दो गौरैया

Chapter 2 · Hindi · Class 8 19 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। कभी आपके घर में या आँगन में कोई चिड़िया घोंसला बनाने आई हो। पहले लगता है — “अरे, यह तो शोर मचाएगी, गंदगी करेगी।” पर धीरे-धीरे वह घर का हिस्सा बन जाती है।

यह कहानी ठीक यही बात कहती है। इसमें एक घर है, जहाँ दो छोटी गौरैया आकर घोंसला बना लेती हैं। घर के पिताजी उन्हें निकालना चाहते हैं। पर कहानी के अंत में कुछ ऐसा होता है कि उनका मन ही बदल जाता है।

इसी में इस कहानी की खूबसूरती है। यह हमें सिखाती है कि ममता (माँ-बाप का प्यार) के आगे बड़ी से बड़ी ज़िद भी हार जाती है। साथ ही यह दिखाती है कि पशु-पक्षी भी अपने घर और परिवार से उतना ही प्यार करते हैं, जितना हम। पढ़ने के बाद आपको दया, परिवार और जीवों के प्रति प्यार थोड़ा और गहराई से समझ आएगा।

मूल भाव

इस कहानी का मूल भाव है — ममता के आगे ज़िद हार जाती है। एक घर में दो गौरैया घोंसला बना लेती हैं। पिताजी अपनी ज़िद में उन्हें बार-बार भगाते हैं, यहाँ तक कि घोंसला तोड़ने लगते हैं। पर जैसे ही अंदर छिपे नन्हे बच्चों की चीं-चीं सुनाई देती है, उनका गुस्सा करुणा में बदल जाता है। कहानी यह भी दिखाती है कि पशु-पक्षी भी घर और परिवार का महत्व समझते हैं — गौरैया अपने बच्चों के लिए डरकर भी बार-बार लौटती रहती हैं।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने कहानी का सरल सार और व्याख्या अपने शब्दों में दी है। पूरी मूल कहानी अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 8) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। यहाँ हम मूल कहानी दोबारा नहीं छाप रहे — बस उसका भाव खोल रहे हैं।

लेखक से परिचय

इससे पहले कि हम कहानी में उतरें, यह जान लेना अच्छा रहेगा कि इसे लिखा किसने।

इस कहानी के लेखक हैं भीष्म साहनी (1915–2003)। वे हिंदी साहित्य के बहुत प्रसिद्ध और बहुमुखी लेखक थे। उनकी कहानियों में देश के बँटवारे (विभाजन) का दर्द और इनसानी मूल्यों की मार्मिक झलक मिलती है।

उनके प्रसिद्ध उपन्यास “तमस” पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। साहित्य में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। बच्चों के लिए भी उन्होंने कई कहानियाँ लिखीं, जैसे “गुलेल का खेल”

कहानी का सारांश

आइए अब पूरी कहानी को धीरे-धीरे, क्रम से समझते हैं। यह कहानी घर का एक बच्चा (लेखक) खुद सुना रहा है।

पहले यह जान लें कि कहानी के पात्र कौन हैं, वरना बातचीत उलझ सकती है। नीचे का चित्र सभी पात्रों को एक साथ दिखाता है।

कहानी के पात्र — पिताजी, माँ, लेखक (बेटा), दो गौरैया और उनके नन्हे बच्चे
Figure 2.1 — चित्र 2.1 — कहानी का पात्र-मानचित्र। ऊपर घर के तीन इनसान हैं। पिताजी ज़िद्दी हैं और गौरैयों को निकालना चाहते हैं (लाल बक्सा)। माँ हँसमुख और समझदार हैं और गौरैयों को रहने देना चाहती हैं (हरा बक्सा) — दोनों के बीच की तीर बताती है कि इनकी राय अलग है। लेखक यानी घर का बेटा यह पूरी कहानी सुना रहा है (नीला बक्सा)। नीचे कहानी के पक्षी हैं — दो गौरैया, जो माँ-बाप हैं और पंखे के गोले में घोंसला बनाती हैं, और उनके नन्हे बच्चे (चूज़े), जिनकी चीं-चीं से कहानी का मोड़ आता है। सबसे नीचे कहानी का असली मोड़ लिखा है — बच्चों की चीं-चीं सुनकर पिताजी का गुस्सा करुणा में बदल गया।

