मेरी माँ

Chapter 6 · Hindi · Class 6 18 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए — आपके जीवन का सबसे पहला गुरु कौन है? जिसने आपको पहला शब्द बोलना सिखाया, पहला कदम चलना सिखाया?

ज़्यादातर लोगों का जवाब एक ही होगा — माँ।

यह पाठ एक बेटे की अपनी माँ के बारे में लिखी गई बातें हैं। इसे लिखने वाले हैं रामप्रसाद ‘बिस्मिल’। वे हमारे देश के एक बहुत बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे। स्वतंत्रता सेनानी का मतलब है, ऐसा वीर जिसने देश को अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद कराने के लिए लड़ाई लड़ी।

इतना बहादुर और निडर इंसान बनने के पीछे किसका हाथ था? इस पाठ में बिस्मिल खुद बताते हैं कि उनकी हिम्मत, उनके अच्छे संस्कार और देश के लिए मर-मिटने का हौसला — यह सब उन्हें अपनी माँ से मिला।

इसलिए यह पाठ सिर्फ़ एक माँ की तारीफ़ नहीं है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि एक माँ अपने बच्चे को कितना कुछ देती है — चुपचाप, बिना किसी इनाम की चाह के। यही बात इस पाठ को खास बनाती है।

मूल भाव

इस पाठ का मूल भाव है — एक माँ अपने बच्चे की पहली गुरु और सबसे बड़ी ताकत होती है। लेखक रामप्रसाद बिस्मिल की माँ स्नेही भी थीं और अनुशासनप्रिय भी। उन्होंने बेटे को अच्छे संस्कार दिए, पढ़ाई के लिए प्रेरित किया, और मुश्किल समय में भी उसका साथ नहीं छोड़ा। बिस्मिल जैसा बहादुर इंसान बन पाए, इसका श्रेय वे अपनी माँ को देते हैं। पाठ हमें माँ के अनमोल प्रेम और त्याग का एहसास कराता है।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने पाठ का सरल अर्थ और व्याख्या दी है। पूरा मूल पाठ अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 6) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें।

पाठ का सार

इस पाठ के लेखक हैं रामप्रसाद ‘बिस्मिल’। यह उनकी अपनी आत्मकथा का एक हिस्सा है। आत्मकथा का मतलब है, अपने जीवन की कहानी जो इंसान खुद लिखता है। आइए लेखक की बातों को सरल भाषा में, क्रम से समझते हैं।

लेखक बताते हैं कि उनकी माँ बहुत सीधी-सादी और भली महिला थीं। वे ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं, फिर भी उनके मन में अच्छे और बुरे की गहरी समझ थी। वे जानती थीं कि बच्चे को सही राह पर कैसे चलाना है।

माँ का स्वभाव दो तरह का था। एक तरफ़ वे बहुत स्नेही थीं — यानी बहुत प्यार करने वाली। दूसरी तरफ़ वे अनुशासनप्रिय भी थीं — यानी वे चाहती थीं कि बच्चा नियम से रहे और गलत काम न करे। ज़रूरत पड़ने पर वे सख्त भी हो जाती थीं। पर उनकी सख्ती के पीछे भी प्यार ही छिपा था।

लेखक की पढ़ाई का बहुत ध्यान रखा गया। माँ चाहती थीं कि उनका बेटा खूब पढ़े और एक अच्छा इंसान बने। उन्होंने पढ़ाई का महत्व लेखक के मन में बैठा दिया। शिक्षा को लेकर उनकी सोच बहुत साफ़ थी।

जब लेखक से कोई गलती होती, तो माँ उसे डाँटकर चुप नहीं कराती थीं। वे उसे प्यार से समझाती थीं कि क्या सही है और क्या गलत। इसी तरह लेखक ने सही और गलत में फ़र्क करना सीखा।

सबसे बड़ी बात यह थी कि मुश्किल समय में माँ ने कभी लेखक का साथ नहीं छोड़ा। जब लेखक बड़े होकर देश की आज़ादी के लिए लड़ने लगे, तो रास्ता बहुत कठिन था और जान का खतरा भी था। ऐसे में भी माँ डरीं नहीं। उन्होंने अपने बेटे को सच्चाई और देश की राह पर चलने से नहीं रोका। उन्होंने उसे हिम्मत दी।

