तरुण के स्वप्न

Chapter 10 · Hindi · Class 8 20 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। आपका कोई सपना है? शायद कुछ बड़ा बनने का, या दुनिया में कुछ अच्छा करने का। हर इंसान कोई न कोई सपना देखता है।

पर सोचिए, अगर किसी का सपना सिर्फ़ अपने लिए न हो — पूरे देश के लिए हो, तो? यही इस पाठ की बात है।

यह पाठ एक भाषण का हिस्सा है। यह भाषण नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने युवाओं के सामने दिया था। इसमें वे अपना सबसे बड़ा सपना बताते हैं — एक ऐसे भारत का सपना जहाँ सब बराबर हों, सब आज़ाद हों, सबको आगे बढ़ने का मौका मिले।

और सबसे ख़ास बात — वे यह सपना अपने पास नहीं रखते। वे इसे तरुणों, यानी युवाओं को सौंप देते हैं। मानो कह रहे हों, “अब इसे सच करना तुम्हारे हाथ में है।” यही बात इस पाठ को आज भी इतना ज़रूरी बनाती है। पढ़ने के बाद आप समझ जाएँगे कि सपना देखना, साहस रखना और देश के लिए कुछ करना — ये तीनों कैसे जुड़े हैं।

मूल भाव

इस पाठ का मूल भाव है — एक बड़ा सपना तभी सच होता है जब लोग उसके लिए साहस से कर्म करें। नेताजी सुभाषचंद्र बोस एक ऐसे स्वाधीन और समृद्ध समाज का स्वप्न देखते हैं, जहाँ कोई जातिभेद न हो, नारी को पुरुष के समान अधिकार हों, धन की विषमता न हो, और हर व्यक्ति को शिक्षा तथा उन्नति का समान अवसर मिले। वे इस सपने को अपने जीवन का सबसे बड़ा सत्य मानते हैं और इसके लिए हर त्याग, हर संकट सहने को तैयार हैं। अंत में वे यह स्वप्न उपहार के रूप में देश के तरुणों को सौंप देते हैं — “स्वीकार करो।”

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने बोस के भाषण का सरल अर्थ और व्याख्या अपने शब्दों में दी है। नेताजी का पूरा मूल भाषण-अंश अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 8) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। यहाँ हम मूल गद्य दोबारा नहीं छाप रहे — बस उसका भाव और विचार खोलकर समझा रहे हैं।

लेखक से परिचय

इससे पहले कि हम भाषण में उतरें, यह जान लेना अच्छा रहेगा कि इसे कहा किसने।

इस पाठ के लेखक हैं नेताजी सुभाषचंद्र बोस। उनका जन्म ओड़िशा के कटक नगर में हुआ था। पूरा देश उन्हें प्यार और सम्मान से ‘नेताजी’ कहता है।

बोस का एक ही लक्ष्य था — भारत को अँग्रेज़ी शासन से आज़ाद कराना। इसके लिए उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने ‘आजाद हिंद फौज’ का नेतृत्व किया और सैनिकों को ‘दिल्ली चलो’ तथा ‘जय हिंद’ का नारा दिया। उनका सबसे प्रसिद्ध नारा है — “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।”

यह पाठ उनके एक भाषण का अंश है। यह भाषण उन्होंने 29 दिसंबर, 1929 को मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में युवाओं को संबोधित करते हुए दिया था।

पाठ का सार

आइए अब इस भाषण का भाव धीरे-धीरे, क्रम से समझते हैं। यह नेताजी के दिल की आवाज़ है, जो वे सीधे युवाओं से कह रहे हैं।

हर सपने की एक शुरुआत होती है। बोस कहते हैं — स्वप्न तो कई लोगों ने देखा है। हमारे नेता देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक स्वप्न देखा था। वही स्वप्न उनकी शक्ति का स्रोत बना और उनके आनंद का झरना भी। बोस कहते हैं — “हम सब उन्हीं के स्वप्न के उत्तराधिकारी हैं।” यानी अब उस सपने को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी हमारी है।

सपना ही हमारी हर हरकत की प्रेरणा है। बोस कहते हैं — इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, काम करते हैं, भाषण देते हैं। मतलब, यह सपना हमारी पूरी दिनचर्या के पीछे की ताक़त है।

