हरिद्वार
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए। आप किसी सुंदर जगह घूमने गए। पहाड़, नदी, मेला, मंदिर — सब देखकर मन खुश हो गया। अब घर लौटकर आप अपने दोस्त को यह सब बताना चाहें, तो कैसे बताएँगे?
आप सिर्फ़ इतना नहीं कहेंगे कि “वहाँ पहाड़ थे, नदी थी।” आप दृश्य को शब्दों में ऐसे खींचेंगे कि दोस्त भी मानो वहीं पहुँच जाए। आप यह भी बताएँगे कि देखकर आपको कैसा लगा।
यही काम इस पाठ में एक बड़े लेखक ने किया है। आज से लगभग 150 साल पहले, भारतेंदु हरिश्चंद्र हरिद्वार घूमने गए। लौटकर उन्होंने अपनी यात्रा का हाल एक पत्र में लिखा। उस पत्र को पढ़कर लगता है मानो हम भी उनके साथ हरिद्वार में खड़े हैं।
इस पाठ से आप सीखेंगे कि एक अच्छा यात्रा-वर्णन कैसे लिखा जाता है — कैसे दृश्य को शब्दों में जीवित किया जाता है, और कैसे अपने मन के भाव उसमें मिलाए जाते हैं। यह बात आपके अपने लेखन में भी काम आएगी।
मूल भाव
इस पाठ का मूल भाव है — हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता और पवित्रता का सजीव वर्णन, और उससे लेखक के मन में उठा आनंद। लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र हरिद्वार जाते हैं और एक पत्र में वहाँ का हाल लिखते हैं। वे तीन ओर के हरे पर्वत, उन पर फैली हरियाली, कलकल बहती शीतल-मीठी गंगा, हर की पैड़ी घाट, चहचहाते निडर पक्षी और संतोषी पंडे-दुकानदारों का वर्णन करते हैं। हर दृश्य उनके मन को प्रसन्न और निर्मल कर देता है, और मन में बार-बार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का भाव जगता है। साथ ही पाठ यह भी सिखाता है कि असली सुख वस्तु में नहीं, मन के संतोष में है।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने पाठ का सरल अर्थ और व्याख्या दी है। पूरा मूल गद्य (पत्र) अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 8) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। यहाँ हम मूल पंक्तियाँ हू-ब-हू नहीं छाप रहे — बस उनका भाव अपने शब्दों में खोल रहे हैं।
लेखक से परिचय
इससे पहले कि हम पाठ में उतरें, यह जान लेना अच्छा रहेगा कि इसे लिखा किसने।
इस पाठ के लेखक हैं भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885)। उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता है — यानी आज की हिंदी जिस रूप में लिखी जाती है, उसकी नींव रखने वालों में वे सबसे आगे थे।
उन्होंने कविता, नाटक, निबंध और यात्रा-वृत्तांत जैसी अनेक विधाओं में लिखा। वे कई पत्रिकाएँ भी निकालते थे, जैसे — कविवचन सुधा और हरिश्चंद्र मैगज़ीन। उनकी रचनाओं में देशप्रेम, समाज-सुधार और स्वाधीनता के स्वर मिलते हैं। उनका प्रसिद्ध नारा था — “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल” (यानी अपनी भाषा की उन्नति ही सब उन्नति की जड़ है)। उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं — सत्य हरिश्चंद्र, भारत-दुर्दशा और अंधेर नगरी।
भारतेंदु जी को यात्रा करना बहुत पसंद था। वे मानते थे कि शिक्षा सिर्फ़ किताबों से नहीं, यात्राओं से भी पूरी होती है। 1871 में वे हरिद्वार गए, और यही पाठ उसी यात्रा का वर्णन है।
पाठ का सार
आइए अब पूरे पाठ का सार धीरे-धीरे, क्रम से समझते हैं। यह पूरा पाठ एक पत्र है, जो लेखक ने अपने मित्र (पत्रिका के संपादक) को लिखा था।
पहले एक नज़र में हरिद्वार का पूरा दृश्य देख लेते हैं, ताकि आगे का वर्णन आसानी से समझ आए। नीचे का चित्र पाठ में वर्णित मुख्य चीज़ें एक साथ दिखाता है।