इसलिए लेखक मानते हैं कि उनके भीतर की हिम्मत, उनके अच्छे संस्कार और उनकी देशभक्ति — इन सबकी जड़ उनकी माँ हैं। माँ ने अपना सुख-चैन छोड़कर अपने बेटे को एक मजबूत और अच्छा इंसान बनाया। यही उनका त्याग था।

पूरे पाठ का सार एक नज़र में देखने के लिए, पहले माँ के गुणों पर नज़र डालते हैं। नीचे चित्र 6.1 इन गुणों का भाव-जाल दिखाता है। भाव-जाल का मतलब है, एक चित्र जिसमें बीच में मुख्य बात और उससे जुड़ी हुई बातें जाल की तरह फैली होती हैं।

लेखक की माँ के गुणों का भाव-जाल
Figure 6.1 — यह भाव-जाल लेखक की माँ के चार मुख्य गुण दिखाता है। बीच के पीले घेरे में मेरी माँ लिखा है, और उससे चार बातें जुड़ी हैं। बायाँ ऊपर का नीला बक्सा — दयालु और स्नेही, यानी बच्चों से गहरा प्यार करने वाली। दायाँ ऊपर का हरा बक्सा — अनुशासनप्रिय, यानी बच्चे को सही राह पर चलना सिखाने वाली। बायाँ नीचे का नीला बक्सा — साहसी और दृढ़, यानी कठिन समय में हिम्मत रखने वाली। दायाँ नीचे का हरा बक्सा — शिक्षा का महत्व, यानी पढ़ाई के लिए प्रेरित करने वाली। नीचे की पंक्ति बताती है कि माँ कठोर भी थीं और स्नेही भी, और ये दोनों गुण मिलकर एक आदर्श माँ बनाते हैं।

आइए गहराई से समझें

अब केवल “क्या हुआ” से आगे बढ़कर “ऐसा क्यों है” समझते हैं। यही इस पाठ की असली गहराई है।

माँ का स्वभाव — स्नेह और अनुशासन, दोनों साथ

पहली नज़र में लगता है कि माँ का स्नेही होना और सख्त होना — ये दो उलटी बातें हैं। पर लेखक की माँ में दोनों साथ-साथ थे।

स्नेह का मतलब है, गहरा प्यार और दुलार। अनुशासन का मतलब है, नियम से रहना और सही काम करना।

सोचिए, अगर माँ सिर्फ़ प्यार करती और कभी न रोकती, तो बच्चा बिगड़ सकता था। और अगर माँ सिर्फ़ सख्त रहती और प्यार न दिखाती, तो बच्चा डर जाता। लेखक की माँ ने दोनों का सही मेल रखा। वे प्यार से समझाती थीं, और ज़रूरत पड़ने पर सख्त भी हो जाती थीं — पर हमेशा बच्चे की भलाई के लिए।

नीचे दी गई तुलना से यह बात और साफ़ हो जाएगी।

माँ का स्नेही पक्ष और अनुशासनप्रिय पक्ष
पक्षस्नेही माँअनुशासनप्रिय माँ
वह क्या करती हैप्यार और दुलार देती हैनियम और सही राह सिखाती है
गलती होने परप्यार से ढाँढस बँधाती हैसमझाती है कि क्या गलत हुआ
मकसद क्या हैबच्चे को खुशी और सहारा देनाबच्चे को अच्छा इंसान बनाना
दोनों का मेलअकेला प्यार बच्चे को बिगाड़ सकता हैअकेली सख्ती बच्चे को डरा सकती है

इस तालिका से साफ़ है कि एक अच्छी माँ में स्नेह और अनुशासन — दोनों होने चाहिए। तभी बच्चा सही ढंग से बड़ा होता है।

लेखक ने माँ से क्या सीखा

माँ ने सिर्फ़ खाना-कपड़ा ही नहीं दिया। उन्होंने लेखक को जीवन की वे बातें सिखाईं, जो उम्र भर काम आईं। आइए चित्र 6.2 की मदद से देखें कि माँ के हर काम से लेखक ने क्या सीखा।

