आदमी का अनुपात

Chapter 9 · Hindi · Class 8 20 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा एक रात आसमान की ओर देखिए। कितने सारे तारे! और हर तारा हमारे सूरज जैसा कोई बड़ा गोला है, जो हमसे बहुत-बहुत दूर है।

अब सोचिए — उस पूरे आसमान के सामने आप कितने बड़े हैं? या यह पूरी पृथ्वी कितनी बड़ी है? सच पूछिए तो हम सब बहुत-बहुत छोटे हैं।

पर मज़ेदार बात यह है। इतना छोटा होकर भी आदमी अक्सर बहुत घमंड करता है। वह दूसरों से झगड़ता है, खुद को सबसे ऊँचा मानता है, और लोगों के बीच दीवारें खड़ी कर देता है।

यही इस कविता का दिल है। यह हमें आईना दिखाती है — तू इतना छोटा है, फिर इतना घमंड क्यों? पढ़ने के बाद आप समझ जाएँगे कि आदमी की असली बड़ाई उसके आकार से नहीं, उसके मन के बड़प्पन से तय होती है।

मूल भाव

इस कविता का मूल भाव है — अपने छोटेपन को पहचानो और घमंड छोड़ो। कवि पहले दिखाते हैं कि आदमी कितना छोटा है। आदमी एक कमरे में रहता है, कमरा घर में, घर मुहल्ले में, मुहल्ला नगर में… और ऐसे बढ़ते-बढ़ते बात पृथ्वी और अनगिनत ब्रह्मांडों तक पहुँच जाती है। इन सबके सामने आदमी एक नन्हा-सा बिंदु है। पर अफ़सोस — इतना छोटा होकर भी आदमी ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ और घृणा में डूबा रहता है। वह खुद को दूसरों का स्वामी मानता है और अनगिनत दीवारें खड़ी कर देता है। कवि इसी पर तीखा, पर करुणा-भरा व्यंग्य करते हैं, और चाहते हैं कि आदमी विनम्र बने।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: यह कविता अभी कॉपीराइट में है, इसलिए हम यहाँ इसकी पूरी मूल पंक्तियाँ नहीं छाप रहे। पूरी कविता अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 8) में पढ़ें। इस पृष्ठ पर हमने कविता का सरल अर्थ, भाव और व्याख्या अपने शब्दों में दी है — इसे किताब की मूल कविता के साथ मिलाकर समझें।

कवि से परिचय

कविता में उतरने से पहले यह जान लें कि इसे लिखा किसने।

इस कविता के कवि हैं गिरिजा कुमार माथुर (1919–1994)। उनका जन्म मध्य प्रदेश के अशोकनगर ज़िले में हुआ था। उनके पिता देवीचरण माथुर भी कविताएँ लिखते थे, तो कविता उन्हें घर से ही मिली।

गिरिजा कुमार माथुर आकाशवाणी (रेडियो) में कई बड़े पदों पर रहे। कविताओं के साथ-साथ उन्होंने नाटक, गीत, कहानी और निबंध भी लिखे। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं — मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान और मैं वक़्त के हूँ सामने

एक बात आपको ज़रूर पसंद आएगी — प्रसिद्ध प्रेरणा-गीत “होंगे कामयाब” (हम होंगे कामयाब, एक दिन) भी इन्हीं की रचना है।

कविता का भावार्थ

आइए अब कविता का भाव धीरे-धीरे, क्रम से समझते हैं। कविता दो हिस्सों में चलती है — पहले आदमी का छोटापन, फिर आदमी का घमंड। हम दोनों को बारी-बारी देखेंगे।

पहले देखते हैं कि कवि आदमी का छोटापन कैसे दिखाते हैं। वे एक सीढ़ी-सी बनाते हैं, जिसमें हर पायदान पिछले से बड़ा है। नीचे का चित्र यही सीढ़ी दिखाता है।

विस्तार की सीढ़ी — आदमी, कमरा, घर, मुहल्ला, नगर, प्रदेश, देश, पृथ्वी और ब्रह्मांड
Figure 9.1 — चित्र 9.1 — विस्तार की सीढ़ी। सबसे नीचे और सबसे छोटा पायदान आदमी है। उसके ऊपर कमरा, फिर घर, फिर मुहल्ला, फिर नगर, प्रदेश, देश, पृथ्वी और सबसे ऊपर सबसे बड़ा पायदान ब्रह्मांड है। हर पायदान पिछले से बड़ा होता जाता है, और इसी से साफ़ दिखता है कि सबसे ऊपर वाली विशाल सृष्टि के सामने सबसे नीचे का आदमी कितना नन्हा है। तिरछा तीर बताता है कि छोटे से बड़े की ओर विस्तार किस दिशा में बढ़ रहा है।

