एक आशीर्वाद

Chapter 3 · Hindi · Class 8 18 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। जब आप कोई नया काम शुरू करते हैं — पहली बार साइकिल चलाना, स्कूल में किसी प्रतियोगिता में भाग लेना — तब घर के बड़े क्या कहते हैं? वे कहते हैं, “जा, मेहनत कर, तू ज़रूर कर पाएगा।” यही तो आशीर्वाद है।

आशीर्वाद सिर्फ़ शब्द नहीं होते। उनमें किसी बड़े का प्यार और भरोसा छिपा होता है। वे कहते हैं — “मुझे तुझ पर यक़ीन है।”

यह कविता ऐसा ही एक आशीर्वाद है। इसमें एक पिता अपने नन्हे बच्चे को आशीर्वाद देता है। पर ध्यान दीजिए, वह यह नहीं कहता कि “तू आराम से रह, कोई तकलीफ़ न आए।” वह कुछ अलग कहता है — “तेरे सपने बड़े हों।”

इसी में इस कविता की खूबसूरती है। यह हमें सिखाती है कि बड़ा सपना देखना ही काफ़ी नहीं — उसे हक़ीक़त में उतारना, मेहनत करना और अपने पाँवों पर खड़ा होना भी ज़रूरी है। यह बात आज हर युवा के लिए उतनी ही सच है। पढ़ने के बाद आपको समझ आएगा कि सपने और मेहनत किस तरह साथ-साथ चलते हैं।

मूल भाव

इस कविता का मूल भाव है — एक पिता का अपने बच्चे को आशीर्वाद कि उसके सपने बड़े हों। पिता चाहता है कि बच्चा सिर्फ़ कल्पना में न खोया रहे, बल्कि जल्द हक़ीक़त की ज़मीन पर चलना सीखे। वह चाँद-तारों जैसे ऊँचे और कठिन लक्ष्यों के लिए हठ करे, हँसे-गाए, हर नई बात सीखने के लिए ललचाए, चोट खाने से न डरे, और अंत में अपने पाँवों पर खड़ा होकर आत्मनिर्भर बने। यह बड़ों के प्यार और भरोसे से भरी एक शुभकामना है।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने कविता का सरल अर्थ और व्याख्या अपने शब्दों में दी है। पूरी मूल कविता अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 8) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। यहाँ हम मूल पंक्तियाँ दोबारा नहीं छाप रहे — बस उनका भाव खोल रहे हैं।

कवि से परिचय

इससे पहले कि हम कविता में उतरें, यह जान लेना अच्छा रहेगा कि इसे लिखा किसने।

इस कविता के कवि हैं दुष्यंत कुमार (1933–1975)। वे हिंदी के बहुत लोकप्रिय रचनाकारों में से एक थे। उनका जन्म बिजनौर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। बहुत कम समय में ही उन्होंने हिंदी साहित्य को कई तरह की रचनाओं और जीवंत (जान से भरी) भाषा से समृद्ध कर दिया।

उनका सबसे चर्चित ग़ज़ल-संग्रह “साये में धूप” है। उनकी सभी रचनाएँ दुष्यंत कुमार रचनावली नाम से चार खंडों में छपी हैं। उनकी भाषा सीधी और दिल को छूने वाली है — और इसी कविता में आप यह बात महसूस करेंगे।

कविता का भावार्थ

आइए अब कविता का भाव धीरे-धीरे, क्रम से समझते हैं। पूरी कविता में एक पिता अपने नन्हे बच्चे से बात कर रहा है, मानो उसे जीवन की राह दिखा रहा हो।

“जा, तेरे स्वप्न बड़े हों।” पिता बच्चे को आगे बढ़ने के लिए कहता है — “जा।” और साथ में सबसे बड़ा आशीर्वाद देता है — “तेरे सपने बड़े हों।” यहाँ स्वप्न का मतलब नींद का सपना नहीं है। इसका मतलब है बच्चे की चाहतें, उसके लक्ष्य, उसकी आकांक्षाएँ। पिता चाहता है कि बच्चा छोटी सोच में न रहे, बल्कि बड़ा सोचे।