माँ ने क्या किया और लेखक ने उससे क्या सीखा, इसका मिलान
Figure 6.2 — यह चित्र बाईं ओर माँ के तीन काम और दाईं ओर लेखक की तीन सीखें दिखाता है, और तीर से बताता है कि किस काम से क्या सीख मिली। (1) माँ ने पढ़ने के लिए प्रेरित किया, तीर के पार लेखक ने शिक्षा का मोल समझा। (2) माँ ने गलती पर प्यार से समझाया, तीर के पार लेखक ने सही-गलत की पहचान सीखी। (3) माँ मुश्किल में साथ खड़ी रहीं, तीर के पार लेखक को हिम्मत और आत्मविश्वास मिला। नीचे की पंक्ति बताती है कि माँ के हर छोटे काम ने लेखक के जीवन को गढ़ा यानी आकार दिया।

ध्यान दीजिए — माँ ने ये बातें भाषण देकर नहीं सिखाईं। उन्होंने रोज़मर्रा के छोटे-छोटे कामों से सिखाईं। जब वे बेटे को पढ़ने बैठातीं, जब वे गलती पर प्यार से समझातीं, जब वे मुश्किल में साथ देतीं — तभी बेटा चुपचाप सीखता जाता था। यही माँ की असली ताकत है।

Concept check

लेखक इतने बहादुर और निडर क्यों बन पाए? इसका माँ से क्या संबंध है?

मुख्य भाव — मातृ-प्रेम और त्याग

अब पाठ के सबसे गहरे भाव पर आते हैं। माँ अपने बच्चे के लिए जो करती है, वह कोई हिसाब-किताब नहीं होता। वह त्याग होता है। त्याग का मतलब है, अपनी चीज़ या अपना सुख दूसरे के लिए छोड़ देना।

माँ अपनी नींद, अपना आराम, अपनी पसंद — सब कुछ बच्चे के लिए छोड़ देती है। और बदले में वह कुछ नहीं माँगती। यही मातृ-प्रेम की सबसे बड़ी खूबी है। मातृ-प्रेम का मतलब है, माँ का अपने बच्चे के लिए प्यार।

नीचे चित्र 6.3 इस संदेश को तीन भागों में दिखाता है।

मातृ-प्रेम और त्याग का संदेश तीन भागों में
Figure 6.3 — यह चित्र मातृ-प्रेम और त्याग के संदेश को दिखाता है। सबसे ऊपर पीले बक्से में मातृ-प्रेम और त्याग लिखा है, यानी माँ का दिल सबसे बड़ा होता है। उससे तीन बातें निकलती हैं। बायाँ नीला बक्सा — बिना शर्त प्यार, यानी माँ बदले में कुछ नहीं माँगती। बीच का हरा बक्सा — त्याग, यानी माँ अपना सुख छोड़कर बच्चों के लिए जीती है। दायाँ नीला बक्सा — अच्छा इंसान, यानी माँ सही संस्कार देकर बच्चे को गढ़ती है। सबसे नीचे लाल अक्षरों में संदेश है कि इसीलिए माँ हमारी पहली गुरु और सबसे बड़ी हितैषी होती है। हितैषी का मतलब है, भला चाहने वाली।

यहाँ एक ज़रूरी सवाल उठता है। माँ बदले में कुछ माँगती क्यों नहीं?

क्यों, माँ अपना सुख छोड़कर भी बच्चे के लिए कुछ नहीं माँगती? इसका जवाब माँ के प्यार की प्रकृति में छिपा है। माँ का प्यार सौदा नहीं है। वह “मैं तुम्हें यह दूँगी, तो बदले में तुम मुझे वह दो” — ऐसा नहीं सोचती। उसके लिए बच्चे की खुशी ही उसका इनाम है। बच्चा अच्छा इंसान बन जाए, खुश रहे — बस यही माँ चाहती है। इसी को निःस्वार्थ प्रेम कहते हैं। निःस्वार्थ का मतलब है, अपने फ़ायदे की चाह के बिना। इसीलिए माँ का प्यार दुनिया का सबसे सच्चा प्यार माना जाता है।

अब इस पूरे रिश्ते को महसूस करने के लिए, नीचे चित्र 6.4 का एक प्यारा दृश्य देखिए — माँ अपने बच्चे को पास बैठाकर सिखा रही है।