अब कहानी शुरू करते हैं। चित्र 2.1 के पात्रों को ध्यान में रखकर पढ़िए।

घर एक सराय जैसा है। लेखक बताता है कि उनके घर में बस तीन लोग रहते हैं — माँ, पिताजी और वह खुद। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर तो एक सराय (धर्मशाला) बन गया है। आँगन में आम का पेड़ है। उस पर तोते, कौवे और तरह-तरह की गौरैया डेरा डाले रहती हैं। घर के अंदर चूहे, चमगादड़, कबूतर, छिपकलियाँ — सब रहते हैं। पिताजी मज़ाक में कहते हैं कि घर के असली मालिक तो ये जीव-जंतु ही हैं; वे तो बस मेहमान हैं।

दो गौरैया अंदर आती हैं। एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आती हैं और उड़-उड़कर पूरा घर देखती हैं। पिताजी मज़ाक में कहते हैं कि वे जाँच कर रही हैं कि घर रहने लायक है या नहीं। दो दिन बाद देखा गया कि उन्होंने छत के पंखे के गोले में घोंसला बना लिया है। साफ़ था — उन्हें घर पसंद आ गया था।

यहाँ कहानी एक मोड़ लेती है। पूरी कहानी कैसे आगे बढ़ती है, यह नीचे का कथानक-चक्र क्रम से दिखाता है।

कहानी का कथानक-चक्र — घर में जीव-जंतु, गौरैयों का घोंसला, पिताजी का भगाना, घोंसला तोड़ना, बच्चों की चीं-चीं और पिताजी का दिल बदलना
Figure 2.2 — चित्र 2.2 — कहानी का कथानक-चक्र, क्रम से। (1) घर एक सराय जैसा है, जहाँ तरह-तरह के पक्षी और जीव-जंतु रहते-आते हैं। (2) दो गौरैया अंदर आकर पंखे के गोले में घोंसला बना लेती हैं — घर उन्हें पसंद आ गया। (3) पिताजी ताली, लाठी और दरवाजे बंद करके उन्हें भगाते हैं, पर वे रोशनदान या दरवाजे के नीचे से बार-बार लौट आती हैं। (4) तंग आकर पिताजी स्टूल पर चढ़कर लाठी से घोंसला ही तोड़ने लगते हैं। (5) तभी घोंसले में छिपे नन्हे बच्चे सिर निकालकर अपने माँ-बाप को चीं-चीं करके पुकारते हैं। (6) यह सुनकर पिताजी का दिल पिघल जाता है — वे रुक जाते हैं, माँ सब दरवाजे खोल देती हैं, गौरैया लौटकर बच्चों को चुग्गा देती हैं और पिताजी अब बस मुसकरा देते हैं। तीर हर कदम की दिशा बताते हैं।

जैसा चित्र 2.2 दिखाता है, अब कहानी का असली खेल शुरू होता है।

पिताजी भगाने की कोशिश करते हैं। पिताजी को यह पसंद नहीं आया। पहले माँ ने कहा कि अब ये नहीं उड़ेंगी, क्योंकि इन्होंने घोंसला बना लिया है। इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया। माँ ने व्यंग्य में कहा — “चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!” बस, पिताजी का अहं जाग गया। उन्होंने ताली बजाई, “श…शू” किया, बाँहें झुलाईं, कूदे, फिर लाठी उठा ली। पर गौरैया एक जगह से उड़कर दूसरी जगह बैठ जातीं और चीं-चीं करती रहतीं।

माँ हँसती और मज़ाक करती हैं। माँ बार-बार हँसती हैं और मज़ाक करती हैं। वे कहती हैं कि गौरैया आपस में पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और क्यों नाच रहा है! इससे पिताजी और गुस्सा हो जाते हैं और और ऊँचा कूदते हैं। माँ समझाती हैं — “एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाकी बंद कर दो, तभी ये निकलेंगी।” लेखक दरवाजे बंद करता है। बहुत मेहनत के बाद गौरैया बाहर निकलती हैं।

