कबीर के दोहे

Chapter 5 · Hindi · Class 8 22 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। आपने कभी न कभी सुना होगा — “जैसा संग, वैसा रंग।” या “सच की हमेशा जीत होती है।” ये छोटी-छोटी बातें कहाँ से आईं?

इनमें से कई बातें सैकड़ों साल पहले एक कवि ने कही थीं। उनका नाम है कबीर। वे एक जुलाहे थे — करघे पर कपड़ा बुनते थे। पर साथ-साथ वे अपने मन में कविता भी बुनते रहते थे।

कबीर ने बड़ी-बड़ी बातें बहुत सरल शब्दों में कह दीं। उनके दोहे आज भी लोग गाते हैं, सुनाते हैं और याद रखते हैं। हर दोहा सिर्फ़ दो पंक्तियों का होता है, पर उसमें जीवन की एक गहरी सीख छिपी होती है।

इस पाठ में हम कबीर के आठ दोहे पढ़ेंगे। ये हमें सिखाते हैं — कैसे सच्चा, सीधा और अच्छा इंसान बना जाए। गुरु का आदर, सत्य का बल, हर बात में संतुलन, मीठी वाणी, अपनी आलोचना सुनना, अच्छे-बुरे की पहचान, दूसरों के काम आना और सही संगति चुनना। पढ़ने के बाद ये बातें आपको जीवन भर काम आएँगी।

मूल भाव

इन दोहों का मूल भाव है — जीवन को सीधा, सच्चा और अच्छा कैसे जिएँ। कबीर भारी-भरकम शब्द नहीं इस्तेमाल करते। वे रोज़मर्रा की चीज़ों — सूप, खजूर का पेड़, धूप-बारिश, साबुन-पानी — से उदाहरण देकर गहरी बात समझा देते हैं। हर दोहा एक नीति यानी जीने का एक छोटा नियम देता है। साथ ही इनमें भक्ति का भाव भी है — गुरु और ईश्वर के प्रति आदर। कुल मिलाकर ये दोहे एक अच्छे इंसान बनने का रास्ता दिखाते हैं।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने हर दोहे का सरल अर्थ और व्याख्या अपने शब्दों में दी है। पूरे मूल दोहे अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 8) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। यहाँ हम सिर्फ़ कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ ही उद्धृत कर रहे हैं — बाकी का भाव अपने शब्दों में खोल रहे हैं।

कवि से परिचय

इससे पहले कि हम दोहों में उतरें, यह जान लेना अच्छा रहेगा कि इन्हें कहा किसने।

इन दोहों के रचयिता हैं संत कबीर। माना जाता है कि उनका जन्म चौदहवीं शताब्दी में काशी (आज का वाराणसी) में हुआ था। वे पेशे से एक जुलाहे थे — कपड़ा बुनकर अपना जीवन चलाते थे।

कबीर ने कभी कोई बड़ी पढ़ाई नहीं की। पर उन्होंने जीवन को बहुत गहराई से देखा और समझा। उन्होंने जो सीखा, उसे बेहद सरल भाषा में कह दिया — ऐसी भाषा जो आम आदमी की थी। उनकी रचनाएँ मुख्यतः कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं। आज भी उनके दोहे और भजन लोगों को सच्चाई समझने और अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देते हैं।

हर दोहे का भावार्थ

आइए अब एक-एक दोहे का भाव समझते हैं। ध्यान रखिए — हम मूल दोहा हू-ब-हू नहीं छाप रहे; हम उसका भाव अपने शब्दों में खोल रहे हैं। आप इसे अपनी पाठ्यपुस्तक के दोहों के साथ मिलाकर पढ़िए।

दोहा 1 — सत्य का बल

कबीर कहते हैं — सच बोलने से बड़ी कोई तपस्या नहीं, और झूठ बोलने से बड़ा कोई पाप नहीं। जिस इंसान के हृदय में सच्चाई बसती है, उसके भीतर मानो गुरु स्वयं विराजमान रहते हैं।

यानी सच्चाई अपने आप में एक बड़ी साधना है। सच बोलने वाले को कहीं और तप करने की ज़रूरत नहीं — उसका हृदय खुद पवित्र और प्रकाशित रहता है।

