नए मेहमान

Chapter 8 · Hindi · Class 8 22 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। एक चिलचिलाती गरमी की रात है। घर छोटा-सा है, पंखा कमज़ोर है, और घर का एक सदस्य बीमार है। ऐसे में अचानक दरवाज़ा खटखटता है — और दो ऐसे लोग अंदर आ जाते हैं जिन्हें घर का कोई नहीं जानता। फिर भी वे “अपना घर” समझकर पानी, खाना, नहाना सब माँगने लगते हैं। आप क्या करेंगे?

यही इस पाठ की कहानी है। यह दिखाता है कि एक साधारण शहरी परिवार किन परेशानियों से जूझता है — तंग मकान, भीषण गरमी, बीमारी, और निर्दयी पड़ोसी। साथ ही यह हमारे देश की एक सुंदर परंपरा को भी दिखाता है — “अतिथि देवो भव”, यानी मेहमान को भगवान के समान मानना।

इसे पढ़ने के बाद आपको एक बात साफ़ समझ आएगी — असली मेहमान कौन होता है, और बिन बुलाए आने वाला बोझ कैसा होता है। साथ ही आप यह भी जानेंगे कि एकांकी (एक छोटा नाटक) कैसे लिखा और समझा जाता है।

मूल भाव

इस पाठ का मूल भाव है — एक मध्यवर्गीय परिवार का संघर्ष और भारतीय आतिथ्य। भीषण गरमी में गृहपति विश्वनाथ और उसकी बीमार पत्नी रेवती अपने छोटे-से किराये के मकान में परेशान हैं। तभी दो अजनबी — नन्हेमल और बाबूलाल — बिन बुलाए “अपना घर” समझकर आ जाते हैं और माँग-माँगकर खातिरदारी करवाते हैं। बाद में पता चलता है कि वे गलत घर आ गए थे। अंत में रेवती का सगा भाई आता है — और तब हम देखते हैं कि एक सच्चा, अपना मेहमान कैसा होता है। पाठ यह दिखाता है कि कितनी भी तकलीफ़ हो, घर वाले मेहमान को मना नहीं कर पाते।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने पूरी एकांकी का सरल सारांश और व्याख्या अपने शब्दों में दी है। पूरी मूल एकांकी अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक मल्हार (कक्षा 8) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। यहाँ हम मूल संवाद दोबारा नहीं छाप रहे — बस उनका भाव अपने शब्दों में खोल रहे हैं।

लेखक और रचना का परिचय

इससे पहले कि हम कहानी में उतरें, यह जान लेना अच्छा रहेगा कि यह रचना है क्या और इसे लिखा किसने।

यह पाठ “नए मेहमान” एक एकांकी है, और इसके लेखक हैं उदयशंकर भट्ट (1898–1966)। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ। परिवार में साहित्य का माहौल था, इसलिए उनकी रुचि भी साहित्य में रही। उन्होंने रेडियो के लिए कई नाटक लिखे और फ़िल्मों में अभिनय भी किया। कविता और उपन्यास भी लिखे, पर सबसे ज़्यादा प्रसिद्धि उन्हें नाटक और एकांकी के क्षेत्र में मिली।

इस एकांकी की एक मुख्य पात्र है रेवती — वह गृहपति विश्वनाथ की पत्नी है। आगे जब हम इस पाठ की बात करें, तो समझिए हम इसी एकांकी “नए मेहमान” की बात कर रहे हैं।

एक छोटा-सा शब्द समझ लें, क्योंकि यह पूरे पाठ की जान है।

कहानी का सारांश

आइए अब पूरी एकांकी का भाव क्रम से, अपने शब्दों में देखते हैं।

पहले यह जान लें कि इसमें कौन-कौन पात्र हैं, वरना संवाद उलझ सकते हैं। नीचे चित्र 8.1 सभी पात्रों को एक साथ दिखाता है।