गौरैया बार-बार लौट आती हैं। पर थोड़ी ही देर में वे फिर अंदर आ जातीं — कभी रोशनदान के टूटे शीशे से, कभी दरवाजे के नीचे की खाली जगह से। पिताजी सब छेद कपड़े से बंद कर देते हैं, फिर भी वे लौट आती हैं। रोज़ यही होने लगा। पिताजी परेशान हो उठे, पर कहते रहे — “मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।”

पिताजी घोंसला तोड़ने लगते हैं। आख़िर तंग आकर पिताजी ने तय किया कि वे घोंसला ही नोचकर निकाल देंगे। वे स्टूल पर चढ़े और लाठी से घोंसले के तिनके खींचने लगे। दो-चार तिनके निकले। इस बीच दोनों गौरैया बाहर दीवार पर चुपचाप, दुबली और उदास बैठी थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं।

नन्हे बच्चों की चीं-चीं। तभी अचानक ज़ोर की आवाज़ आई — “चीं-चीं, चीं-चीं!” पिताजी के हाथ रुक गए। लेखक ने ऊपर देखा — पंखे के गोले के ऊपर से नन्हे-नन्हे बच्चे सिर निकालकर नीचे झाँक रहे थे और अपने माँ-बाप को पुकार रहे थे। मानो कह रहे हों — “हम आ गए हैं, हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?”

पिताजी का दिल पिघल जाता है। यह देखकर पिताजी चुपचाप स्टूल से नीचे उतर आए। उन्होंने लाठी एक ओर रख दी और कुर्सी पर बैठ गए। माँ ने उठकर सब दरवाजे खोल दिए। गौरैया झट से अंदर आईं और बच्चों की नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगीं। कमरे में फिर शोर होने लगा। पर अबकी बार पिताजी गुस्सा नहीं हुए — वे बस उन्हें देख-देखकर मुसकराते रहे।

तो पूरी कहानी का सार यह है — बच्चों की मासूम पुकार के आगे पिताजी की सारी ज़िद पिघल गई। ममता जीत गई।

आइए गहराई से समझें

अब कहानी के पीछे छिपी बातों को थोड़ा गहराई से देखते हैं। हम समझेंगे कि कहानी में क्या हुआ, और क्यों हुआ।

मुख्य भाव — कई भावों का जाल

इस छोटी-सी कहानी में एक साथ कई भाव बुने हुए हैं। नीचे का भाव-जाल इन्हें एक साथ दिखाता है।

कहानी का भाव-जाल — वात्सल्य (संतान-प्रेम), करुणा और हृदय-परिवर्तन, हास्य और व्यंग्य, तथा इनसान और जीवों का साथ
Figure 2.3 — चित्र 2.3 — कहानी का भाव-जाल। बीच में कहानी का मूल भाव है — ममता के आगे ज़िद हार जाती है। उससे चार भाव जुड़े हैं। वात्सल्य यानी संतान-प्रेम — गौरैया अपने बच्चों के लिए डरकर भी बार-बार लौटती हैं। करुणा और हृदय-परिवर्तन — पिताजी का गुस्सा बच्चों को देखकर दया में बदल जाता है। हास्य और व्यंग्य — माँ की हँसी और तीखे मज़ाक कहानी को मज़ेदार बनाते हैं। और इनसान तथा जीवों का साथ — पशु-पक्षी भी घर और परिवार का महत्व समझते हैं। ये चारों भाव मिलकर एक छोटी-सी घटना को एक गहरी कहानी बना देते हैं।

चित्र 2.3 से साफ़ है कि यह कहानी सिर्फ़ दो चिड़ियों को भगाने की कहानी नहीं है। इसमें वात्सल्य है — बच्चों के लिए माँ-बाप का प्यार। करुणा है — पिताजी के मन में जागी दया। हास्य-व्यंग्य है — माँ की हँसी और चुटीले मज़ाक। और इन सबके पीछे एक बड़ी बात है — जीव-जंतु भी हमारी तरह परिवार और घर से प्यार करते हैं।

पिताजी का मन क्यों बदला — “नथिंग इज़ ए गिवन”

यहाँ एक बहुत ज़रूरी सवाल है। पूरी कहानी में पिताजी कहते रहे — “मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।” वे घोंसला तक तोड़ने को तैयार थे। फिर अचानक उनका मन कैसे बदल गया? सिर्फ़ एक “चीं-चीं” सुनकर इतना बड़ा बदलाव क्यों?

