पद — रैदास
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए — आपका कोई दोस्त ऐसा है जिससे आप दिल से जुड़े हैं। अब कोई आकर कहे, “उसे छोड़ दो, किसी और से दोस्ती कर लो।” क्या आप मान जाएँगे? शायद नहीं। आप कहेंगे — “जिससे मेरा इतना गहरा नाता है, उसे मैं कैसे छोड़ दूँ?”
यह पाठ ठीक इसी भाव का है। फ़र्क बस इतना है कि यहाँ दोस्त नहीं, प्रभु हैं। संत रैदास एक भक्त कवि हैं। वे कहते हैं कि उनका प्रभु से नाता इतना गहरा और अटूट हो गया है कि अब वह टूट ही नहीं सकता। पर रैदास यह बात सीधे-सीधे नहीं कहते। वे रोज़मर्रा की चीज़ों से उदाहरण देते हैं — जैसे चंदन और पानी, दीपक और बाती, मोती और धागा। हर जोड़ी में दोनों चीज़ें ऐसे जुड़ी हैं कि एक के बिना दूसरी अधूरी है।
यह पाठ सिर्फ़ कुछ पुराने पद नहीं हैं। यह दिखाता है कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, मन के अटूट प्रेम और भरोसे में होती है। रैदास तीर्थ-व्रत जैसे बाहरी नियम छोड़ सकते हैं, पर मन का यह नाता कभी नहीं। यही सोच इन पदों को आज भी जीवित और मन को छू लेने वाला बनाती है।
कवि-परिचय
रैदास (जिन्हें रविदास भी कहते हैं) हिंदी के प्रसिद्ध संत कवियों में से एक हैं। उनका जन्म काशी (आज के वाराणसी) में हुआ। उनका जीवन-काल पंद्रहवीं शताब्दी (लगभग सन् 1388–1518) माना जाता है।
रैदास निर्गुण भक्ति धारा के कवि थे। यहाँ एक नया शब्द आया, उसे पहले साफ़ कर लेते हैं।
रैदास ने बाहरी आडंबरों (दिखावे की पूजा, ऊँच-नीच के भेद, खोखले कर्मकांड) का खंडन किया। उन्होंने मन की शुद्धता और भीतरी भक्ति को ही सच्चा धर्म माना। उनकी रचनाएँ सरल ब्रजभाषा में हैं, जिसमें अवधी, राजस्थानी और खड़ी बोली के शब्द भी मिले हैं। उनके पद आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं और आज भी समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हैं। उनकी रचनाएँ ‘रैदास बानी’ में संकलित हैं। यहाँ उनके दो पद लिए गए हैं।
मूल भाव
दोनों पदों को एक वाक्य में समेटें तो उनका दिल यही है।
मूल भाव: भक्त और उसके प्रभु का नाता इतना अटूट है कि वह कभी टूट नहीं सकता। रैदास इसी अनन्य भक्ति और पूरे समर्पण को रोज़मर्रा की जानी-पहचानी जोड़ियों से समझाते हैं, और कहते हैं कि बाहरी कर्मकांड से बड़ी मन की सच्ची भक्ति है।
पूरे पाठ का भाव एक नज़र में समझने के लिए, नीचे चित्र 8.1 देखिए।
पाठ का सार
यहाँ रैदास के दो पद हैं। दोनों का भाव मिलता-जुलता है, पर कोण थोड़ा अलग है।
पहला पद — “अब कैसे छूटै राम रट लागी।” इसमें रैदास कहते हैं कि अब उन्हें राम-नाम की ऐसी लगन (रट) लग गई है कि वह छूट ही नहीं सकती। प्रभु और भक्त के नाते को समझाने के लिए वे चार सुंदर जोड़ियाँ देते हैं — प्रभु चंदन हैं, भक्त पानी; प्रभु बादल हैं, भक्त मोर; प्रभु दीपक हैं, भक्त बाती; प्रभु मोती हैं, भक्त धागा। हर जोड़ी में दोनों ऐसे जुड़े हैं कि अलग किए ही नहीं जा सकते। अंत में रैदास कहते हैं — प्रभु स्वामी हैं और रैदास उनके दास, और ऐसी ही सच्ची भक्ति वे करते हैं।