पात्र-मानचित्र — घर के लोग विश्वनाथ, रेवती, प्रमोद-किरण; बिन बुलाए मेहमान नन्हेमल और बाबूलाल; निर्दयी पड़ोसी; और रेवती का भाई आगंतुक
Figure 8.1 — चित्र 8.1 — एकांकी का पात्र-मानचित्र। सबसे ऊपर घर के लोग हैं — गृहपति विश्वनाथ (शांत, संकोची, सभ्य, उम्र 45), उसकी पत्नी रेवती (बीमार है पर मेहमाननवाज़ है), और उनके दो समझदार बच्चे प्रमोद और किरण; विश्वनाथ-रेवती पति-पत्नी हैं। बीच में बिन बुलाए दो अजनबी मेहमान हैं — नन्हेमल (बड़ा, बातूनी, बेझिझक माँगने वाला) और बाबूलाल (छोटा, उसकी हाँ-में-हाँ मिलाने वाला); ये असल में किसी और का घर ढूँढ़ रहे थे। सबसे नीचे दो और पात्र हैं — निर्दयी पड़ोसी (जो ज़रा-ज़रा बात पर झगड़ता है) और आगंतुक (रेवती का सगा भाई, जो अंत में आता है — असली और स्वागत-योग्य मेहमान)।

अब चित्र 8.1 के पात्रों को ध्यान में रखकर कहानी पढ़िए।

गरमी और तंगी। एक भीषण गरमी की रात है। विश्वनाथ और रेवती अपने छोटे-से किराये के मकान में परेशान हैं। मकान मानो भट्टी बन गया है। कमज़ोर पंखा बहुत कम हवा देता है। उनका छोटा बच्चा पसीने से तर होकर बेचैन है। रेवती कई दिनों से सिरदर्द और कमज़ोरी से बीमार है। दोनों दुखी होकर बात करते हैं — मकान नहीं मिलता, गरमी से जान निकल रही है, और गरीबों के लिए तो यह “जेलखाना” है।

निर्दयी पड़ोसी। बातों-बातों में पता चलता है कि उनका पड़ोसी कैसा है। वह खाली छत पर भी बच्चों को सोने के लिए एक खाट तक नहीं बिछाने देता। ऐसा लगता है मानो वह उन्हें मुसीबत में देखकर ख़ुश होता है।

दरवाज़ा खटखटाता है। तभी अचानक कोई दरवाज़ा खटखटाता है। रेवती डर जाती है — “हे भगवान! कोई मुसीबत न आ जाए।” विश्वनाथ देखने जाता है।

यहाँ कहानी एक मोड़ लेती है। पूरी घटना कैसे आगे बढ़ती है, यह चित्र 8.2 क्रम से दिखाता है।

कथानक-चक्र — गरमी, दरवाज़ा खटखटाना, दो अजनबी मेहमानों का आना, माँग-माँगकर खातिरदारी, विश्वनाथ की पूछताछ, गलत घर का पता चलना, मेहमानों का जाना, और रेवती के भाई का आना
Figure 8.2 — चित्र 8.2 — एकांकी का कथानक-चक्र, घटनाएँ क्रम से। (1) भीषण गरमी से घर के लोग परेशान हैं, छोटा किराये का मकान और बीमार रेवती। (2) तभी दरवाज़ा खटखटता है, रेवती डरती है। (3) दो अजनबी — नन्हेमल और बाबूलाल — सामान सहित घर में घुस आते हैं। (4) वे माँग-माँगकर पानी, बरफ़, नहाना और खाना सब करवाते हैं। (5) विश्वनाथ को शक होता है, वह बार-बार उनका परिचय पूछता है। (6) दोनों गोल-मोल जवाब देते हैं — नाम, पता, काम कुछ ठीक से याद नहीं। (7) पता चलता है कि वे कविराज रामलाल वैद्य को ढूँढ़ रहे थे — यह गलत घर है। (8) मेहमान राम-राम कहकर चले जाते हैं और रेवती की जान में जान आती है। (9) तभी रेवती का सगा भाई आता है, जिसने पहले तार भेजा था — यही असली, अपना मेहमान है। नीले तीर हर कदम की दिशा दिखाते हैं।