इसका जवाब समझने के लिए सोचिए कि पिताजी पहले गौरैयों को क्या समझते थे। उनके लिए वे बस शोर मचाने वाली एक मुसीबत थीं — एक परेशानी जिसे घर से बाहर करना था। पर जैसे ही उन्हें नन्हे बच्चे दिखे, उनकी नज़र बदल गई। अब वे “मुसीबत” नहीं, बल्कि एक परिवार दिख रहे थे। पिताजी को एहसास हुआ कि वे सिर्फ़ एक घोंसला नहीं, बल्कि नन्हे बच्चों का घर और एक पूरा परिवार उजाड़ रहे थे।

नीचे की कारण-शृंखला यही बदलाव कदम-दर-कदम दिखाती है।

कारण-शृंखला — पिताजी पहले गौरैयों को मुसीबत समझते थे, ज़िद में घोंसला तोड़ने लगे, बच्चों की चीं-चीं सुनी, समझे कि यह एक परिवार का घर है, और गुस्सा करुणा में बदल गया
Figure 2.4 — चित्र 2.4 — पिताजी का मन क्यों बदला, यह कारण-शृंखला। पहले: पिताजी गौरैयों को सिर्फ़ शोर मचाने वाली एक मुसीबत समझते थे। इसलिए ज़िद में आकर, हार न मानने के अहं में, वे घोंसला ही तोड़ने लगे। तभी मोड़ आता है — नन्हे बच्चों की चीं-चीं सुनाई देती है और घोंसले में छिपे चूज़े पहली बार दिखते हैं। इससे पिताजी को एहसास होता है कि यह तो एक परिवार का घर है, वे बच्चों को बेघर कर रहे थे। नतीजा — उनका गुस्सा करुणा में बदल जाता है, वे लाठी रख देते हैं और गौरैयों को रहने देते हैं। तीर हर कदम का अगला कारण बताते हैं।

चित्र 2.4 हमारे सवाल का जवाब दे देता है। बदलाव “चीं-चीं” से नहीं आया — वह तो बस एक आवाज़ थी। बदलाव इस एहसास से आया कि सामने एक परिवार है, बच्चे हैं। जब तक गौरैया सिर्फ़ “घुसपैठिए” लगती थीं, पिताजी का अहं उन पर भारी था। पर जैसे ही वे “माँ-बाप और उनके बच्चे” बन गईं, अहं अपने आप पिघल गया। इसीलिए कहानी का संदेश है — ममता के आगे बड़ी से बड़ी ज़िद हार जाती है।

एक छोटी जाँच करते हैं, ताकि यह बात पक्की हो जाए।

Concept check

पिताजी का गुस्सा सिर्फ़ बच्चों की 'चीं-चीं' से नहीं, बल्कि किस एहसास से बदला?

माँ का व्यंग्य और हँसी — इसका कहानी में क्या काम है?

अब एक और सुंदर बात पर ध्यान दें। पूरी कहानी में माँ गौरैयों को भगाने में पिताजी की मदद नहीं करतीं। वे बस बैठी हँसती रहती हैं और तीखे मज़ाक करती रहती हैं। ऐसा वे क्यों करती हैं?