दूसरा पद — “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ।” इसमें रैदास की अडिग निष्ठा खुलकर आती है। वे कहते हैं — हे राम, अगर तुम मुझसे नाता तोड़ भी दो, तो भी मैं तुमसे नहीं तोड़ूँगा; क्योंकि तुम्हें छोड़कर मैं किससे नाता जोड़ूँ? उन्हें तीर्थ-व्रत की कोई चिंता नहीं — उनका एकमात्र सहारा प्रभु के चरण-कमल हैं। वे कहते हैं कि वे जहाँ भी जाएँ, वहीं प्रभु की पूजा है, उन-जैसा कोई दूसरा देव नहीं। वे अपना मन प्रभु से जोड़ते हैं और बाक़ी सबसे तोड़ लेते हैं। हर पहर उन्हें बस प्रभु की ही आस रहती है।
मूल पाठ और व्याख्या
अब दोनों पदों का मूल पाठ क्रम से पढ़ते हैं, और हर पद के तुरंत बाद उसका भावार्थ सरल हिंदी में खोलते हैं। पहले मूल पंक्तियाँ, फिर उनका अर्थ — इस तरह आपको पुराने शब्द भी मिलेंगे और भाव भी।
पद 1 — “अब कैसे छूटै राम रट लागी”
अब कैसे छूटै राम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा।
रैदास कहते हैं — अब राम-नाम की रट (बार-बार जपने की लगन) मुझे ऐसी लग गई है कि यह कैसे छूटेगी? यानी अब यह छूट ही नहीं सकती। इसके बाद वे प्रभु से अपने नाते को चार जोड़ियों से समझाते हैं।
पहली जोड़ी — “तुम चंदन, हम पानी।” जब चंदन को पानी के साथ घिसा जाता है, तो उसकी सुगंध (बास) पानी के अंग-अंग (कण-कण) में रच-बस जाती है। यानी प्रभु की महक भक्त के रोम-रोम में समा गई है। दूसरी जोड़ी — “तुम बादल (घन), हम मोर।” जैसे चकोर पक्षी टकटकी लगाकर चाँद को देखता रहता है (चितवत चंद चकोरा), वैसे ही मोर बादल देखकर मगन हो जाता है — भक्त भी प्रभु को उसी प्रेम से निहारता है। तीसरी जोड़ी — “तुम दीपक, हम बाती।” जिसकी जोति (लौ) दिन-रात (दिन राती) जलती रहती है — दीपक और बाती मिलकर ही उजाला देते हैं। चौथी जोड़ी — “तुम मोती, हम धागा।” जैसे सोने में सुहागा मिल जाता है (सुहागा सोने की चमक बढ़ाता है), वैसे ही भक्त-प्रभु का मेल एक-दूसरे को निखारता है। अंत में रैदास कहते हैं — प्रभु जी, तुम स्वामी (मालिक) हो और मैं तुम्हारा दास (सेवक); ऐसी ही सच्ची, समर्पित भक्ति रैदास करता है।
इन चारों जोड़ियों को एक साथ देखें, तो भाव और साफ़ हो जाता है। चित्र 8.2 इसी को सामने रखता है।
पद 2 — “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ”
जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौं तोरि कवन सौं जोरौं।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।
जहँ जहँ जाउँ तुम्हारी पूजा, तुम सा देव और नहीं दूजा।
मैं अपनो मन हरि सौं जोरौं, हरि सौं जोरि सबन सौं तोरौं।
सब ही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।
