घर की याद

Chapter 12 · Hindi · Class 9 22 min read

इस पाठ का महत्व

सोचिए, आप घर से बहुत दूर हैं। हॉस्टल में, या किसी और शहर में। बाहर तेज़ बारिश हो रही है। और अचानक आपको अपना घर याद आ जाता है — माँ का हाथ का खाना, पिता की डाँट और दुलार, भाई-बहनों की हँसी और शोर। मन भर आता है। ऐसा सबके साथ होता है।

अब एक और बात सोचिए। आप घर से दूर हैं, पर अपनी मर्ज़ी से नहीं। आप जेल में बंद हैं — सिर्फ़ इसलिए कि आपने अपने देश की आज़ादी के लिए आवाज़ उठाई। बाहर सावन की झड़ी लगी है। और हर बूँद आपको घर की याद दिला रही है।

यही हालत है इस कविता के कवि की। कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने यह कविता सच में जेल में बैठकर लिखी थी। यह कोई बनावटी कविता नहीं है — यह एक सच्चे इंसान का सच्चा दर्द है।

इस कविता में हमें दो बहुत गहरे भाव मिलते हैं। एक — अपने घर और परिवार से प्यार (इसे वात्सल्य और घर-प्रेम कहते हैं)। दूसरा — अपना दुख खुद सहकर भी अपनों को दुखी न होने देने का त्याग। यह कविता पढ़कर हम समझते हैं कि घर सिर्फ़ ईंट-पत्थर की एक इमारत नहीं है। घर तो रिश्तों और प्यार का नाम है।

कवि-परिचय

इस कविता के कवि हैं भवानीप्रसाद मिश्र (1913–1985)। इनका जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) में हुआ था।

मिश्र जी सिर्फ़ कवि नहीं थे। वे एक सच्चे देशभक्त भी थे। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसी वजह से ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तीन साल के लिए जेल में डाल दिया। इसी जेल में, घर को याद करते हुए, उन्होंने यह कविता “घर की याद” लिखी।

उनकी भाषा बहुत सहज और बोलचाल वाली है। वे ऐसे लिखते थे मानो कोई अपने मन की बात सीधे, बिना सजावट के कह रहा हो। इसी सहजता के कारण उन्हें “गीत-फ़रोश” (गीत बेचने वाला) भी कहा गया। उनके एक कविता-संग्रह “बुनी हुई रस्सी” पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।

इस पाठ का पूरा मूल पाठ (कविता की असली पंक्तियाँ) अपनी पाठ्यपुस्तक ‘गंगा’ (कक्षा 9) में पढ़ें। यह कविता अभी कॉपीराइट में सुरक्षित है, इसलिए हम यहाँ पूरी कविता दोबारा नहीं छाप रहे। नीचे हम कविता का भाव, सार और हर हिस्से की सरल व्याख्या दे रहे हैं — ताकि पाठ्यपुस्तक की कविता पढ़ते समय उसका एक-एक शब्द आपको आसानी से समझ आए।

मूल भाव (The Big Idea)

मूल भाव: जेल में बंद कवि को वर्षा के दिनों में अपने घर और परिवार की तीव्र याद आती है। वह अपना सारा दुख खुद सहता है, पर सावन के बादल से प्रार्थना करता है कि वह घरवालों को उसके कष्ट न बताए — बल्कि यह कहे कि वह मज़े में है। अपनों को दुखी होने से बचाने का यही त्याग इस कविता का हृदय है।

पाठ का सार

पूरी कविता एक ही दिन की कहानी है — एक बरसात वाला दिन। आइए, इस कविता की भाव-यात्रा को क्रम से समझें।

रात-भर ज़ोर की बारिश होती है। कवि ठीक से सो भी नहीं पाता। सुबह होती है, पर बादल इतने घने हैं कि अँधेरा ही लगता है। बाहर पानी झर-झर गिर रहा है, पत्ते हिल रहे हैं, हवा सर-सर बह रही है। यह सब देखकर कवि का मन बेचैन हो जाता है।

इसी बेचैनी में उसे अपना घर याद आने लगता है। वह घर, जो खुशियों से भरा है। जहाँ उसके चार भाई और चार बहनें हैं। फिर उसे अपनी माँ याद आती है — जो पढ़ी-लिखी नहीं है, पर बहुत स्नेह करती है और भीतर से बहुत मज़बूत है।

