झाँसी की रानी
इस पाठ का महत्व
ज़रा एक तस्वीर अपने मन में बनाइए। एक नौजवान औरत है। उसकी उम्र अभी बीस-बाईस साल ही है। उसकी गोद में एक छोटा बच्चा है। उसके चारों ओर अंग्रेज़ों की विशाल सेना है। पर वह डरती नहीं। वह घोड़े पर चढ़ती है, हाथ में तलवार उठाती है, और दुश्मनों के बीच ऐसे टूट पड़ती है मानो कोई शेरनी हो।
यह औरत थीं रानी लक्ष्मीबाई — झाँसी की रानी। यह कविता उन्हीं की वीरता की कहानी कहती है।
यह पाठ इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह हमें सिखाता है कि हिम्मत किसी उम्र या लिंग की मोहताज नहीं होती। उस ज़माने में लोग सोचते थे कि लड़ना सिर्फ़ मर्दों का काम है। रानी लक्ष्मीबाई ने यह सोच ही बदल दी। उन्होंने अपने देश की आज़ादी के लिए जान दे दी।
और इस कविता की एक खास बात है — इसकी एक पंक्ति इतनी मशहूर हो गई कि आज भी लोग उसे ज़बानी याद रखते हैं: “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।” इसे पढ़ते ही मन में जोश भर जाता है। यही इस कविता की सबसे बड़ी ताकत है।
कवयित्री-परिचय
इस कविता को लिखने वाली का नाम है सुभद्रा कुमारी चौहान। आगे बढ़ने से पहले उनके बारे में और इस कविता की पृष्ठभूमि (पीछे की कहानी) थोड़ा जान लेना अच्छा रहेगा। इससे कविता समझने में बहुत आसानी होगी।
मूल भाव (The Big Idea)
मूल भाव: यह कविता रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और देशप्रेम की कहानी है। यह उनके पूरे जीवन को क्रम से दिखाती है — बचपन से लेकर वीरगति तक। एक निःसंतान राजा की विधवा होने के बाद भी, अपनी झाँसी के छिन जाने पर रानी हार नहीं मानतीं। वे तलवार उठाती हैं, सेना जुटाती हैं और अंग्रेज़ों से जमकर लड़ती हैं। मात्र 23 वर्ष की आयु में देश के लिए प्राण न्योछावर कर वे स्वतंत्रता की अमिट निशानी बन जाती हैं। कविता का संदेश साफ़ है — सच्ची वीरता और बलिदान कभी नहीं मरते, वे आने वाली पीढ़ियों को राह दिखाते हैं।
रानी के जीवन की पूरी यात्रा को एक नज़र में समझने के लिए, नीचे चित्र 11.1 देखिए।
पाठ का सार
अब पूरी कविता का भाव सरल भाषा में, घटना-दर-घटना समझते हैं। यह कविता एक कहानी की तरह आगे बढ़ती है।
कविता शुरू होती है सन् 1857 के माहौल से। पूरे भारत में अंग्रेज़ों के खिलाफ़ एक नई जागृति आ गई थी। बूढ़ा भारत मानो फिर से जवान हो उठा था। सब लोग खोई हुई आज़ादी की कीमत समझ चुके थे और अंग्रेज़ों को भगाने की ठान चुके थे।
फिर कवयित्री रानी का बचपन बताती हैं। रानी का बचपन का नाम था ‘छबीली’। वे कानपुर के नाना साहब की मुँहबोली बहन थीं। बचपन से ही वे तलवार, ढाल, बरछी जैसे हथियारों के साथ खेलती थीं। उन्हें वीर शिवाजी की कहानियाँ ज़बानी याद थीं।
फिर रानी का विवाह होता है और वे झाँसी की रानी बन जाती हैं। पर खुशी ज़्यादा दिन नहीं टिकती। राजा का निधन हो जाता है और रानी विधवा हो जाती हैं। राजा का कोई पुत्र नहीं था।