रैदास कहते हैं — हे राम, अगर तुम मुझसे नाता तोड़ो (तोरौ) भी, तो भी मैं तुमसे नहीं तोड़ूँगा। क्योंकि तुमसे तोड़कर मैं और किससे नाता जोड़ूँ (जोरौं)? तुम्हारे जैसा कोई दूसरा है ही नहीं। आगे वे कहते हैं — मुझे तीर्थ-यात्रा और व्रत-उपवास की कोई चिंता (अंदेसा) नहीं है। मेरा एकमात्र भरोसा तो तुम्हारे चरन कमल (कमल जैसे कोमल चरण) हैं। मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहीं मुझे तुम्हारी ही पूजा दिखती है — तुम जैसा देव और कोई दूसरा नहीं। फिर वे अपनी भक्ति का सार कहते हैं — मैं अपना मन हरि (प्रभु) से जोड़ता हूँ, और हरि से जोड़कर बाक़ी सबसे तोड़ लेता हूँ। यानी प्रभु से जुड़ने के लिए वे सांसारिक मोह छोड़ देते हैं। अंत में — हर पहर (हर समय) मुझे बस तुम्हारी ही आस लगी रहती है; यह बात रैदास मन, कर्म और वचन (सोच, काम और बोली — तीनों) से कहता है। यानी उसकी भक्ति दिखावा नहीं, पूरे मन की है।
इस पद का सबसे ज़रूरी भाव यही है — किसे छोड़ें और किसे कभी न छोड़ें। चित्र 8.3 इसी टकराव को सामने रखता है।
नोट: ऊपर दिया गया मूल पाठ रैदास के इन दोनों प्रसिद्ध पदों का सर्वमान्य रूप है (लय के अनुसार वर्तनी में थोड़ा अंतर मिल सकता है)। परीक्षा में अपनी पाठ्यपुस्तक ‘गंगा’ (कक्षा 9) में छपे रूप को ही प्रमाण मानें।
भाव / विषय (मुख्य भाव)
अब देखते हैं कि इन पदों में कौन-कौन से भाव बार-बार उभरते हैं, और हर भाव क्यों मायने रखता है।
1. अनन्य भक्ति और अटूट नाता। “अनन्य” का अर्थ है — जिसका कोई दूसरा न हो। रैदास के लिए प्रभु ही सब कुछ हैं, उनके अलावा कोई दूसरा सहारा नहीं। यह भाव इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यही पूरे पाठ की रीढ़ है — चंदन-पानी से लेकर “तुमसे तोड़कर किससे जोड़ूँ” तक, हर पंक्ति इसी एक नाते को मज़बूत करती है।
2. बाहरी आडंबर पर मन की भक्ति की जीत। रैदास तीर्थ और व्रत जैसे दिखावे के नियमों को बड़ी बात नहीं मानते। उनके लिए असली भक्ति मन के भरोसे में है। यह भाव आज भी मायने रखता है — यह सिखाता है कि सच्चाई दिखावे में नहीं, भीतर के सच्चे भाव में होती है।
3. सर्वव्यापक (हर जगह बसने वाला) ईश्वर। “जहँ जहँ जाउँ तुम्हारी पूजा” — रैदास कहते हैं कि प्रभु हर जगह हैं, किसी एक मंदिर या तीर्थ में बँधे नहीं। यह निर्गुण भक्ति का मूल विचार है, और यह सबको बराबर मानने का रास्ता खोलता है — क्योंकि जब ईश्वर हर जगह है, तो किसी जगह या व्यक्ति को ऊँचा-नीचा मानने का कोई आधार नहीं बचता।
वक्ता और स्वर
इन पदों में बोलने वाला (वक्ता) स्वयं रैदास हैं, जो सीधे अपने प्रभु से बात कर रहे हैं। वे कौन हैं, क्या चाहते हैं, और क्यों — यह चित्र 8.4 में देखिए।
रैदास का स्वर विनम्र, समर्पित और दृढ़ है। वे खुद को “दास” कहते हैं — यानी वे अहंकार छोड़कर प्रभु के सेवक के भाव में हैं। पर यह विनम्रता कमज़ोरी नहीं है। जब वे कहते हैं “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ”, तो उसमें गज़ब की दृढ़ता है — चाहे प्रभु छोड़ दें, रैदास नहीं छोड़ेंगे। यही विनम्रता और दृढ़ता का मेल उनके स्वर को ख़ास बनाता है।