सबसे ज़्यादा कवि को अपने पिता की याद आती है। पिता बाहर से बहुत कठोर और बहादुर हैं, पर भीतर से मक्खन जैसे कोमल। कवि सोचता है कि आज बारिश देखकर पिता को भी उसकी (अपने पाँचवें बेटे की) याद आ रही होगी और उनकी आँखें भर आई होंगी।

फिर कवि सावन के बादल से प्रार्थना करता है। वह बादल को अपना संदेशवाहक (संदेश ले जाने वाला दूत) बनाता है। वह कहता है — हे बादल, तुम घर जाकर मेरे परिवार को धीरज देना। उन्हें बताना कि मैं यहाँ खूब मस्त हूँ, खेलता-कूदता हूँ, काम करता हूँ। पर मेरे जेल के दुख और मेरे आँसुओं की बात उनसे कभी मत कहना। वे बेचारे और दुखी हो जाएँगे।

नीचे चित्र 12.1 इसी पूरी भाव-यात्रा को पाँच चरणों में दिखाता है — वर्षा से शुरू होकर दुख छिपाने तक।

कविता की भाव-यात्रा के पाँच चरण
Figure 12.1 — कविता एक बरसात वाले दिन की भाव-यात्रा है। चरण 1 — रात-भर लगातार वर्षा से कवि का मन बेचैन और उदास हो जाता है। चरण 2 — इसी उदासी में उसकी आँखों के सामने घर तैरने लगता है। चरण 3 — एक-एक करके भाई-बहन, माँ और सबसे ज़्यादा पिता याद आते हैं। चरण 4 — कवि सावन के बादल को दूत बनाकर घर तक प्रार्थना भेजता है। चरण 5 — वह बादल से कहता है कि घरवालों को बताना कि मैं मज़े में हूँ, पर मेरा सच्चा दुख मत बताना। नीचे का बॉक्स बताता है कि यही दुख छिपाने वाला त्याग कविता का हृदय है।

मूल पाठ और व्याख्या

अब हम कविता के भाव को क्रम से, हिस्सा-दर-हिस्सा समझेंगे।

ध्यान दें — जैसा ऊपर बताया, यह कविता कॉपीराइट में है, इसलिए हम मूल पंक्तियाँ यहाँ पूरी नहीं छाप रहे। पूरी कविता अपनी पाठ्यपुस्तक ‘गंगा’ (कक्षा 9) में खुली रखकर पढ़ें। नीचे हर हिस्से का सरल भाव दिया है। साथ में जहाँ ज़रूरी हुआ, समझाने के लिए कविता की एक-दो शब्द या एक छोटी पंक्ति का संक्षिप्त उद्धरण दिया गया है।

हिस्सा 1 — बरसात और बेचैनी

कविता की शुरुआत बारिश से होती है। रात-भर पानी गिरता रहा है। कवि का मन (प्राण) भी इसी बारिश से घिरा-घिरा-सा रहा। सुबह कब हुई, यह कवि ठीक से जान भी नहीं पाया, क्योंकि बादल इतने घने हैं कि अभी भी अँधेरा-सा छाया है।

कवि चारों ओर की आवाज़ों को शब्दों में पकड़ता है — पानी “झरा-झर” गिर रहा है, पत्ते “हरा-हर” हिल रहे हैं, हवा “सर-सर” बह रही है, और इन सबके बीच उसके प्राण “थर-थर” काँप रहे हैं। यहाँ ध्वनि वाले शब्दों (झर-झर, थर-थर) से एक उदास, काँपता हुआ माहौल बन जाता है।

इसी माहौल में कवि की आँखों के सामने अपना घर तैरने (दिखाई देने) लगता है। वह घर जो उससे बहुत दूर है, पर खुशियों से भरा है।

हिस्सा 2 — भाई-बहन और माँ की याद

कवि को याद आता है कि घर में सब जुड़े हुए हैं — उसके चार भाई और चार बहनें। वह भाइयों को “भुजा भाई” कहता है (भुजा यानी बाँह, ताकत) और बहनों को “प्यार बहनें”। यानी भाई परिवार की ताकत हैं और बहनें परिवार का प्यार।

फिर माँ की याद आती है। माँ पढ़ी-लिखी नहीं है। कवि कहता है — माँ को तो लिखना भी नहीं आता, इसलिए मेरी चिट्ठी पाकर भी वह खुद पढ़ नहीं पाएगी। पर माँ की एक खासियत है — उसकी गोद में सिर रखते ही सारा दुख गायब हो जाता है। माँ का स्नेह बहुत गहरा है।