इसी कमज़ोरी का फायदा उठाकर अंग्रेज़ गवर्नर डलहौज़ी झाँसी को हड़प लेता है। ‘लावारिस का वारिस’ बनकर अंग्रेज़ी राज झाँसी पर कब्ज़ा कर लेता है। यही नहीं — कविता बताती है कि अंग्रेज़ों ने दिल्ली, लखनऊ, नागपुर, सतारा जैसे कई राज्य भी इसी तरह हड़प लिए।
जब अत्याचार हद से बढ़ गया, तो सन् 1857 की क्रांति भड़क उठी। झाँसी, दिल्ली, मेरठ, कानपुर, पटना — हर जगह आज़ादी की चिंगारी फैल गई। रानी ने भी तलवार उठा ली। फिर शुरू होता है युद्ध। रानी ने लेफ्टिनेंट वॉकर को घायल कर भगा दिया। वे झाँसी से कालपी और फिर ग्वालियर तक लड़ती गईं और जीतती गईं।
पर अंत में अंग्रेज़ों की बड़ी सेना ने उन्हें घेर लिया। लड़ते-लड़ते रानी वीरगति को प्राप्त हुईं। उस समय उनकी उम्र सिर्फ़ 23 साल थी। कवयित्री कहती हैं — रानी मरी नहीं, बल्कि वे हमें आज़ादी की राह दिखाकर अमर हो गईं।
मूल पाठ और व्याख्या
अब कविता के कुछ प्रसिद्ध अंतरे (छंद) क्रम से पढ़ते हैं, और हर अंतरे के तुरंत बाद उसका भावार्थ सरल हिंदी में खोलते हैं।
एक बात ध्यान रखिए — इस कविता में हर अंतरे के बाद एक ही टेक (दोहराई जाने वाली पंक्तियाँ) लौटकर आती हैं:
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इसका अर्थ है — कवयित्री कहती हैं कि हमने यह कहानी बुंदेलखंड के हरबोलों (लोकगायकों) के मुँह से सुनी है। और वह रानी एक मर्द योद्धा की तरह, यानी पूरी निडरता से, खूब लड़ी — वही तो झाँसी वाली रानी थी। यह टेक हर बार रानी की वीरता को फिर से हमारे मन में बैठा देती है।
अंतरा 1 — सन् 1857 का माहौल
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस अंतरे में कवयित्री सन् 1857 का माहौल दिखाती हैं। वे कहती हैं कि उस समय राजाओं के सिंहासन हिल उठे थे और राजघरानों ने गुस्से में भौंहें तान ली थीं (भृकुटी तानना = गुस्सा दिखाना)। पुराना, थका हुआ भारत फिर से जवान हो उठा था — यानी लोगों में नया जोश आ गया था। सबने खोई हुई आज़ादी की असली कीमत पहचान ली थी। और सबने मन में दृढ़ निश्चय (ठान लेना) कर लिया था कि अंग्रेज़ों (फिरंगी) को देश से दूर भगाना है। यह अंतरा पूरे देश में फैले विद्रोह के माहौल को दिखाता है।
अंतरा 2 — रानी का बचपन
कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस अंतरे में रानी का बचपन दिखाया गया है। वे कानपुर के नाना साहब (नाना धुंधूपंत) की मुँहबोली बहन थीं, जिनका प्यार का नाम ‘छबीली’ था। उनका असली नाम लक्ष्मीबाई था और वे अपने पिता की अकेली संतान थीं। वे नाना साहब के साथ ही पढ़ती और खेलती थीं। पर ध्यान दीजिए — उनकी सहेलियाँ गुड़िया नहीं, बल्कि हथियार थे: बरछी (छोटा भाला), ढाल, कृपाण (तलवार) और कटारी (छोटा चाकू)। यानी बचपन से ही उन्हें लड़ाई और वीरता का शौक था। इससे पता चलता है कि उनकी वीरता कोई अचानक की बात नहीं थी — वह बचपन से ही पल रही थी।
अंतरा 3 — झाँसी की राज्य-हड़प
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