काव्य/भाषा सौंदर्य (अलंकार)
अब देखते हैं कि रैदास ने भाषा को सुंदर बनाने के लिए कौन-से अलंकार (भाषा सजाने के तरीके) इस्तेमाल किए। तीन मुख्य अलंकार चित्र 8.5 में एक साथ हैं।
आइए हर अलंकार को पाठ से जोड़कर देखें।
अनुप्रास अलंकार — जब किसी पंक्ति में एक ही व्यंजन वर्ण बार-बार आए, तो अनुप्रास होता है। यह कानों को संगीत जैसा लगता है। उदाहरण — “जैसे चितवत चंद चकोरा” में चितवत, चंद, चकोरा — ‘च’ वर्ण बार-बार आया। रैदास ने इसे इसलिए चुना ताकि पद गाने और सुनने में मधुर लगे (इन पदों को गाया जाता था)।
उपमा अलंकार — जब किसी चीज़ की समानता किसी प्रसिद्ध चीज़ से दिखाई जाए, और बीच में “जैसे/ज्यों” जैसा शब्द आए, तो उपमा होती है। उदाहरण — “जैसे सोनहिं मिलत सुहागा” — यहाँ भक्त-प्रभु के मेल की तुलना सोने-सुहागा से की गई, और “जैसे” शब्द साफ़ दिखता है। रैदास ने उपमा इसलिए चुनी क्योंकि अनदेखे, बड़े भाव (प्रभु-प्रेम) को रोज़ की देखी-जानी चीज़ों से जोड़ने पर वह तुरंत समझ आ जाता है।
रूपक अलंकार — जब दो चीज़ों में इतनी समानता मान ली जाए कि एक को सीधे दूसरी ही कह दिया जाए (बिना “जैसे” के), तो रूपक होता है। उदाहरण — “तुम्हरे चरन कमल” — यहाँ चरण को “कमल जैसा” नहीं कहा, बल्कि सीधे “चरन कमल” कह दिया, मानो चरण ही कमल हों। रैदास इससे चरणों की कोमलता और पवित्रता एक ही शब्द में दिखा देते हैं।
इन तीनों का फ़र्क एक बार में पकड़ने के लिए, नीचे की तुलना देखिए।
| अलंकार | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| अनुप्रास | एक वर्ण बार-बार | चितवत चंद चकोरा ('च') |
| उपमा | 'जैसे/ज्यों' से तुलना | जैसे सोनहिं मिलत सुहागा |
| रूपक | एक को दूसरा ही कह देना (बिना 'जैसे') | चरन कमल |
पदों की एक और बड़ी विशेषता है उनकी लयात्मकता और गेयता — यानी इन्हें गाया जा सकता है। हर पंक्ति में एक मीठी लय है, और तुकबंदी (पानी-समानी, मोरा-चकोरा, बाती-राती) सुनने में अच्छी लगती है। भाषा सरल और लोकधर्मी (आम लोगों की) है — चंदन, पानी, दीपक, मोती जैसे रोज़ के शब्द, जिन्हें हर कोई समझ सकता है।
चुनावों और संदेश के पीछे का “क्यों”
अब पाठ के हृदय तक पहुँचते हैं। यहाँ हम सिर्फ़ “क्या कहा” नहीं, बल्कि “ऐसा क्यों कहा” देखेंगे।
रैदास ने प्रभु को बड़ा (चंदन, बादल, दीपक, मोती) और खुद को छोटा (पानी, मोर, बाती, धागा) क्यों रखा? ध्यान दीजिए — हर जोड़ी में प्रभु वह है जो गंध, छाया, उजाला या मूल्य देता है, और भक्त वह है जो उसे पाकर पूरा होता है। यह चुनाव सोच-समझकर किया गया है। रैदास कहना चाहते हैं कि भक्त अपने-आप में अधूरा है; प्रभु से जुड़कर ही उसका जीवन सार्थक होता है — जैसे बाती दीपक के बिना सिर्फ़ धागा है, पर दीपक से जुड़कर उजाला बन जाती है।