नीचे चित्र 12.2 कवि के पूरे परिवार को एक नज़र में दिखाता है — बीच में जेल में बंद कवि, और चारों ओर उसके परिजन।

कवि के परिवार का मानचित्र
Figure 12.2 — यह चित्र कवि के पूरे परिवार को एक साथ दिखाता है। बीच के लाल घेरे में कवि भवानी है — वह घर का पाँचवाँ बेटा है और इस समय जेल में बंद है। ऊपर पिताजी हैं — भोले, बहादुर और कर्मठ, जिनके हाथ वज्र-से कठोर पर हृदय मक्खन-सा कोमल है। नीचे माँ है — बिन-पढ़ी पर स्नेहमयी और भीतर से दृढ़। बाईं ओर चार भाई हैं, जिन्हें कवि 'भुजा भाई' यानी परिवार की ताकत कहता है। दाईं ओर चार बहनें हैं, जिन्हें वह 'प्यार बहनें' कहता है। पूरे घर में नौ भाई-बहन हैं और कवि सबसे छोटा, जो आज सबसे दूर है।

हिस्सा 3 — पिता का बहुआयामी रूप

अब कविता का सबसे सुंदर और गहरा हिस्सा आता है — पिता का वर्णन। कवि पिता को “भोले” और “बहादुर” कहता है। फिर एक बहुत प्रसिद्ध पंक्ति आती है — “वज्र-भुज नवनीत-सा उर”। इसका अर्थ है — जिनकी भुजाएँ (बाँहें) वज्र (कड़ी बिजली) जैसी कठोर और मज़बूत हैं, पर जिनका हृदय (उर) नवनीत यानी ताज़ा मक्खन जैसा कोमल है।

पिता बूढ़े होकर भी जवानों जैसे हैं। बुढ़ापा उन्हें छू भी नहीं सका। वे आज भी दौड़ सकते हैं, खिलखिला सकते हैं। वे मौत के आगे नहीं हिचकते और शेर के आगे भी नहीं डरते। रोज़ सुबह गीता-पाठ करते हैं, दो सौ साठ दंड लगाते हैं और मुगदर (एक भारी कसरत का औज़ार) घुमाते हैं।

पर इतने बहादुर पिता का दिल बहुत कोमल है। कवि कल्पना करता है कि जब आज कसरत के बाद पिता नीचे आए होंगे, तो उनकी आँखें आँसुओं से भर गई होंगी — अपने पाँचवें बेटे (यानी कवि) की याद में। कवि खुद को “अभागा” (भाग्यहीन) कहता है, क्योंकि वह जेल में बँधा बैठा है और अपने प्यारे पिता को दुख दे रहा है।

पिता के इस दोहरे रूप को चित्र 12.3 साफ़-साफ़ दिखाता है।

पिता के दो रूप — बाहर से वज्र, भीतर से मक्खन
Figure 12.3 — यह चित्र पिता के व्यक्तित्व के दो विपरीत रूप साथ-साथ रखता है। बाईं ओर नीला हिस्सा बाहरी रूप दिखाता है — वज्र जैसे कठोर और बहादुर। वे रोज़ गीता-पाठ और दंड लगाते हैं, मुगदर घुमाते हैं, मौत और शेर से नहीं डरते, बोल में बादल जैसी गरज है और बुढ़ापा भी उन्हें छू न सका। दाईं ओर लाल हिस्सा भीतरी रूप दिखाता है — नवनीत यानी मक्खन जैसा कोमल और भावुक। बेटे की याद में उनकी आँखें भर आती हैं, वे पाँचवें का नाम लेकर रो पड़ते हैं, उनका मन बरगद जैसा है जिसकी जड़ें जितनी गहरी, चिंता और प्यार उतना ही गहरा। बीच का 'पर' बताता है कि ये दोनों रूप एक ही इंसान में हैं। नीचे का संदेश — सच्चा बहादुर वही है जिसका दिल इतना कोमल भी हो।

यहाँ कवि एक बहुत सुंदर बात कहता है — पिता का मन बरगद (वट) के पेड़ जैसा है। बरगद की जितनी ज़्यादा जड़ें और टहनियाँ होती हैं, उतनी ही ज़्यादा उसकी देखभाल और चिंता। वैसे ही पिता का परिवार जितना बड़ा है, उनका प्यार और फ़िक्र उतनी ही ज़्यादा है। और इतने बड़े पेड़ का “एक पत्ता टूट जाए” तो भी उसमें से दूध की धारा फूट पड़ती है — यानी पिता के बड़े-से दिल को ज़रा-सी चोट भी गहरा दुख दे जाती है।

