भारति, जय, विजय करे!

Chapter 10 · Hindi · Class 9 22 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। जब आप किसी से बहुत प्यार करते हैं, तो आप उसे कैसे देखते हैं? आपको उसका हर हिस्सा सुंदर और ख़ास लगता है।

यह कविता ठीक यही करती है। कवि अपने देश से इतना प्यार करते हैं कि उन्हें पूरा भारत एक देवी जैसा दिखने लगता है। एक ऐसी देवी, जिसके सिर पर हिमालय मुकुट है, गले में गंगा हार है, और जिसके पैर समुद्र धोता है।

यह कविता दो बातें एक साथ करती है। यह ज्ञान की देवी सरस्वती से प्रार्थना भी है, और अपने देश भारत से प्रेम का गीत भी। “भारती” शब्द दोनों को दर्शाता है।

इसे पढ़कर आप समझेंगे कि एक कवि शब्दों से कैसे चित्र बनाता है। और आपको अपना देश एक नई, सुंदर नज़र से दिखेगा। यह कविता स्वतंत्रता से पहले लिखी गई थी, जब भारत के लोग अपने देश के गौरव को याद कर हिम्मत बटोर रहे थे।

मूल भाव (The Big Idea)

मूल भाव: यह कविता माँ भारती (सरस्वती और भारतमाता, दोनों) की एक वंदना है। निराला भारत को एक जीवंत देवी के रूप में देखते हैं और उसकी जय, उन्नति और विजय की कामना करते हैं। भारत की प्रकृति, खेती और ज्ञान-परंपरा को वे उस देवी के आभूषण और वस्त्र बनाकर दिखाते हैं — ताकि देश के प्रति प्रेम और गर्व का भाव जागे।

पहले एक छोटा शब्द समझ लें, जो पूरी कविता की चाबी है।

पाठ का सार

आइए पहले पूरी कविता का भाव सरल भाषा में समझ लें। हम मूल पंक्तियाँ आगे अलग से देंगे; यहाँ बस उनका अर्थ बता रहे हैं।

कवि शुरू में ही पुकारते हैं — “हे भारती, तुम्हारी जय हो, तुम विजय पाओ!” यह “भारती” कौन है? यह सरस्वती भी है (ज्ञान की देवी) और भारतमाता भी (हमारा देश)। कवि उसे “कनक-शस्य-कमल धरे” कहते हैं — यानी सोने जैसी फसलों और कमल को धारण करने वाली। इससे भारत की खेती और संपन्नता दिखती है।

फिर कवि एक सुंदर चित्र खींचते हैं। वे कहते हैं — गरजती लहरों वाला समुद्र इस देवी के पवित्र चरणों को धोता है। श्रीलंका (लंका) उसके चरणों के नीचे कमल की तरह है। यह सारा वर्णन ऐसे की प्रशंसा है जिसमें कई गहरे अर्थ भरे हैं।

इसके बाद कवि देवी के वस्त्र और आभूषण बताते हैं। पेड़, घास, वन और लताएँ उसके वस्त्र हैं। आँचल में सुंदर फूल जड़े हैं। गले में गंगा एक चमकीले, सफ़ेद हार की तरह सुशोभित है।

अंत में कवि देवी का मुकुट और उसकी आवाज़ बताते हैं। बर्फ़ से ढका हिमालय उसका सफ़ेद, उज्ज्वल मुकुट है। उसके प्राणों में ओंकार (ॐ) की पवित्र ध्वनि बसी है। चारों दिशाएँ इस ओंकार से गूँज रही हैं। यह देश सैकड़ों मुखों और सैकड़ों आवाज़ों से भरा हुआ है — यानी अनेक भाषाएँ, अनेक विचार, अनेक संस्कृतियाँ। और फिर कवि वही पुकार दोहराते हैं — “भारती, जय, विजय करे!”