“भावना की गोद से उतरकर, जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।” पिता कहता है कि सपने सिर्फ़ मन के अंदर, भावनाओं की गोद में मत पड़े रहो। उन्हें जल्द हक़ीक़त की ज़मीन पर उतारो। यानी सिर्फ़ कल्पना मत करो — असल जीवन में मेहनत करके उन्हें पूरा करो।

“चाँद-तारों-सी अप्राप्य सच्चाइयों के लिए, रूठना-मचलना सीखें।” अप्राप्य यानी जो आसानी से न मिले। चाँद और तारे बहुत ऊँचे और दूर हैं — उन्हें पाना बहुत मुश्किल लगता है। पिता चाहता है कि बच्चा ऐसे ही ऊँचे, कठिन लक्ष्यों के लिए रूठे और मचले — यानी ज़िद करे, हठ करे। जैसे बच्चा मनचाही चीज़ के लिए ज़िद करता है, वैसे ही वह अपने बड़े सपनों के लिए ज़िद करे और तब तक न रुके जब तक उन्हें पा न ले।

“हँसें, मुसकराएँ, गाएँ।” पिता चाहता है कि बच्चा यह सब हँसते-मुसकराते, गाते हुए करे। यानी मेहनत के रास्ते में खुशी भी बनी रहे, मनोबल बना रहे। कठिनाई आए तब भी मुस्कान न छूटे।

“हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ, उँगली जलाएँ।” यहाँ दीये की रोशनी नई बातों और ज्ञान की प्रतीक है। पिता चाहता है कि बच्चा हर नई बात देखकर ललचाए — यानी उसे जानने-सीखने की चाह रखे। और अगर सीखने की कोशिश में उँगली जल भी जाए — यानी कोई चोट या असफलता मिले — तो भी डरे नहीं। सीखने के लिए जोखिम लेने से मत घबराओ।

“अपने पाँवों पर खड़े हों।” आख़िर में पिता सबसे ज़रूरी बात कहता है — बच्चा अपने पैरों पर खड़ा हो, यानी आत्मनिर्भर बने। किसी का सहारा लेकर नहीं, अपनी ताक़त से जीवन में आगे बढ़े।

“जा, तेरे स्वप्न बड़े हों।” कविता उसी पंक्ति पर लौटकर ख़त्म होती है। पिता फिर से वही आशीर्वाद दोहराता है, ताकि यह बात बच्चे के मन में पक्की बैठ जाए।

तो पूरी कविता का सार यह है — एक पिता अपने बच्चे को सबसे सुंदर आशीर्वाद देता है : बड़ा सोचो, उसे हक़ीक़त में उतारो, मेहनत करो, सीखने से मत डरो और आत्मनिर्भर बनो।

आइए गहराई से समझें

अब कविता के पीछे छिपी बातों को थोड़ा गहराई से देखते हैं। हम समझेंगे कि कवि ने क्या कहा, और इसके पीछे का क्यों

मुख्य भाव — आशीर्वाद के चार धागे

यह छोटी-सी कविता एक पिता का आशीर्वाद है, पर इसमें एक साथ कई बातें बुनी हुई हैं। नीचे का भाव-जाल इन्हें एक साथ दिखाता है।

कविता का भाव-जाल — बीच में पिता का आशीर्वाद, चारों ओर चार भाव
Figure 3.1 — चित्र 3.1 — कविता का भाव-जाल। बीच में पिता का आशीर्वाद है। उससे चार भाव जुड़े हैं — बड़े सपने देखना (ऊँचे लक्ष्य रखना), यथार्थ का सामना (सपनों को हक़ीक़त की पृथ्वी पर उतारना), ललक और प्रयास (हर नई बात सीखने की चाह और मेहनत), और आत्मनिर्भरता (अपने पाँवों पर खड़े होना)। ये चारों भाव मिलकर एक पिता की पूरी शुभकामना बनाते हैं।

जैसा चित्र 3.1 दिखाता है, यह कविता सिर्फ़ “बड़े सपने देखो” तक नहीं रुकती। इसमें बड़े सपने हैं, उन्हें हक़ीक़त में उतारने की बात है, सीखने की ललक और मेहनत है, और इन सबके ऊपर आत्मनिर्भरता है। चारों धागे मिलकर एक पूरा आशीर्वाद बनते हैं।