पहले एक छोटा शब्द समझ लें, जो आगे काम आएगा।

असल में माँ चाहती थीं कि गौरैयों को घर से न भगाया जाए। पर वे सीधे मना नहीं करतीं — वे व्यंग्य और हँसी का रास्ता चुनती हैं। उनके मज़ाक के दो काम हैं। पहला, उनसे पता चलता है कि पिताजी के सारे प्रयास बेकार हैं — चिड़ियाँ नहीं जाएँगी। दूसरा, उनकी हँसी कहानी को हल्का-फुल्का और मज़ेदार बना देती है। एक गंभीर-सी बात (एक परिवार को बेघर करना) माँ के मज़ाक की वजह से बोझिल नहीं लगती।

और एक गहरी बात — माँ शुरू से ही जानती थीं कि गौरैयों ने अंडे दे दिए हैं और वे अपने बच्चों को छोड़कर नहीं जाएँगी। इसीलिए वे बार-बार कहती हैं — “अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी।” माँ की समझदारी और ममता की पहचान, दोनों उनके इस भरोसे में छिपी हैं।

आम भूलें

कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें बच्चे अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।

⚠️ Common mistake
What students think

गौरैया बार-बार लौटती थीं क्योंकि वे ज़िद्दी थीं और पिताजी को चिढ़ाना चाहती थीं।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि वे हर बार पिताजी के भगाने के तुरंत बाद लौट आती थीं, जिससे जान-बूझकर परेशान करने जैसा लगता है।

What actually happens

गौरैया चिढ़ाने के लिए नहीं लौटती थीं। उन्होंने घोंसले में अंडे दे दिए थे और उनमें बच्चे थे। वे अपने बच्चों को छोड़कर नहीं जा सकती थीं — यही ममता उन्हें बार-बार लौटा लाती थी।

⚠️ Common mistake
What students think

माँ ने पिताजी की मदद नहीं की क्योंकि वे आलसी थीं या उन्हें परवाह नहीं थी।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि माँ सिर्फ़ बैठी हँसती रहती हैं और कोई काम नहीं करतीं, तो सतही तौर पर उदासीन लगती हैं।

What actually happens

माँ जान-बूझकर मदद नहीं करतीं, क्योंकि वे खुद नहीं चाहती थीं कि गौरैयों को भगाया जाए। उनका व्यंग्य और हँसी यही बता रहे थे कि गौरैयों को रहने देना चाहिए।

⚠️ Common mistake
What students think

पिताजी ने अंत में हार मान ली, इसलिए वे कमज़ोर साबित हुए।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि पूरी कहानी में वे कहते रहे 'मैं हार मानने वाला नहीं हूँ', और अंत में रुक गए — तो यह हार जैसा दिखता है।

What actually happens

यह हार नहीं, हृदय का बदलाव है। पिताजी जीद से नहीं रुके, बल्कि दया से रुके। नन्हे बच्चों को देखकर उनका मन बदल गया — और दया से पिघलना कमज़ोरी नहीं, इनसानियत है।

जाँचिए अपनी समझ

अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।

'दो गौरैया' कहानी के लेखक कौन हैं?

दो गौरैयों ने घर में अपना घोंसला कहाँ बनाया था?

कहानी के अंत में पिताजी का गुस्सा किस वजह से बदल गया?

माँ का व्यंग्य और हँसी कहानी में क्या काम करते हैं?

अभ्यास (श्रेणीबद्ध)

अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।

सरल

सरल

कहानी के मुख्य पात्र कौन-कौन हैं? संक्षेप में बताइए।

सरल

शब्दार्थ लिखिए: (क) सराय (ख) निरीक्षण (ग) व्यंग्य (घ) चुग्गा।

मध्यम

मध्यम

कहानी में माँ और पिताजी का स्वभाव और गौरैयों के प्रति उनका रवैया अलग-अलग था। एक छोटी तालिका बनाकर दोनों की तुलना कीजिए।

मध्यम

गौरैया घर में किन-किन रास्तों से बार-बार अंदर आती थीं? और वे लौटती ही क्यों थीं?

चुनौती

चुनौती

इस कहानी का मुख्य संदेश क्या है? और यह संदेश हमारे अपने जीवन में कैसे उतर सकता है?