रैदास ने सीधे “मैं प्रभु से प्रेम करता हूँ” क्यों नहीं कहा? क्योंकि सूखा कथन मन को नहीं छूता। पर जब वे चंदन-पानी या मोती-धागा का चित्र खींचते हैं, तो पाठक के मन में वह जोड़ी जीवित हो उठती है, और भाव अपने-आप गहरा उतर जाता है। यही उपमा की ताक़त है — अनदेखे भाव को देखी-जानी चीज़ से समझा देना।
रैदास तीर्थ-व्रत को छोटा क्यों बताते हैं? क्योंकि उनके समय में लोग बाहरी दिखावे को ही धर्म मान बैठे थे — मान लेते थे कि तीर्थ चले जाने या व्रत रख लेने से भक्ति पूरी हो गई। रैदास इस सोच को चुनौती देते हैं। उनका संदेश है — भक्ति बाहर के काम में नहीं, भीतर के सच्चे भरोसे में है। जब ईश्वर हर जगह है (“जहँ जहँ जाउँ तुम्हारी पूजा”), तो किसी ख़ास जगह जाने की ज़रूरत ही क्या? यही सोच आगे चलकर ऊँच-नीच के भेद को भी तोड़ती है, क्योंकि सबके भीतर वही एक प्रभु बसा है।
आम भ्रांतियाँ
इन पदों को पढ़ते समय विद्यार्थी अक्सर कुछ बातें ग़लत समझ लेते हैं। आइए उन्हें साफ़ करें।
रैदास का 'राम' अयोध्या के राजा दशरथ-पुत्र राम हैं, इसलिए ये सगुण भक्ति के पद हैं।
पद में बार-बार 'राम' शब्द आता है, और हम राम को आमतौर पर रामायण वाले राजा राम के रूप में ही जानते हैं, इसलिए वही चित्र मन में आ जाता है।
रैदास निर्गुण भक्ति के कवि हैं। उनका 'राम' किसी रूप वाला राजा नहीं, बल्कि वही निराकार, सर्वव्यापी प्रभु है। 'राम' यहाँ उस निराकार ईश्वर का नाम भर है।
'तीरथ बरत न करूँ अंदेसा' का मतलब है कि रैदास धर्म-विरोधी हैं और किसी भी पूजा-भक्ति को नहीं मानते।
वे तीर्थ और व्रत को नकारते दिखते हैं, इसलिए लगता है कि वे पूरी भक्ति को ही ठुकरा रहे हैं।
रैदास भक्ति को नहीं, बल्कि भक्ति के दिखावे और बाहरी कर्मकांड को छोटा बताते हैं। वे मन की सच्ची भक्ति को सबसे ऊँचा मानते हैं — प्रभु के चरणों का भरोसा ही उनका सहारा है।
'चरन कमल' में उपमा अलंकार है, क्योंकि चरणों की तुलना कमल से की गई है।
चरण और कमल दोनों साथ आए हैं और तुलना जैसी लगती है, और उपमा भी तुलना ही होती है, इसलिए दोनों एक से लगते हैं।
यहाँ रूपक अलंकार है, उपमा नहीं। उपमा में 'जैसे/ज्यों' होता है, पर यहाँ चरण को सीधे कमल कह दिया गया है — बिना 'जैसे' के, दोनों को एक मान लिया गया। यही रूपक की पहचान है।
'प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा' से पता चलता है कि रैदास खुद को छोटा और कमज़ोर मानकर हीन महसूस करते हैं।
'दास' शब्द आज सेवक या नौकर के अर्थ में आता है, जो छोटा-कमज़ोर लगता है, इसलिए लगता है रैदास हीनता में डूबे हैं।
यहाँ 'दास' भाव विनम्रता और पूरे समर्पण का प्रतीक है, हीनता का नहीं। अहंकार छोड़कर प्रभु को सब कुछ मान लेना भक्ति की सबसे ऊँची अवस्था मानी जाती है।
झटपट जाँच
अब अपनी समझ परखिए। नीचे दो छोटे प्रश्न हैं।
'प्रभु जी तुम चंदन हम पानी' पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में दिखाया गया है?