सपने के बड़े होने की यात्रा

अब देखते हैं कि कविता में सपना कैसे आगे बढ़ता है — मन में जन्म लेने से लेकर पूरा होने तक। यह एक छोटी यात्रा जैसी है, जिसे नीचे का चित्र क्रम से दिखाता है।

सपने के बड़े होने की यात्रा — चार कदम
Figure 3.2 — चित्र 3.2 — सपने के बड़े होने की यात्रा, चार कदमों में। पहला कदम — भावना की गोद, यानी सपना मन में जन्म लेता है। दूसरा कदम — पृथ्वी पर चलना, यानी सपना कल्पना से निकलकर हक़ीक़त में उतरता है। तीसरा कदम — चाँद-तारों की चाह, यानी ऊँचे और कठिन लक्ष्यों के लिए हठ और प्रयास। चौथा कदम — अपने पाँवों पर, यानी आत्मनिर्भर बनना। तीर बताते हैं कि सपना मन में जन्मता है और फिर मेहनत से एक-एक कदम पूरा होता है।

चित्र 3.2 से एक सुंदर बात समझ आती है। कवि बस “सपना देखो” कहकर नहीं रुकता। वह सपने को एक यात्रा बनाता है — पहले वह मन में जन्मता है, फिर ज़मीन पर उतरता है, फिर मेहनत से ऊँचाई तक पहुँचता है, और आख़िर में आत्मनिर्भरता तक ले जाता है।

काव्य-सौंदर्य — कविता को सुंदर क्या बनाता है

अब देखते हैं कि कवि ने इस आशीर्वाद को इतना सजीव और सुंदर कैसे बना दिया।

पहले एक छोटा शब्द समझ लें, जो आगे काम आएगा।

इस कविता का काव्य-सौंदर्य इन बातों से बनता है:

1. प्रतीकों का प्रयोग। कवि सीधी-सीधी बात नहीं कहता, बल्कि चित्रों के ज़रिए कहता है। चाँद-तारे ऊँचे और कठिन लक्ष्यों के प्रतीक हैं। दीये की रोशनी नई बातों और ज्ञान का प्रतीक है। उँगली जलाना सीखने में मिलने वाली चोट का प्रतीक है। ऐसे प्रतीक कविता को गहरा और सुंदर बनाते हैं।

2. पंक्ति का दोहराव। “जा, तेरे स्वप्न बड़े हों” — यह पंक्ति कविता के शुरू में भी है और अंत में भी। इस दोहराव से कविता की सबसे ज़रूरी बात मन में पक्की बैठ जाती है, और कविता गोल घूमकर वहीं लौट आती है जहाँ से शुरू हुई थी।

3. छोटे और जीवंत क्रिया-शब्द। कविता एक ही संज्ञा स्वप्न के इर्द-गिर्द बुनी है, पर उसके चारों ओर ढेर सारी क्रियाएँ (काम बताने वाले शब्द) हैं — चलना, रूठना, मचलना, हँसना, मुसकराना, गाना, ललचाना, जलाना, खड़े होना। ये छोटे-छोटे क्रिया-शब्द कविता को चलता-फिरता और सजीव बना देते हैं।

4. सपने को इंसान की तरह दिखाना। कविता में सपना मानो कोई जीता-जागता बच्चा है, जो चलता है, हँसता है, रूठता-मचलता है। जब किसी निर्जीव चीज़ को इंसान की तरह दिखाया जाए, तो वह बात और प्यारी लगती है।

“नथिंग इज़ ए गिवन” — पिता आराम का नहीं, सपनों और चोट का आशीर्वाद क्यों देता है?

यहाँ एक बहुत ज़रूरी सवाल है। आम तौर पर बड़े बच्चों को आशीर्वाद देते हैं — “तू सुखी रह, कोई दुख न आए, कोई तकलीफ़ न हो।” पर यह पिता उल्टा कहता है। वह कहता है — बड़े सपने देख, कठिन लक्ष्यों के लिए हठ कर, और सीखने में उँगली जला (चोट खा)। पिता तकलीफ़ का आशीर्वाद क्यों दे रहा है? यह तो अजीब लगता है। क्यों?