आदमी से ब्रह्मांड तक का सफ़र। जैसा चित्र 9.1 दिखाता है, कवि एक-एक कदम बढ़ाते हैं। दो आदमी एक कमरे में हैं — और कमरे से भी छोटे हैं। कमरा घर का एक हिस्सा है, घर मुहल्ले का, मुहल्ला नगर का, नगर प्रदेश का, प्रदेश देश का। देश पृथ्वी पर है। और पृथ्वी? वह तो अनगिनत तारों के बीच एक छोटी-सी, करोड़ों में एक है। ऊपर आकाशगंगा फैली है। और ऐसी लाखों आकाशगंगाओं, करोड़ों ब्रह्मांडों में हमारा ब्रह्मांड बस एक है। हर ब्रह्मांड में न जाने कितनी पृथ्वियाँ, कितनी भूमियाँ, कितनी सृष्टियाँ होंगी।

यही है आदमी का अनुपात। इस पूरे विशाल विस्तार के सामने आदमी का माप क्या है? बस एक नन्हा-सा बिंदु। विराट (बहुत बड़ी सृष्टि) के सामने आदमी कितना छोटा है — कवि इसी “अनुपात” को हमारे सामने रखते हैं।

अब कविता का दूसरा हिस्सा आता है — और यहीं कवि का असली निशाना है।

इतना छोटा, फिर भी इतना घमंड। कवि कहते हैं — इतना छोटा होकर भी आदमी ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में डूबा रहता है। वह शंख जैसी गिनी न जा सकने वाली (अनगिनत) दीवारें खड़ी कर देता है। वह खुद को दूसरों का स्वामी (मालिक) बता देता है।

सबसे तीखी बात। देशों की तो बात ही छोड़िए — आदमी एक छोटे-से कमरे में भी दो दुनिया बना देता है। यानी एक ही कमरे में रहते दो लोग भी झगड़े और अहंकार से इतने बँट जाते हैं, मानो दो अलग दुनिया में रहते हों।

तो पूरी कविता का सार यह है — आदमी विशाल सृष्टि के सामने नन्हा है, फिर भी घमंड और बँटवारे में जीता है। कवि चाहते हैं कि वह यह सच पहचाने और विनम्र बने।

आइए गहराई से समझें

अब कविता के पीछे छिपी बातों को थोड़ा गहराई से देखते हैं। हम समझेंगे कि कवि ने क्या कहा, और क्यों कहा।

“अनुपात” का मतलब — आदमी की महानता किससे मापें

पहले कविता का सबसे ज़रूरी शब्द समझ लें, क्योंकि पूरा शीर्षक इसी पर टिका है।

अब असली सवाल यह है — अगर आदमी आकार में इतना छोटा है, तो उसकी “महानता” किससे नापें? कविता का जवाब बहुत सुंदर है। आदमी की बड़ाई उसके आकार से नहीं, उसके गुणों से तय होती है। नीचे का चित्र यही दो तराज़ू दिखाता है।

आदमी की महानता किससे मापें — आकार से छोटा, पर गुणों से विराट
Figure 9.2 — चित्र 9.2 — आदमी की महानता किससे मापें। बीच में आदमी है। बाईं ओर लाल पक्ष कहता है — अगर आकार से नापें तो आदमी ब्रह्मांड के सामने धूल के कण जितना छोटा है। दाईं ओर हरा पक्ष कहता है — अगर गुणों से नापें तो वही आदमी विराट बन जाता है। ये गुण हैं — प्रेम, सहयोग और सौहार्द, सहिष्णुता, उदारता और समावेश, सबको अपना मानना। सबसे नीचे का संदेश बताता है कि असली अनुपात आकार से नहीं, मन के बड़प्पन से तय होता है।

जैसा चित्र 9.2 दिखाता है, यही कविता का गहरा संदेश है। शरीर से आदमी छोटा है, यह सच है। पर अगर उसका मन बड़ा हो — अगर उसमें प्रेम, दया और सबको साथ लेकर चलने का भाव हो — तो वह सृष्टि जितना विशाल बन सकता है। महानता आकार में नहीं, अच्छे गुणों में है।