'जहँ जहँ जाउँ तुम्हारी पूजा' पंक्ति से ईश्वर के बारे में क्या भाव निकलता है?
एक छोटी जाँच और।
रैदास किस भक्ति धारा के कवि हैं — सगुण या निर्गुण?
अभ्यास (परीक्षा-शैली)
अब परीक्षा जैसे प्रश्नों पर अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” दबाकर मिलाइए।
लघु उत्तर
'अब कैसे छूटै राम रट लागी' पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
इस पंक्ति में रैदास कहते हैं कि अब उन्हें राम-नाम जपने की ऐसी गहरी लगन (रट) लग गई है कि वह छूट ही नहीं सकती। ‘कैसे छूटै’ एक प्रश्न के रूप में है, पर इसका असली अर्थ है — यह कभी नहीं छूटेगी। यह पंक्ति रैदास की अनन्य भक्ति और प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण को दिखाती है।
'तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा' का अर्थ और भाव लिखिए।
अर्थ — मुझे तीर्थ-यात्रा और व्रत-उपवास की कोई चिंता (अंदेसा) नहीं है; मेरा एकमात्र भरोसा तो प्रभु के कमल-जैसे कोमल चरण हैं।
भाव — रैदास बाहरी कर्मकांड और दिखावे की पूजा को बड़ी बात नहीं मानते। उनके लिए सच्ची भक्ति मन के अटूट भरोसे में है, बाहरी नियमों में नहीं। यह पंक्ति उनकी दृढ़ निष्ठा और निर्गुण भक्ति की सोच को दिखाती है — कि असली धर्म भीतर है, बाहर नहीं। (‘चरन कमल’ में रूपक अलंकार भी है।)
दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों या उपमाओं से दिखाया गया है? सूची बनाइए।
पहले पद में चार जोड़ियाँ हैं — (1) चंदन और पानी, (2) बादल (घन) और मोर, (3) दीपक और बाती, (4) मोती और धागा। इनमें प्रभु को चंदन/बादल/दीपक/मोती कहा गया और भक्त को पानी/मोर/बाती/धागा। हर जोड़ी में दोनों ऐसे जुड़े हैं कि अलग किए ही नहीं जा सकते। दूसरे पद में प्रभु के ‘चरन कमल’ को भरोसे का प्रतीक बनाया गया है। सभी प्रतीक भक्त-आराध्य के अटूट, अनन्य नाते को दिखाते हैं।
दीर्घ उत्तर / ससंदर्भ व्याख्या
'जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ' पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य के प्रति अटूट निष्ठा का भाव है। इस भाव को विस्तार से समझाइए।
इस पंक्ति में रैदास अपने प्रभु से कहते हैं — हे राम, अगर तुम मुझसे नाता तोड़ भी दो, तो भी मैं तुमसे नहीं तोड़ूँगा। यहाँ रैदास की भक्ति की दो ख़ास बातें उभरती हैं।
पहली — उनकी निष्ठा एकतरफ़ा नहीं टूटती। आम रिश्तों में अगर एक पक्ष नाता तोड़ दे, तो दूसरा भी हट जाता है। पर रैदास कहते हैं कि चाहे प्रभु छोड़ दें, वे नहीं छोड़ेंगे। यह उनकी भक्ति की दृढ़ता और बिना शर्त वाला प्रेम दिखाता है।
दूसरी — वे इसका कारण भी देते हैं — ‘तुम सौं तोरि कवन सौं जोरौं’, यानी तुमसे तोड़कर मैं और किससे नाता जोड़ूँ? उनके लिए प्रभु ही सब कुछ हैं, उनके जैसा दूसरा कोई है ही नहीं। यही ‘अनन्य’ भक्ति है — जहाँ भक्त के मन में आराध्य के सिवा कोई दूसरा सहारा नहीं।