जैसा चित्र 8.2 दिखाता है, अब असली घटना शुरू होती है।

दो अजनबी मेहमान आ जाते हैं। विश्वनाथ के साथ दो अजनबी सामान (बिस्तर और संदूक) सहित कमरे में आ जाते हैं। उनके नाम हैं — नन्हेमल (बड़ा) और बाबूलाल (छोटा)। वे “पंडित जी, पंडित जी” कहते हुए ऐसे बात करते हैं मानो यह उन्हीं का घर हो।

माँग-माँगकर खातिरदारी। दोनों बेझिझक माँगने लगते हैं — ठंडा पानी, बरफ़, नहाने का इंतज़ाम, और खाना भी। वे घर वालों की तकलीफ़ की बिलकुल परवाह नहीं करते। उधर रेवती बीमार है और सिरदर्द से परेशान है, फिर भी मेहमानों के लिए सोचना पड़ रहा है।

विश्वनाथ को शक होता है। विश्वनाथ को कुछ अजीब लगता है। वह बार-बार पूछता है — “क्षमा कीजिए, आप कौन हैं? कहाँ से आए हैं?” पर हर बार दोनों घुमा-फिराकर जवाब देते हैं। वे किसी “संपतराम”, “जगदीशप्रसाद” जैसे नामों का सहारा लेते हैं, पर विश्वनाथ इनमें से किसी को नहीं जानता।

गलत घर का पता चलता है। आख़िरकार सच सामने आता है। दोनों को जिसके घर जाना था, उसका न नाम ठीक से याद है, न पता, न काम। बहुत पूछताछ के बाद पता चलता है कि वे असल में कविराज रामलाल वैद्य को ढूँढ़ रहे थे, जो किसी और गली में रहते हैं। यानी वे गलत घर आ गए थे! बस “घर के ही तो हैं” सोचकर आवाज़ लगाई और चढ़ आए।

मेहमान चले जाते हैं। अब विश्वनाथ बच्चों को कहता है कि इन्हें कविराज का मकान दिखा दो। दोनों “राम-राम” कहकर चले जाते हैं। रेवती की जान में जान आती है — “अब जान में जान आई।”

असली भाई का आना। तभी नीचे से एक और आवाज़ आती है। यह रेवती का सगा भाई (आगंतुक) है। वह चार घंटे से मकान ढूँढ़ रहा था और कहता है — “क्या मेरा तार नहीं मिला?” यानी उसने पहले से तार (टेलीग्राम) भेजकर सूचना दी थी। रेवती ख़ुश होकर उसका स्वागत करती है। भाई कहता है — “खाना-वाना मत बनाओ, मैं तो पानी पीकर सो जाऊँगा।” पर रेवती ज़िद करके कहती है — “कैसी बातें करते हो भैया! मैं अभी खाना बनाती हूँ।” इसी प्यार-भरे दृश्य पर एकांकी का परदा गिरता है।

पात्र

आइए मुख्य पात्रों को थोड़ा और जान लें।

  • विश्वनाथ — घर का मुखिया (गृहपति), उम्र लगभग 45 वर्ष। वह शांत, संकोची और सभ्य आदमी है। अजनबियों से सीधे “तुम गलत घर आए हो” नहीं कह पाता।
  • रेवती — विश्वनाथ की पत्नी। वह कई दिनों से बीमार है, फिर भी मेहमान के लिए खाना बनाने को तैयार रहती है। उसके मन में आतिथ्य का भाव गहरा है।
  • नन्हेमल और बाबूलाल — बिन बुलाए दो अजनबी मेहमान। नन्हेमल बड़ा और बातूनी है; बाबूलाल छोटा और उसकी हाँ-में-हाँ मिलाता है। दोनों बेझिझक माँगते हैं और असल में गलत घर आ गए थे।
  • प्रमोद और किरण — विश्वनाथ-रेवती के समझदार बच्चे। प्रमोद मेहमानों के लिए पानी-बरफ़ लाता है और छोटी बहन का ध्यान भी रखता है।
  • पड़ोसी — निर्दयी, झगड़ालू। ज़रा-ज़रा बात पर शिकायत करता है।
  • आगंतुक — रेवती का सगा भाई, जो अंत में आता है। यही असली, अपना और स्वागत-योग्य मेहमान है।