काव्य-सौंदर्य — कविता को सुंदर और असरदार क्या बनाता है

अब देखते हैं कि कवि ने इतनी बड़ी बात इतने थोड़े-से शब्दों में कैसे कह दी।

पहले एक छोटा शब्द समझ लें, जो आगे काम आएगा।

इस कविता का काव्य-सौंदर्य चार बातों से बनता है:

1. छोटा-से-बड़ा क्रम (दोहराव)। कवि एक शब्द को अगली पंक्ति में दोहराते हुए आगे बढ़ते हैं — कमरा… घर… मुहल्ला… नगर… इस सीढ़ी जैसे क्रम से छोटे से बड़े का विस्तार आँखों के सामने खिंच जाता है।

2. छोटी-छोटी पंक्तियाँ। कविता की पंक्तियाँ बहुत छोटी हैं। हर पंक्ति में एक-दो शब्द ही हैं। इससे पढ़ते समय एक ठहराव-सा आता है, और हर बात पर हमारा ध्यान रुकता है।

3. प्रश्न-शैली में व्यंग्य। कवि सीधे उपदेश नहीं देते। वे ऐसे दिखाते हैं कि पाठक खुद सोचने लगे — “इतना छोटा होकर इतना घमंड क्यों?” यही नरम, पर गहरा व्यंग्य कविता की जान है।

4. अतिशयोक्ति (बढ़ा-चढ़ाकर कहना)। “शंख सी दीवारें” यानी गिनी न जा सकने वाली असंख्य दीवारें — यह बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया है, ताकि आदमी के बँटवारे की आदत और तीखी लगे।

“नथिंग इज़ ए गिवन” — आदमी का घमंड बेमानी क्यों है?

यहाँ एक बहुत ज़रूरी सवाल है। कवि बार-बार आदमी के घमंड पर चोट करते हैं। पर क्यों? घमंड करना इतनी बड़ी बात क्यों है? आदमी अगर खुद को बड़ा मान भी ले, तो इसमें हर्ज़ क्या?

इसका जवाब उसी “अनुपात” में छिपा है। घमंड का मतलब है — खुद को दूसरों से ऊँचा और बड़ा समझना। पर सच्चाई यह है कि इस अनंत सृष्टि के सामने हम सब बराबर के छोटे हैं। तो खुद को “स्वामी” मान लेना असल में एक झूठ पर खड़ा है। नीचे का चित्र इसी विरोध (विरोधाभास) को दिखाता है।

कविता का विरोधाभास — आदमी छोटा है, फिर भी घमंड करता है
Figure 9.3 — चित्र 9.3 — कविता का विरोधाभास। ऊपर नीले बक्से में सच्चाई है — अनगिनत तारों और करोड़ों ब्रह्मांडों के सामने आदमी बहुत छोटा है, एक नन्हा-सा बिंदु। नीचे लाल बक्से में आदमी का असली व्यवहार है — फिर भी वह खुद को दूसरों का स्वामी मानता है, अनगिनत दीवारें खड़ी करता है, और एक कमरे में भी झगड़े से दो दुनिया बना देता है। बीच का बड़ा प्रश्नचिह्न पूछता है — जब आदमी इतना छोटा है, तो इतना घमंड क्यों? यही विरोध कविता का दिल है।

चित्र 9.3 हमारे सवाल का जवाब दे देता है। घमंड इसलिए बेमानी है क्योंकि वह सच्चाई के उलट है। जो इंसान असल में नन्हा है, वह अगर खुद को सबसे बड़ा माने, तो यह सच नहीं, सिर्फ़ एक भ्रम है। और इसी भ्रम से ईर्ष्या, स्वार्थ और झगड़े पैदा होते हैं, जो आदमी को और छोटा बना देते हैं।

एक छोटी जाँच करते हैं, ताकि यह बात पक्की हो जाए।

Concept check

कविता के अनुसार आदमी का घमंड एक भ्रम (झूठा विश्वास) क्यों है?

संदेश के पीछे का क्यों — दीवारें तोड़कर ही आदमी बड़ा क्यों बनता है?