दोहा 2 — बड़ा होना ही काफ़ी नहीं

इस दोहे में कबीर एक सुंदर उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं — खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, पर उससे फ़ायदा क्या? उसकी छाया इतनी ऊपर रहती है कि थके राहगीर (पंथी) को छाया नहीं मिलती। और उसके फल इतने ऊँचे लगते हैं कि आसानी से तोड़े नहीं जा सकते।

मतलब साफ़ है — सिर्फ़ बड़ा या ऊँचा हो जाना काफ़ी नहीं। असली बड़ापन तब है जब आप दूसरों के काम आएँ। ऊँचा पद या धन तभी सार्थक है, जब उससे किसी का भला हो।

दोहा 3 — गुरु का महत्व

यह कबीर का बहुत प्रसिद्ध दोहा है। इसकी पंक्तियाँ हैं —

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।

कबीर पूछते हैं — अगर गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों मेरे सामने एक साथ खड़े हों, तो मैं पहले किसके पैर छुऊँ? फिर वे खुद जवाब देते हैं — मैं अपने गुरु पर न्यौछावर हूँ, क्योंकि उन्होंने ही मुझे ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता बताया। इसलिए पहले गुरु को प्रणाम।

यहाँ कबीर गुरु को ईश्वर से भी पहले स्थान देते हैं। क्यों? क्योंकि गुरु के बिना तो हमें ईश्वर का पता ही नहीं चलता। ज्ञान देने वाले का स्थान सबसे ऊँचा है।

दोहा 4 — हर बात में संतुलन

इस दोहे में एक ही शब्द बार-बार आता है — “अति”। अति यानी हद से ज़्यादा। कबीर कहते हैं — न बहुत बोलना अच्छा है, न बिल्कुल चुप रहना अच्छा है। न बहुत बारिश अच्छी है, न बहुत तेज़ धूप।

सीख यह है कि किसी भी चीज़ की अति बुरी होती है। जीवन में संतुलन ज़रूरी है। न इतना बोलो कि लोग परेशान हो जाएँ, न इतना चुप रहो कि कोई समझ ही न पाए। हर बात बीच के रास्ते में अच्छी लगती है।

दोहा 5 — मधुर वाणी

कबीर कहते हैं — ऐसी मीठी बात बोलनी चाहिए जिसमें अपने मन का अहंकार (आपा) छूट जाए। ऐसी वाणी दूसरों को भी शीतल यानी शांत करती है, और बोलने वाले को भी भीतर से ठंडक और सुकून देती है।

यानी मीठा बोलने का फ़ायदा दोनों को होता है — सुनने वाले को भी और बोलने वाले को भी। कठोर शब्द झगड़ा बढ़ाते हैं; मीठे शब्द मन को शांति देते हैं।

दोहा 6 — आलोचना सुनो

यह दोहा एक चौंकाने वाली सलाह देता है। कबीर कहते हैं — अपनी निंदा करने वाले (निंदक) को अपने पास ही रखो, अपने आँगन में उसके लिए झोपड़ी बनवा दो। क्यों? क्योंकि वह बिना पानी और बिना साबुन के ही हमारे स्वभाव को साफ़ (निर्मल) कर देता है।

मतलब — जो हमारी गलतियाँ बताता है, वह हमारा सबसे बड़ा हितैषी है। उसकी बात बुरी लगती है, पर वह हमें सुधरने का मौका देता है। इसलिए आलोचना से चिढ़ने के बजाय उसका स्वागत करना चाहिए।

दोहा 7 — विवेक का सूप

कबीर कहते हैं — साधु यानी अच्छा इंसान सूप जैसा होना चाहिए। सूप वह बाँस का बना औज़ार है जिससे गाँव में अनाज साफ़ किया जाता है। सूप क्या करता है? सार-सार को पकड़ रखता है और थोथा (हल्का, बेकार भूसा) उड़ा देता है।

यानी अच्छे इंसान में विवेक होना चाहिए — सही और गलत पहचानने की समझ। वह अच्छी बात (सार) को अपना लेता है और बेकार बात (थोथा) को छोड़ देता है।

दोहा 8 — संगति का असर

आख़िरी दोहे की दूसरी पंक्ति बहुत प्रसिद्ध है — “जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।” कबीर कहते हैं कि मन एक पंछी की तरह है, जिधर चाहे उड़ जाता है। और जो इंसान जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।