हिस्सा 4 — माँ-पिता की कल्पित बातचीत

अब कवि कल्पना करता है कि घर पर माँ और पिता उसके बारे में क्या बातें कर रहे होंगे।

कवि सोचता है कि माँ ने हिम्मत बँधाते हुए कहा होगा — आँख में पानी मत लाओ। भवानी (कवि) वहाँ अच्छा है। उसने हमारे मन और अपनेपन को समझकर ही यह राह (जेल जाने की राह) चुनी है। यह सही ही किया है। अगर वह पीछे हट जाता (देश की लड़ाई से डर जाता), तो मेरी कोख को लजाता (मुझे शर्मिंदा करता)। तुम इस तरह कमज़ोर मत बनो, वरना बाकी बच्चे भी रो पड़ेंगे।

ध्यान दीजिए — यहाँ माँ कितनी मज़बूत है। वह बिन-पढ़ी ज़रूर है, पर सबको हिम्मत वही बँधा रही है। उसका दुख सबसे बड़ा है, फिर भी वह सबसे पहले सँभलती है।

फिर कवि सोचता है कि पिता ने भी कहा होगा कि बेटे ने कितना कुछ सहा होगा। और पिता खुद को सँभालते हुए कहते होंगे — “कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ” — यानी मैं नहीं रो रहा, मैं अपना धीरज नहीं खो रहा। पर इतना कहते-कहते उनकी आँखों से फिर पानी बह निकला होगा। पिता को याद आता है कि कवि को बचपन से ही बरसात बहुत प्यारी थी। वह खुले सिर और नंगे बदन बारिश में मगन होकर घूमता था, बाड़ी (बगीचे) में लौकी के बीज बोता था।

यहाँ हम देखते हैं कि माँ और पिता दोनों एक ही काम कर रहे हैं — एक-दूसरे को और बाकी बच्चों को सँभाल रहे हैं, अपना दुख भीतर दबाकर। पूरे घर का यही हाल है — सब एक-दूसरे के लिए मज़बूत बनने की कोशिश कर रहे हैं।

हिस्सा 5 — बादल को संदेश और दुख छिपाना

कविता का अंतिम और सबसे मार्मिक हिस्सा यही है। कवि अब सीधे सावन के बादल से बात करता है। वह बादल को बहुत प्यार से बुलाता है — “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन”।

कवि बादल से प्रार्थना करता है — तुम चाहे जितना बरसो, पर मेरे घरवालों को मत बरसाना (उन्हें रुलाना मत)। तुम जाकर उन्हें धीरज देना। उनसे कहना कि भवानी यहाँ बहुत मज़े में है। वह कहता है — उन्हें बताना कि मैं लिखता-पढ़ता हूँ, काम करता हूँ, नाम कमाता हूँ। कहना कि मैं मस्त हूँ, कातने (चरखा चलाने) में व्यस्त हूँ, मेरा वजन सत्तर सेर है, भरपेट भोजन मिलता है, मैं कूदता-खेलता हूँ और दुख को डटकर ठेलता (हटाता) हूँ।

पर इसी के साथ कवि बादल को बार-बार रोकता भी है। वह कहता है — पर यह मत कह देना कि मैं रात-रात जागता हूँ, कि मैं लोगों से दूर भागता हूँ (अकेले उदास रहता हूँ), कि मैं असल में टूट चुका हूँ। उन्हें ज़रा-सा भी शक मत होने देना कि मैं दुखी हूँ।

यहाँ कविता का असली दर्द खुल जाता है। कवि सच में दुखी है, टूटा हुआ है। पर वह यह दुख घरवालों तक पहुँचने नहीं देना चाहता। चित्र 12.4 इसी संदेश-व्यवस्था को दिखाता है।

