स्वदेश

Chapter 1 · Hindi · Class 8 20 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। 15 अगस्त को जब स्कूल में तिरंगा फहराता है, और सब मिलकर राष्ट्रगान गाते हैं — तब आपके मन में कैसा कुछ होता है? एक अजीब-सी गुदगुदी, एक गर्व, आँखों में थोड़ी नमी?

वही भाव “देश-प्रेम” है। पर देश-प्रेम सिर्फ़ एक दिन का त्योहार नहीं है। यह हर दिन का भाव है।

यह कविता उसी भाव को जगाने वाली एक पुकार है। इसे आह्वान गीत कहते हैं — यानी ऐसा गीत जो हमें कुछ करने के लिए बुलाता है, प्रेरित करता है। कवि हमसे सीधे बात करता है। वह कहता है — जिस इंसान के दिल में अपने देश के लिए प्यार नहीं, उसका दिल तो दिल ही नहीं, पत्थर है।

पढ़ने के बाद आप समझ पाएँगे कि देश-प्रेम का मतलब सिर्फ़ नारे लगाना नहीं है। इसका मतलब है — जोश, साहस, और देश के लिए कुछ कर गुज़रने की भावना। यह बात तब भी ज़रूरी थी, आज भी उतनी ही ज़रूरी है।

मूल भाव

इस कविता का मूल भाव है — सच्चा हृदय वही है जिसमें अपने देश के लिए प्रेम हो। कवि बार-बार कहता है — “वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।” यानी देश-प्रेम से खाली दिल पत्थर जैसा ठंडा और बेकार है। कवि हमें जोश, साहस और इच्छाशक्ति से भरने को कहता है। वह याद दिलाता है कि यही देश हमें मिट्टी, भोजन, रिश्ते और सम्मान देता है — इसलिए इसके लिए कुछ कर गुज़रना हमारा फ़र्ज़ है। एक दिन सबको जाना है, तो डरकर नहीं, साहस के साथ जीना चाहिए।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने कविता का सरल अर्थ और व्याख्या दी है। पूरी मूल कविता अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 8) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। यहाँ हम मूल पंक्तियाँ हू-ब-हू दोबारा नहीं छाप रहे — बस उनका भाव अपने शब्दों में खोल रहे हैं।

कवि से परिचय

इससे पहले कि हम कविता में उतरें, यह जान लेना अच्छा रहेगा कि इसे लिखा किसने।

इस कविता के कवि हैं गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ (1883–1972)। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले में हुआ था। उन्होंने पहले ब्रजभाषा में कविता लिखना शुरू किया, फिर खड़ी बोली (आज की आम हिंदी) के बहुत अच्छे कवियों में अपनी जगह बनाई।

वे सरकारी नौकरी करते थे, इसलिए उन्हें ‘सनेही’ के अलावा एक और उपनाम ‘त्रिशूल’ भी रखना पड़ा। उन्होंने सिर्फ़ देश-प्रेम पर ही नहीं, बल्कि किसान, मज़दूर और समाज की बुराइयों पर भी असरदार कविताएँ लिखीं। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं — त्रिशूल तरंग, राष्ट्रीय मंत्र और कृषक क्रंदन

कविता का भावार्थ

आइए अब कविता का भाव धीरे-धीरे, क्रम से समझते हैं। पूरी कविता में एक बात बार-बार लौटती है — “वह हृदय नहीं, पत्थर है।” इसी को ध्यान में रखकर पढ़िए।

सबसे पहले कविता का सबसे ज़रूरी विचार समझ लें — हृदय और पत्थर का अंतर। नीचे का चित्र दोनों को साथ-साथ दिखाता है।

दो हृदयों की तुलना — बाएँ देश-प्रेम से भरा सजीव हृदय, दाएँ देश-प्रेम से खाली पत्थर जैसा हृदय
Figure 1.1 — चित्र 1.1 — हृदय या पत्थर? बाईं ओर हरा, धड़कता हुआ हृदय है — यह देश-प्रेम से भरा हुआ है। इसमें भाव हैं, जोश है, साहस है; यह देश के लिए कुछ कर गुज़रता है। यही सच्चा हृदय है। दाईं ओर एक ठंडा, ग्रे पत्थर है — यह देश-प्रेम से खाली हृदय का प्रतीक है। इसमें न कोई भाव है, न जोश, न साहस; यह देश के लिए कुछ नहीं करता। कवि कहता है — ऐसा हृदय असल में हृदय नहीं, पत्थर है।