अब आता है सबसे ज़रूरी सवाल — वह स्वप्न आख़िर है क्या? बोस इसे एक आदर्श समाज के रूप में बताते हैं। यह समाज कैसा होगा, उसकी चार खास बातें हैं। नीचे का भाव-जाल इन चारों को एक साथ दिखाता है।

नेताजी के स्वप्न का भाव-जाल — सबको समानता, नारी मुक्ति, सबको शिक्षा और अवसर, श्रम और कर्म का सम्मान
Figure 10.1 — चित्र 10.1 — नेताजी के स्वप्न का भाव-जाल। बीच में नेताजी का स्वप्न है, यानी एक आदर्श समाज और राष्ट्र। उससे चार भाव जुड़े हैं। (1) सबको समानता — उस समाज में न जातिभेद हो, न अमीर-गरीब का भेद, धन की विषमता न हो। (2) नारी मुक्ति — स्त्री को पुरुष के समान अधिकार हों और वह भी देश की सेवा में बराबर हिस्सा ले। (3) सबको शिक्षा और अवसर — हर व्यक्ति को पढ़ने और आगे बढ़ने का समान मौका मिले। (4) श्रम और कर्म का सम्मान — मेहनत करने वालों की पूरी मर्यादा हो, और आलसी के लिए कोई जगह न हो। ये चारों बातें मिलकर बोस का आदर्श समाज बनाती हैं।

जैसा चित्र 10.1 दिखाता है, बोस का सपना बहुत साफ़ है। वे कहते हैं — उस समाज में व्यक्ति हर तरह से मुक्त हो, समाज के दबाव से दबकर न मरे। उस समाज में जातिभेद न हो, स्त्री-पुरुष को समान अधिकार हों, धन की विषमता न हो, और हर व्यक्ति को शिक्षा का समान अवसर मिले। जहाँ मेहनत की क़द्र हो और आलसी के लिए कोई जगह न हो।

यह राष्ट्र दुनिया के सामने एक मिसाल बनेगा। बोस कहते हैं — ऐसा राष्ट्र हर विदेशी प्रभाव से मुक्त रहेगा। वह अपने ही लोगों की भलाई के लिए काम करेगा और हर भारतवासी का अभाव मिटाएगा। और सिर्फ़ इतना ही नहीं — वह पूरी दुनिया के सामने एक आदर्श समाज और आदर्श राष्ट्र के रूप में गिना जाएगा।

यह सपना ही बोस का जीवन है। बोस कहते हैं — यह स्वप्न उनके सामने हमेशा का सच है। इस सच को पाने के लिए वे हर त्याग करने को तैयार हैं, हर संकट सहने को तैयार हैं। और अगर इस सपने को सच करते हुए प्राण भी देने पड़ें, तो वह मरना उन्हें स्वर्ग के समान लगेगा।

अंत में वे सपना तरुणों को सौंप देते हैं। बोस अपने युवा श्रोताओं से कहते हैं — “हे मेरे तरुण भाइयो! तुम्हें देने लायक मेरे पास कुछ और नहीं है। बस यही एक सपना है, जो मुझे असीम शक्ति और आनंद देता है। यही सपना मैं तुम्हें उपहार के रूप में देता हूँ — स्वीकार करो।”

तो पूरे पाठ का सार यह है — बोस एक बेहतर भारत का सपना देखते हैं, उसके लिए सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हैं, और यह सपना युवाओं को सौंप देते हैं ताकि वे इसे सच कर सकें।

आइए गहराई से समझें

अब इस भाषण के पीछे छिपी बातों को थोड़ा गहराई से देखते हैं। हम समझेंगे कि बोस ने क्या कहा, और क्यों कहा।

स्वप्न से कर्म तक — पूरा रास्ता

बोस का संदेश सिर्फ़ “सपना देखो” नहीं है। सपना तो सिर्फ़ पहला कदम है। उसके बाद और भी कदम हैं। नीचे का प्रवाह-चित्र यह पूरा रास्ता क्रम से दिखाता है।

स्वप्न से कर्म तक का प्रवाह — स्वप्न देखना, विश्वास, साहस और त्याग, तरुणों को सौंपना, कर्म
Figure 10.2 — चित्र 10.2 — तरुण के स्वप्न से कर्म तक का प्रवाह, क्रम से। (1) स्वप्न देखना — एक स्वाधीन, समान समाज का सपना देखना। (2) विश्वास — उस स्वप्न को अपने जीवन का नित्य सत्य मानना। (3) साहस और त्याग — सपने के लिए हर संकट सहना, हर त्याग करना, ज़रूरत पड़ने पर प्राण देने को भी तैयार रहना। (4) तरुणों को सौंपना — यह स्वप्न युवाओं को उपहार में देना और कहना 'स्वीकार करो'। (5) कर्म — तरुण इस सपने को मेहनत और काम से आदर्श राष्ट्र के रूप में साकार करें। तीर हर कदम की दिशा बताते हैं — सपना अकेले अधूरा है, कर्म से ही पूरा होता है।

