरण देकर समझाइए — वे आधुनिक दिखावा करते हैं पर विचार रूढ़िवादी हैं।
रामस्वरूप का चरित्र दोहरा है। वे ऊपर से आधुनिक दिखते हैं, पर अंदर से समाज की रूढ़ियों के दबाव में हैं।
आधुनिक दिखावे के उदाहरण:
- उन्होंने अपनी बेटी उमा को बी.ए. तक पढ़ाया।
- वे खुद को खुले विचारों वाला दिखाना चाहते हैं।
रूढ़िवादी असलियत के उदाहरण:
- उन्होंने उमा के बी.ए. पास होने का झूठ बोला और उसे सिर्फ़ मैट्रिक बताया, क्योंकि लड़के वाले ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहते थे।
- वे लड़की को “देखने” की दिखावे वाली रस्म में पूरा साथ देते हैं — घर सजाते हैं, गाना-बजाना दिखाते हैं।
- गोपालप्रसाद की हर रूढ़िवादी बात में वे हाँ-में-हाँ मिलाते हैं, जैसे “मर्द के दाढ़ी होती है, औरत के नहीं।”
इस तरह उनके भीतर दो सोचें लड़ रही हैं — एक आधुनिक, एक पुरानी। यही उनका अंतर्द्वंद्व है। वे बुरे आदमी नहीं, पर समाज के डर से अपने ही विश्वास को छिपाते हैं।
'जब कुर्सी-मेज बिकती है, तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है।' — इस कथन की ससंदर्भ व्याख्या कीजिए।
संदर्भ: यह कथन एकांकी ‘रीढ़ की हड्डी’ (लेखक — जगदीशचंद्र माथुर) से है। यह उमा कहती है, जब लड़के वाले उसे “देखने” आते हैं और उसके गाने, पेंटिंग, इनाम आदि को परखते जाते हैं।
व्याख्या: उमा यहाँ खुद की तुलना बिकती हुई कुर्सी-मेज से कर रही है। उसका कहना है कि जैसे दुकान में सामान बिकते समय सामान से कोई राय नहीं पूछता, बस खरीदार को दिखा देता है — वैसे ही इस “देखने” की रस्म में लड़की की राय कोई नहीं पूछता, उसे बस खरीदार (लड़के वालों) के सामने सजाकर पेश कर दिया जाता है।
महत्व: यह वाक्य पूरी रस्म की असलियत खोल देता है। उमा कहना चाहती है कि यह तरीका एक इंसान को सामान की तरह बेचने जैसा है। इसमें लड़की के दिल, भावना और आत्म-सम्मान की कोई कद्र नहीं। यही एकांकी का केंद्रीय व्यंग्य है।
लेखक ने एकांकी का शीर्षक 'रीढ़ की हड्डी' क्यों चुना होगा? यदि आपको कोई दूसरा शीर्षक रखना हो तो वह क्या होगा और क्यों?
‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक क्यों:
- यह शीर्षक एक प्रतीक है। यहाँ रीढ़ की हड्डी शरीर के अंग की नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और नैतिक साहस की बात है।
- एकांकी के अंत में उमा का तीखा वाक्य — “पता लगाइए बेटे में रीढ़ की हड्डी है या नहीं” — पूरी कहानी का सार बन जाता है। शंकर में सच का सामना करने की हिम्मत नहीं, यानी नैतिक रीढ़ नहीं।
- शीर्षक का दोहरा अर्थ इसे और सुंदर बनाता है — गोपालप्रसाद के लिए यह शरीर की मुद्रा है, उमा के लिए यह चरित्र की दृढ़ता।
दूसरा संभव शीर्षक: “बिकती कुर्सी-मेज” या “उमा का आत्म-सम्मान।”
क्यों: “बिकती कुर्सी-मेज” शीर्षक एकांकी के उस केंद्रीय व्यंग्य को पकड़ता है, जहाँ लड़की को सामान की तरह परखा जाता है। और “उमा का आत्म-सम्मान” नायिका की उस हिम्मत को सामने लाता है जो पूरे समाज की गलत सोच को चुनौती देती है। दोनों शीर्षक एकांकी की मुख्य बात — स्त्री का सम्मान — को दर्शाते हैं।
सारांश
- “रीढ़ की हड्डी” एक प्रसिद्ध एकांकी है। इसके लेखक जगदीशचंद्र माथुर (1917–1978) हैं। यह सन् 1939 में लिखी गई।
- यह एकांकी विवाह में लड़की को “देखने” की रस्म, स्त्री-शिक्षा पर रूढ़िगत सोच और दहेज जैसी कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य करती है।
- लड़के वाले (गोपालप्रसाद और बेटा शंकर) उमा को “देखने” आते हैं। वे कम पढ़ी-लिखी बहू चाहते हैं।
- उमा के पिता रामस्वरूप दिखावा करते हैं और छिपाते हैं कि उमा बी.ए. पास है — यही झूठ कहानी को मोड़ देता है।
- उमा का चश्मा देखकर बाप-बेटे चौंक जाते हैं, क्योंकि वह उन्हें पढ़ाई की निशानी लगता है।
- परखे जाने से तंग आकर उमा फट पड़ती है। वह खुद को बिकती कुर्सी-मेज बताती है और शंकर की कायरता (होस्टल के पास से भागना) खोल देती है।
- सच खुलते ही गोपालप्रसाद नाराज़ होकर रिश्ता तोड़ देते हैं। उमा आखिरी व्यंग्य करती है — पता लगाइए, बेटे में रीढ़ की हड्डी (आत्म-सम्मान, साहस) है या नहीं।
- शीर्षक “रीढ़ की हड्डी” का दोहरा अर्थ है — शरीर की मुद्रा (गोपालप्रसाद) और नैतिक साहस (उमा)। एकांकी की सबसे बड़ी सीख — लड़की कोई सामान नहीं; असली रीढ़ आत्म-सम्मान में है।
आगे क्या?