जैसा चित्र 1.1 दिखाता है, कवि पूरी कविता में बार-बार यही बात कहता है।

हृदय या पत्थर? कवि शुरू में ही एक ज़ोरदार बात कहता है — जिस दिल में अपने देश के लिए प्यार नहीं है, वह दिल नहीं, पत्थर है। पत्थर ठंडा होता है, उसमें कोई भावना नहीं होती। इसी तरह देश-प्रेम से खाली दिल भी भावहीन और बेकार है।

जोश और साहस के बिना जीवन अधूरा है। कवि आगे कहता है — जो इंसान अपने अंदर जोश नहीं जगा सका, उसके जीवन में कोई सार (असली मतलब) नहीं है। जो दुनिया के साथ कदम मिलाकर नहीं चल सका, यह संसार उसका नहीं हो पाता। जिसने साहस छोड़ दिया, वह कभी पार (मंज़िल तक) नहीं पहुँच सकता।

अपने समाज और देश के लिए कुछ करो। कवि कहता है — जिससे अपनी जाति या समाज का कोई भला नहीं हुआ, उसका अपना भला भी नहीं हो सकता। और जिस दिल में भाव ही नहीं बहते, उसे फिर से वही बात — वह हृदय नहीं, पत्थर है।

मातृभूमि हमें इतना सब देती है। यहाँ कवि देश की महिमा गाता है। यही धरती है जिसकी मिट्टी में हम पैदा हुए और बड़े हुए। इसी ने हमें दाना-पानी (भोजन) दिया। हमारे माता-पिता, भाई-बंधु — सब इसी देश में हैं। और सबसे प्यारी बात — हम ही इसके राजा-रानी हैं। यानी हम सब नागरिक ही इस देश के असली मालिक हैं।

देश हमें कितना कुछ देता है — यह नीचे का चित्र एक साथ दिखाता है।

मातृभूमि के चार उपहार — मिट्टी और भोजन, माता-पिता और बंधु, अधिकार और सम्मान, ज्ञान का खज़ाना
Figure 1.2 — चित्र 1.2 — मातृभूमि हमें क्या देती है। बीच में पीले रंग में मातृभूमि (अपना देश) है। उससे चार तीर बाहर जाते हैं, जो उसके चार उपहार दिखाते हैं। ऊपर बाएँ — मिट्टी और भोजन (जहाँ हम उगे-बढ़े, जिसने दाना-पानी दिया)। ऊपर दाएँ — माता-पिता और बंधु (हमारे सारे रिश्ते इसी में हैं)। नीचे बाएँ — अधिकार और सम्मान (हम ही इसके राजा-रानी, यानी असली मालिक)। नीचे दाएँ — ज्ञान का खज़ाना और रत्न, जिन पर पूरी दुनिया मुग्ध है। नीचे लिखा संदेश बताता है — जो देश इतना सब देता है, उसके लिए प्रेम तो बनता ही है।

जैसा चित्र 1.2 दिखाता है, यही देश ज्ञान का खज़ाना है। कवि कहता है — इसी देश ने दुनिया को बहुमूल्य रत्न (महान लोग और विचार) दिए हैं। इस पर ज्ञानी लोग भी मर मिटते हैं, और सारी दुनिया इस पर दीवानी (मोहित) है।

जो इस सबसे भी न पिघले… कवि कहता है — जिसका दिल इतना सब देखकर भी न पसीजे (न पिघले), वह तो इस धरती पर बोझ है। उसके होने का कोई फ़ायदा नहीं।

मौत से मत डरो, साहस से जियो। यहाँ कवि एक गहरी बात कहता है। यह तय है, इसमें कोई शक नहीं — एक दिन सबको जाना है। मौत का दीपक हर वक़्त जल रहा है, और परवाने (पतंगे) को उस पर जल मरना ही है। यानी मौत निश्चित है। तो फिर डरकर क्यों जीना? साहस के साथ, कुछ अच्छा करके जियो।

सब कुछ हमारे हाथों में है। अंत में कवि जोश भर देता है — सब कुछ हमारे अपने हाथों में है। हमें तोप या तलवार की ज़रूरत नहीं। हमारा असली हथियार तो हमारा अपना साहस है। और फिर वही पुकार — वह हृदय नहीं, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

तो पूरी कविता का सार यह है — देश से प्रेम करो, जोश और साहस रखो, और देश के लिए कुछ कर गुज़रो। यही सच्चे हृदय की पहचान है।

आइए गहराई से समझें

अब कविता के पीछे छिपी बातों को थोड़ा गहराई से देखते हैं। हम समझेंगे कि कवि ने क्या किया, और क्यों किया।