जैसा चित्र 4.1 दिखाता है, हरिद्वार में बहुत कुछ एक साथ है। अब पत्र का हाल क्रम से देखते हैं।
पत्र की शुरुआत। लेखक अपने मित्र (संपादक) को संबोधित करते हैं और कहते हैं — मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद हो रहा है। यह वह पुण्य भूमि है जहाँ पहुँचते ही मन शुद्ध हो जाता है।
पर्वत और वृक्ष। लेखक बताते हैं कि यह भूमि तीन ओर से सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है। पर्वतों पर तरह-तरह की हरी लताएँ फैली हैं — मानो सज्जनों की शुभ इच्छाएँ फैल रही हों। बड़े-बड़े वृक्ष ऐसे खड़े हैं मानो साधु तपस्या कर रहे हों, जो धूप, ओस और वर्षा — सब चुपचाप सहते हैं। ये वृक्ष इतने उदार हैं कि अपने फल, फूल, छाया, पत्ते, लकड़ी — सब से लोगों का काम पूरा करते हैं।
चहचहाते निडर पक्षी। इन वृक्षों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं। वे शिकारियों से बिना डरे ख़ुशी से कल्लोल (खेल-कूद) करते हैं — मानो यहाँ उन्हें कोई ख़तरा ही न हो।
अब लेखक की दृष्टि गंगा की ओर मुड़ती है, जो इस पूरे वर्णन का केंद्र है।
कलकल बहती गंगा। एक ओर पवित्र गंगा बहती है। उसकी धारा ऐसी सुंदर है मानो राजा भगीरथ के यश की लता हो। गंगा का जल बहुत शीतल (ठंडा) और मीठा है — मानो चीनी के शरबत को बर्फ़ में जमा दिया हो। जल साफ़ और सफ़ेद है। पानी के बहाव की आवाज़ बहुत होती है, इसलिए “नदी” नाम सच लगता है। ठंडी हवा गंगा के पवित्र कणों को लेकर बहती है और छूते ही मन को पावन कर देती है।
दो धाराएँ और हर की पैड़ी। यहाँ गंगा दो धाराओं में बँट जाती है — एक का नाम “नील धारा” और दूसरी गंगा जी के नाम से। नील धारा के किनारे एक छोटे पर्वत के शिखर पर चण्डिका देवी का मंदिर है। यहीं हर की पैड़ी नामक एक पक्का घाट है, जहाँ लोग स्नान करते हैं।
मेला, घाट और लोग। गंगा का पाट (चौड़ाई) छोटा है पर बहाव तेज़ है। किनारे पर राजाओं की बनवाई धर्मशालाएँ हैं, जहाँ यात्री ठहरते हैं। दुकानें भी हैं, पर रात को बंद रहती हैं। यहाँ के पंडे और दुकानदार पास के कनखल और ज्वालापुर से आते हैं।
संतोषी पंडे। लेखक एक प्यारी बात कहते हैं — यहाँ के पंडे बड़े संतोषी हैं। एक पैसे को भी वे लाख के बराबर मानकर खुश हो जाते हैं। यानी थोड़े में भी संतुष्ट रहते हैं।
लेखक का अनुभव और भोजन। लेखक कहते हैं कि वहाँ जाते ही उनका मन इतना प्रसन्न और निर्मल हो गया कि उसका वर्णन शब्दों में नहीं हो सकता। एक दिन उन्होंने गंगा-तट पर, पत्थर पर ही बैठकर, पानी के बिलकुल पास भोजन किया। ठंडे पानी के छींटे पास ही आते रहे। वे लिखते हैं कि उस पत्थर पर किए भोजन का सुख सोने की थाली के भोजन से भी कहीं बढ़कर था। मन में बार-बार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का भाव उठता रहा। वहाँ झगड़े-लड़ाई का तो नाम भी नहीं था।
पत्र का अंत। लेखक कहते हैं कि वे मन से तो अब भी वहीं बसे हुए हैं। फिर वे मित्र (संपादक) से अनुरोध करते हैं कि इस पत्र को पत्रिका में स्थान (छपने की जगह) दें। अंत में अपना नाम “यात्री — भारतेंदु हरिश्चंद्र” लिखकर पत्र समाप्त करते हैं।
तो पूरे पाठ का सार यह है — हरिद्वार का प्राकृतिक सौंदर्य और पवित्रता लेखक के मन को गहरी शांति और आनंद से भर देती है, और वे इस अनुभव को सजीव शब्दों में अपने मित्र तक पहुँचाते हैं।
आइए गहराई से समझें
अब पाठ के पीछे छिपी बातों को थोड़ा गहराई से देखते हैं। हम समझेंगे कि लेखक ने क्या किया, और क्यों किया।
यात्रा-वर्णन क्या है?