स्त्री-सम्मान और दिखावे के खिलाफ़ खड़ी होने की यह कहानी समझने के बाद, अगला पाठ देश और अपनेपन की भावना की ओर ले जाता है। अगला पाठ है पाठ 7 — “मैं और मेरा देश”। जैसे इस एकांकी में उमा अपने आत्म-सम्मान के लिए खड़ी होती है, वैसे ही अगला पाठ हमें अपने देश और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के बारे में सोचने पर मजबूर करता है।
Frequently Asked Questions
रीढ़ की हड्डी एकांकी का सारांश क्या है?
एक लड़के वाले उमा नाम की लड़की को 'देखने' आते हैं। उमा के पिता रामस्वरूप दिखावा करते हैं और छिपाते हैं कि उमा बी.ए. पास है। लड़के के पिता गोपालप्रसाद ज्यादा पढ़ी-लिखी बहू नहीं चाहते। बातचीत में दोनों परिवार स्त्री-शिक्षा का मज़ाक उड़ाते हैं। अंत में उमा खुद बोल उठती है, खुद को कुर्सी-मेज की तरह बिकता बताती है और लड़के शंकर की कायरता खोल देती है। वह कहती है कि पता लगाइए आपके बेटे में रीढ़ की हड्डी है भी या नहीं।
रीढ़ की हड्डी एकांकी के लेखक कौन हैं?
इस एकांकी के लेखक जगदीशचंद्र माथुर (1917–1978) हैं। उनका जन्म शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ और शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। हिंदी नाटक और रंगमंच के विकास में उनके एकांकी और नाटकों की बड़ी भूमिका रही है। 'कोणार्क' उनका सबसे चर्चित नाटक है।
रीढ़ की हड्डी शीर्षक का क्या अर्थ है?
यहाँ 'रीढ़ की हड्डी' शरीर के अंग का नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है। जिस व्यक्ति में हिम्मत और सच का सामना करने का साहस हो, उसकी 'रीढ़ की हड्डी मज़बूत' कही जाती है। उमा शंकर पर व्यंग्य करती है कि वह कमर झुकाकर बैठता है और सच का सामना नहीं कर पाता, यानी उसमें नैतिक रीढ़ नहीं है।
उमा का चरित्र कैसा है?
उमा पढ़ी-लिखी, आत्म-सम्मानी और निडर लड़की है। उसने बी.ए. पास किया है। वह दिखावे और बिकने वाली रस्म से चिढ़ती है। शुरू में चुप रहकर पिता का मान रखती है, पर जब अपमान हद से बढ़ जाता है तो खुलकर बोल उठती है। वह नई, सशक्त भारतीय नारी का प्रतीक है।
एकांकी के अंत में रतन का मक्खन वाला संवाद क्यों रखा गया है?
रिश्ता टूट जाने के तनाव-भरे क्षण में अचानक रतन का 'बाबूजी, मक्खन!' कहना एक हास्य-व्यंग्य पैदा करता है। यह दिखाता है कि जिस मक्खन के पीछे सुबह से इतनी भागदौड़ हुई, वह अब बिल्कुल बेमतलब हो गया। यह दिखावे की पूरी कोशिश के व्यर्थ हो जाने पर एक चुटीला कटाक्ष है।