इस अंतरे में झाँसी के छिनने की कहानी है। राजा की मृत्यु से झाँसी का दीपक बुझ गया (यानी रोशनी, उम्मीद खत्म हो गई)। यह देखकर अंग्रेज़ गवर्नर डलहौज़ी मन-ही-मन खुश हुआ। उसे झाँसी को हड़पने का अच्छा मौका मिल गया। उसने तुरंत सेना भेजकर किले (दुर्ग) पर अपना झंडा फहरा दिया। कविता की एक तीखी पंक्ति है — “लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।” इसका मतलब है कि जिस झाँसी का कोई वारिस नहीं था, अंग्रेज़ बिना किसी हक़ के उसके मालिक बन बैठे। यह अंग्रेज़ों की धोखेबाज़ी और लालच को दिखाता है।
अंतरा 4 — रानी की वीरगति और अमरता
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
यह कविता का सबसे भावुक अंतरा है। रानी वीरगति को प्राप्त हो गईं। कवयित्री कहती हैं कि उनकी चिता अब उनकी दिव्य सवारी बन गई — यानी मृत्यु में भी वे महान और पवित्र लगती हैं। उनका तेज (शक्ति और चमक) अपने मूल तेज में जाकर मिल गया, क्योंकि वे सचमुच उस तेज की हकदार थीं। फिर एक चौंकाने वाली बात — उनकी उम्र सिर्फ़ तेइस साल की थी, फिर भी उन्होंने इतना बड़ा काम किया। इसलिए कवयित्री कहती हैं कि वे कोई साधारण इंसान (मनुज) नहीं, बल्कि अवतार थीं — जैसे स्वतंत्रता खुद नारी का रूप लेकर हमें जगाने आई हो। यह अंतरा बताता है कि रानी मरी नहीं, बल्कि अमर हो गईं।
📖 पूरी कविता कहाँ पढ़ें: ऊपर कविता के कुछ प्रसिद्ध अंतरे ही दिए गए हैं। पूरी कविता के सारे अंतरे — डलहौज़ी की हड़प-नीति, रनिवासों का दुख, क्रांति का फैलना, वॉकर से द्वंद्व, कालपी-ग्वालियर का युद्ध और अंतिम विदाई — अपनी पाठ्यपुस्तक ‘गंगा’ (कक्षा 9) में ज़रूर पढ़िए। नीचे हमने पूरी कविता के भाव और शिल्प की व्याख्या दी है।
भाव / विषय (Themes)
अब हम कविता के मुख्य भावों को समझेंगे, और हर एक के साथ देखेंगे कि वह क्यों ज़रूरी है।
पहला भाव — वीरता। यह कविता की जान है। रानी एक औरत होकर भी, छोटे बच्चे को पीठ पर बाँधकर, अंग्रेज़ों की विशाल सेना से लड़ती हैं। वे डरती नहीं, हार नहीं मानतीं। यह भाव ज़रूरी है क्योंकि यह सिखाता है कि हिम्मत उम्र, लिंग या ताकत की मोहताज नहीं — वह दिल से आती है।
दूसरा भाव — देशप्रेम। रानी अपने लिए नहीं, अपने देश की आज़ादी के लिए लड़ती हैं। वे जान दे देती हैं, पर झुकती नहीं। यह भाव ज़रूरी है क्योंकि यह बताता है कि देश से बड़ा कुछ नहीं — आज़ादी के लिए लोगों ने अपनी जान तक दी है।
तीसरा भाव — अन्याय के खिलाफ़ आवाज़। अंग्रेज़ धोखे से, बिना हक़ के एक के बाद एक राज्य हड़प रहे थे। कविता इस अन्याय को साफ़ दिखाती है। यह भाव ज़रूरी है क्योंकि यह सिखाता है कि गलत के खिलाफ़ खड़ा होना चाहिए, चाहे सामने वाला कितना ही ताकतवर क्यों न हो।
चौथा भाव — बलिदान अमर होता है। रानी मर जाती हैं, पर उनकी वीरता हमेशा याद रखी जाती है। कवयित्री कहती हैं कि रानी ने हमें राह दिखाई। यह भाव ज़रूरी है क्योंकि यह बताता है कि सच्चा बलिदान कभी बेकार नहीं जाता।
वक्ता और स्वर (कविता का कहने वाला)
अब देखते हैं कि यह कविता कौन और किस अंदाज़ में सुना रहा है।
इस कविता को सुनाने वाली खुद कवयित्री हैं। वे एक कहानी सुनाने वाले के अंदाज़ में बोलती हैं। पहली ही पंक्ति में वे कहती हैं — “हमने यह कहानी हरबोलों के मुँह से सुनी थी।” इसका मतलब, वे एक ऐसी कहानी आगे बढ़ा रही हैं जो लोकगायकों के ज़रिए पीढ़ियों से चली आ रही है।