तो पूरी कविता का सार यह है — भारत सिर्फ़ ज़मीन का टुकड़ा नहीं है। वह एक जीवंत, सुंदर और पवित्र देवी है, जिसकी जय और उन्नति कवि दिल से चाहते हैं।

नीचे का चित्र इसी पूरे रूप को एक साथ दिखाता है।

भारत एक देवी के रूप में — मुकुट हिमालय, हार गंगा, वस्त्र वन-लता, आँचल में फूल, चरण धोता समुद्र
Figure 10.1 — चित्र 10.1 — कवि भारत को एक देवी के रूप में देखते हैं। सिर पर मुकुट हिमालय है (शुभ्र हिम-तुषार)। गले में हार के रूप में गंगा बहती है (धवल धार)। देवी के वस्त्र पेड़, वन और लता हैं (तरु-तृण-वन-लता), और आँचल में फूल जड़े हैं (खचित सुमन)। सबसे नीचे गरजती लहरों वाला समुद्र उसके दोनों चरण धोता है (गर्जितोर्मि सागर-जल)। इस तरह भारत की हर प्राकृतिक चीज़ देवी का कोई न कोई अंग बन जाती है।

मूल पाठ और व्याख्या

इस कविता के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का निधन 1961 में हुआ था, इसलिए यह रचना अब सार्वजनिक डोमेन में है। नीचे हम मूल कविता छंद-दर-छंद दे रहे हैं, और हर भाग के तुरंत बाद उसकी सरल व्याख्या। आप इसे अपनी ‘गंगा’ (कक्षा 9) पाठ्यपुस्तक से भी मिलाकर पढ़ सकते हैं।

अब मूल कविता को टुकड़ों में पढ़ते हैं। हर टुकड़े के नीचे उसका सरल अर्थ दिया गया है।

पहला भाग

भारति, जय, विजय करे!

कनक-शस्य-कमल धरे!

लंका पदतल-शतदल,

गर्जितोर्मि सागर-जल,

धोता शुचि चरण-युगल,

स्तव कर बहु-अर्थ भरे!

कवि माँ भारती को पुकारते हैं — “हे भारती, तुम्हारी जय हो, तुम विजय पाओ!” वे उसे “कनक-शस्य-कमल धरे” कहते हैं, यानी सोने जैसी फसलें और कमल धारण करने वाली। फिर वे एक चित्र दिखाते हैं — श्रीलंका उसके चरणों के नीचे कमल (शतदल = सौ पंखुड़ियों वाला कमल) की तरह है। गरजती लहरों वाला समुद्र (गर्जितोर्मि सागर-जल) उसके दोनों पवित्र चरण (शुचि चरण-युगल) धोता है। कवि इस देवी की ऐसी स्तुति (स्तव) करते हैं जिसमें बहुत-से गहरे अर्थ भरे हैं (बहु-अर्थ भरे)।

दूसरा भाग

तरु-तृण-वन-लता-वसन,

अंचल में खचित सुमन;

गंगा ज्योतिर्जल-कण

धवल धार हार गले।

अब कवि देवी के वस्त्र दिखाते हैं। पेड़ (तरु), घास (तृण), वन और लताएँ — ये सब उसके वस्त्र (वसन) हैं। उसके आँचल में सुंदर फूल (सुमन) जड़े (खचित) हैं। और गले में गंगा है — जिसका जल प्रकाश की तरह चमकता है (ज्योतिर्जल-कण)। यह सफ़ेद, उज्ज्वल धारा (धवल धार) देवी के गले में एक हार की तरह शोभा देती है।

तीसरा भाग

मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,

प्राण, प्रणव ओंकार,

ध्वनित दिशाएँ उदार,

शत-मुख-शत-रव-मुखरे!

भारति, जय, विजय करे!

अंत में कवि देवी का सिर और स्वर दिखाते हैं। बर्फ़ से ढका हिमालय (शुभ्र हिम-तुषार) उसका उज्ज्वल मुकुट है। उसके प्राणों में ओंकार (ॐ) की पवित्र ध्वनि — प्रणव — बसी है। चारों उदार (खुली, विशाल) दिशाएँ इसी ध्वनि से गूँज रही हैं (ध्वनित दिशाएँ उदार)। यह देश सैकड़ों मुखों और सैकड़ों आवाज़ों से मुखर है (शत-मुख-शत-रव-मुखरे) — यानी इसमें अनेक भाषाएँ, अनेक स्वर और अनेक विचार हैं। और कवि फिर वही पुकार दोहराते हैं — “भारती, जय, विजय करे!”