मुख्य भाव — कई भावों का जाल

इस कविता में एक साथ कई भाव बुने हुए हैं, और सबके बीच में एक ही चीज़ है — स्वदेश-प्रेम। नीचे का भाव-जाल इन्हें एक साथ दिखाता है।

कविता का भाव-जाल — बीच में स्वदेश-प्रेम, उससे जुड़े चार भाव — मातृभूमि से लगाव, जोश और साहस, बलिदान की भावना, कर्म से देशसेवा
Figure 1.3 — चित्र 1.3 — कविता का भाव-जाल। बीच में पीले गोले में कविता का मूल भाव है — स्वदेश-प्रेम। उससे चार भाव जुड़े हैं। ऊपर बाएँ — मातृभूमि से लगाव (मिट्टी, दाना-पानी, अपनापन)। ऊपर दाएँ — जोश और साहस (हिम्मत से ही प्रगति होती है)। नीचे बाएँ — बलिदान की भावना (देश पर मर मिटने को तैयार रहना)। नीचे दाएँ — कर्म से देशसेवा (सब कुछ अपने हाथों में है)। नीचे लिखा है — ये चारों भाव मिलकर सच्चा देश-प्रेम बनाते हैं।

चित्र 1.3 से साफ़ है कि यह कविता सिर्फ़ “देश अच्छा है” कहने वाली नहीं है। इसमें मातृभूमि से लगाव है, जोश और साहस की पुकार है, बलिदान की भावना है, और कर्म से देशसेवा का संदेश है। ये चारों मिलकर बताते हैं कि सच्चा देश-प्रेम क्या होता है।

काव्य-सौंदर्य — कविता को सुंदर क्या बनाता है

अब देखते हैं कि कवि ने इस पुकार को इतना असरदार कैसे बना दिया।

पहले एक छोटा शब्द समझ लें, जो आगे काम आएगा।

इस कविता का काव्य-सौंदर्य चार बातों से बनता है:

1. हृदय और पत्थर का रूपक। कवि “भावहीन दिल” को सीधे “पत्थर” कह देता है। जब हम एक चीज़ को बिल्कुल दूसरी चीज़ बता देते हैं (जैसे “दिल पत्थर है”), तो उसे रूपक कहते हैं। यह बात मन में गहरी बैठ जाती है।

2. टेक (दोहराई जाने वाली पंक्ति)। “वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं” — यह पंक्ति कविता में बार-बार लौटती है। ऐसी दोहराई जाने वाली पंक्ति को टेक कहते हैं। इससे कविता की मुख्य बात बार-बार याद आती है और गीत जैसी लय बनती है।

3. तुक (rhyme)। पंक्तियों के अंत के शब्दों की आवाज़ आपस में मिलती-जुलती है — जैसे “दाना-पानी… राजा-रानी… लासानी… दीवानी”। इससे कविता गाने जैसी बहती है और याद रखने में आसान हो जाती है।

4. ओज भरी भाषा। कविता की भाषा में जोश और गर्मी है। यह डराती नहीं, बल्कि हिम्मत बढ़ाती है। इसी वजह से यह एक सच्चा आह्वान गीत बन जाती है — एक पुकार, जो हमें कुछ करने को बुलाती है।

“नथिंग इज़ ए गिवन” — दिल को पत्थर ही क्यों कहा?

यहाँ एक बहुत ज़रूरी सवाल है। कवि भावहीन दिल को “ठंडा” या “खाली” भी कह सकता था। पर उसने “पत्थर” ही क्यों चुना? इस एक शब्द में ऐसा क्या ख़ास है?

इसका जवाब समझने के लिए सोचिए कि पत्थर कैसा होता है। पत्थर तीन बातों में हमारे दिल से बिल्कुल उल्टा है। पहला — पत्थर ठंडा और कठोर होता है, उसमें कोई गर्मी या नर्मी नहीं। दूसरा — पत्थर कुछ महसूस नहीं करता; उसे चोट लगे या प्यार मिले, उस पर कोई असर नहीं होता। तीसरा — पत्थर कुछ करता नहीं, बस पड़ा रहता है, बोझ बना रहता है।

अब देखिए — देश-प्रेम से खाली दिल भी ठीक ऐसा ही है। उसमें न गर्मी है, न वह कुछ महसूस करता है, न देश के लिए कुछ करता है। इसीलिए कवि का यह रूपक इतना सटीक है। “पत्थर” शब्द एक ही झटके में तीनों बातें कह देता है। अगर कवि सिर्फ़ “खाली दिल” कहता, तो बात इतनी गहरी न बैठती।

एक छोटी जाँच करते हैं, ताकि यह बात पक्की हो जाए।

Concept check

कवि ने देश-प्रेम से खाली हृदय को 'पत्थर' क्यों कहा है?