मतलब — अच्छी संगति में रहोगे तो अच्छे बनोगे, बुरी संगति में रहोगे तो बिगड़ जाओगे। इसीलिए सोच-समझकर अपने मित्र और अपनी संगति चुननी चाहिए।

आइए गहराई से समझें

अब इन दोहों के पीछे की बातों को थोड़ा गहराई से देखते हैं। हम समझेंगे कि कबीर ने क्या कहा, और हर सीख के पीछे का क्यों क्या है।

दोहा क्या होता है — छंद की रचना

सबसे पहले यह समझ लें कि “दोहा” है क्या। यह आगे काम आएगा।

नीचे का चित्र दोहे की इसी रचना को साफ़-साफ़ दिखाता है।

दोहे की संरचना — दो पंक्तियाँ, हर पंक्ति के दो भाग, पहला भाग 13 मात्रा, दूसरा भाग 11 मात्रा, अंत में तुक
Figure 5.1 — चित्र 5.1 — दोहे की संरचना। ऊपर पहली पंक्ति है और नीचे दूसरी पंक्ति। हर पंक्ति के दो भाग दिखाए गए हैं — नीले रंग का पहला भाग (13 मात्रा) और हरे रंग का दूसरा भाग (11 मात्रा)। दायीं ओर की लाल टूटी रेखा बताती है कि दोनों पंक्तियों के अंत में तुक मिलती है, यानी आवाज़ मेल खाती है। पीले बक्से में समझाया गया है कि मात्रा ध्वनि की नाप है — छोटी ध्वनि एक मात्रा, लंबी ध्वनि दो मात्रा; और हर भाग में अक्षर नहीं, मात्राएँ गिनी जाती हैं। सबसे नीचे एक उदाहरण से पूरी बात दोहराई गई है।

जैसा चित्र 5.1 दिखाता है, दोहा बहुत छोटा छंद है — सिर्फ़ दो पंक्तियाँ। इतने छोटे आकार में इतनी बड़ी बात कह देना ही कबीर की कला है।

कबीर की भाषा — सीधी-सादी, पर असरदार

अब एक बात पर ध्यान दीजिए। कबीर बड़े-बड़े शब्द नहीं इस्तेमाल करते। वे आम बोलचाल की भाषा में लिखते हैं।

सोचिए — गुरु का महत्व समझाने के लिए वे कोई भारी उपदेश नहीं देते। वे बस एक सीधा सवाल पूछ देते हैं — “गुरु और ईश्वर दोनों खड़े हों, तो पहले किसके पैर छुऊँ?” यह सवाल इतना सहज है कि एक बच्चा भी समझ जाए।

इसी तरह संतुलन समझाने के लिए वे धूप, बारिश और बोलने-चुप रहने का उदाहरण देते हैं — ऐसी चीज़ें जो हर किसी ने देखी हैं। यही कबीर की ताक़त है: रोज़मर्रा की चीज़ों से गहरी बात समझा देना। इसीलिए उनके दोहे आज भी सबको याद रहते हैं।

हर दोहे का संदेश — एक नज़र में

ये आठों दोहे अलग-अलग बातें कहते हैं, पर सबका एक ही मक़सद है — एक अच्छा इंसान बनना। नीचे का चित्र सभी आठ संदेशों को एक साथ दिखाता है।

कबीर के आठ दोहों के नीति-संदेश — गुरु का महत्व, सत्य, संतुलन, मधुर वाणी, आलोचना सुनना, विवेक, परोपकार और अच्छी संगति
Figure 5.2 — चित्र 5.2 — कबीर के दोहों के नीति-संदेश। बीच में कबीर हैं और उनके चारों ओर आठ दोहों की मुख्य सीख दी गई है। गुरु का महत्व (गुरु राह दिखाता है), सत्य का बल (सच सबसे बड़ी तपस्या), संतुलन (अति किसी की भली नहीं), मधुर वाणी (मीठा बोलो, शांति पाओ), आलोचना सुनो (निंदक को पास रखो), विवेक (सार चुनो, कचरा छोड़ो), परोपकार (दूसरों के काम आओ) और अच्छी संगति (जैसा संग, वैसा रंग)। हर रेखा एक दोहे को कबीर से जोड़ती है। नीचे लिखा है कि हर दोहा जीवन जीने का एक सरल सूत्र देता है।

चित्र 5.2 से साफ़ है कि कबीर ने जीवन के अलग-अलग पहलुओं को छुआ है — रिश्ते, सच्चाई, स्वभाव, वाणी और संगति। हर दोहा एक छोटा-सा सूत्र है, जिसे अपनाकर हम बेहतर इंसान बन सकते हैं।

सूप का राज़ — विवेक का क्या मतलब है?