अब एक और सुंदर बात पर ध्यान दें। कविता में बार-बार “दीवार” शब्द आता है। पर क्या ये दीवारें ईंट-पत्थर की हैं? नहीं। ये मन की दीवारें हैं — ईर्ष्या, घृणा, अविश्वास और अहंकार की।

सोचिए, इन दीवारों से होता क्या है? हर दीवार आदमी को थोड़ा और अकेला, थोड़ा और छोटा कर देती है। इसके उलट, जब आदमी प्रेम और सहयोग से दूसरों से जुड़ता है, तो वह बड़ा होता जाता है — मानो उसका मन फैलकर सबको अपने अंदर समेट लेता है। नीचे का चित्र आदमी के सामने इन्हीं दो रास्तों को दिखाता है।

आदमी के सामने दो रास्ते — दीवारें उठाना या पुल बनाना
Figure 9.4 — चित्र 9.4 — आदमी के सामने दो रास्ते। बायाँ रास्ता है दीवारें उठाना, यानी सिकुड़ना। ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास से ईंटों जैसी दीवारें बनती हैं, और नतीजा होता है बँटवारा, अलगाव और एक कमरे में भी दो दुनिया। दायाँ रास्ता है पुल बनाना, यानी विस्तार। प्रेम, सहयोग, सहिष्णुता और समर्पण से लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं (जुड़े हुए घेरे यही पुल दिखाते हैं), और नतीजा होता है कि आदमी विराट बन जाता है। बीच की टूटी रेखा दोनों रास्तों को अलग करती है।

चित्र 9.4 का संदेश साफ़ है। दीवारें तोड़ने से ही आदमी बड़ा बनता है, क्योंकि असली बड़ाई जोड़ने में है, तोड़ने में नहीं। जो आदमी सबको अपना मानता है, उसकी दुनिया बड़ी होती जाती है। और जो हर किसी से दीवार खड़ी करता है, उसकी दुनिया सिमटकर एक कमरे जितनी रह जाती है। यही कविता की सबसे बड़ी सीख है।

आम भूलें

कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें बच्चे अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।

⚠️ Common mistake
What students think

कविता कहती है कि आदमी छोटा है, इसलिए वह बेकार और महत्वहीन है।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि हम अक्सर 'छोटे' को 'कम महत्वपूर्ण' मान लेते हैं — रोज़मर्रा में छोटी चीज़ को हम हल्के में लेते हैं।

What actually happens

कविता आदमी को महत्वहीन नहीं कहती। वह सिर्फ़ घमंड पर चोट करती है। उसका असली संदेश है कि आदमी अपने गुणों — प्रेम और सहयोग — से विराट बन सकता है। यानी छोटा होकर भी वह महान हो सकता है।

⚠️ Common mistake
What students think

कविता में 'दीवार' का मतलब असली ईंट-पत्थर की दीवार है।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि 'दीवार' शब्द सुनते ही सबसे पहले घर की पक्की दीवार का चित्र मन में आता है।

What actually happens

यहाँ 'दीवार' का मतलब मन की दीवारें हैं — ईर्ष्या, घृणा, अविश्वास और अहंकार। ये दीवारें लोगों को आपस में बाँट देती हैं, भले ही वे एक ही कमरे या घर में रहते हों।

⚠️ Common mistake
What students think

कविता में कवि आदमी पर बहुत गुस्सा (क्रोध) दिखाते हैं।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कविता आदमी की कमियाँ गिनाती है, और हम मानते हैं कि किसी की कमियाँ गिनाना हमेशा गुस्से से ही होता है।

What actually happens

कवि कहीं भी क्रोध नहीं दिखाते। उनके स्वर में नरम व्यंग्य और एक चिंता है। वे आदमी को नीचा नहीं दिखाना चाहते, बल्कि प्यार से उसे उसका सच याद दिलाना चाहते हैं, ताकि वह सुधरे।

जाँचिए अपनी समझ

अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।

कविता के अनुसार ब्रह्मांड में आदमी का स्थान कैसा है?

कविता में मुख्य रूप से किन दो चीज़ों का अनुपात दिखाया गया है?

कविता के अनुसार आदमी किन भावों में लिप्त (डूबा) रहता है?

'एक कमरे में दो दुनिया रचाता है' पंक्ति का क्या अर्थ है?

अभ्यास (श्रेणीबद्ध)

अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।

सरल

सरल

शब्दार्थ लिखिए: (क) अनुपात (ख) विराट (ग) निरंतर बड़ा होता क्रम — 'कमरा, घर, मुहल्ला' से कवि क्या दिखाते हैं? (घ) संख्यातीत।

सरल

कविता में आदमी के घमंड को दिखाने वाली कौन-सी तीन बातें कवि ने कही हैं? सूची बनाइए।

मध्यम

मध्यम

कविता आदमी को दो रास्ते दिखाती है — एक 'दीवारें उठाना' और दूसरा 'विस्तार पाना'। दोनों का फ़र्क़ एक छोटी तालिका बनाकर समझाइए।

मध्यम

'संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है / अपने को दूजे का स्वामी बताता है।' — इन पंक्तियों का भाव अपने शब्दों में समझाइए।

चुनौती

चुनौती

कविता का शीर्षक 'आदमी का अनुपात' है। यह शीर्षक कितना सही है? और इस कविता से हमें जीवन के लिए क्या सीख मिलती है, जिसे हम रोज़ अपना सकें?