कविता का स्वर (बोलने का भाव) जोश और गर्व से भरा है। पर बीच-बीच में जब झाँसी छिनती है या रानी विधवा होती हैं, तो स्वर में दुख और दर्द भी आ जाता है। अंत में रानी की वीरगति पर स्वर श्रद्धा और सम्मान से भर जाता है। यानी एक ही कविता में जोश, दुख और गर्व — तीनों भाव हैं।
रानी के चरित्र के मुख्य गुणों को एक साथ देखने के लिए, नीचे चित्र 11.2 देखिए।
परिवेश (Setting)
अब देखते हैं कि यह कहानी किस समय और जगह की है, और वह कहानी को कैसे आकार देती है।
कविता का समय है — सन् 1857 के आसपास का। यह वह दौर था जब अंग्रेज़ भारत पर राज कर रहे थे और एक-एक करके राज्य हड़प रहे थे। इसी समय भारत में पहली बड़ी बगावत (1857 की क्रांति) भड़की।
कविता की जगह है — मुख्य रूप से झाँसी (आज के उत्तर प्रदेश में) और उसके आसपास का बुंदेलखंड क्षेत्र। बाद में कहानी कालपी और ग्वालियर तक पहुँचती है, जहाँ रानी ने युद्ध लड़े।
यह परिवेश कहानी को बहुत गहराई देता है। अगर यह अंग्रेज़ी राज और 1857 की क्रांति का समय न होता, तो रानी की लड़ाई का कोई अर्थ न होता। यह परिवेश ही बताता है कि रानी क्यों और किसके खिलाफ़ लड़ रही थीं। इसलिए परिवेश सिर्फ़ पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि कहानी का ज़रूरी हिस्सा है।
काव्य/भाषा सौंदर्य (अलंकार और शिल्प)
अब कविता की भाषा की खूबियाँ देखते हैं। हर खूबी को नाम, सरल अर्थ और कविता से उदाहरण के साथ समझेंगे।
पहली खूबी — टेक (दोहराई जाने वाली पंक्ति)। हर अंतरे के बाद वही दो पंक्तियाँ — “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी” — लौटकर आती हैं। इस दोहराव से कविता गीत जैसी लगती है। कवयित्री ने इसे इसलिए चुना ताकि रानी की वीरता बार-बार हमारे मन में बैठ जाए और कविता याद रखने में आसान हो।
दूसरी खूबी — वीर रस और ओज। कविता के शब्द छोटे, तेज़ और जोशीले हैं, जैसे “सिंहासन हिल उठे”, “तलवार खींच ली”। इन शब्दों में ओज यानी ताकत है, जो वीरता का भाव और बढ़ा देती है।
तीसरी खूबी — मानवीकरण। “बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी” — यहाँ भारत को एक इंसान की तरह दिखाया गया है, जो बूढ़ा होकर फिर जवान हो जाता है। जब किसी निर्जीव चीज़ को इंसान की तरह दिखाया जाए, तो उसे मानवीकरण कहते हैं। इससे बात ज़्यादा जीवंत लगती है।
चौथी खूबी — रूपक और प्रतीक। “बुझा दीप झाँसी का” में झाँसी की उम्मीद को एक बुझते दीपक से जोड़ा गया है। दीपक बुझना यानी रोशनी और उम्मीद का खत्म होना। इस तरह के प्रतीक बात को छोटे में, पर गहराई से कह देते हैं।
इस कविता में मुख्य रस वीर रस है। वीर रस को ठीक से समझने के लिए, नीचे चित्र 11.3 देखिए।
चुनावों और संदेश के पीछे का “क्यों”
अब कविता के दिल तक पहुँचते हैं। यहाँ हम सिर्फ़ “क्या हुआ” नहीं, बल्कि “ऐसा क्यों” समझेंगे।
कवयित्री ने रानी को “मर्दानी” क्यों कहा?