इसका जवाब समझने के लिए सोचिए कि असली तरक़्क़ी कैसे होती है। दीये की लौ को छूने पर उँगली ज़रूर जलती है, पर उसी कोशिश से बच्चा सीखता है कि आग कैसी होती है। अगर डर के मारे वह कभी हाथ ही न बढ़ाए, तो वह कुछ नया सीख ही नहीं पाएगा।

नीचे का चित्र इसी बात को दिखाता है।

दीये की रोशनी देखकर ललचाना और उँगली जलाना — सीखने में चोट से न डरना
Figure 3.3 — चित्र 3.3 — दीये की रोशनी और सीखने की ललक। बीच में एक जलता दीया है, जिसकी रोशनी फैली है। बाईं ओर बताया गया है कि यह रोशनी नई बात और ज्ञान का प्रतीक है, जिसे जानने-सीखने की चाह होनी चाहिए। दाईं ओर की लाल तीर दिखाती है कि बच्चा रोशनी की ओर हाथ बढ़ाता है और उँगली जला बैठता है — यानी सीखने की कोशिश में चोट खा बैठता है। नीचे का हरा संदेश बताता है कि चोट के डर से सीखना नहीं छोड़ना चाहिए।

चित्र 3.3 हमारे सवाल का जवाब देता है। पिता का आशीर्वाद बच्चे को डरपोक और आरामतलब नहीं बनाना चाहता। वह चाहता है कि बच्चा हिम्मती बने। अगर पिता “कोई तकलीफ़ न आए” का आशीर्वाद देता, तो वह बच्चे को छोटी और सुरक्षित दुनिया में बंद कर देता। पर बड़े सपने और नया सीखना — दोनों में जोखिम और चोट तो आते ही हैं। इसलिए पिता तकलीफ़ से बचने का नहीं, बल्कि तकलीफ़ के बीच भी आगे बढ़ने का आशीर्वाद देता है। यही सच्चा और बड़ा आशीर्वाद है।

एक छोटी जाँच करते हैं, ताकि यह बात पक्की हो जाए।

Concept check

पिता 'उँगली जलाने' का आशीर्वाद क्यों देता है — वह तो चोट की बात है?

संदेश के पीछे का “क्यों” — सपना और मेहनत साथ-साथ क्यों?

अब एक और सुंदर बात पर ध्यान दें। पिता सिर्फ़ “बड़े सपने देख” कहकर नहीं रुकता। वह तुरंत जोड़ता है — “जल्द पृथ्वी पर चलना सीख”, यानी सपने को हक़ीक़त में उतार।

ऐसा वह क्यों करता है? क्योंकि अकेला सपना अधूरा है। जो सपना सिर्फ़ मन में पड़ा रहे और कभी ज़मीन पर न उतरे, वह सिर्फ़ कल्पना बनकर रह जाता है। और अकेली मेहनत भी अधूरी है, अगर उसके पीछे कोई बड़ा सपना न हो। असली कमाल तब होता है जब दोनों साथ चलें — बड़ा सपना दिशा देता है, और मेहनत उसे पूरा करती है।

नीचे का चित्र इसी पूरे संदेश को सीढ़ियों के रूप में दिखाता है।

कविता का संदेश — बड़ा सपना देखो, मेहनत से जुटो, आत्मनिर्भर बनो
Figure 3.4 — चित्र 3.4 — कविता का संदेश, सीढ़ियों के रूप में। सबसे ऊपर पिता का आशीर्वाद है — जा, तेरे स्वप्न बड़े हों। नीचे तीन चढ़ती हुई सीढ़ियाँ हैं। पहली सीढ़ी — बड़ा सपना देखो, ऊँचा लक्ष्य रखो। दूसरी सीढ़ी — मेहनत से जुटो, हँसते-गाते प्रयास करो। तीसरी और सबसे ऊँची सीढ़ी — आत्मनिर्भर बनो, अपने पाँवों पर खड़े हो। ऊपर जाते तीर बताते हैं कि एक-एक सीढ़ी चढ़कर ही सपना पूरा होता है।