माँ अपने बच्चे को प्यार से पढ़ाते और सिखाते हुए
Figure 6.4 — यह एक स्नेहपूर्ण दृश्य है। बीच में लाल साड़ी पहने माँ खड़ी है और उसने अपना हाथ बच्चे के कंधे के चारों ओर रखा है। दाईं ओर बच्चा यानी लेखक है, जिसकी गोद में एक खुली किताब है। माँ और बच्चे के बीच एक गुलाबी दिल बना है, जो उनके आपसी प्यार को दिखाता है। बाईं ओर एक जलता हुआ दीया है, जो रोशनी दे रहा है। पूरा दृश्य बताता है कि माँ अपने बच्चे को प्यार से पढ़ाती और जीवन की सीख देती है — यही माँ की सबसे सुंदर भूमिका है।

आम भूलें

कई बार पाठ पढ़ते समय बच्चे कुछ गलत समझ बैठते हैं। आइए ऐसी तीन आम भूलें देखें और उन्हें सुधारें।

⚠️ Common mistake
What students think

माँ की सख्ती का मतलब है कि वह बच्चे से प्यार नहीं करती।

Why it seems right

जब माँ डाँटती है या किसी काम के लिए रोकती है, तो उस पल बच्चे को बुरा लगता है और लगता है कि माँ नाराज़ है, इसलिए ऐसा सोचना स्वाभाविक है।

What actually happens

माँ की सख्ती भी प्यार का ही रूप है। लेखक की माँ सख्त इसलिए होती थीं ताकि बेटा गलत राह पर न जाए और एक अच्छा इंसान बने। सख्ती के पीछे बच्चे की भलाई की चिंता छिपी होती है। प्यार और अनुशासन साथ-साथ चलते हैं।

⚠️ Common mistake
What students think

लेखक की बहादुरी सिर्फ़ उनकी अपनी हिम्मत थी, इसमें माँ का कोई हाथ नहीं था।

Why it seems right

रामप्रसाद बिस्मिल एक बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे, इसलिए उनकी बहादुरी अकेले उन्हीं की देन लगती है और ध्यान माँ की ओर नहीं जाता।

What actually happens

लेखक खुद मानते हैं कि उनकी बहादुरी की जड़ माँ में थी। माँ ने उन्हें अच्छे संस्कार दिए, सही-गलत की समझ दी और मुश्किल समय में हिम्मत दी। माँ के इसी साथ और भरोसे ने उन्हें निडर बनाया।

⚠️ Common mistake
What students think

माँ ने जो कुछ किया, वह सब एक माँ का सामान्य फ़र्ज़ था, इसमें कोई त्याग नहीं था।

Why it seems right

माँ हर बच्चे के लिए ऐसा ही करती है, इसलिए यह आम-सी बात लगती है और इसमें कोई बड़ी कुर्बानी नज़र नहीं आती।

What actually happens

माँ अपनी नींद, आराम और अपनी कई इच्छाएँ बच्चे के लिए छोड़ देती है, और बदले में कुछ नहीं माँगती — यही सबसे बड़ा त्याग है। बात आम लगने का मतलब यह नहीं कि वह छोटी है। माँ का यह निःस्वार्थ त्याग ही उसके प्रेम को सबसे ऊँचा बनाता है।

जाँचिए अपनी समझ

अब तक जो पढ़ा, उसे थोड़ा परख लेते हैं। हर प्रश्न का सही उत्तर चुनिए और फिर समझाइश पढ़िए।

इस पाठ 'मेरी माँ' के लेखक कौन हैं?

लेखक की माँ का स्वभाव कैसा था?

लेखक अपनी बहादुरी और अच्छे संस्कारों का श्रेय किसे देते हैं?

पाठ में माँ का 'त्याग' किस बात से दिखता है?