चित्र 10.2 से एक बड़ी बात साफ़ होती है। बोस के लिए सपना देखना और सपने को सच करना — दोनों अलग बातें हैं। सपना तो शुरुआत है। उसके बाद विश्वास चाहिए, साहस चाहिए, त्याग चाहिए। और सबसे आख़िर में चाहिए कर्म — असली मेहनत, जिससे सपना ज़मीन पर उतरता है।

बोस ने सपना तरुणों को ही क्यों सौंपा?

यहाँ एक सुंदर सवाल है। बोस अपना सबसे कीमती सपना किसी और को क्यों नहीं देते? वे इसे युवाओं को ही क्यों सौंपते हैं?

इसका जवाब सोचने लायक है। एक बड़ा सपना एक इंसान के जीवन में पूरा नहीं हो पाता। उसे पूरा होने में सालों लगते हैं। बोस जानते थे कि वे अकेले अपने जीवन में पूरा भारत नहीं बदल सकते। पर युवाओं के पास तीन चीज़ें हैं — लंबा जीवन, जोश, और साहस। वे इस सपने को आगे ले जा सकते हैं। इसीलिए बोस इसे “उपहार” कहकर तरुणों को देते हैं — ताकि एक पीढ़ी का सपना अगली पीढ़ी में जीता रहे।

“नथिंग इज़ ए गिवन” — आलसी के लिए कोई जगह क्यों नहीं?

बोस एक बात ज़ोर देकर कहते हैं — उनके आदर्श समाज में आलसी और अकर्मण्य (काम न करने वाले) के लिए कोई जगह नहीं रहेगी। पर क्यों? कोई पूछ सकता है — समानता का मतलब तो सबको साथ लेकर चलना है, फिर आलसी को क्यों छोड़ें?

इसका जवाब समझने के लिए सोचिए कि कोई समाज आगे कैसे बढ़ता है। पहले एक छोटा शब्द समझ लें, जो यहाँ काम आएगा।

अब सोचिए — किसी समाज की कमी कैसे मिटती है? जब लोग मेहनत करके खेती करें, सामान बनाएँ, चीज़ें तैयार करें। यानी अभाव सिर्फ़ कर्म से मिटता है, बैठे रहने से नहीं। अगर समाज में सब आलसी हो जाएँ, तो कोई काम ही नहीं होगा, और कमी बढ़ती जाएगी। इसीलिए बोस मेहनत को इतना ज़रूरी मानते हैं। उनके लिए श्रम का सम्मान करना और आलस्य को नकारना — समानता के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि एक मज़बूत समाज की ज़रूरत है।

एक छोटी जाँच करते हैं, ताकि यह बात पक्की हो जाए।

Concept check

बोस के अनुसार किसी समाज का अभाव (कमी) किससे मिटता है?

बोस के मुख्य संदेश

इस छोटे-से भाषण में बोस तरुणों को कुछ ज़रूरी बातें सौंपते हैं। नीचे का चित्र इन संदेशों को एक साथ कार्ड के रूप में दिखाता है।

नेताजी के चार प्रेरक संदेश — बड़ा स्वप्न देखो, साहस से डरो मत, देश सबसे ऊपर, करके दिखाओ
Figure 10.3 — चित्र 10.3 — तरुणों के लिए नेताजी के चार संदेश। (1) बड़ा स्वप्न देखो — एक अच्छे, समान और स्वाधीन समाज का सपना देखना ही पहला कदम है। (2) साहस से डरो मत — सपने के लिए हर संकट सहो, हर त्याग करो; हिम्मत से ही जीत मिलती है। (3) देश सबसे ऊपर — अपने निजी स्वार्थ से पहले समाज और राष्ट्र की सेवा को रखो। (4) करके दिखाओ — सिर्फ़ सोचते मत रहो, आलस्य छोड़कर श्रम और कर्म से सपने को सच करो। यही चार बातें नेताजी अपने तरुण भाइयों को सौंपते हैं।