बादल कवि का संदेशवाहक
Figure 12.4 — यह चित्र बताता है कि कवि अपना संदेश घर तक कैसे भेजता है। बाईं ओर जेल है, जहाँ कवि अकेला बंद है। बीच में सावन का बादल है, जिसे कवि अपना संदेशवाहक यानी दूत बनाता है। दाईं ओर घर है, जहाँ पिता, माँ और भाई-बहन उसकी राह देख रहे हैं। नीले तीर दिखाते हैं कि संदेश जेल से बादल के ज़रिए घर तक जाता है। नीचे पीले बॉक्स में कवि का असली संदेश है — घरवालों से कहना कि मैं मस्त हूँ, खूब खेलता-कूदता हूँ; पर मेरे जेल के कष्ट और आँसुओं की बात उनसे मत कहना। यही कविता का सबसे मार्मिक भाव है।

भाव / विषय (कविता के मुख्य भाव)

इस कविता में कई भाव आपस में गुँथे हुए हैं। पहले इन्हें एक नज़र में देख लेते हैं, फिर एक-एक करके समझेंगे। चित्र 12.5 इन भावों का जाल दिखाता है।

कविता का भाव-जाल
Figure 12.5 — यह भाव-जाल कविता के सभी मुख्य भावों को एक साथ दिखाता है। बीच में कविता का केंद्र है — घर और परिवार की याद। चारों ओर इससे जुड़े भाव हैं — ऊपर वात्सल्य और घर-प्रेम; बाएँ ऊपर त्याग और साहस यानी दुख को डटकर सहना; दाएँ ऊपर वर्षा का बिंब यानी बाहर बारिश और भीतर आँसू; बाएँ नीचे संयुक्त परिवार का सुख यानी सबका साथ और सबका मन; दाएँ नीचे देश के लिए कुर्बानी यानी आज़ादी की लड़ाई और जेल; और सबसे नीचे अपनों से बिछोह यानी अलग होने की पीड़ा। सब भाव बीच के घर-प्रेम से जुड़े हैं, इसीलिए यह एक जाल जैसा दिखता है।

अब हर भाव को समझते हैं और यह भी देखते हैं कि वह क्यों ज़रूरी है।

वात्सल्य और घर-प्रेम। यह कविता का सबसे बड़ा भाव है। कवि का अपने घर, माँ-पिता और भाई-बहनों से गहरा लगाव है। यह भाव इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह हम सबसे जुड़ता है। घर की याद हर इंसान को आती है। इसीलिए यह कविता पढ़ते ही सीधे दिल को छूती है।

त्याग और दुख छिपाने का साहस। कवि अपना दुख खुद सहता है, पर अपनों को नहीं बताता। यह भाव इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह असली प्यार दिखाता है। सच्चा प्यार वह है जो अपनी तकलीफ़ भी इसलिए छिपा ले ताकि दूसरे दुखी न हों।

देश के लिए कुर्बानी। कवि जेल में अपनी गलती से नहीं, बल्कि देश की आज़ादी के लिए है। यह भाव इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह कविता के दुख को गौरव में बदल देता है। माँ भी यही कहती है — बेटे ने सही राह चुनी है।

संयुक्त परिवार का सुख। कविता में एक भरा-पूरा परिवार है — नौ भाई-बहन, माँ-पिता, भौजी (भाभी)। यह भाव इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह दिखाता है कि घर का असली सुख रिश्तों के साथ में है।

वक्ता और स्वर (कौन बोल रहा है और कैसे)

इस कविता में बोलने वाला खुद कवि है। पूरी कविता “मैं” में, यानी कवि के अपने मुँह से कही गई है। इसी को आत्मकथात्मक स्वर कहते हैं — जहाँ कवि अपनी ही बात, अपने ही दिल से कहता है।

कविता का स्वर शुरू में उदास और बेचैन है (बारिश, अकेलापन)। बीच में वह प्यार और गर्व से भर जाता है (पिता, माँ, परिवार का वर्णन)। और अंत में वह मार्मिक (दिल को छू लेने वाला) हो जाता है, जब कवि अपना दुख छिपाने की बात करता है।

परिवेश (समय और स्थान)

कविता का समय सावन का है — बरसात के दिन, और कविता एक ही बरसाती दिन में घटती है। कविता का स्थान एक जेल है, जहाँ कवि बंद है।

यह परिवेश कविता के लिए बहुत ज़रूरी है। अगर मौसम धूप वाला होता, तो शायद कवि को घर इतनी तीव्रता से याद न आता। पर सावन की लगातार बारिश ने उसकी उदासी को और गहरा कर दिया। और जेल का अकेलापन इस उदासी को और बढ़ा देता है। इस तरह बाहर का मौसम और भीतर का मन — दोनों एक साथ चलते हैं।