चित्र 3.4 कविता के पूरे संदेश को एक नज़र में समेट देता है। नीचे की सीढ़ी (बड़ा सपना) के बिना ऊपर चढ़ने का कोई मतलब नहीं, और बीच की सीढ़ी (मेहनत) के बिना ऊपर पहुँचा ही नहीं जा सकता। तीनों मिलकर ही आत्मनिर्भरता तक ले जाती हैं। यही पिता का पूरा आशीर्वाद है।

आम भूलें

कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें बच्चे अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।

⚠️ Common mistake
What students think

'तेरे स्वप्न बड़े हों' में स्वप्न का मतलब नींद में आने वाले सपने हैं।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि रोज़मर्रा में 'सपना' शब्द सबसे पहले उसी चीज़ की याद दिलाता है जो हमें सोते समय दिखती है।

What actually happens

यहाँ स्वप्न का मतलब है बच्चे की आकांक्षाएँ, रुचियाँ और लक्ष्य — यानी वह जो वह जीवन में पाना और बनना चाहता है। पिता चाहता है कि ये चाहतें बड़ी और ऊँची हों।

⚠️ Common mistake
What students think

'उँगली जलाएँ' का मतलब है बच्चे को चोट लगने या नुकसान होने की कामना करना।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि 'जलना' शब्द से सीधे दर्द और नुकसान का ध्यान आता है, तो लगता है पिता बुरा चाह रहा है।

What actually happens

'उँगली जलाना' यहाँ एक प्रतीक है। इसका मतलब है — नई बात सीखने की कोशिश में जोखिम लेने और चोट खाने से न डरना। पिता बच्चे को हिम्मती और सीखने वाला बनाना चाहता है, उसका बुरा नहीं चाहता।

⚠️ Common mistake
What students think

कविता बस इतना कहती है कि बड़े सपने देखो।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि शुरू और अंत की दोहराई गई पंक्ति 'तेरे स्वप्न बड़े हों' सबसे ज़्यादा ध्यान खींचती है, तो यही पूरी बात लगने लगती है।

What actually happens

बड़े सपने देखना तो सिर्फ़ शुरुआत है। कविता आगे कहती है — सपने को हक़ीक़त में उतारो, मेहनत करो, सीखने से मत डरो और अपने पाँवों पर खड़े होकर आत्मनिर्भर बनो। सपना और प्रयास, दोनों ज़रूरी हैं।

जाँचिए अपनी समझ

अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।

इस कविता 'एक आशीर्वाद' के कवि कौन हैं?

'तेरे स्वप्न बड़े हों' पंक्ति में 'स्वप्न' से क्या आशय है?

'हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ / उँगली जलाएँ' पंक्ति का भाव क्या है?

'अपने पाँवों पर खड़े हों' पंक्ति से कवि का क्या आशय है?

अभ्यास (श्रेणीबद्ध)

अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।

सरल

सरल

इस कविता में आशीर्वाद कौन, किसे दे रहा है?

सरल

शब्दार्थ लिखिए: (क) स्वप्न (ख) अप्राप्य (ग) ललचाना (घ) आत्मनिर्भर।

मध्यम

मध्यम

कविता में 'चाँद-तारे' और 'दीये की रोशनी' किसके प्रतीक हैं? एक छोटी तालिका बनाकर इनका अर्थ समझाइए।

मध्यम

कविता का शीर्षक 'एक आशीर्वाद' है, जबकि यह शब्द कविता में कहीं नहीं आता। फिर भी यह शीर्षक सही क्यों है? अपने शब्दों में समझाइए।

चुनौती

चुनौती

कई बड़े बच्चों को 'सुखी रहो, कोई तकलीफ़ न आए' का आशीर्वाद देते हैं। पर यह पिता 'बड़े सपने देख' और 'उँगली जला' का आशीर्वाद देता है। आपको कौन-सा आशीर्वाद ज़्यादा अच्छा लगता है और क्यों? कविता के आधार पर अपने विचार लिखिए।