सबसे पहले एक ज़रूरी शब्द समझ लें, जो पूरे पाठ की जान है।
यह पाठ एक ख़ास तरह का यात्रा-वर्णन है — यह पत्र के रूप में लिखा गया है। लेखक अपने मित्र को सीधे संबोधित करते हैं, मानो आमने-सामने बात कर रहे हों। इससे वर्णन में अपनापन और सहजता आ जाती है।
यात्रा-वर्णन की कुछ ख़ास विशेषताएँ होती हैं। नीचे का भाव-जाल इन्हें एक साथ दिखाता है।
जैसा चित्र 4.2 दिखाता है, इस पाठ में चारों विशेषताएँ साफ़ दिखती हैं। लेखक दृश्य भी दिखाते हैं, अपने भाव भी बताते हैं, सुंदर तुलनाओं से भाषा को सजीव भी करते हैं, और पत्र की सहज शैली में लिखते भी हैं।
लेखक क्या देखता और महसूस करता है — और क्यों?
अब एक ज़रूरी बात पर ध्यान दें। लेखक जो भी देखते हैं, वह सिर्फ़ बाहर की चीज़ नहीं रहती — हर दृश्य उनके मन के भीतर एक भाव जगा देता है। यही इस यात्रा-वर्णन को गहरा बनाता है।
नीचे का चित्र दिखाता है कि लेखक हरिद्वार में क्या-क्या देखते हैं।
चित्र 4.3 हमें एक सुंदर बात बताता है। आइए कुछ दृश्यों के पीछे का “क्यों” खोलें:
पत्थर पर किया भोजन सोने की थाल से बढ़कर क्यों लगा? यह सबसे प्यारी पहेली है। सोने की थाली तो ज़्यादा कीमती है, फिर पत्थर पर किया साधारण भोजन बेहतर कैसे? इसका जवाब यह है कि सुख वस्तु से नहीं, मन की अवस्था से मिलता है। गंगा-तट पर, ठंडे छींटों के बीच, शांत और प्रसन्न मन से किया भोजन लेखक को गहरी तृप्ति दे गया। महल में बेचैन मन से खाया सोने की थाली का भोजन यह सुख नहीं दे सकता। यानी असली सुख बाहर की चीज़ में नहीं, भीतर के संतोष में है।
पक्षी निडर होकर क्यों कल्लोल करते हैं? क्योंकि लेखक को यह जगह इतनी पवित्र और शांत लगती है कि वहाँ हिंसा और डर का माहौल नहीं है। पक्षी ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हैं, इसलिए बेफ़िक्र खेलते हैं। यह दृश्य पूरी जगह की शांति को और गहरा कर देता है।
लेखक बार-बार वैराग्य और भक्ति की बात क्यों करते हैं? क्योंकि प्रकृति की शांति और पवित्रता मन को सांसारिक झगड़ों से ऊपर उठा देती है। ऐसे शांत वातावरण में मन अपने आप ईश्वर और जीवन के गहरे विचारों की ओर मुड़ जाता है। यही “वैराग्य और भक्ति का उदय” है।
एक छोटी जाँच करते हैं, ताकि यह बात पक्की हो जाए।
लेखक ने पत्थर पर किए भोजन को सोने की थाल के भोजन से बढ़कर क्यों कहा?