एक सवाल अक्सर मन में आता है — रानी तो एक औरत थीं, फिर उन्हें “मर्दानी” (मर्दों जैसी) क्यों कहा गया? क्या औरत होना कमज़ोर होना है?
बात ऐसी नहीं है। उस ज़माने में लोग सोचते थे कि लड़ाई, तलवार और युद्ध सिर्फ़ मर्दों के काम हैं। औरतों से ऐसी वीरता की उम्मीद नहीं की जाती थी। जब रानी ने एक मर्द योद्धा की तरह — बल्कि उनसे भी बेहतर — लड़ाई लड़ी, तो लोगों ने उनकी इस अनोखी बहादुरी की तारीफ़ में उन्हें “मर्दानी” कहा। यह उस ज़माने की भाषा में सबसे बड़ी तारीफ़ थी। आज हम यह ज़रूर समझें कि वीरता का किसी लिंग से कोई लेना-देना नहीं — रानी ने यही साबित किया।
कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई को 'मर्दानी' क्यों कहा है? क्या इसका मतलब औरत होना कमज़ोरी है?
कवयित्री ने रानी को “अवतारी” क्यों कहा?
कविता कहती है कि रानी “मनुज नहीं अवतारी थी” — यानी वे साधारण इंसान नहीं, बल्कि अवतार थीं। एक घोड़े पर लड़ने वाली रानी को भला अवतार क्यों कहा गया?
इसका कारण यह है कि रानी ने इतनी कम उम्र (सिर्फ़ 23 साल) में इतना बड़ा और असाधारण काम किया कि वह किसी आम इंसान के बस की बात नहीं लगती। कवयित्री को लगता है कि मानो आज़ादी की देवी खुद एक नारी का रूप लेकर हमें गुलामी से जगाने आई हो। यह बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं, बल्कि रानी के प्रति गहरी श्रद्धा और सम्मान है। इस एक शब्द से रानी की महानता हमारे मन में और गहरी बैठ जाती है।
कविता “कथात्मक” क्यों है, और टेक का क्या काम है?
यह कविता एक कहानी की तरह आगे बढ़ती है — बचपन से वीरगति तक, सब कुछ क्रम से। ऐसी कविता को कथात्मक कविता कहते हैं, जिसमें कविता और कहानी दोनों के तत्व जुड़े होते हैं।
अब सवाल — हर अंतरे के बाद वही टेक क्यों लौटती है? इसके पीछे एक सोच है। हर अंतरा कहानी का एक नया टुकड़ा बताता है — कभी दुख का, कभी अन्याय का, कभी जोश का। पर हर बार वही टेक — “खूब लड़ी मर्दानी” — लौटकर हमें याद दिला देती है कि कहानी चाहे जो मोड़ ले, रानी की वीरता ही इसका केंद्र है। यह दोहराव कविता को गीत जैसी लय देता है और रानी की बहादुरी को हमारे मन में पक्का कर देता है।
कविता के इस ढाँचे को समझने के लिए, नीचे चित्र 11.4 देखिए।
आम भ्रांतियाँ
ये कुछ गलतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक को ध्यान से पढ़िए। “ऐसा क्यों लगता है” वाला हिस्सा सिर्फ़ जाल दिखाता है, और “असल बात” उसे सुधार देती है।
'मर्दानी' शब्द का मतलब है कि औरत होना कमज़ोरी है, और रानी मर्द बन गई थीं।
'मर्दानी' शब्द में 'मर्द' छिपा है और हम रोज़ की भाषा में बहादुरी को अक्सर मर्दों से जोड़ देते हैं, इसलिए लगता है कि औरत होना कमज़ोरी मानी गई है।