तोप-तलवार का संदेश — असली हथियार क्या है?

अब एक और सुंदर बात पर ध्यान दें। कविता के अंत में कवि कहता है — “सब कुछ है अपने हाथों में, क्या तोप नहीं तलवार नहीं।” इसका मतलब क्या है? क्या कवि सच में हथियार उठाने को कह रहा है?

नहीं। यहाँ कवि एक रूपक का इस्तेमाल कर रहा है। वह यह समझाना चाहता है कि जैसे युद्ध जीतने के लिए तोप और तलवार जैसे हथियार चाहिए, वैसे ही जीवन में आगे बढ़ने के लिए कुछ “भीतरी हथियार” चाहिए — और वे हैं साहस और इच्छाशक्ति।

नीचे का चित्र इसी तुलना को दिखाता है।

रूपक की तुलना — बाएँ युद्ध के लिए तोप और तलवार, दाएँ जीवन में प्रगति के लिए साहस और इच्छाशक्ति
Figure 1.4 — चित्र 1.4 — तोप-तलवार का रूपक। बाईं ओर लाल बक्से में 'युद्ध जीतने के लिए' तोप और तलवार दिखाए गए हैं — यानी हथियार हों, तभी लड़ाई जीती जाती है। बीच में एक 'लगभग बराबर' का चिह्न है, जो बताता है — वैसे ही। दाईं ओर हरे बक्से में 'जीवन में प्रगति के लिए' साहस और इच्छाशक्ति दिखाई गई है — यानी हिम्मत हो, तभी आगे बढ़ा जाता है। नीचे लिखा है — कवि कहता है कि सब कुछ हमारे अपने हाथों में है।

चित्र 1.4 हमारे सवाल का जवाब दे देता है। कवि बाहरी लड़ाई की बात नहीं कर रहा। वह कह रहा है — असली हथियार तुम्हारे भीतर है। जिसके पास साहस और इच्छाशक्ति है, वह बिना तोप-तलवार के भी अपनी मंज़िल पा सकता है। और सबसे अच्छी बात — यह हथियार हमें कहीं बाहर से नहीं लाना; यह हमारे अपने हाथों में है।

आम भूलें

कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें विद्यार्थी अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।

⚠️ Common mistake
What students think

'वह हृदय पत्थर है' का मतलब है कि उस इंसान का दिल सचमुच पत्थर का बना है।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कविता में 'पत्थर' शब्द सीधे-सीधे आया है, तो उसका शब्दशः (अक्षर-दर-अक्षर) मतलब लेना आसान पड़ता है।

What actually happens

यह एक रूपक है, सच नहीं। 'पत्थर' का मतलब है — भावहीन, कठोर और संवेदनहीन दिल। कवि कह रहा है कि जिस दिल में देश-प्रेम नहीं, वह पत्थर जैसा ठंडा और बेकार है।

⚠️ Common mistake
What students think

'तोप नहीं तलवार नहीं' का मतलब है कि देश के लिए हमें असली हथियार उठाकर लड़ना चाहिए।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि तोप और तलवार सचमुच के युद्ध के हथियार हैं, तो ध्यान सीधे लड़ाई की ओर चला जाता है।

What actually happens

यहाँ तोप-तलवार एक रूपक हैं। कवि का मतलब है — जैसे युद्ध में हथियार चाहिए, वैसे ही जीवन में प्रगति के लिए साहस और इच्छाशक्ति चाहिए। असली हथियार हमारे भीतर का साहस है।

⚠️ Common mistake
What students think

कविता मौत की बात करती है, इसलिए यह एक उदास और निराश करने वाली कविता है।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कविता में 'काल-दीप', 'जल जाना' और 'एक दिन जाने को' जैसी मौत से जुड़ी बातें आती हैं, जो पहली नज़र में भारी लगती हैं।

What actually happens

कविता उदास नहीं, बल्कि जोश भरने वाली है। मौत की बात इसलिए है ताकि हम समझें — जब जाना तय है, तो डरकर नहीं, साहस के साथ और देश के लिए कुछ कर गुज़रते हुए जीना चाहिए।

जाँचिए अपनी समझ

अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।

'वह हृदय नहीं है पत्थर है' पंक्ति में हृदय के पत्थर होने का क्या मतलब है?

इस कविता का मुख्य भाव क्या है?

'हम हैं जिसके राजा-रानी' पंक्ति में 'हम' शब्द किसके लिए आया है?

कवि के अनुसार जीवन में प्रगति के लिए असली 'हथियार' क्या है?