अब एक दोहे को थोड़ा और खोलते हैं, क्योंकि इसमें एक गहरी बात छिपी है। दोहा 7 में कबीर कहते हैं कि अच्छा इंसान “सूप जैसा” होना चाहिए। पर सूप जैसा क्यों? इसका क्यों समझना ज़रूरी है।

सोचिए, गाँव में अनाज कैसे साफ़ होता है। अनाज में भूसा (छिलका) मिला होता है। किसान सूप में अनाज लेकर उसे हवा में हल्के-से उछालता है। तब क्या होता है? भारी अनाज नीचे, सूप में ही रह जाता है। हल्का भूसा हवा में उड़ जाता है। इस तरह अनाज साफ़ हो जाता है।

नीचे का चित्र यही दिखाता है।

सूप का प्रतीक — भारी अनाज (सार) सूप में रह जाता है, हल्का भूसा (थोथा) हवा में उड़ जाता है
Figure 5.3 — चित्र 5.3 — सूप का प्रतीक। बीच में सूप दिखाया गया है, जो बाँस से बना एक औज़ार है। उसमें हरे रंग के दाने भारी अनाज हैं, जो सार यानी अच्छी बात का प्रतीक हैं — ये सूप में ही रह जाते हैं (नीचे हरे बक्से में लिखा है)। दायीं ओर हवा के साथ उड़ते लाल कण थोथा यानी हल्के भूसे का प्रतीक हैं — ये बेकार बात की तरह उड़ जाते हैं (ऊपर लाल बक्से में लिखा है)। टूटी हुई रेखा वाला तीर हवा की दिशा बताता है। संदेश यह है कि जैसे सूप अनाज और भूसे को अलग करता है, वैसे ही विवेक अच्छी और बुरी बात को अलग करता है।

अब कबीर की बात समझ में आती है। जैसा चित्र 5.3 दिखाता है, सूप अपने आप अच्छे को रख लेता है और बेकार को छोड़ देता है। इसी को कहते हैं विवेक — सही और गलत को पहचानने की समझ। एक अच्छे इंसान को भी ऐसा ही होना चाहिए। दुनिया में अच्छी-बुरी, सच्ची-झूठी, बहुत-सी बातें आती हैं। समझदार वही है जो अच्छी बात अपना ले और बेकार बात छोड़ दे।

एक छोटी जाँच करते हैं, ताकि यह बात पक्की हो जाए।

Concept check

कबीर अच्छे इंसान को 'सूप जैसा' क्यों कहते हैं?

संगति का असर — मन पंछी क्यों कहा?

आख़िरी दोहे में भी एक गहरी बात है। कबीर मन को “पंछी” कहते हैं। ऐसा क्यों?

सोचिए, पंछी का क्या स्वभाव है — वह जिधर चाहे उड़ जाता है। उसे रोकना मुश्किल है। हमारा मन भी ऐसा ही है। वह किसी भी विचार, किसी भी संगति की ओर खिंच जाता है। अच्छी संगति मिले तो अच्छी ओर, बुरी मिले तो बुरी ओर।

नीचे का चित्र यह दिखाता है कि संगति का असर कैसे पड़ता है।

संगति का असर — मन पंछी की तरह; अच्छी संगति से अच्छा फल, बुरी संगति से बुरा फल
Figure 5.4 — चित्र 5.4 — जैसी संगति, वैसा फल। बीच में पीले घेरे में मन है, जिसे पंछी कहा गया है — यह जिधर चाहे उड़ जाता है। बायीं ओर हरी राह है — अच्छी संगति (अच्छे मित्र, अच्छी आदतें), जिससे अच्छा फल मिलता है (सही राह, अच्छा स्वभाव)। दायीं ओर लाल राह है — बुरी संगति (ग़लत संगत, ग़लत आदतें), जिससे बुरा फल मिलता है (ग़लत राह, बिगड़ा स्वभाव)। नीचे लिखा है कि मन पंछी की तरह जिधर चाहे उड़ता है, इसलिए सही संगति खुद चुननी पड़ती है।