'मर्दानी' का मतलब है — मर्दों जैसी बहादुर। उस ज़माने में युद्ध को सिर्फ़ मर्दों का काम माना जाता था, इसलिए रानी की अनोखी वीरता की तारीफ़ में यह शब्द आया। यह सबसे बड़ी प्रशंसा थी। रानी ने असल में यही साबित किया कि वीरता का किसी लिंग से कोई संबंध नहीं होता।
यह कविता पूरी तरह कल्पना है, रानी लक्ष्मीबाई और 1857 का युद्ध सच में हुआ ही नहीं।
रानी को 'अवतारी' कहना और घटनाओं का इतना जोशीला, गीत जैसा वर्णन सुनकर पूरी बात एक कहानी जैसी लगती है, इसलिए लगता है कि सब कुछ मन से गढ़ा गया है।
रानी लक्ष्मीबाई एक असली ऐतिहासिक व्यक्ति थीं और 1857 की क्रांति सचमुच हुई थी। कवयित्री ने सिर्फ़ रानी की सच्ची वीरता को सुंदर और जोशीले शब्दों में सजाया है, ताकि उनका साहस हमारे दिल तक पहुँचे।
कविता सिर्फ़ रानी की जीत और बहादुरी की खुशी का गीत है, इसमें कोई दुख या पीड़ा नहीं है।
मशहूर टेक 'खूब लड़ी मर्दानी' बहुत जोशीली और गर्व से भरी है, इसलिए लगता है कि पूरी कविता बस जश्न और जीत की है।
कविता में जोश के साथ-साथ गहरा दुख भी है। झाँसी का छिनना, रानी का विधवा होना, राज्यों का हड़पा जाना और अंत में रानी की वीरगति — ये सब करुण (दुखभरे) हिस्से हैं। कविता में वीर रस के साथ करुण रस की छाया भी चलती है।
रानी अकेले अंग्रेज़ों से लड़ीं, 1857 की क्रांति में और किसी ने हिस्सा नहीं लिया।
कविता का नाम और टेक पूरी तरह रानी पर केंद्रित है, इसलिए लगता है कि बाकी पूरे देश में कोई और लड़ नहीं रहा था।
कविता खुद बताती है कि क्रांति पूरे देश में फैली थी — झाँसी, दिल्ली, मेरठ, कानपुर, पटना और कई जगह। नाना धुंधूपंत, तांत्या टोपे, कुँवर सिंह जैसे कई वीरों ने हिस्सा लिया। रानी इस बड़ी लड़ाई का एक चमकता हिस्सा थीं, अकेली योद्धा नहीं।
झटपट जाँच
खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।
'झाँसी की रानी' कविता की कवयित्री कौन हैं?
कविता में रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम क्या बताया गया है?
कविता में मुख्य रूप से कौन-सा रस है?
'लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया' पंक्ति का क्या अर्थ है?
अभ्यास (परीक्षा-शैली)
पहले अपना उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए। उत्तर की लंबाई पर ध्यान दीजिए — सरल प्रश्नों में 2–3 वाक्य काफ़ी हैं, दीर्घ उत्तर में पूरा अनुच्छेद चाहिए।
लघु उत्तर
रानी लक्ष्मीबाई के बचपन के खेल औरों से किस तरह अलग थे?
रानी का बचपन आम बच्चों से बहुत अलग था। दूसरे बच्चे जहाँ गुड़िया या खिलौनों से खेलते हैं, वहीं रानी की सहेलियाँ हथियार थे — बरछी, ढाल, कृपाण (तलवार) और कटारी। वे नाना साहब के साथ युद्ध-कौशल सीखती थीं और उन्हें वीर शिवाजी की कहानियाँ ज़बानी याद थीं। यानी बचपन से ही उनमें वीरता पल रही थी।
'बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी' — इस पंक्ति का अर्थ समझाइए। हरबोले कौन थे?