क्योंकि असली सुख वस्तु में नहीं, मन के संतोष और शांति में होता है। गंगा-तट पर शांत और प्रसन्न मन से किया साधारण भोजन लेखक को गहरी तृप्ति दे गया। सोने की थाली कीमती ज़रूर है, पर वह मन की वैसी शांति नहीं दे सकती। इसलिए साधारण भोजन भी उन्हें बढ़कर लगा।
भाषा-शैली — वर्णन को सजीव क्या बनाता है
अब देखते हैं कि लेखक ने इस वर्णन को इतना सजीव कैसे बना दिया। इसका राज़ उनकी भाषा-शैली में है।
1. चित्रात्मक भाषा। लेखक शब्दों से चित्र खींचते हैं। वे सिर्फ़ “जल ठंडा था” नहीं कहते; वे कहते हैं — “मानो चीनी के शरबत को बर्फ़ में जमा दिया हो।” इससे दृश्य आँखों के सामने आ जाता है।
2. उपमा (तुलना)। लेखक हर चीज़ की तुलना किसी जानी-पहचानी चीज़ से करते हैं। हरी लताओं की तुलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं से, वृक्षों की तुलना तपस्या करते साधुओं से, हरियाली की तुलना बिछे गलीचे से, और गंगा की धारा की तुलना राजा भगीरथ के यश से। इन तुलनाओं से वर्णन सुंदर और गहरा हो जाता है।
3. मानवीकरण। लेखक वृक्षों और पक्षियों को मानो इंसान बना देते हैं। वृक्ष “तपस्या करते” हैं, लताएँ “मनोरथ” रखती हैं। इससे प्रकृति जीवंत लगती है।
4. पुरानी हिंदी का रूप। यह बात ध्यान देने योग्य है। यह पत्र लगभग 150 साल पुराना है, इसलिए इसकी हिंदी आज से थोड़ी अलग है। आइए इसे एक छोटी तालिका से समझें।
पुरानी और आज की हिंदी का अंतर साफ़ करने के लिए नीचे की तालिका देखिए।
| पाठ का (पुराना) रूप | आज की हिंदी |
|---|---|
| शिषर | शिखर |
| जात्री / जात्रियों | यात्री / यात्रियों |
| स्थानदान दीजिएगा | छपने की जगह दीजिएगा |
| दृष्टि पड़ती थी | दिखाई देती थी |
इन अंतरों के बावजूद भाषा कठिन नहीं है। वह सरल, बहती हुई और चित्रों से भरी है — यही भारतेंदु जी के लेखन की ख़ासियत है।
आम भूलें
कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें बच्चे अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।
यह पाठ केवल हरिद्वार के दृश्यों की एक सूची है — पहाड़, नदी, घाट, दुकानें।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि पाठ में बहुत-सी जगहें और चीज़ें एक के बाद एक गिनाई गई हैं, तो ध्यान केवल उन वस्तुओं पर टिक जाता है।
यह सिर्फ़ चीज़ों की सूची नहीं है। यह एक यात्रा-वर्णन है, जिसमें हर दृश्य के साथ लेखक के मन के भाव भी जुड़े हैं — आनंद, शांति, भक्ति और वैराग्य। दृश्य और भाव, दोनों मिलकर पाठ बनाते हैं।
लेखक ने पत्थर पर इसलिए भोजन किया क्योंकि उनके पास सोने की थाली नहीं थी।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि आम तौर पर हम सोचते हैं कि कोई पत्थर पर तभी खाएगा जब उसके पास बर्तन या सुविधा न हो।
लेखक एक संपन्न व्यक्ति थे; उन्हें थाली की कमी नहीं थी। उन्होंने गंगा-तट पर बैठकर भोजन इसलिए किया क्योंकि उससे प्रकृति की निकटता और मन की शांति मिली। यही सुख उन्हें सोने की थाली से बढ़कर लगा।
पाठ की भाषा पुरानी और अलग है, इसलिए यह कठिन और बोझिल होगी।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि 'शिषर' या 'जात्री' जैसे अनजाने शब्द देखकर मन पहले ही मान लेता है कि पूरी भाषा मुश्किल होगी।
कुछ शब्द और वर्तनी ज़रूर पुरानी है, पर भाषा का स्वरूप सरल, चित्रात्मक और सुंदर तुलनाओं से भरा है। थोड़ा ध्यान देने पर हर दृश्य आँखों के सामने सजीव हो उठता है।
जाँचिए अपनी समझ
अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।
'हरिद्वार' पाठ किस रूप में लिखा गया है?
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हरिद्वार की अपनी यात्रा का हाल एक पत्र में ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका के संपादक को लिखकर भेजा। इसलिए यह एक पत्र-रूप यात्रा-वर्णन है।
लेखक के अनुसार हरिद्वार में गंगा का जल कैसा है?
लेखक कहते हैं कि गंगा का जल बहुत शीतल और मीठा है — मानो चीनी के शरबत को बर्फ़ में जमा दिया हो। जल साफ़ और सफ़ेद है।
लेखक ने यहाँ के पंडों के बारे में क्या ख़ास बात कही?
लेखक कहते हैं कि यहाँ के पंडे बड़े विलक्षण संतोषी हैं। वे एक पैसे को भी लाख के बराबर मानकर खुश हो जाते हैं — यानी थोड़े में संतुष्ट रहते हैं।
इस यात्रा-वर्णन की भाषा-शैली की एक मुख्य विशेषता क्या है?