आगे रैदास कहते हैं कि वे अपना मन हरि से जोड़ते हैं और बाक़ी सबसे तोड़ लेते हैं (‘मैं अपनो मन हरि सौं जोरौं, हरि सौं जोरि सबन सौं तोरौं’)। यानी प्रभु से सच्चा नाता जोड़ने के लिए वे सांसारिक मोह छोड़ देते हैं। और यह भक्ति वे मन, कर्म और वचन — तीनों से करते हैं, यानी यह दिखावा नहीं, पूरे अस्तित्व की भक्ति है। इस तरह यह पंक्ति रैदास की अडिग, अनन्य और बिना शर्त निष्ठा का गहरा परिचय देती है।
ससंदर्भ व्याख्या कीजिए — 'प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।'
संदर्भ — यह पंक्ति संत रैदास के पद ‘अब कैसे छूटै राम रट लागी’ से ली गई है। इसमें रैदास प्रभु और भक्त के अटूट नाते को उपमाओं से समझा रहे हैं।
व्याख्या — रैदास कहते हैं कि हे प्रभु, तुम बादल (घन) हो और मैं मोर हूँ। जैसे मोर बादल को देखकर मगन होकर नाच उठता है, वैसे ही मैं तुम्हें देखकर मगन हो जाता हूँ। आगे वे चकोर पक्षी का उदाहरण देते हैं — जैसे चकोर टकटकी लगाकर चाँद को निहारता रहता है (चितवत चंद चकोरा), वैसे ही भक्त प्रभु को एकटक प्रेम से देखता रहता है।
भाव — इन उपमाओं से रैदास भक्त के प्रभु पर टिके अटूट प्रेम और लगन को दिखाते हैं। शिल्प की दृष्टि से इसमें अनुप्रास अलंकार है (चितवत, चंद, चकोरा में ‘च’ वर्ण की आवृत्ति), जो पंक्ति को मधुर और गेय बनाता है।
रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के सच्चे आधार क्या हो सकते हैं?
रैदास ने तीर्थ-यात्रा और व्रत-उपवास जैसे बाहरी कर्मकांडों के स्थान पर प्रभु के ‘चरन कमल’ के एक भरोसे को, यानी मन की सच्ची और अनन्य भक्ति को, भक्ति का प्रमुख आधार माना है। वे कहते हैं कि उन्हें तीर्थ-व्रत की कोई चिंता नहीं — उनका एकमात्र सहारा प्रभु पर टिका मन का भरोसा है।
मेरे विचार से भक्ति के सच्चे आधार बाहरी दिखावे में नहीं, भीतर के भावों में होते हैं — जैसे मन की शुद्धता, ईश्वर पर अटूट भरोसा, प्रेम और समर्पण, और सबके प्रति समानता तथा भाईचारे का भाव। रैदास और कबीर जैसे संत कवि इसी निर्गुण, भीतरी भक्ति पर ज़ोर देते हैं। उनके समय में समाज ऊँच-नीच के भेद और दिखावे की पूजा में बँटा था, इसलिए इन संतों ने सबके भीतर बसे एक ही ईश्वर का संदेश देकर मन की सच्ची भक्ति को सबसे ऊँचा बताया।
सारांश
इस पाठ को पढ़ने के बाद अब आप ये बातें समझा सकते हैं:
- रैदास कौन थे — काशी में जन्मे, पंद्रहवीं सदी के निर्गुण भक्ति धारा के संत कवि, जिन्होंने बाहरी आडंबर का खंडन कर मन की भीतरी भक्ति को सच्चा धर्म माना।
- पहले पद का भाव — राम-नाम की लगन कभी न छूटने वाली है; प्रभु-भक्त का नाता चंदन-पानी, बादल-मोर, दीपक-बाती, मोती-धागा की तरह अटूट है।
- दूसरे पद का भाव — प्रभु छोड़ दें तो भी रैदास नहीं छोड़ेंगे; तीर्थ-व्रत की चिंता नहीं, बस प्रभु के चरणों का एक भरोसा; प्रभु हर जगह बसते हैं।