इस पंक्ति में कवयित्री बताती हैं कि उन्होंने रानी की यह वीरता-भरी कहानी हरबोलों के मुँह से सुनी थी। हरबोले बुंदेलखंड क्षेत्र के लोकगायकों का एक समुदाय थे। इन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की वीर गाथा को अपने गीतों के द्वारा जन-जन तक पहुँचाया। इस तरह रानी की कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों तक पहुँचती रही।
दीर्घ उत्तर
'झाँसी की रानी' कविता वीर रस की कविता क्यों कही जाती है? इसकी भाषा-शैली की दो खूबियाँ भी बताइए।
यह कविता वीर रस की कविता इसलिए कही जाती है क्योंकि इसे पढ़ते समय हमारे मन में वीरता, जोश और साहस का भाव जाग उठता है। ‘रस’ का अर्थ है — कविता पढ़ने पर मन में जो भाव आए। यहाँ रानी की निडर तलवारबाज़ी, अंग्रेज़ों से उनका लोहा लेना और प्रसिद्ध टेक “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी” — ये सब पढ़कर मन उत्साह से भर जाता है। ऐसा लगता है मानो हम भी देश के लिए कुछ करना चाहें। यही वीर रस है।
इसकी भाषा-शैली की दो खूबियाँ ये हैं:
पहली — टेक का दोहराव। हर अंतरे के बाद वही दो पंक्तियाँ लौटती हैं। इस दोहराव से कविता गीत जैसी लगती है और रानी की वीरता बार-बार हमारे मन में बैठ जाती है।
दूसरी — ओज से भरे शब्द। कवयित्री छोटे, तेज़ और जोशीले शब्द चुनती हैं, जैसे “सिंहासन हिल उठे” और “तलवार खींच ली”। इन शब्दों में ताकत है, जो वीरता का भाव और बढ़ा देती है।
'झाँसी की रानी' कविता के आधार पर रानी लक्ष्मीबाई का चरित्र-चित्रण कीजिए। उनके मुख्य गुणों को उदाहरण देकर समझाइए।
‘झाँसी की रानी’ कविता में रानी लक्ष्मीबाई एक सच्ची वीरांगना के रूप में सामने आती हैं। उनके चरित्र में कई बड़े गुण दिखाई देते हैं।
वीरता — रानी का सबसे बड़ा गुण उनकी बहादुरी है। एक औरत होकर भी वे अंग्रेज़ों की विशाल सेना से निडर होकर लड़ती हैं। उन्होंने लेफ्टिनेंट वॉकर को घायल कर भगा दिया। इसीलिए कवयित्री कहती हैं — “खूब लड़ी मर्दानी”।
नेतृत्व क्षमता — रानी सिर्फ़ खुद नहीं लड़तीं, बल्कि सेना भी जुटाती हैं और दूसरों को साथ लेकर युद्ध की अगुवाई करती हैं। उनकी सखियाँ काना और मंदरा अंत तक उनके साथ लड़ीं।
स्वतंत्रता-प्रेम — रानी अपने लिए नहीं, अपने देश और झाँसी की आज़ादी के लिए लड़ती हैं। अंग्रेज़ों की गुलामी उन्हें मंज़ूर नहीं थी।
त्याग और बलिदान — यह उनका सबसे ऊँचा गुण है। मात्र 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। वे लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुईं।
इस तरह वीरता, नेतृत्व, स्वतंत्रता-प्रेम और बलिदान — इन गुणों के कारण रानी लक्ष्मीबाई स्वतंत्रता संग्राम की एक अमर वीरांगना बन जाती हैं, जिन्हें आज भी पूरा देश याद करता है।
ससंदर्भ व्याख्या कीजिए — 'अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी।'
संदर्भ: ये पंक्तियाँ ‘गंगा’ (कक्षा 9) में संकलित सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘झाँसी की रानी’ से ली गई हैं। यह कविता के अंतिम भाग की पंक्तियाँ हैं, जहाँ रानी की वीरगति के बाद कवयित्री उन्हें श्रद्धांजलि दे रही हैं।
व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि वीरगति पाते समय रानी की उम्र सिर्फ़ तेइस साल की थी। इतनी कम उम्र में इतना बड़ा बलिदान देना किसी साधारण इंसान के बस की बात नहीं। इसलिए कवयित्री कहती हैं कि रानी कोई आम मनुष्य (मनुज) नहीं, बल्कि अवतार थीं। उनके अनुसार मानो स्वतंत्रता खुद एक नारी का रूप लेकर धरती पर आई हो, ताकि गुलामी में सोए हुए भारत को फिर से जगा सके — “हमको जीवित करने आई।”