आइए गहराई से समझें

अब एकांकी के पीछे छिपी बातों को समझते हैं — कि लेखक ने क्या दिखाया, और क्यों

एकांकी का संदेश — क्या-क्या कहा गया है

इस छोटी-सी एकांकी में एक साथ कई बातें बुनी हुई हैं। चित्र 8.3 का संदेश-जाल इन्हें एक साथ दिखाता है।

संदेश-जाल — मूल भाव से जुड़ी चार बातें: गरमी और तंगी, अतिथि देवो भव, मेहमान का बोझ, और निर्दयी पड़ोसी
Figure 8.3 — चित्र 8.3 — एकांकी का संदेश-जाल। बीच में मूल भाव है — शहरी मध्यवर्ग और आतिथ्य का चित्रण। उससे चार बातें जुड़ी हैं — (ऊपर बाएँ) गरमी और तंगी: छोटा किराये का मकान, भीषण गरमी, बीमारी और गरीबी की मार; (ऊपर दाएँ) अतिथि देवो भव: कितनी भी तकलीफ़ हो, घर वाले मेहमान को मना नहीं कर पाते; (नीचे बाएँ) मेहमान का बोझ: बिन बुलाए, बेझिझक माँगने वाले मेहमान घर पर भारी पड़ते हैं; (नीचे दाएँ) निर्दयी पड़ोसी: शहर में पड़ोसी भी सहयोग नहीं करते, ज़रा-ज़रा बात पर झगड़ते हैं। ये चारों मिलकर एकांकी का पूरा संदेश बनाते हैं।

चित्र 8.3 से साफ़ है कि यह एकांकी सिर्फ़ “मेहमान आ गए” की हल्की-फुल्की कहानी नहीं है। इसके भीतर शहरी मध्यवर्गीय जीवन की सच्चाई छिपी है — तंग मकान, गरमी की मार, बीमारी, और पड़ोसियों का रूखापन। और इन सबके बीच भी भारतीय परिवार का आतिथ्य-भाव ज़िंदा रहता है।

“नथिंग इज़ ए गिवन” — विश्वनाथ अजनबियों को घर में क्यों आने देता है?

यहाँ एक बहुत ज़रूरी सवाल है। विश्वनाथ नन्हेमल और बाबूलाल को जानता तक नहीं। फिर भी वह उन्हें घर में आने देता है, पानी पिलाता है, और खाने तक का इंतज़ाम करवाता है। ऐसा क्यों? कोई भी सीधा-सा कह देता — “भाई, मैं तुम्हें नहीं जानता, तुम कहीं और जाओ।”

इसका जवाब हमारी संस्कृति में छिपा है। भारत में “अतिथि देवो भव” की परंपरा रही है — यानी मेहमान को देवता के समान मानो। जब कोई “अपना घर” समझकर आ जाए, तो उसे मना करना अपमान-सा लगता है। दूसरी बात, विश्वनाथ स्वभाव से बहुत संकोची और सभ्य आदमी है। उसे लगता है कि शायद ये सच में किसी जान-पहचान वाले के भेजे हुए हों। इसी संकोच में वह सीधे मना नहीं कर पाता — बस घुमा-फिराकर परिचय पूछता रहता है।

तो यह “हाँ” किसी डर से नहीं, बल्कि एक गहरे संस्कार और शराफ़त से निकलता है। यही बात इस एकांकी को इतना सच्चा बनाती है।

एक छोटी जाँच करते हैं, ताकि यह बात पक्की हो जाए।

Concept check

विश्वनाथ नन्हेमल और बाबूलाल को न जानते हुए भी घर में आने क्यों देता है?

दो तरह के मेहमान — असली अंतर क्या है?