सारांश

  • “दो गौरैया” प्रसिद्ध लेखक भीष्म साहनी की लिखी एक कहानी है। यह कहानी घर का एक बच्चा (लेखक) खुद सुना रहा है।
  • एक घर तरह-तरह के जीव-जंतुओं से भरा एक “सराय” जैसा है। उसी में एक दिन दो गौरैया आकर छत के पंखे के गोले में घोंसला बना लेती हैं।
  • पिताजी अपनी ज़िद में उन्हें ताली, लाठी और बंद दरवाजों से भगाने की कोशिश करते हैं, पर वे बार-बार लौट आती हैं — क्योंकि उन्होंने अंडे दे दिए हैं।
  • माँ बैठी हँसती और व्यंग्य करती रहती हैं; वे शुरू से ही चाहती थीं कि गौरैयों को रहने दिया जाए।
  • तंग आकर पिताजी घोंसला तोड़ने लगते हैं। तभी अंदर से नन्हे बच्चों की चीं-चीं सुनाई देती है।
  • यह सुनकर पिताजी का दिल पिघल जाता है। वे लाठी रख देते हैं, माँ दरवाजे खोल देती हैं, और गौरैया लौटकर बच्चों को चुग्गा देती हैं।
  • कहानी का मुख्य संदेश है — ममता के आगे ज़िद हार जाती है, और पशु-पक्षी भी घर और परिवार का महत्व समझते हैं
  • कहानी के मुख्य भाव हैं — वात्सल्य, करुणा, हास्य-व्यंग्य और इनसान तथा जीवों का साथ

आगे क्या?

ममता और हृदय-परिवर्तन की यह कहानी समझने के बाद, अगला पाठ हमें जीवन के एक और सुंदर भाव की ओर ले जाता है। अगला पाठ है पाठ 3 — “एक आशीर्वाद”। जैसे इस कहानी में बड़ों का दिल बच्चों के लिए पिघला, वैसे ही अगली रचना में हम बड़ों के प्यार और आशीर्वाद की गहराई देखेंगे।

Frequently Asked Questions

दो गौरैया कहानी का सारांश क्या है?

यह एक घर की कहानी है जहाँ तरह-तरह के जीव-जंतु रहते हैं। एक दिन दो गौरैया अंदर आकर पंखे के गोले में घोंसला बना लेती हैं। पिताजी उन्हें बार-बार भगाते हैं पर वे लौट आती हैं। जब पिताजी घोंसला तोड़ने लगते हैं, तभी अंदर से नन्हे बच्चों की चीं-चीं सुनाई देती है और पिताजी का दिल पिघल जाता है। अंत में वे गौरैयों को रहने देते हैं।

दो गौरैया कहानी के लेखक कौन हैं?

इस कहानी के लेखक भीष्म साहनी हैं। वे हिंदी के बहुत प्रसिद्ध लेखक थे। उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'तमस' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था और भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया था। उन्होंने बच्चों के लिए भी कई कहानियाँ लिखी हैं।

कहानी के अंत में पिताजी का दिल क्यों बदल गया?

पिताजी घोंसला तोड़ ही रहे थे कि अंदर से नन्हे बच्चों की चीं-चीं सुनाई दी। तब उन्हें एहसास हुआ कि वे सिर्फ़ एक घोंसला नहीं, बल्कि एक परिवार और बच्चों का घर उजाड़ रहे थे। इसी एहसास से उनका गुस्सा करुणा में बदल गया और उन्होंने गौरैयों को रहने दिया।

गौरैया घर में बार-बार क्यों लौट आती थीं?

गौरैयों ने पंखे के गोले में घोंसला बना लिया था और उसमें अंडे दे दिए थे। उनके अंडे और बच्चे उसी घोंसले में थे, इसलिए वे अपने बच्चों को छोड़कर नहीं जा सकती थीं। यही ममता उन्हें डरकर भी बार-बार लौटने पर मजबूर करती थी।

माँ बार-बार पिताजी पर हँसती और मज़ाक क्यों करती थीं?

माँ चाहती थीं कि गौरैयों को घर से न भगाया जाए। उन्हें पिताजी के प्रयास व्यर्थ लगते थे, इसलिए वे व्यंग्य और हँसी से यह बात कहती थीं। उनके मज़ाक से कहानी हल्की-फुल्की और मज़ेदार बन जाती है।