भाव-सौंदर्य: यहाँ रानी को ‘अवतारी’ कहकर उनके प्रति गहरी श्रद्धा प्रकट की गई है। भाषा सरल पर ओज से भरी है। पंक्तियों में वीर रस के साथ श्रद्धा का भाव मिला हुआ है, जो रानी की महानता को हमारे मन में और गहरा कर देता है।
सारांश
- ‘झाँसी की रानी’ कविता की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान हैं, जो एक प्रसिद्ध कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी थीं।
- यह एक कथात्मक कविता है, जो रानी लक्ष्मीबाई के पूरे जीवन को क्रम से एक कहानी की तरह सुनाती है — बचपन, विवाह, वैधव्य, राज्य-हड़प, क्रांति, युद्ध और वीरगति।
- रानी का बचपन का नाम ‘छबीली’ था और बचपन से ही उनकी सहेलियाँ हथियार थे।
- अंग्रेज़ गवर्नर डलहौज़ी ने राजा की मृत्यु के बाद ‘लावारिस का वारिस’ बनकर झाँसी को हड़प लिया।
- सन् 1857 की क्रांति में रानी ने तलवार उठाई और झाँसी से कालपी, ग्वालियर तक लड़ती गईं।
- मात्र 23 वर्ष की आयु में रानी वीरगति को प्राप्त हुईं और स्वतंत्रता की अमिट निशानी बन गईं।
- कविता में मुख्य रूप से वीर रस है, साथ में करुण रस की छाया भी। प्रसिद्ध टेक “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी” हर अंतरे के बाद दोहराई जाती है।
आगे क्या
इस पाठ में हमने एक वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी और बलिदान को जाना — कि देश के लिए जान देने वाले कभी नहीं मरते, वे अमर हो जाते हैं।
अगला पाठ है पाठ 12 — “घर की याद”। युद्ध और वीरता की दुनिया से हटकर अब हम एक कोमल और भावुक कविता पढ़ेंगे। वहाँ कवि जेल में बैठकर अपने घर और परिवार को याद करता है। तैयार हो जाइए दिल को छू लेने वाली एक नई कविता के लिए।
Frequently Asked Questions
झाँसी की रानी कविता का सारांश क्या है?
यह कविता रानी लक्ष्मीबाई के पूरे जीवन की कहानी क्रम से कहती है — बचपन में 'छबीली' कहलाना, विवाह करके झाँसी की रानी बनना, राजा की मृत्यु, डलहौज़ी द्वारा झाँसी हड़प लेना, 1857 की क्रांति, और झाँसी से ग्वालियर तक लड़ते-लड़ते वीरगति पाना। पूरी कविता रानी की वीरता और देशप्रेम को सलाम करती है।
झाँसी की रानी कविता की कवयित्री कौन हैं?
यह कविता सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी हुई है। वे एक प्रसिद्ध कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी थीं। यह उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना मानी जाती है और वीर रस की कविता है।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है कि रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुरुष योद्धा की तरह निडर होकर, बहुत बहादुरी से युद्ध लड़ा। 'मर्दानी' शब्द उनके साहस और पराक्रम की तारीफ़ करता है। यह कविता की टेक है, जो हर अंतरे के बाद दोहराई जाती है।
झाँसी की रानी कविता में कौन-सा रस है?
इस कविता में मुख्य रूप से वीर रस है। रानी की निडर तलवारबाज़ी और अंग्रेज़ों से लोहा लेना पढ़कर मन जोश और साहस से भर जाता है। साथ ही झाँसी के छिनने और रानी के वैधव्य वाले हिस्सों में करुण रस की हल्की छाया भी मिलती है।
बुंदेले हरबोले कौन थे?
हरबोले बुंदेलखंड क्षेत्र के लोकगायकों का एक समुदाय था। इन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की गाथा को अपने गीतों के द्वारा जन-जन तक पहुँचाया। कवयित्री कहती हैं कि उन्होंने यह कहानी इन्हीं हरबोलों के मुँह से सुनी थी।
डलहौज़ी ने झाँसी को कैसे हड़प लिया?
राजा की मृत्यु के बाद उनका कोई पुत्र नहीं था। डलहौज़ी ने इसी का फायदा उठाकर झाँसी को अंग्रेज़ी राज में मिला लिया। कविता कहती है 'लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया' — यानी अंग्रेज़ बिना हक़ के झाँसी के मालिक बन बैठे।