एकांकी में दो तरह के मेहमान आते हैं, और लेखक जान-बूझकर इन्हें आमने-सामने रखता है। चित्र 8.4 दोनों का अंतर दिखाता है।

दो तरह के मेहमानों की तुलना — बाईं ओर बिन बुलाए अजनबी नन्हेमल-बाबूलाल, दाईं ओर रेवती का असली भाई आगंतुक
Figure 8.4 — चित्र 8.4 — दो तरह के मेहमान, आमने-सामने। बाईं ओर बिन बुलाए अजनबी नन्हेमल और बाबूलाल हैं — वे बिना जान-पहचान आ गए, माँग-माँगकर पानी-बरफ़-नहाना-खाना करवाते हैं, घर वालों की तकलीफ़ की परवाह नहीं करते, परिचय पूछने पर गोल-मोल जवाब देते हैं, और असल में किसी और का घर ढूँढ़ रहे थे; रेवती मन-ही-मन परेशान रहती है — ये बोझ बने मेहमान हैं। दाईं ओर रेवती का असली भाई (आगंतुक) है — उसने पहले तार भेजकर सूचना दी, वह कहता है खाना मत बनाओ मैं सो जाऊँगा, घर वालों को कष्ट देने से डरता है, फिर भी रेवती ख़ुद ख़ुशी से उसके लिए खाना बनाने को तैयार है — यह सच्चा, स्वागत-योग्य मेहमान है।

चित्र 8.4 एकांकी की सबसे सुंदर बात समझा देता है। नन्हेमल-बाबूलाल माँगते हैं, पर भाई मना करता है। एक ही गरमी, एक ही छोटा घर, एक ही बीमार रेवती — पर पहले मेहमानों के लिए सब काम बोझ लगता है, और भाई के लिए रेवती ख़ुशी से वही काम करने को तैयार है। फ़र्क़ मेहमान के काम का नहीं, उसके भाव का है — अपनापन और दूसरे का ख़याल।

रेवती का चरित्र — बीमार होकर भी भाई के लिए खाना क्यों बनाती है?

रेवती बीमार है, सिर दर्द से फटा जा रहा है, और भाई ख़ुद कह रहा है कि खाना मत बनाओ। फिर भी वह ज़िद करके खाना बनाने जाती है। क्यों?

क्योंकि यहाँ बात मजबूरी की नहीं, प्यार की है। अजनबियों के लिए खाना बनाना उसे बोझ लगता था, पर अपने भाई के लिए वही काम उसे ख़ुशी देता है। उसके मन में आतिथ्य का गहरा संस्कार है — “भैया भूखे नहीं सो सकते।” यही रेवती का असली चरित्र है — बाहर से थकी और बीमार, पर भीतर से अपनों के लिए हमेशा तैयार।

एकांकी की पहचान — इसे कहानी से अलग क्या बनाता है?

अंत में यह समझ लें कि यह “कहानी” नहीं, एकांकी क्यों है।

  • पूरी घटना एक ही जगह — विश्वनाथ के घर — में होती है।
  • यह संवादों (पात्रों की बातचीत) से आगे बढ़ती है, वर्णन से नहीं।
  • कोष्ठक ( ) में रंगमंच-निर्देश दिए हैं — जैसे “पंखा करता है”, “रेवती आँगन में चली जाती है”।
  • शुरू में पात्र-परिचय और मंच का दृश्य बताया गया है।

इन्हीं विशेषताओं की वजह से इसे मंच पर अभिनय करके दिखाया जा सकता है। यही एकांकी की पहचान है।

आम भूलें

कुछ बातों में बच्चे अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें।

⚠️ Common mistake
What students think

'नए मेहमान' नाम से लगता है कि यह किसी ख़ुशी भरे, गर्मजोशी से स्वागत वाले मेहमान की कहानी है।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि 'नए मेहमान' सुनकर मन में अच्छे, चाव से बुलाए गए मेहमान की तस्वीर बनती है, जिनका स्वागत होता है।