आइए गहराई से समझें

अब कविता के पीछे छिपी बातों को थोड़ा गहराई से देखते हैं। हम समझेंगे कि कवि क्या कहना चाहते हैं, और क्यों कहना चाहते हैं।

‘भारती’ किसकी वंदना है?

सबसे पहले एक बड़ा सवाल — यह कविता किसकी वंदना है? देश की या देवी की? असल में दोनों की। और यही इस कविता की सबसे ख़ास बात है।

नीचे का चित्र “भारती” शब्द के दोनों अर्थ साफ़ करता है।

भारती शब्द के दो अर्थ — सरस्वती (ज्ञान की देवी) और भारतमाता (देश)
Figure 10.2 — चित्र 10.2 — कविता का संबोधन 'भारती' दो अर्थ रखता है। पहला अर्थ — सरस्वती, यानी ज्ञान और वाणी की देवी; इस अर्थ में कविता एक वंदना यानी प्रार्थना है। दूसरा अर्थ — भारतमाता, यानी हमारा देश; इस अर्थ में यह देशप्रेम की कविता है। निराला दोनों अर्थ एक साथ रखते हैं, इसी से कविता और गहरी बन जाती है।

चित्र 10.2 से साफ़ है कि कवि चतुराई से दोनों भाव जोड़ देते हैं। जब वे “जय, विजय करे” कहते हैं, तो देश की उन्नति भी माँगते हैं और ज्ञान की जीत भी। एक कविता में दो प्रार्थनाएँ — यही निराला की कुशलता है।

मुख्य भाव — देशप्रेम और गर्व

इस कविता का सबसे बड़ा भाव है देशप्रेम और गर्व। पर यह कोई एक सपाट भाव नहीं है। यह कई छोटे भावों से मिलकर बना है। नीचे का भाव-जाल इन्हें एक साथ दिखाता है।

कविता का भाव-जाल — देशप्रेम के साथ प्रकृति, कृषि-संपन्नता, ज्ञान-अध्यात्म और विजय की कामना
Figure 10.3 — चित्र 10.3 — कविता का भाव-जाल। बीच में है देशप्रेम और गर्व। उससे चार भाव जुड़े हैं। एक — प्रकृति का सौंदर्य (हिमालय, गंगा, वन, फूल, समुद्र)। दो — कृषि और संपन्नता (सोने जैसी फसलें, कनक-शस्य)। तीन — ज्ञान और अध्यात्म (ओंकार-प्रणव की गूँज, सरस्वती की वंदना)। चार — विजय की कामना (भारत आगे बढ़े, जय हो)। ये चारों मिलकर भारत के प्रति प्रेम और गर्व जगाते हैं।

चित्र 10.3 दिखाता है कि निराला का देशप्रेम सिर्फ़ “मेरा देश अच्छा है” कहना नहीं है। उसमें प्रकृति की सुंदरता पर गर्व है, खेती की संपन्नता का आभार है, ज्ञान-परंपरा का सम्मान है, और देश के उज्ज्वल भविष्य की कामना है।

वक्ता और स्वर

कविता में बोलने वाला (वक्ता) स्वयं कवि निराला हैं, जो एक भक्त की तरह माँ भारती के सामने खड़े हैं।

उनका स्वर भक्ति और गर्व से भरा है। वे न तो शिकायत कर रहे हैं, न दुखी हैं। वे श्रद्धा से सिर झुकाकर अपने देश-रूपी देवी की स्तुति कर रहे हैं। यही कारण है कि कविता पढ़ते ही मन में एक ऊँचा, पवित्र भाव जागता है। शब्द भारी और संस्कृतनिष्ठ हैं, जो स्तुति को और गरिमामय बना देते हैं।

काव्य/भाषा सौंदर्य — अलंकार

अब देखते हैं कि कवि ने भाषा को इतना सुंदर कैसे बनाया। इसके लिए उन्होंने अलंकारों का प्रयोग किया है।

इस कविता में दो मुख्य अलंकार हैं। नीचे का चित्र दोनों को आसान उदाहरण के साथ समझाता है।