- अनन्य भक्ति — आराध्य के सिवा कोई दूसरा सहारा न मानना, मन-कर्म-वचन से पूरा समर्पण।
- अलंकार — अनुप्रास (एक वर्ण की आवृत्ति), उपमा (‘जैसे’ से तुलना) और रूपक (एक को दूसरा ही कह देना) पहचान सकते हैं।
- मुख्य संदेश — सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे में नहीं, मन के अटूट प्रेम और भरोसे में होती है; और सर्वव्यापी ईश्वर सबको बराबर मानने की राह दिखाता है।
आगे क्या
रैदास के इन पदों में हमने भक्त और प्रभु के कोमल, अटूट नाते को देखा — जहाँ स्वर विनम्र और समर्पित है। अगले पाठ में रस और स्वर बिलकुल बदल जाता है। वहाँ टकराव, क्रोध और तीखे संवाद हैं।
आगे पढ़िए — पाठ 9 — राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद, जिसमें धनुष टूटने पर क्रोधित परशुराम और निडर लक्ष्मण के बीच का रोचक संवाद है।
Frequently Asked Questions
रैदास के पद 'अब कैसे छूटै राम रट लागी' का भाव क्या है?
इस पद में रैदास कहते हैं कि अब उन्हें राम-नाम की ऐसी लगन लग गई है कि वह छूट ही नहीं सकती। वे प्रभु और अपने नाते को चंदन-पानी, दीपक-बाती, मोती-धागा जैसी जोड़ियों से समझाते हैं, जहाँ दोनों कभी अलग नहीं होते। यह अनन्य भक्ति और समर्पण का पद है।
रैदास ने प्रभु को चंदन और खुद को पानी क्यों कहा है?
जब चंदन को पानी में घिसा जाता है, तो चंदन की सुगंध पानी के कण-कण में रच-बस जाती है। दोनों एक हो जाते हैं। रैदास इसी से कहना चाहते हैं कि उनका प्रभु उनके अंग-अंग में बस गया है, जैसे पानी में चंदन की गंध — अब उन्हें अलग नहीं किया जा सकता।
'तीरथ बरत न करूँ अंदेसा' पंक्ति का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि रैदास को तीर्थ-यात्रा और व्रत-उपवास जैसे बाहरी कर्मकांडों की कोई चिंता नहीं है। उनके लिए सच्चा सहारा सिर्फ प्रभु के चरण-कमल की भक्ति है। वे दिखावे की पूजा छोड़ सकते हैं, पर मन का यह भरोसा कभी नहीं।
रैदास के पदों में कौन-कौन से अलंकार हैं?
इन पदों में मुख्यतः तीन अलंकार हैं — अनुप्रास ('जैसे चितवत चंद चकोरा' में 'च' की आवृत्ति), उपमा ('जैसे सोने मिलत सुहागा' में 'जैसे' से तुलना) और रूपक ('चरन कमल' में चरण को सीधे कमल कह देना)। इनसे पदों की भाषा मधुर और गेय बनती है।
रैदास किस प्रकार के संत कवि थे?
रैदास भक्तिकाल की निर्गुण संत-काव्य परंपरा के कवि थे। उन्होंने बाहरी आडंबरों और दिखावे का खंडन किया और मन की शुद्धता तथा भीतरी भक्ति को ही सच्चा धर्म माना। उनके पद समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हैं।
दूसरे पद में रैदास की अटूट निष्ठा कैसे दिखती है?
दूसरे पद में रैदास कहते हैं कि भले ही प्रभु उन्हें छोड़ दें, पर वे प्रभु को नहीं छोड़ेंगे — क्योंकि उन्हें छोड़कर वे किससे नाता जोड़ें? वे अपना मन प्रभु से जोड़ते हैं और बाक़ी सब से तोड़ लेते हैं। यह उनकी अडिग, अनन्य निष्ठा का परिचय देता है।