What actually happens

यहाँ शीर्षक का भाव उल्टा (व्यंग्य) है। 'नए मेहमान' असल में बिन बुलाए अजनबी हैं, जो गलत घर आ गए और घर वालों पर बोझ बन जाते हैं। इसी विरोधाभास से लेखक मध्यवर्ग की परेशानी और आतिथ्य का सच्चा अर्थ दिखाता है।

⚠️ Common mistake
What students think

नन्हेमल और बाबूलाल जान-बूझकर ठगने या मुफ़्त खाने के इरादे से विश्वनाथ के घर आए थे।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि वे बेझिझक बहुत कुछ माँगते हैं और परिचय पूछने पर सीधा जवाब नहीं देते, जिससे वे चालाक से लगते हैं।

What actually happens

वे असल में किसी और (कविराज रामलाल वैद्य) के घर जा रहे थे और भूल से गलत घर आ गए थे। 'घर के ही तो हैं' सोचकर चढ़ आए। उनका इरादा ठगना नहीं था, बस उन्हें ठीक पता-नाम याद नहीं था।

⚠️ Common mistake
What students think

विश्वनाथ डरपोक है, इसलिए अजनबियों को मना नहीं कर पाता।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि वह बार-बार पूछने के बाद भी सीधे 'तुम गलत घर आए हो' नहीं कह पाता, तो लगता है उसमें हिम्मत की कमी है।

What actually happens

यह डर नहीं, संकोच और शराफ़त है। 'अतिथि देवो भव' के संस्कार और सभ्य स्वभाव की वजह से वह किसी मेहमान को सीधे मना करना अपमान समझता है। इसी कारण वह घुमा-फिराकर परिचय पूछता है।

जाँचिए अपनी समझ

अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।

'नए मेहमान' एकांकी के लेखक कौन हैं?

नन्हेमल और बाबूलाल विश्वनाथ के घर क्यों आ गए थे?

विश्वनाथ अजनबी मेहमानों को घर में आने और रुकने क्यों देता है?

एकांकी को साधारण कहानी से मुख्य रूप से कौन-सी बात अलग बनाती है?

अभ्यास (श्रेणीबद्ध)

अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।

सरल

सरल

शब्दार्थ लिखिए: (क) गृहपति (ख) अतिथि (ग) आगंतुक (घ) एकांकी।

सरल

एकांकी 'नए मेहमान' की दो मुख्य पात्र — विश्वनाथ और रेवती — का आपस में क्या रिश्ता है, और प्रमोद-किरण कौन हैं?

मध्यम

मध्यम

बिन बुलाए मेहमानों (नन्हेमल-बाबूलाल) और रेवती के असली भाई के व्यवहार में क्या फ़र्क़ है? एक छोटी तालिका बनाकर समझाइए।

मध्यम

एकांकी में गरमी की भीषणता को दिखाने वाली कुछ बातें/पंक्तियाँ अपने शब्दों में लिखिए। लेखक ने इतनी गरमी क्यों दिखाई?

चुनौती

चुनौती

यह एकांकी आज के जीवन के लिए हमें क्या सीख देती है? मेहमान बनकर जाते समय और मेज़बान बनकर घर पर हमें कैसा व्यवहार करना चाहिए?