कविता के दो अलंकार — अनुप्रास (श वर्ण की पुनरावृत्ति) और रूपक (हिमालय = मुकुट)
Figure 10.4 — चित्र 10.4 — कविता के दो अलंकार। बाईं ओर अनुप्रास — पंक्ति 'शत-मुख-शत-रव-मुखरे' में 'श' वर्ण बार-बार आता है; एक ही ध्वनि दोहराने से पंक्ति में संगीत और लय आ जाती है। दाईं ओर रूपक — पंक्ति 'मुकुट शुभ्र हिम-तुषार' में हिमालय को सीधे भारत का मुकुट कह दिया गया है, बिना 'जैसा' लगाए; हिमालय और मुकुट को एक मान लिया गया, इसी से भारत की छवि भव्य और दिव्य बन जाती है।

चित्र 10.4 के दोनों अलंकार समझ लें:

1. अनुप्रास। जब एक ही वर्ण (अक्षर) पंक्ति में बार-बार आता है, तो उसे अनुप्रास कहते हैं। जैसे “शत-मुख-शत-रव-मुखरे” में ‘श’ की आवाज़ कई बार आती है। इससे पंक्ति गाने जैसी, लयदार बन जाती है। कवि ने इसे क्यों चुना? क्योंकि वंदना गाने या ज़ोर से पढ़ने के लिए होती है, और लय उसे कान को मीठी बना देती है।

2. रूपक। जब किसी चीज़ को सीधे दूसरी चीज़ बता दिया जाए (बिना ‘जैसा’ लगाए), तो उसे रूपक कहते हैं। जैसे “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” — यहाँ हिमालय को सीधे भारत का मुकुट कह दिया। कवि ने यह नहीं कहा कि “हिमालय मुकुट जैसा है”; उन्होंने हिमालय को मुकुट ही मान लिया। कवि ने इसे क्यों चुना? क्योंकि “जैसा” लगाने से बात कमज़ोर पड़ जाती। सीधे मुकुट कह देने से भारत की छवि एक दमकती हुई देवी जैसी, भव्य बन जाती है।

प्रकृति का मानवीकरण — कविता का दिल

अब कविता की सबसे गहरी बात। निराला भारत को निर्जीव ज़मीन नहीं रहने देते — वे उसे जीवित बना देते हैं। इसे मानवीकरण कहते हैं।

इस कविता में जगह-जगह मानवीकरण है। नीचे का चित्र तीन साफ़ उदाहरण देता है।

प्रकृति का मानवीकरण — समुद्र चरण धोता है, फूल आँचल में जड़े हैं, दिशाएँ ओंकार से गूँजती हैं
Figure 10.5 — चित्र 10.5 — कविता में प्रकृति का मानवीकरण। पहला उदाहरण — समुद्र भारत के पवित्र चरण धोता है (धोता शुचि चरण-युगल), मानो वह कोई सेवक हो जो पैर धो रहा हो। दूसरा — पेड़-वन देवी के वस्त्र हैं और फूल आँचल में जड़े हैं (अंचल में खचित सुमन), मानो देवी ने सुंदर साड़ी पहनी हो। तीसरा — चारों दिशाएँ ओंकार की ध्वनि से गूँज रही हैं (ध्वनित दिशाएँ उदार), मानो पूरा देश एक जीवंत प्राणी हो। इस तरह निराला भारत को निर्जीव भूमि नहीं, एक जीती-जागती देवी बना देते हैं।

चित्र 10.5 कविता का असली जादू दिखाता है। कवि ऐसा क्यों करते हैं? सोचिए — हम किसी ज़मीन के टुकड़े से प्यार नहीं कर पाते, पर एक माँ या देवी से सहज ही प्यार करते हैं। निराला भारत को देवी बना देते हैं, ताकि पाठक के मन में देश के लिए वही प्रेम और श्रद्धा जागे जो हम अपनी माँ के लिए रखते हैं। यही मानवीकरण का असर है।

एक छोटी जाँच करते हैं।

Concept check

कवि भारत को एक देवी (जीवित रूप) के रूप में क्यों दिखाते हैं?