सारांश

  • “आदमी का अनुपात” गिरिजा कुमार माथुर की कविता है। प्रसिद्ध गीत “होंगे कामयाब” भी इन्हीं की रचना है।
  • कविता मुख्य रूप से आदमी और ब्रह्मांड का अनुपात दिखाती है — विशाल सृष्टि के सामने आदमी एक नन्हा-सा बिंदु है।
  • कवि कमरा → घर → मुहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी → ब्रह्मांड का बढ़ता क्रम बनाकर आदमी का छोटापन दिखाते हैं।
  • इतना छोटा होकर भी आदमी ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में डूबा रहता है — यही कवि की चिंता है।
  • आदमी अनगिनत दीवारें खड़ी करता है, खुद को दूसरों का स्वामी मानता है, और एक कमरे में भी दो दुनिया बना देता है।
  • कवि का संदेश है — अपने छोटेपन को पहचानो, घमंड छोड़ो, और प्रेम-सहयोग से जुड़कर विराट बनो। महानता आकार से नहीं, मन के बड़प्पन से तय होती है।
  • कविता का काव्य-सौंदर्य बनता है — छोटे-से-बड़े का दोहराव वाला क्रम, छोटी-छोटी पंक्तियाँ, प्रश्न-शैली का नरम व्यंग्य और अतिशयोक्ति से।

आगे क्या?

ब्रह्मांड के सामने अपने छोटेपन और मन के बड़प्पन को समझने के बाद, अगला पाठ हमें नई उमंग और सपनों की ओर ले जाता है। अगला पाठ है पाठ 10 — “तरुण के स्वप्न”। जहाँ यह कविता विनम्रता सिखाती है, वहीं अगला पाठ युवा मन के बड़े सपनों और हौसले की बात करेगा।

Frequently Asked Questions

आदमी का अनुपात कविता का मुख्य भाव क्या है?

कविता बताती है कि इस विशाल ब्रह्मांड के सामने आदमी बहुत छोटा है — एक नन्हा-सा बिंदु। फिर भी वह घमंड करता है, खुद को दूसरों का स्वामी मानता है और अनगिनत दीवारें खड़ी कर देता है। कवि इसी विरोधाभास पर तीखा व्यंग्य करते हैं और याद दिलाते हैं कि आदमी की असली महानता आकार से नहीं, उसके मन के बड़प्पन से तय होती है।

आदमी का अनुपात कविता के कवि कौन हैं?

इस कविता के कवि गिरिजा कुमार माथुर हैं। उनका जन्म मध्य प्रदेश के अशोकनगर में हुआ था। वे आकाशवाणी में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे और कविता के साथ नाटक, गीत, कहानी और निबंध भी लिखे। प्रसिद्ध गीत 'होंगे कामयाब' की रचना भी उन्होंने ही की थी।

आदमी का अनुपात किन दो चीज़ों के बीच दिखाया गया है?

अनुपात मुख्य रूप से 'आदमी' और 'ब्रह्मांड' के बीच दिखाया गया है। यानी एक नन्हा-सा इंसान और दूसरी ओर अनगिनत तारों, करोड़ों ब्रह्मांडों वाली अनंत सृष्टि। इसी तुलना से समझ आता है कि आदमी कितना सूक्ष्म है।

एक कमरे में दो दुनिया रचाता है का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है कि आदमी इतना अलगाववादी हो गया है कि एक ही छोटे-से कमरे में रहते हुए भी वह झगड़े, मतभेद और अहंकार की दीवार खड़ी कर दो अलग दुनिया बना देता है। यह पंक्ति आदमी के मन की संकीर्णता और बँटवारे की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करती है।

आदमी का अनुपात कविता हमें क्या सीख देती है?

कविता सिखाती है कि अपनी विशालता का घमंड छोड़कर आदमी को विनम्र बनना चाहिए। ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ और घृणा छोड़कर प्रेम, सहयोग और सहिष्णुता अपनानी चाहिए। तभी आदमी सिकुड़ने के बजाय विराट बनता है और सच में बड़ा कहलाता है।