चित्र 5.4 से बात साफ़ हो जाती है। चूँकि मन खुद को आसानी से नहीं रोक पाता, इसलिए हमें सोच-समझकर अपनी संगति चुननी पड़ती है। अगर हम अच्छे लोगों के बीच रहेंगे, तो हमारा मन भी अच्छी ओर बहेगा। यही “जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय” का असली अर्थ है। इसी बात से एक प्रसिद्ध कहावत बनी — “जैसा संग, वैसा रंग।“

आम भूलें

कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें बच्चे अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।

⚠️ Common mistake
What students think

'निंदक नियरे राखिए' का मतलब है कि हमें खुद दूसरों की निंदा करते रहना चाहिए।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि दोहे में 'निंदक' शब्द आता है, और निंदा का मतलब बुराई करना होता है — तो पहली नज़र में लगता है कि कबीर निंदा करने को कह रहे हैं।

What actually happens

कबीर निंदा करने को नहीं, बल्कि अपनी निंदा सुनने को कह रहे हैं। निंदक यानी जो हमारी गलतियाँ बताता है, उसे पास रखो — क्योंकि वह हमें सुधरने का मौका देता है। बात आलोचना सहने और उससे सीखने की है, किसी की बुराई करने की नहीं।

⚠️ Common mistake
What students think

'अति का भला न बोलना' का मतलब है कि हमें हमेशा चुप ही रहना चाहिए।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि दोहे में बोलने को मना किया गया लगता है, तो ध्यान सिर्फ़ 'बोलना मना है' पर चला जाता है और बाकी पंक्ति छूट जाती है।

What actually happens

कबीर सिर्फ़ बोलने को नहीं, हर अति को मना कर रहे हैं — बहुत बोलना भी बुरा और बहुत चुप रहना भी बुरा। असली सीख संतुलन की है, चुप रहने की नहीं।

⚠️ Common mistake
What students think

'बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर' का मतलब है कि खजूर का पेड़ बेकार होता है।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कबीर खजूर के पेड़ की कमी (न छाया, न आसानी से मिलने वाले फल) गिनाते हैं, तो लगता है वे पेड़ को बुरा बता रहे हैं।

What actually happens

कबीर खजूर के पेड़ को बुरा नहीं कह रहे। वे उसे सिर्फ़ एक उदाहरण की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं — यह समझाने के लिए कि सिर्फ़ बड़ा या ऊँचा होना काफ़ी नहीं, असली बड़ापन दूसरों के काम आने में है।

जाँचिए अपनी समझ

अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।

'साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय' दोहे में 'सूप' किसका प्रतीक है?

'अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप' दोहे का मूल संदेश क्या है?

'गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय' दोहे में किसका महत्व बताया गया है?

'बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर' दोहा किस जीवन-मूल्य पर बल देता है?

अभ्यास (श्रेणीबद्ध)

अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।

सरल

सरल

शब्दार्थ लिखिए: (क) सार (ख) थोथा (ग) निंदक (घ) पंथी।

सरल

दोहा क्या होता है? इसकी एक खास बात बताइए।

मध्यम

मध्यम

'अच्छी संगति' और 'बुरी संगति' में क्या फ़र्क़ है? कबीर के दोहे के आधार पर एक छोटी तालिका बनाकर समझाइए।

मध्यम

'निंदक नियरे राखिए' — कबीर अपनी आलोचना करने वाले को पास रखने को क्यों कहते हैं? अपने शब्दों में समझाइए।

चुनौती

चुनौती

कबीर अपनी गहरी बातें इतनी आसानी से कैसे समझा देते हैं? इन दोहों से दो उदाहरण देकर बताइए, और सोचिए कि इससे हम क्या सीख सकते हैं।