लेखक की भाषा सरल और चित्रात्मक है। वे हर चीज़ की तुलना किसी जानी-पहचानी चीज़ से करते हैं — जैसे जल की मिठास की चीनी से, वृक्षों की साधुओं से। इससे वर्णन सजीव हो जाता है।
अभ्यास (श्रेणीबद्ध)
अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।
सरल
शब्दार्थ लिखिए: (क) उपवन (ख) शीतल (ग) कल्लोल (घ) निर्मल।
- उपवन — बाग़, बग़ीचा।
- शीतल — ठंडा।
- कल्लोल — आनंद से खेलना, चहल-पहल करना।
- निर्मल — साफ़, स्वच्छ; जिसमें कोई मैल न हो।
लेखक ने हरिद्वार में किन-किन चीज़ों को देखा? कोई पाँच चीज़ें लिखिए।
लेखक ने हरिद्वार में ये चीज़ें देखीं (कोई पाँच):
- तीन ओर फैले हरे-हरे पर्वत और उन पर हरी लताएँ।
- बड़े-बड़े उदार वृक्ष और उन पर चहचहाते निडर पक्षी।
- कलकल बहती शीतल और मीठी गंगा।
- हर की पैड़ी नामक पक्का घाट और स्नान करते लोग।
- किनारे पर धर्मशालाएँ, दुकानें और संतोषी पंडे-दुकानदार।
मध्यम
लेखक ने हरी लताओं, वृक्षों और गंगाजल की तुलना किन चीज़ों से की है? एक तालिका बनाकर समझाइए।
लेखक हर दृश्य की तुलना किसी जानी-पहचानी चीज़ से करते हैं, जिससे वर्णन सजीव हो जाता है। नीचे की तालिका यह साफ़ करती है:
| किसका वर्णन | किससे तुलना की | क्या भाव बनता है |
|---|---|---|
| हरी लताएँ | सज्जनों की शुभ इच्छाएँ | सौम्यता और सुंदरता |
| बड़े वृक्ष | तपस्या करते साधु | त्याग और सहनशीलता |
| हरियाली | बिछा हुआ हरा गलीचा | सुंदरता और कोमलता |
| गंगा का मीठा जल | बर्फ़ में जमा चीनी का शरबत | शीतलता और मिठास |
इन तुलनाओं (उपमाओं) से लेखक की चित्रात्मक भाषा बनती है। यही उनके यात्रा-वर्णन को सुंदर और यादगार बनाती है।
'मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।' — इस पंक्ति से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है? समझाइए।
इस पंक्ति से लेखक के मन की गहरी शांति और आध्यात्मिक आनंद का भाव प्रकट होता है। इसका अर्थ है:
- हरिद्वार पहुँचते ही लेखक का मन (चित्त) इतना प्रसन्न और साफ़ (निर्मल) हो गया कि उसे शब्दों में बताना मुश्किल है।
- यानी वहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य और पवित्रता ने उनके मन को सांसारिक चिंताओं से ऊपर उठा दिया।
- यह दिखाता है कि यात्रा-वर्णन में लेखक सिर्फ़ दृश्य नहीं बताता, बल्कि अपने भीतर के भाव भी साझा करता है।
इसी भाव के कारण आगे उनके मन में बार-बार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता है।
चुनौती
यह पाठ एक अच्छा यात्रा-वर्णन क्यों माना जाता है? अपनी कोई एक छोटी यात्रा सोचिए — आप उसका वर्णन इस पाठ से क्या-क्या सीखकर बेहतर लिख सकते हैं?