सारांश

  • “एक आशीर्वाद” कविता के कवि दुष्यंत कुमार (1933–1975) हैं। उनका सबसे चर्चित ग़ज़ल-संग्रह “साये में धूप” है।
  • इस कविता में एक पिता अपने नन्हे बच्चे को आशीर्वाद देता है — “जा, तेरे स्वप्न बड़े हों।”
  • यहाँ स्वप्न का मतलब नींद का सपना नहीं, बल्कि बच्चे की आकांक्षाएँ और बड़े लक्ष्य हैं।
  • पिता चाहता है कि सपने सिर्फ़ कल्पना में न रहें, बल्कि हक़ीक़त की पृथ्वी पर उतरें — यानी मेहनत से पूरे हों।
  • चाँद-तारे ऊँचे-कठिन लक्ष्यों के, और दीये की रोशनी नई बातों व ज्ञान के प्रतीक हैं। उँगली जलाना यानी सीखने में चोट से न डरना।
  • कविता का संदेश है — बड़ा सपना देखो, उसे हक़ीक़त में उतारो, हँसते-गाते मेहनत करो, सीखने से मत डरो और अपने पाँवों पर खड़े होकर आत्मनिर्भर बनो।
  • कविता का काव्य-सौंदर्य बनता है — प्रतीकों के प्रयोग, पहली पंक्ति के दोहराव, छोटे-जीवंत क्रिया-शब्दों और सपने को इंसान की तरह दिखाने से।

आगे क्या?

सपनों और आत्मनिर्भरता की यह कविता समझने के बाद, अगला पाठ हमें एक अलग दुनिया में ले जाता है। अगला पाठ है पाठ 4 — “हरिद्वार”। जैसे इस कविता में पिता ने जीवन को क़रीब से देखा, वैसे ही अगले पाठ में हम एक स्थान और उससे जुड़े जीवन को क़रीब से देखेंगे।

Frequently Asked Questions

एक आशीर्वाद कविता का सारांश क्या है?

यह एक पिता का अपने बच्चे को दिया गया आशीर्वाद है। पिता चाहता है कि बच्चे के सपने बड़े हों, वह सपनों को सिर्फ़ मन में न रखे बल्कि जल्द हक़ीक़त में उतारे, चाँद-तारों जैसे ऊँचे लक्ष्यों के लिए हठ करे, हँसते-गाते मेहनत करे, चोट खाने से न डरे और अंत में अपने पाँवों पर खड़ा होकर आत्मनिर्भर बने।

एक आशीर्वाद कविता के कवि कौन हैं?

इस कविता के कवि दुष्यंत कुमार (1933 से 1975) हैं। वे हिंदी के बहुत लोकप्रिय रचनाकार थे। उनका जन्म बिजनौर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका सबसे चर्चित ग़ज़ल-संग्रह 'साये में धूप' है और उनकी रचनाएँ जीवंत भाषा के लिए जानी जाती हैं।

तेरे स्वप्न बड़े हों पंक्ति में स्वप्न से क्या आशय है?

यहाँ स्वप्न का मतलब नींद में आने वाला सपना नहीं है। इसका अर्थ है बच्चे की आकांक्षाएँ, रुचियाँ और लक्ष्य। पिता चाहता है कि बच्चे की चाहतें और इरादे छोटे न रहें, बल्कि बड़े और ऊँचे हों ताकि वह जीवन में कुछ बड़ा कर सके।

हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ उँगली जलाएँ का क्या अर्थ है?

दीये की रोशनी नई बातों और ज्ञान का प्रतीक है। उसे देखकर ललचाना यानी हर नई बात को जानने-सीखने की चाह रखना। उँगली जलाना यानी सीखने की कोशिश में चोट या असफलता मिले तो भी डरना नहीं। पिता चाहता है कि बच्चा सीखने के उत्साह में जोखिम लेने से न घबराए।

एक आशीर्वाद कविता का संदेश क्या है?

कविता का संदेश है कि बड़े सपने देखो, पर उन्हें सिर्फ़ कल्पना में मत रखो। उन्हें हक़ीक़त में उतारो, मेहनत करो, सीखने में चोट खाने से मत डरो और अंत में आत्मनिर्भर बनो। असली सफलता तभी मिलती है जब सपने के साथ प्रयास और आत्मनिर्भरता भी जुड़ें।