भाषा की एक ख़ास बात — समास

कविता की भाषा बहुत सघन (कसी हुई) है। इसका कारण है — कवि ने बहुत-से समस्त पद (समास वाले शब्द) इस्तेमाल किए हैं।

देखिए, कवि “सोने जैसी फसलें” कहने के बजाय बस “कनक-शस्य” कह देते हैं। “सौ मुख” के बजाय “शत-मुख”। इससे कविता में बहुत-सी बात कम शब्दों में आ जाती है, और भाषा गठीली व प्रभावशाली बन जाती है। आइए एक उदाहरण पर समास-विग्रह करके देखें।

Worked example

'शतदल' शब्द का समास-विग्रह कीजिए और उसका अर्थ बताइए।

आम भ्रांतियाँ

कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें विद्यार्थी अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें।

⚠️ Common mistake
What students think

'भारती' का मतलब सिर्फ़ भारत देश है।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि 'भारती' शब्द 'भारत' से बहुत मिलता-जुलता है, और पूरी कविता देश की प्रशंसा करती दिखती है।

What actually happens

'भारती' का एक अर्थ सरस्वती (ज्ञान और वाणी की देवी) भी है। निराला 'भारती' से देश और देवी, दोनों को एक साथ संबोधित करते हैं, इसलिए यह वंदना और देशप्रेम — दोनों है।

⚠️ Common mistake
What students think

'मुकुट शुभ्र हिम-तुषार' में उपमा अलंकार है, क्योंकि हिमालय की तुलना मुकुट से की गई है।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि दोनों जगह दो चीज़ों को आपस में जोड़ा जाता है, तो तुलना और रूपक एक जैसे लगने लगते हैं।

What actually happens

यहाँ रूपक अलंकार है, उपमा नहीं। उपमा में 'जैसा/सी' लगाकर तुलना होती है। यहाँ कोई 'जैसा' नहीं है — हिमालय को सीधे मुकुट कह दिया गया, यानी दोनों को एक मान लिया गया। यही रूपक है।

⚠️ Common mistake
What students think

कविता केवल भारत की पहाड़ों-नदियों की सुंदरता का वर्णन है, इसमें कोई गहरा भाव नहीं।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कविता में बार-बार हिमालय, गंगा, समुद्र जैसी चीज़ों के नाम आते हैं, तो यह बस एक वर्णन जैसा लगता है।

What actually happens

ये सब चीज़ें केवल वर्णन नहीं हैं। कवि इनके ज़रिए भारत को एक जीवंत देवी बनाते हैं और देश के प्रति गहरा प्रेम, गर्व व विजय की कामना जगाते हैं। सुंदरता तो भाव तक पहुँचने का ज़रिया है।

⚠️ Common mistake
What students think

कविता की भाषा सरल, बोल-चाल की हिंदी है।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कविता छोटी है और गाने जैसी लयदार लगती है, तो भाषा भी आसान लगने का भ्रम होता है।

What actually happens

कविता की भाषा संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त है। 'गर्जितोर्मि', 'ज्योतिर्जल-कण', 'शत-रव-मुखरे' जैसे भारी शब्द बोल-चाल की हिंदी नहीं, बल्कि गढ़े हुए सघन शब्द हैं, जो वंदना को गरिमा देते हैं।

झटपट जाँच

अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल ध्यान से पढ़कर सही विकल्प चुनिए।

'कनक-शस्य-कमल धरे' पंक्ति भारत की किस विशेषता की ओर संकेत करती है?

'मुकुट शुभ्र हिम-तुषार' पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?

निराला भारत को एक देवी (जीवित रूप) में क्यों दिखाते हैं?

अभ्यास (परीक्षा-शैली)

अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।

लघु उत्तर

सरल

कवि ने भारत के किन-किन प्राकृतिक रूपों को देवी के आभूषण या वस्त्र बनाकर दिखाया है? कोई चार लिखिए।

सरल

शब्दार्थ लिखिए: (क) कनक (ख) शुचि (ग) धवल (घ) शुभ्र।

ससंदर्भ व्याख्या

मध्यम

निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए — 'लंका पदतल-शतदल, / गर्जितोर्मि सागर-जल, / धोता शुचि चरण-युगल!'