सारांश

  • ये दोहे संत कबीर के हैं, जो चौदहवीं शताब्दी के एक जुलाहे और महान कवि थे। उन्होंने गहरी बातें बहुत सरल भाषा में कहीं।
  • दोहा एक छंद है जिसमें सिर्फ़ दो पंक्तियाँ होती हैं; हर पंक्ति के दो भाग (13 और 11 मात्रा) होते हैं और अंत में तुक मिलती है।
  • सत्य का बल — सच बोलना सबसे बड़ी तपस्या है; सच्चे हृदय में मानो गुरु बसते हैं।
  • बड़ा होना ही काफ़ी नहीं — खजूर के पेड़ की तरह सिर्फ़ ऊँचा होना बेकार है; असली बड़ापन दूसरों के काम आने में है।
  • गुरु का महत्व — गुरु को ईश्वर से भी पहले प्रणाम, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर तक का रास्ता बताया।
  • संतुलन — किसी भी चीज़ की ‘अति’ बुरी है; न बहुत बोलना, न बहुत चुप; न बहुत धूप, न बहुत बारिश।
  • मधुर वाणी — मीठा बोलने से दूसरे भी शांत होते हैं और हम खुद भी।
  • आलोचना सुनो — निंदक को पास रखो; वह बिना पानी-साबुन के हमारे स्वभाव को साफ़ कर देता है।
  • विवेक — अच्छा इंसान सूप जैसा हो — सार (अच्छी बात) रखे, थोथा (बेकार बात) छोड़ दे।
  • संगति — मन पंछी की तरह है; जैसी संगति करोगे, वैसा फल पाओगे — इसलिए सही संगति चुनो।

आगे क्या?

कबीर के इन सीधे-सादे दोहों ने हमें जीने का रास्ता दिखाया। अगला पाठ हमें ज़मीन और मिट्टी से जुड़ी एक भावुक कहानी की ओर ले जाता है। अगला पाठ है पाठ 6 — “एक टोकरी भर मिट्टी”। जैसे कबीर ने छोटी-छोटी चीज़ों में बड़ी सीख दिखाई, वैसे ही अगली कहानी में हम देखेंगे कि एक मुट्ठी मिट्टी में कितना गहरा भाव छिपा हो सकता है।

Frequently Asked Questions

कबीर के दोहे कक्षा 8 का मूल भाव क्या है?

इन दोहों का मूल भाव है — सीधा-सादा और सच्चा जीवन कैसे जिएँ। कबीर गुरु का आदर करने, सत्य बोलने, हर बात में संतुलन रखने, मीठी वाणी बोलने, अपनी आलोचना सुनने, अच्छे-बुरे में फ़र्क़ करने, दूसरों के काम आने और अच्छी संगति चुनने की सीख देते हैं। हर दोहा जीवन का एक छोटा सूत्र है।

साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय दोहे में सूप किसका प्रतीक है?

इस दोहे में 'सूप' विवेक यानी सही-गलत पहचानने की समझ का प्रतीक है। जैसे सूप अनाज को साफ करते समय भारी अनाज (सार) को पास रखता है और हल्का भूसा (थोथा) उड़ा देता है, वैसे ही समझदार व्यक्ति अच्छी बात अपनाता है और बेकार बात छोड़ देता है।

निंदक नियरे राखिए दोहे का अर्थ क्या है?

इस दोहे में कबीर कहते हैं कि अपनी आलोचना करने वाले (निंदक) को अपने पास रखना चाहिए। जो हमारी गलतियाँ बताता है, वह बिना पानी और साबुन के ही हमारे स्वभाव को निर्मल यानी साफ कर देता है। आलोचना से चिढ़ने के बजाय उससे सुधरने का मौका लेना चाहिए।

अति का भला न बोलना दोहे से क्या सीख मिलती है?

इस दोहे से यह सीख मिलती है कि किसी भी चीज़ की अति यानी हद से ज़्यादा होना अच्छा नहीं। न बहुत बोलना अच्छा है, न बिल्कुल चुप रहना; न बहुत बारिश अच्छी है, न बहुत धूप। जीवन में हर बात में संतुलन ज़रूरी है।

गुरु गोविंद दोऊ खड़े दोहे में किसे बड़ा बताया गया है?

इस दोहे में गुरु को ईश्वर (गोविंद) से भी पहले प्रणाम करने को कहा गया है। कबीर कहते हैं कि गुरु बड़ा है, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता दिखाया। ज्ञान देने वाले का स्थान सबसे ऊँचा माना गया है।