सारांश

  • “नए मेहमान” उदयशंकर भट्ट की एक प्रसिद्ध एकांकी है। रेवती इसकी एक मुख्य पात्र है — गृहपति विश्वनाथ की पत्नी।
  • एकांकी एक ही अंक वाला छोटा नाटक है, जो संवादों से आगे बढ़ता है और मंच पर अभिनय करने योग्य होता है।
  • भीषण गरमी की एक रात, छोटे-से किराये के मकान में विश्वनाथ और बीमार रेवती परेशान हैं। उनका पड़ोसी निर्दयी और झगड़ालू है।
  • तभी दो अजनबी — नन्हेमल और बाबूलाल — बिन बुलाए आ जाते हैं और माँग-माँगकर पानी, नहाना, खाना सब करवाते हैं।
  • बहुत पूछताछ के बाद पता चलता है कि वे गलत घर आ गए थे — उन्हें कविराज रामलाल वैद्य के पास जाना था। वे राम-राम कहकर चले जाते हैं।
  • अंत में रेवती का सगा भाई (आगंतुक) आता है, जिसने पहले तार भेजा था — यही असली, अपना मेहमान है।
  • एकांकी के मुख्य भाव हैं — मध्यवर्ग की तंगी और गरमी, अतिथि देवो भव, बिन बुलाए मेहमान का बोझ, और निर्दयी पड़ोसी
  • असली मेहमान वही है जो घर वालों का ख़याल रखे — माँगने वाला नहीं, अपनापन रखने वाला।

आगे क्या?

मेहमान, घर और आतिथ्य की यह एकांकी समझने के बाद, अगला पाठ हमें एक अलग दुनिया में ले जाता है। अगला पाठ है पाठ 9 — “आदमी का अनुपात”। जैसे इस एकांकी ने इंसानी रिश्तों और व्यवहार पर सोचने को कहा, वैसे ही अगली रचना में हम इंसान और उसके मोल पर एक नई नज़र से सोचेंगे।

Frequently Asked Questions

नए मेहमान एकांकी के लेखक कौन हैं और इसकी पात्र रेवती कौन है?

नए मेहमान एकांकी के लेखक उदयशंकर भट्ट हैं। एकांकी एक ही अंक वाला छोटा नाटक होता है, जो संवादों के ज़रिये आगे बढ़ता है। रेवती इस एकांकी की एक मुख्य पात्र है — वह गृहपति विश्वनाथ की पत्नी है।

नए मेहमान एकांकी में नन्हेमल और बाबूलाल कौन हैं?

नन्हेमल और बाबूलाल वे दो अजनबी मेहमान हैं जो बिन बुलाए विश्वनाथ के घर आ जाते हैं। नन्हेमल बड़ा और बातूनी है, बाबूलाल छोटा और उसकी हाँ-में-हाँ मिलाता है। बाद में पता चलता है कि वे असल में किसी और (कविराज रामलाल वैद्य) को ढूँढ़ रहे थे और गलत घर आ गए थे।

विश्वनाथ नन्हेमल और बाबूलाल को नहीं जानता, फिर भी घर में क्यों आने देता है?

क्योंकि भारत में 'अतिथि देवो भव' की परंपरा है, और विश्वनाथ संकोची तथा सभ्य आदमी है। मेहमान घर समझकर आए हैं, तो उन्हें मना करना उसे अच्छा नहीं लगता। इसी संकोच की वजह से वह तकलीफ़ सहकर भी उनकी खातिरदारी करता है और सीधे यह नहीं कह पाता कि तुम गलत घर आए हो।

रेवती 'ईश्वर करे इन दिनों कोई मेहमान न आए' ऐसा क्यों कहती है?

क्योंकि भीषण गरमी है, घर छोटा और किराये का है, और रेवती कई दिनों से सिरदर्द तथा कमज़ोरी से बीमार है। ऐसे में मेहमान आने पर खाना बनाना, पानी-व्यवस्था और बाकी काम और बढ़ जाते हैं, जो वह अपनी हालत में मुश्किल से कर पाती है। इसलिए वह चाहती है कि इन दिनों कोई मेहमान न आए।

रेवती के असली भाई और बिन बुलाए मेहमानों में क्या अंतर है?

बिन बुलाए मेहमान नन्हेमल-बाबूलाल माँग-माँगकर पानी, नहाना और खाना करवाते हैं और घर वालों की तकलीफ़ की परवाह नहीं करते। रेवती का भाई पहले तार भेजकर आता है और कहता है खाना मत बनाओ, मुझे कष्ट नहीं देना। फिर भी रेवती ख़ुशी-ख़ुशी उसके लिए खाना बनाने को तैयार हो जाती है — क्योंकि वह अपना और सच्चा मेहमान है।