मध्यम

'मुकुट शुभ्र हिम-तुषार' पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट क्यों बताया गया है? समझाइए।

दीर्घ उत्तर

चुनौती

'भारति, जय, विजय करे!' कविता को 'वंदना' और 'देशप्रेम' — दोनों कैसे कहा जा सकता है? उदाहरण देकर समझाइए।

सारांश

अब आप यह सब समझा सकते हैं:

  • “भारति, जय, विजय करे!” सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की देशप्रेम और वंदना से भरी कविता है।
  • “भारती” के दो अर्थ हैं — सरस्वती (ज्ञान की देवी) और भारतमाता (देश); कवि दोनों को एक साथ संबोधित करते हैं।
  • कवि भारत को एक जीवंत देवी के रूप में देखते हैं — हिमालय मुकुट, गंगा हार, वन-लता वस्त्र, फूल आँचल के गहने और समुद्र चरण धोने वाला।
  • “कनक-शस्य-कमल धरे” भारत की खेती और संपन्नता दिखाता है।
  • कविता में दो मुख्य अलंकार हैं — अनुप्रास (एक वर्ण की पुनरावृत्ति) और रूपक (एक चीज़ को सीधे दूसरी बता देना)।
  • प्रकृति का मानवीकरण कविता का दिल है — इससे भारत निर्जीव भूमि नहीं, जीती-जागती देवी बन जाता है, और देश के लिए माँ जैसा प्रेम जागता है।
  • कविता की भाषा संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त है, जो वंदना को गरिमा देती है।
  • “शत-मुख-शत-रव-मुखरे” भारत की अनेक भाषाओं, स्वरों और विचारों की विविधता दिखाता है।

आगे क्या

माँ भारती की वंदना के बाद, अगला पाठ हमें एक सच्ची वीरांगना की कहानी सुनाएगा। अगला पाठ है पाठ 11 — झाँसी की रानी। यह सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता है, जो रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और बलिदान का ओजस्वी गान करती है। जिस भारत-देवी की जय इस पाठ में माँगी गई, उसी की रक्षा के लिए झाँसी की रानी कैसे लड़ीं — यह अगले पाठ में पढ़िए।

Frequently Asked Questions

भारति जय विजय करे कविता का सारांश क्या है?

इस कविता में निराला माँ भारती (सरस्वती और भारतमाता) की वंदना करते हैं। वे भारत को एक देवी के रूप में देखते हैं — हिमालय उसका मुकुट है, गंगा गले का हार, पेड़-वन उसके वस्त्र और समुद्र उसके चरण धोता है। कवि भारत की जय, उन्नति और विजय की कामना करते हैं।

भारति शब्द का इस कविता में क्या अर्थ है?

'भारती' के दो अर्थ हैं। एक अर्थ है सरस्वती — ज्ञान और वाणी की देवी। दूसरा अर्थ है भारतमाता — हमारा देश। निराला दोनों अर्थ एक साथ लेते हैं, इसलिए यह ज्ञान की वंदना भी है और देशप्रेम की कविता भी।

कनक-शस्य-कमल धरे का भावार्थ क्या है?

'कनक' यानी सोना और 'शस्य' यानी फसल। 'कनक-शस्य' का अर्थ है सोने जैसी सुनहरी फसलें। 'कमल धरे' यानी हे कमल धारण करने वाली। यह पंक्ति भारत की खेती और धन-धान्य की संपन्नता दिखाती है।

मुकुट शुभ्र हिम-तुषार में कौन सा अलंकार है?

यहाँ रूपक अलंकार है। कवि ने हिमालय को सीधे भारत का मुकुट कह दिया है, बिना 'जैसा' शब्द लगाए। हिमालय और मुकुट को एक मान लिया गया है, इसी से रूपक बनता है और भारत की छवि भव्य और दिव्य लगती है।

इस कविता में प्रकृति का मानवीकरण कैसे हुआ है?

कविता में निर्जीव और प्राकृतिक चीज़ों को इंसान की तरह दिखाया गया है। समुद्र भारत के चरण धोता है, फूल आँचल में जड़े हैं और दिशाएँ ओंकार से गूँजती हैं। इस तरह भारत निर्जीव भूमि नहीं, एक जीती-जागती देवी बन जाता है।

भारति जय विजय करे कविता के कवि कौन हैं?

इस कविता के कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हैं। उनका जन्म 1899 में और निधन 1961 में हुआ। वे छायावाद के प्रमुख कवि थे और छायावादियों में सबसे पहले उन्होंने मुक्त छंद का प्रयोग किया।