चित्र 10.3 बोस के पूरे भाषण को चार आसान संदेशों में समेट देता है। ध्यान दीजिए कि ये चारों आज भी उतने ही सच हैं। एक युवा आज भी इन्हें अपने जीवन में अपना सकता है — चाहे वह पढ़ाई हो, खेल हो, या देश के लिए कोई काम।

आम भूलें

कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें विद्यार्थी अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।

⚠️ Common mistake
What students think

'तरुण के स्वप्न' का मतलब है कि बोस अपने सोते समय आए सपनों की बात कर रहे हैं।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि 'स्वप्न' शब्द का रोज़मर्रा में सबसे आम मतलब होता है — नींद में दिखने वाला सपना।

What actually happens

यहाँ 'स्वप्न' का मतलब है — एक बड़ा लक्ष्य या आदर्श, यानी जिस तरह का समाज और देश बोस चाहते हैं। यह जागते हुए देखा गया सपना है, सोते हुए नहीं।

⚠️ Common mistake
What students think

बोस सिर्फ़ देश को आज़ाद कराने की बात कर रहे हैं, और कुछ नहीं।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि हम बोस को आज़ादी की लड़ाई के नायक के रूप में जानते हैं, तो लगता है उनकी हर बात बस आज़ादी पर ही होगी।

What actually happens

बोस आज़ादी से आगे की बात करते हैं। वे आज़ादी के बाद कैसा समाज हो, यह बताते हैं — समानता, नारी के समान अधिकार, सबको शिक्षा, और मेहनत का सम्मान। उनका सपना सिर्फ़ आज़ादी नहीं, एक आदर्श समाज है।

⚠️ Common mistake
What students think

बोस का स्वप्न तभी पूरा होगा जब कोई महान नेता उसे पूरा करेगा।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि हम आमतौर पर सोचते हैं कि बड़े काम सिर्फ़ बड़े नेता ही करते हैं, आम लोग नहीं।

What actually happens

बोस ने यह सपना किसी एक नेता को नहीं, बल्कि सारे तरुणों को सौंपा है। उनका मानना है कि हर युवा अपने हिस्से के कर्म से इस सपने को सच करने में हिस्सा ले सकता है।

जाँचिए अपनी समझ

अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।

यह पाठ 'तरुण के स्वप्न' किसके भाषण का अंश है?

'उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।' इसमें 'हम' किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

बोस के आदर्श समाज में किसके लिए कोई स्थान नहीं रहेगा?

अंत में बोस अपना स्वप्न किसे उपहार में सौंपते हैं?

अभ्यास (श्रेणीबद्ध)

अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।

सरल

सरल

शब्दार्थ लिखिए: (क) तरुण (ख) स्वप्न (ग) उत्तराधिकारी (घ) अभाव।

सरल

बोस ने अपना भाषण किसे संबोधित करते हुए दिया था, और कब?

मध्यम

मध्यम

नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार के राष्ट्र-निर्माण का स्वप्न देखा था? कम-से-कम चार बातें लिखिए।

मध्यम

बोस का स्वप्न और चित्तरंजन दास का स्वप्न आपस में कैसे जुड़े हैं? एक छोटी तालिका बनाकर समझाइए।

चुनौती

चुनौती

नेताजी के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आज की युवा पीढ़ी क्या-क्या कर सकती है? और इस पाठ की सीख को हम अपने रोज़मर्रा के जीवन में कैसे अपना सकते हैं?

सारांश

  • “तरुण के स्वप्न” नेताजी सुभाषचंद्र बोस के एक भाषण का अंश है, जो उन्होंने 1929 में युवाओं को संबोधित करते हुए दिया था।
  • बोस मानते हैं कि वे देशबंधु चित्तरंजन दास के स्वप्न के उत्तराधिकारी हैं, और अब वह सपना आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी तरुणों की है।
  • बोस का स्वप्न है — एक स्वाधीन और समृद्ध समाज, जहाँ जातिभेद न हो, धन की विषमता न हो, नारी को समान अधिकार हों, और सबको शिक्षा का समान अवसर मिले।
  • उनके समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी; आलसी के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा, क्योंकि अभाव सिर्फ़ मेहनत से मिटता है।
  • ऐसा राष्ट्र हर विदेशी प्रभाव से मुक्त रहेगा, अपने लोगों का अभाव मिटाएगा, और पूरी दुनिया के सामने एक आदर्श बनेगा।
  • बोस यह स्वप्न अपने जीवन का सबसे बड़ा सत्य मानते हैं और इसके लिए हर त्याग तथा हर संकट सहने को तैयार हैं।
  • अंत में वे यह स्वप्न उपहार के रूप में तरुणों को सौंप देते हैं — “स्वीकार करो।”
  • पाठ का मूल संदेश — एक बड़ा सपना तभी सच होता है जब लोग साहस के साथ उसके लिए कर्म करें।

आगे क्या?