काव्य-सौंदर्य (भाषा और शिल्प)

अब देखते हैं कि कवि ने अपनी बात को सुंदर और असरदार बनाने के लिए कौन-कौन से तरीके अपनाए। हर तरीके का नाम पहले सरल भाषा में समझेंगे।

1. ध्वनि वाले शब्द (अनुप्रास और नाद-सौंदर्य)। जब किसी शब्द को सुनकर ही उसकी आवाज़ का अहसास हो जाए, तो उससे कविता में संगीत-सा बन जाता है। जैसे — “झरा-झर” (पानी गिरने की आवाज़), “सर-सर” (हवा बहने की आवाज़), “थर-थर” (काँपने का भाव)। इन शब्दों से बरसात का पूरा माहौल आँखों और कानों के सामने खड़ा हो जाता है। कवि ने इन्हें इसलिए चुना ताकि पाठक सिर्फ़ पढ़े नहीं, बल्कि उस बारिश को महसूस भी करे।

2. उपमा (एक चीज़ की तुलना दूसरी से)। जब किसी चीज़ को समझाने के लिए उसे किसी और चीज़ जैसा बताया जाए, तो उसे उपमा कहते हैं। इसमें अक्सर “सा”, “जैसे”, “समान” शब्द आते हैं। जैसे — पिता का हृदय “नवनीत-सा” (मक्खन जैसा) कोमल। यहाँ हृदय की कोमलता को मक्खन से तुलना करके समझाया गया है। एक और उपमा — पिता का मन “बड़ का झाड़ जैसे” (बरगद के पेड़ जैसा)। कवि ने उपमा इसलिए चुनी क्योंकि कोमलता या विशालता जैसी अनदेखी बात को किसी जानी-पहचानी चीज़ से जोड़ देने पर वह तुरंत समझ आ जाती है।

3. प्रतीक (एक चीज़ जो किसी गहरी बात की ओर इशारा करे)। आइए इसे एक छोटे उदाहरण से समझें।

4. विरोधाभास (दो उलटी बातें एक साथ)। जब किसी एक चीज़ में दो विपरीत गुण एक साथ दिखें, तो वह बात और गहरी लगती है। जैसे — पिता “वज्र-भुज” (कठोर बाँहों वाले) हैं, पर “नवनीत-सा उर” (मक्खन जैसे कोमल हृदय वाले) भी हैं। कठोरता और कोमलता — दोनों एक साथ। कवि ने यह इसलिए किया ताकि पिता का पूरा, सच्चा रूप सामने आए — जो ऊपर से सख्त पर भीतर से बहुत प्यार करने वाले हैं।

5. लोकभाषा की सहजता। कवि ने आम बोलचाल के शब्द इस्तेमाल किए हैं — जैसे “चुआ” (टपका), “रे”, “हाय रे”। इससे कविता बनावटी नहीं लगती, बल्कि ऐसी लगती है मानो कोई अपने मन की बात सीधे कह रहा हो। यही सहजता इस कविता को इतना सच्चा बनाती है।

चुनावों और संदेश के पीछे का “क्यों”

अब कविता का सबसे गहरा सवाल। कवि अपना दुख घरवालों से क्यों छिपाता है? अगर वह सच बता देता, तो शायद उसका मन हलका हो जाता।

इसका जवाब ही इस कविता का असली संदेश है। कवि जानता है कि अगर घरवालों को उसके दुख का पता चला, तो वे उसके लिए और ज़्यादा दुखी होंगे। माँ रोएगी, पिता टूट जाएँगे, छोटे बच्चे रो पड़ेंगे। कवि यह नहीं चाहता। वह अपना दुख अकेले सह लेने को तैयार है, बस इसलिए कि उसके अपने सुखी रहें।

यही सच्चे प्यार और त्याग की पहचान है। प्यार का मतलब सिर्फ़ किसी के साथ रहना नहीं है। प्यार का मतलब है — अपनी तकलीफ़ छिपाकर भी दूसरे की खुशी को बचाना।

और एक बात। कवि अपनी कुर्बानी पर पछताता नहीं है। वह दुखी ज़रूर है, पर शर्मिंदा नहीं। उसे और उसकी माँ को गर्व है कि उसने देश के लिए यह राह चुनी। इसलिए यह कविता सिर्फ़ एक उदास कविता नहीं है — यह त्याग, प्रेम और देशभक्ति को एक साथ जोड़ने वाली कविता है।