अभ्यास (श्रेणीबद्ध)

अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।

सरल

सरल

शब्दार्थ लिखिए: (क) स्वदेश (ख) सार (ग) लासानी (घ) काल-दीप।

सरल

कवि के अनुसार किस प्रकार का हृदय पत्थर के समान है?

मध्यम

मध्यम

कविता में 'देश-प्रेम से भरा हृदय' और 'देश-प्रेम से खाली हृदय' में क्या फ़र्क़ है? एक छोटी तालिका बनाकर समझाइए।

मध्यम

कविता में कवि मौत (काल-दीप) की बात क्यों करता है? इससे वह हमें क्या समझाना चाहता है?

चुनौती

चुनौती

यह कविता एक 'आह्वान गीत' कही जाती है। आह्वान गीत क्या होता है, और यह कविता एक किशोर (टीनएजर) के जीवन में देश-प्रेम को कैसे उतार सकती है?

सारांश

  • “स्वदेश” कविता के कवि गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ (1883–1972) हैं, जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव में हुआ।
  • यह एक आह्वान गीत है — एक पुकार, जो हमें देश-प्रेम, जोश और साहस के लिए प्रेरित करती है।
  • कविता का मुख्य भाव है — सच्चा हृदय वही है जिसमें अपने देश के लिए प्रेम हो। देश-प्रेम से खाली दिल पत्थर जैसा ठंडा और बेकार है।
  • कवि याद दिलाता है कि यही देश हमें मिट्टी, भोजन, रिश्ते और सम्मान देता है — हम ही इसके राजा-रानी (असली मालिक) हैं।
  • जीवन में आगे बढ़ने के लिए तोप-तलवार नहीं, बल्कि साहस और इच्छाशक्ति चाहिए — और सब कुछ हमारे अपने हाथों में है।
  • मौत निश्चित है, इसलिए डरकर नहीं — साहस के साथ, देश के लिए कुछ कर गुज़रते हुए जीना चाहिए।
  • कविता का काव्य-सौंदर्य बनता है — हृदय-पत्थर का रूपक, बार-बार लौटती टेक, तुक और ओज भरी भाषा से।

आगे क्या?

देश-प्रेम के इस जोश को समझने के बाद, अगला पाठ हमें प्रकृति और छोटे जीवों की दुनिया की ओर ले जाता है। अगला पाठ है पाठ 2 — “दो गौरैया”। जैसे इस कविता में देश के लिए संवेदना जगी, वैसे ही अगली कहानी में हम नन्ही गौरैयों के ज़रिए प्रकृति और जीवों के प्रति प्रेम को महसूस करेंगे।

Frequently Asked Questions

स्वदेश कविता का मुख्य भाव क्या है?

इस कविता का मुख्य भाव है देश के प्रति प्रेम। कवि कहता है कि जिस हृदय में अपने देश के लिए प्यार नहीं, वह हृदय नहीं, पत्थर के समान है। कविता हमें देश के लिए जोश, साहस और कुछ कर गुज़रने की भावना से भर देती है।

वह हृदय नहीं है पत्थर है पंक्ति का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि जिस इंसान के मन में अपने देश के लिए प्रेम और भाव नहीं है, उसका हृदय भावहीन और कठोर है। पत्थर ठंडा और संवेदनहीन होता है, उसमें कोई भावना नहीं होती। इसी तरह देश-प्रेम से खाली हृदय भी निर्जीव और बेकार है।

स्वदेश कविता के कवि कौन हैं?

इस कविता के कवि गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' हैं (1883 से 1972)। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले में हुआ था। उन्होंने देश-प्रेम के साथ-साथ किसान, मज़दूर और सामाजिक कुरीतियों पर भी कविताएँ लिखीं और 'त्रिशूल' उपनाम से भी जाने जाते थे।

स्वदेश कविता में तोप और तलवार का क्या मतलब है?

कवि कहता है कि जैसे युद्ध जीतने के लिए तोप और तलवार जैसे हथियार चाहिए, वैसे ही जीवन में प्रगति के लिए साहस और इच्छाशक्ति चाहिए। यानी सच्चा हथियार बाहरी नहीं, हमारे भीतर का साहस है, और सब कुछ हमारे अपने हाथों में है।

स्वदेश कविता में हम किसके राजा-रानी कहे गए हैं?

कवि कहता है कि हम अपने देश के राजा-रानी हैं। इसका मतलब है कि देश के सभी नागरिक ही इस देश के असली मालिक हैं। देश की मिट्टी, उसके संसाधन और उसका सम्मान हम सबका है, इसलिए उसकी देखभाल भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है।