यह एक अच्छा यात्रा-वर्णन क्यों है: क्योंकि इसमें यात्रा-वर्णन की सभी ख़ूबियाँ हैं —
- लेखक सिर्फ़ चीज़ें नहीं गिनाते, बल्कि दृश्य को चित्रात्मक भाषा और सुंदर तुलनाओं से सजीव बनाते हैं।
- वे जो देखते हैं, उसके साथ अपने मन के भाव (आनंद, शांति, भक्ति) भी जोड़ते हैं।
- पत्र-शैली के कारण वर्णन में अपनापन और सहजता है।
मैं अपने वर्णन में क्या सीखकर अपना सकता/सकती हूँ:
- सिर्फ़ “वहाँ क्या था” न लिखूँ, बल्कि “देखकर मुझे कैसा लगा” भी लिखूँ।
- दृश्य की तुलना किसी जानी-पहचानी चीज़ से करूँ, ताकि पढ़ने वाला उसे आँखों के सामने देख सके।
- छोटी-छोटी बातें भी ध्यान से देखूँ — आवाज़, रंग, खुशबू, हवा — और उन्हें शब्दों में उतारूँ।
- अपनी भाषा सरल रखूँ, ताकि वर्णन सहज और बहता हुआ लगे।
इस तरह मैं अपनी साधारण यात्रा को भी एक जीवंत और रोचक वर्णन में बदल सकता/सकती हूँ।
सारांश
- ‘हरिद्वार’ पाठ भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा है, जिन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक कहा जाता है।
- यह एक पत्र-रूप यात्रा-वर्णन है। लेखक ने 1871 की अपनी हरिद्वार-यात्रा का हाल ‘कविवचन सुधा’ पत्रिका के संपादक को पत्र में लिखकर भेजा।
- यात्रा-वर्णन में लेखक तीन बातें मिलाकर लिखता है — आँखों देखा दृश्य, वहाँ का जीवन, और अपने मन के भाव।
- लेखक ने तीन ओर के हरे पर्वत, उदार वृक्ष, निडर पक्षी, शीतल-मीठी गंगा, हर की पैड़ी घाट और संतोषी पंडे-दुकानदार देखे।
- हर दृश्य ने लेखक के मन को प्रसन्न और निर्मल कर दिया; मन में बार-बार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का भाव जगा।
- लेखक ने गंगा-तट पर पत्थर पर किया भोजन सोने की थाल से बढ़कर बताया — क्योंकि असली सुख वस्तु में नहीं, मन के संतोष में होता है।
- पाठ की भाषा सरल, चित्रात्मक और सुंदर तुलनाओं (उपमाओं) से भरी है; कुछ शब्द-वर्तनी पुरानी हिंदी की हैं (जैसे शिषर, जात्री)।
आगे क्या?
हरिद्वार की इस यात्रा में हमने देखा कि प्रकृति का सौंदर्य मन को कैसे शांति और भक्ति से भर देता है। अगला पाठ हमें भक्ति और जीवन की सीख की ओर और गहराई से ले जाता है। अगला पाठ है पाठ 5 — “कबीर के दोहे”। जैसे भारतेंदु जी ने सरल शब्दों में गहरी बात कही, वैसे ही कबीर अपने छोटे-छोटे दोहों में जीवन की बड़ी सीख दे जाते हैं।
Frequently Asked Questions
हरिद्वार पाठ किसने लिखा है और यह किस रूप में लिखा गया है?
यह पाठ भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा है, जिन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक कहा जाता है। उन्होंने 1871 में हरिद्वार की यात्रा की और उसका वर्णन एक पत्र के रूप में 'कविवचन सुधा' पत्रिका के संपादक को लिखकर भेजा। इसलिए यह पाठ एक पत्र-रूप यात्रा-वर्णन है।
यात्रा-वर्णन किसे कहते हैं?
यात्रा-वर्णन वह लेखन है जिसमें लेखक किसी स्थान की अपनी यात्रा का हाल लिखता है। इसमें वह जो देखता है उसका दृश्य, वहाँ के लोग और जीवन, तथा अपने मन के भाव और विचार सब साथ-साथ लिखता है। हरिद्वार पाठ इसी का सुंदर उदाहरण है।
लेखक ने हरिद्वार में क्या-क्या देखा?
लेखक ने तीन ओर हरे-हरे पर्वत, उन पर फैली हरी लताएँ और बड़े वृक्ष देखे। उसने कलकल बहती शीतल और मीठी गंगा, हर की पैड़ी नामक पक्का घाट, वहाँ स्नान करते लोग, चहचहाते निडर पक्षी, और संतोषी पंडे-दुकानदार देखे। उसने गंगा-तट पर पत्थर पर बैठकर भोजन भी किया।
लेखक ने पत्थर पर किए भोजन को सोने की थाल से बढ़कर क्यों कहा?
क्योंकि वह सुख स्वाद से नहीं, बल्कि मन के संतोष और प्रकृति की निकटता से मिला था। गंगा-तट पर ठंडे पानी के छींटों के बीच किए साधारण भोजन ने लेखक के मन को इतनी शांति दी कि वह सोने की थाली के भोजन से भी ऊँचा लगा। इससे पता चलता है कि असली सुख वस्तु में नहीं, मन में होता है।
इस पाठ की भाषा आज की हिंदी से कैसे अलग है?
इस पत्र की हिंदी लगभग 150 साल पुरानी है, इसलिए कुछ शब्द और वर्तनी आज से अलग हैं, जैसे 'शिखर' के लिए 'शिषर' और 'यात्रियों' के लिए 'जात्रियों'। फिर भी भाषा सरल, चित्रात्मक और तुलनाओं से भरी है, जिससे हर दृश्य आँखों के सामने सजीव हो उठता है।