अभ्यास (श्रेणीबद्ध)

अब कुछ अभ्यास प्रश्न हल कीजिए। पहले खुद सोचिए, फिर उत्तर खोलकर मिलाइए। प्रश्न आसान से कठिन की ओर बढ़ते हैं।

सरल

easy

इस पाठ के लेखक कौन हैं और वे किस लिए प्रसिद्ध हैं?

easy

लेखक की माँ के स्वभाव की दो खास बातें लिखिए।

मध्यम

medium

शब्दार्थ लिखिए — (क) स्नेह (ख) अनुशासन (ग) त्याग (घ) निःस्वार्थ। हर शब्द को एक छोटे वाक्य में भी प्रयोग कीजिए।

medium

लेखक को अपनी माँ से क्या-क्या सीख मिली? कोई तीन बातें लिखिए।

चुनौती

challenge

लेखक की माँ का स्वभाव स्नेही भी था और सख्त भी। क्या एक माँ का इस तरह दोनों होना सही है? अपने शब्दों में समझाइए।

challenge

'माँ बच्चे की पहली गुरु होती है।' इस बात को इस पाठ के आधार पर समझाइए और अपने जीवन से जोड़िए।

सारांश

  • इस पाठ ‘मेरी माँ’ के लेखक हैं रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, जो एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। यह उनकी आत्मकथा का हिस्सा है।
  • लेखक की माँ स्नेही भी थीं और अनुशासनप्रिय भी — यानी वे प्यार भी करती थीं और सही राह भी सिखाती थीं।
  • माँ की सख्ती के पीछे भी बच्चे की भलाई और प्यार ही छिपा था; प्यार और अनुशासन साथ-साथ चलते हैं।
  • माँ ने लेखक को शिक्षा का महत्व, सही-गलत की पहचान, और हिम्मत सिखाई — और यह सब रोज़मर्रा के छोटे कामों से।
  • लेखक अपनी बहादुरी और अच्छे संस्कारों का श्रेय अपनी माँ को देते हैं।
  • माँ ने अपना सुख-आराम छोड़कर बच्चे के लिए जीवन बिताया — यही उनका त्याग है।
  • माँ का प्यार निःस्वार्थ होता है; वह बदले में कुछ नहीं माँगती।
  • इसलिए माँ बच्चे की पहली गुरु और सबसे बड़ी हितैषी होती है।

आगे क्या?

इस पाठ में हमने माँ के अनमोल प्रेम और त्याग को समझा — कि कैसे एक माँ अपने बच्चे को गढ़ती है। अगले पाठ पाठ 7 — “जलाते चलो” में हम एक ऐसी रचना पढ़ेंगे जो हमें अंधेरे में भी रोशनी फैलाते रहने, यानी अच्छाई और उम्मीद बाँटते रहने का संदेश देती है। जैसे माँ हमारे जीवन में रोशनी भरती है, वैसे ही हम भी दूसरों के जीवन में रोशनी कैसे ला सकते हैं — यह अगले पाठ में देखेंगे।

Frequently Asked Questions

मेरी माँ पाठ का सारांश क्या है?

'मेरी माँ' रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा का अंश है। इसमें वे अपनी माँ के स्नेही और अनुशासनप्रिय स्वभाव का वर्णन करते हैं। उनकी माँ ने उन्हें अच्छे संस्कार दिए और देश-सेवा का रास्ता चुनने पर रोका नहीं बल्कि हिम्मत दी।

मेरी माँ पाठ के लेखक कौन हैं?

इस पाठ के लेखक रामप्रसाद बिस्मिल हैं, जो भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन में हिस्सा लिया और देश के लिए अपना जीवन बलिदान किया।

बिस्मिल की माँ ने उन्हें क्या सिखाया?

बिस्मिल की माँ ने उन्हें सच बोलना, हिम्मत रखना और दूसरों की मदद करना सिखाया। जब बिस्मिल ने स्वतंत्रता संग्राम में कदम रखा, तो उनकी माँ ने उन्हें रोका नहीं बल्कि प्रोत्साहित किया।

मेरी माँ पाठ का मुख्य संदेश क्या है?

इस पाठ का संदेश है कि माँ बच्चे की पहली शिक्षक होती है। उसके संस्कार और प्यार से ही बच्चा बड़ा होकर एक अच्छा इंसान बनता है। माँ का त्याग और स्नेह बेमिसाल होता है।

'मेरी माँ' में माँ का स्वभाव कैसा बताया गया है?

पाठ में माँ को एक तरफ बहुत प्यार करने वाली (स्नेही) बताया गया है और दूसरी तरफ अनुशासनप्रिय भी। वे बच्चे की गलती पर डाँटती भी थीं लेकिन साथ ही उसे हमेशा आगे बढ़ने की हिम्मत भी देती थीं।