यहीं के साथ मल्हार (कक्षा 8) की हमारी पूरी यात्रा पूरी होती है। यह इस पुस्तक का अंतिम पाठ है।

ज़रा पीछे मुड़कर देखिए — हमने कविताओं में प्रकृति, माँ का स्नेह, देश-प्रेम और जीवन के नीति-संदेश पढ़े। कहानियों में हमने साहस, समझदारी और दया की बातें सीखीं। और इस अंतिम पाठ में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने हमें सबसे बड़ी सीख दी — एक अच्छा सपना देखो, और उसे साहस तथा कर्म से सच करो। मानो पूरी पुस्तक हमें यहीं तक लाना चाहती थी — एक बेहतर इंसान और एक बेहतर नागरिक बनने की ओर।

अब आप पूरी पुस्तक के किसी भी पाठ को दोबारा पढ़ सकते हैं, या अपनी समझ परख सकते हैं। सभी पाठ एक जगह देखने के लिए मल्हार (कक्षा 8) की विषय-सूची पर जाएँ। पढ़ते रहिए, सोचते रहिए — और नेताजी की तरह, एक बड़ा सपना देखना मत भूलिए।

Frequently Asked Questions

तरुण के स्वप्न पाठ का सारांश क्या है?

यह नेताजी सुभाषचंद्र बोस के एक भाषण का अंश है, जो उन्होंने 1929 में युवाओं को संबोधित करते हुए दिया था। इसमें वे एक ऐसे स्वाधीन और समृद्ध समाज का स्वप्न बताते हैं जहाँ न जातिभेद हो, न अमीर-गरीब का भेद, जहाँ नारी को समान अधिकार हों और हर किसी को शिक्षा का समान अवसर मिले। अंत में वे यह स्वप्न उपहार के रूप में तरुणों को सौंपते हैं।

तरुण के स्वप्न पाठ के लेखक कौन हैं?

इस पाठ के लेखक नेताजी सुभाषचंद्र बोस हैं। उनका जन्म ओड़िशा के कटक नगर में हुआ था। वे भारत की स्वतंत्रता के महान सेनानी थे, जिन्होंने 'आजाद हिंद फौज' का नेतृत्व किया और 'जय हिंद' तथा 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा' जैसे प्रेरक नारे दिए।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस तरह के राष्ट्र का स्वप्न देखा था?

बोस ने ऐसे राष्ट्र का स्वप्न देखा जो पूरी तरह स्वाधीन हो और हर तरह के विदेशी प्रभाव से मुक्त हो। उस समाज में व्यक्ति हर दृष्टि से स्वतंत्र हो, जातिभेद न हो, नारी को पुरुष के समान अधिकार हों, धन की विषमता न हो और सबको शिक्षा का समान अवसर मिले। वह राष्ट्र पूरी दुनिया के सामने एक आदर्श बने।

बोस तरुणों को अपना स्वप्न क्यों सौंपते हैं?

बोस मानते थे कि वे अकेले अपने जीवन में पूरा स्वप्न साकार नहीं कर सकते, पर युवा शक्ति इसे पूरा कर सकती है। तरुणों में जोश, साहस और लंबा जीवन होता है। इसलिए वे अपना सबसे कीमती स्वप्न युवाओं को उपहार में देते हैं और कहते हैं 'स्वीकार करो', ताकि वे इसे कर्म से सच कर सकें।

बोस ने 'आलसी के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा' ऐसा क्यों कहा?

बोस मानते थे कि कोई भी समाज या राष्ट्र तभी आगे बढ़ता है जब उसके लोग मेहनत और कर्म करें। आलस्य से देश पिछड़ जाता है और किसी का अभाव नहीं मिटता। इसलिए वे श्रम और कर्म की मर्यादा को ज़रूरी मानते हैं और चाहते हैं कि हर व्यक्ति अपने हिस्से का काम करे।