आम भ्रांतियाँ

इस कविता को समझने में विद्यार्थी अक्सर कुछ भूलें करते हैं। आइए उन्हें ठीक करें।

⚠️ Common mistake
What students think

कवि सच में जेल में मज़े में है — खेलता-कूदता है, भरपेट खाता है।

Why it seems right

कविता में कवि खुद बार-बार यही कहता है — मैं मस्त हूँ, कूदता-खेलता हूँ। ये शब्द सीधे पढ़ने पर ऐसा ही लगता है कि वह सचमुच खुश है।

What actually happens

यह सब कवि का बनाया हुआ झूठा संदेश है, जो वह घरवालों को भिजवाना चाहता है ताकि वे चिंता न करें। असल में वह दुखी है, रात-रात जागता है और टूट चुका है — यह बात वह बादल से छिपाने को कहता है।

⚠️ Common mistake
What students think

पिता एकदम कठोर और भावनाहीन इंसान हैं, क्योंकि वे बहादुर और सख्त हैं।

Why it seems right

कविता में पिता को बहुत बहादुर बताया गया है — मौत और शेर से न डरने वाला, रोज़ कसरत करने वाला। इतनी कठोरता देखकर लगता है कि वे कोमल नहीं होंगे।

What actually happens

पिता बाहर से जितने कठोर हैं, भीतर से उतने ही कोमल हैं। 'वज्र-भुज नवनीत-सा उर' इसी का प्रमाण है — वे बेटे की याद में रो पड़ते हैं। बहादुरी और कोमलता दोनों उनमें साथ हैं।

⚠️ Common mistake
What students think

कविता में बार-बार पानी गिरने का ज़िक्र सिर्फ़ मौसम बताने के लिए है।

Why it seems right

कविता सच में एक बरसात वाले दिन की है, इसलिए ऊपर-ऊपर देखने पर पानी का वर्णन सिर्फ़ मौसम का वर्णन लगता है।

What actually happens

लगातार गिरता पानी कवि के मन की बेचैनी और आँसुओं का प्रतीक है। बाहर की वर्षा और भीतर की उदासी एक साथ बहती हैं — पानी यहाँ एक भाव बन जाता है, सिर्फ़ मौसम नहीं।

⚠️ Common mistake
What students think

माँ कमज़ोर और रोने-धोने वाली है, क्योंकि वह बिन-पढ़ी है।

Why it seems right

माँ का पढ़ी-लिखी न होना और एक माँ का बेटे के लिए दुखी होना — इन दोनों को जोड़कर लगता है कि वह कमज़ोर होगी।

What actually happens

माँ बिन-पढ़ी ज़रूर है, पर भीतर से बहुत मज़बूत है। कविता में वही सबको हिम्मत बँधाती है — पिता को भी और बाकी बच्चों को भी। उसका दुख सबसे बड़ा है, फिर भी वह सबसे पहले सँभलती है।

झटपट जाँच

अब तक की समझ को परखते हैं। हर सवाल का उत्तर सोचकर ही चुनिए।

कवि ने 'घर की याद' कविता कहाँ बैठकर लिखी थी?

'वज्र-भुज नवनीत-सा उर' पंक्ति पिता के व्यक्तित्व के बारे में क्या बताती है?

कवि बादल से क्यों कहता है कि घरवालों को उसके कष्ट न बताए?

अभ्यास (परीक्षा-शैली)

अब परीक्षा जैसी तैयारी करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक करके आदर्श उत्तर से मिलाइए।

लघु उत्तर

सरल

कविता में लगातार होती वर्षा कवि के किस भाव को दिखाती है? समझाइए।

सरल

'भुजा भाई प्यार बहिनें' पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

मध्यम

कविता में माँ की कैसी छवि उभरती है?

दीर्घ उत्तर / ससंदर्भ व्याख्या

मध्यम

कविता में वर्णित पिता के व्यक्तित्व की उन विशेषताओं का वर्णन कीजिए जिनसे उनका बहुआयामी (कई पहलू वाला) रूप सामने आता है।

चुनौती

'दुख डटकर ठेलता हूँ' — इस कथन के आधार पर बताइए कि कठिन परिस्थितियों में कवि किस प्रकार धैर्य, साहस और त्याग का परिचय देता है।

सारांश

इस पाठ को पढ़ने के बाद अब आप यह सब समझा सकते हैं:

  • कविता का संदर्भ — भवानीप्रसाद मिश्र ने यह कविता 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन के समय जेल में लिखी; इसका केंद्रीय भाव घर और परिवार की याद है।
  • वर्षा का प्रतीक — लगातार गिरता पानी कवि के मन की बेचैनी और आँसुओं का प्रतीक है; बाहर की बारिश और भीतर का दुख साथ बहते हैं।
  • पिता का बहुआयामी रूप — “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” — बाहर से कठोर और बहादुर, भीतर से मक्खन जैसे कोमल और भावुक।
  • माँ की दृढ़ता — बिन-पढ़ी होकर भी स्नेहमयी और भीतर से बहुत मज़बूत; वही सबको हिम्मत बँधाती है।
  • बादल — संदेशवाहक — कवि सावन के बादल को दूत बनाकर घर तक संदेश भेजता है।
  • त्याग और दुख छिपाना — कवि अपना सच्चा दुख घरवालों से छिपाता है ताकि वे चिंता में दुखी न हों; यही कविता का हृदय है।
  • काव्य-सौंदर्य — ध्वनि वाले शब्द (झर-झर, थर-थर), उपमा (नवनीत-सा उर), प्रतीक (पानी), विरोधाभास और लोकभाषा की सहजता।

आगे क्या

बधाई हो! इस पाठ के साथ आपने कक्षा 9 की हिंदी पाठ्यपुस्तक “गंगा” पूरी कर ली है। आपने कहानियाँ, निबंध और कविताएँ — सब पढ़ीं, और हर पाठ का भाव, शिल्प और संदेश गहराई से समझा। यह पूरी किताब आपको भाषा से प्यार करना और हर रचना के पीछे का “क्यों” देखना सिखाती है। अब आप अगली कक्षा की और भी गहरी रचनाओं के लिए तैयार हैं।

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Frequently Asked Questions

घर की याद कविता किसने और कहाँ लिखी थी?

यह कविता भवानीप्रसाद मिश्र ने लिखी थी। उन्होंने इसे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय जेल में रहते हुए लिखा। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तीन साल की कैद दी थी। जेल में वर्षा के दिनों में उन्हें अपने घर और परिवार की बहुत याद आती है — यही इस कविता का मूल है।

घर की याद कविता में पिता की छवि कैसी है?

पिता बाहर से बहुत कठोर और बहादुर हैं — रोज़ कसरत करते हैं, मौत या शेर से भी नहीं डरते। पर भीतर से वे मक्खन जैसे कोमल और भावुक हैं। बेटे की याद आते ही उनकी आँखें भर आती हैं। 'वज्र-भुज नवनीत-सा उर' पंक्ति उनके इसी दोहरे रूप को दिखाती है।

घर की याद में बार-बार पानी गिरने का क्या मतलब है?

लगातार बरसता पानी कवि के मन की बेचैनी और उदासी का प्रतीक है। जैसे बाहर रात-भर बारिश रुकती नहीं, वैसे ही कवि के मन में घर की याद और दुख की धारा भी रुकती नहीं। बाहर की वर्षा और भीतर के आँसू — दोनों एक साथ बहते हैं।

और कहना मस्त हूँ मैं — कवि ऐसा क्यों कहता है?

कवि अपना सच्चा दुख घरवालों से छिपाना चाहता है। वह बादल से कहता है कि घर जाकर बता देना कि मैं मज़े में हूँ, खूब खेलता-कूदता हूँ। ऐसा वह इसलिए कहता है ताकि माँ-पिता उसकी चिंता में दुखी न हों। यही उसका त्याग और प्रेम है।

घर की याद कविता में माँ का स्वभाव कैसा दिखाया गया है?

माँ बिन-पढ़ी है, पर बहुत स्नेहमयी और भीतर से बहुत मज़बूत है। वह दुख में भी हिम्मत नहीं हारती। कविता में वह दूसरों को ही धीरज बँधाती है — बेटे को भी और बाकी बच्चों को भी। उसका प्यार और उसकी दृढ़ता दोनों साथ-साथ दिखते हैं।

घर की याद कविता में सावन के बादल की क्या भूमिका है?

कवि सावन के बादल को अपना संदेशवाहक यानी दूत बनाता है। वह बादल से प्रार्थना करता है कि वह घर जाकर परिवार को धीरज दे और कवि की तरफ से यह संदेश दे कि वह ठीक है। पर बादल से यह भी कहता है कि उसके जेल के कष्ट और आँसुओं की बात घर पर मत बताना।