रहीम के दोहे
इस पाठ का महत्व
सोचिए, कोई आपसे ज़िंदगी की कोई बड़ी सीख कहना चाहे। पर उसके पास सिर्फ़ दो लाइनें हों। क्या वह इतनी छोटी बात में कुछ गहरा कह पाएगा?
रहीम यही कमाल करते हैं। वे सिर्फ़ दो पंक्तियों में, यानी एक दोहे में, जीवन की बहुत बड़ी बात कह जाते हैं।
दोहा क्या है? यह एक छोटी कविता है, सिर्फ़ दो पंक्तियों की। पर इन दो पंक्तियों में इतनी गहरी सीख भरी होती है कि लोग उसे सदियों तक याद रखते हैं।
रहीम के दोहे आज भी हमारे काम आते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि छोटे को छोटा न समझो, दूसरों के काम आओ, रिश्ते सँभालकर रखो, अपनी इज़्ज़त बचाए रखो, और सच्चे दोस्त को पहचानो।
ये बातें परीक्षा के बाद भी, पूरी ज़िंदगी आपके साथ रहेंगी। इसीलिए यह पाठ ज़रूरी है।
कवि-परिचय
दोहों में जाने से पहले, चलिए उनके लिखने वाले से मिल लें।
मूल भाव
इन सात दोहों का मूल भाव है — जीवन को सही ढंग से जीने की सीख। रहीम बताते हैं कि किसी छोटे को छोटा समझकर त्यागना नहीं चाहिए, दूसरों के काम आना (परोपकार) ही सच्ची संपत्ति है, प्रेम के रिश्ते को झटके से तोड़ना नहीं चाहिए, अपनी इज़्ज़त और मान बनाए रखना ज़रूरी है, और सच्चा मित्र वही है जो मुसीबत में भी साथ निभाए। हर दोहा रोज़ की किसी सीधी-सादी चीज़ से एक बड़ी बात समझा देता है।
मूल पाठ और व्याख्या
अब हम सातों दोहे क्रम से पढ़ेंगे। पहले मूल पंक्तियाँ, फिर तुरंत उसका सरल भावार्थ (मतलब)। इस तरह आपको दोहा भी मिलेगा और उसकी सीख भी।
दोहा 1
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि॥
भावार्थ: रहीम कहते हैं — किसी बड़े को देखकर छोटे को बेकार समझकर फेंक मत दो। हर चीज़ का अपना काम और अपना महत्व है। सोचिए, कपड़ा सीना हो तो छोटी-सी सुई ही काम आती है। वहाँ बड़ी तलवार क्या करेगी? वह तो सी ही नहीं सकती। यानी छोटा होने से कोई बेकार नहीं हो जाता।
दोहा 2
तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥
भावार्थ: रहीम कहते हैं — पेड़ (तरुवर) अपने फल खुद नहीं खाता, और तालाब (सरवर) अपना पानी खुद नहीं पीता। दोनों अपनी चीज़ दूसरों के लिए रखते हैं। ठीक इसी तरह, समझदार और भले लोग (सुजान) अपनी संपत्ति दूसरों की भलाई के लिए जोड़ते हैं। जैसे कोई व्यक्ति कमाई का कुछ हिस्सा ज़रूरतमंदों को देता है — यही असली परोपकार है।
दोहा 3
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥
भावार्थ: रहीम कहते हैं — प्रेम का रिश्ता एक नाज़ुक धागे जैसा है। इसे झटके से (चटकाय) मत तोड़ो। एक बार टूट गया तो फिर पहले जैसा नहीं जुड़ता। और अगर जुड़ भी जाए, तो उसमें गाँठ पड़ जाती है। जैसे किसी दोस्त से कड़वी बात कहकर रिश्ता तोड़ दें, तो बाद में सुलह होने पर भी मन में वह कड़वाहट कहीं रह ही जाती है।
दोहा 4
रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥
भावार्थ: रहीम कहते हैं — पानी को बचाकर रखो, क्योंकि पानी के बिना सब कुछ सूना है। यहाँ “पानी” शब्द के तीन मतलब हैं। मोती का पानी यानी उसकी चमक। मानुष (इंसान) का पानी यानी उसकी इज़्ज़त। और चून (आटे) का पानी यानी सचमुच का जल। तीनों ही पानी के बिना बेकार हो जाते हैं — मोती बिना चमक का, इंसान बिना इज़्ज़त का, और आटा बिना पानी के नहीं गुँधता। यानी अपनी इज़्ज़त सबसे ज़रूरी है।
दोहा 5
रहिमन बिपदाहु भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥
भावार्थ: रहीम कहते हैं — थोड़े दिनों की विपदा (मुसीबत) भी अच्छी होती है। क्यों? क्योंकि मुसीबत में ही पता चलता है कि कौन हमारा सच्चा हितैषी (हित) है और कौन भीतर से दुश्मन (अनहित)। जब सब ठीक होता है तो सब अपने लगते हैं। पर बुरे दिन में जो साथ खड़ा रहे, वही सच्चा है — और यह पहचान मुसीबत ही कराती है।
दोहा 6
रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥
भावार्थ: रहीम कहते हैं — यह जीभ (जिह्वा) बावली (पागल) है। यह बिना सोचे कुछ भी बोल जाती है, चाहे आसमान (सरग) की बात हो या पाताल की। बोलकर तो यह मुँह के भीतर छिप जाती है, पर उसकी कही बात का नतीजा सिर (कपाल) को भुगतना पड़ता है — यानी बुरा बोलने पर मार सिर पर पड़ती है। सीधी सीख — सोच-समझकर बोलो, वरना मुसीबत खड़ी हो जाती है।
दोहा 7
कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत॥
भावार्थ: रहीम कहते हैं — जब संपत्ति यानी अच्छे दिन होते हैं, तब बहुत-से लोग कई-कई तरीकों से अपने (सगे) और मित्र बन जाते हैं। पर असली परख तो विपत्ति (मुसीबत) की कसौटी पर होती है। “कसौटी” वह पत्थर है जिस पर सोने को घिसकर परखा जाता है कि वह असली है या नकली। जो दोस्त इस मुसीबत की कसौटी पर खरे उतरें, यानी बुरे वक़्त में भी साथ निभाएँ — वही (ते ही) सच्चे मित्र (साँचे मीत) हैं।
आइए गहराई से समझें
अब हम सिर्फ़ “क्या कहा” से आगे बढ़ते हैं। हम देखेंगे कि हर दोहे की सीख सही क्यों है। यही इन दोहों की असली ताक़त है। चार चित्र इन्हें आपके मन में बैठा देंगे।
विनम्रता — छोटे को छोटा मत समझो
पहला दोहा एक बड़ी सीख देता है — विनम्रता। विनम्रता यानी घमंड न करना, और हर किसी का महत्व समझना।
रहीम कहते हैं, किसी छोटे को बेकार समझकर मत त्यागो। पर ऐसा क्यों? क्योंकि हर चीज़ का अपना अलग काम होता है। कोई चीज़ छोटी है, इसका मतलब यह नहीं कि वह बेकार है। उसका काम शायद बड़ी चीज़ कर ही न सके।
इसे सुई और तलवार के उदाहरण से चित्र 5.1 में देखिए।
देखा? तलवार सुई से बहुत बड़ी है, फिर भी कपड़ा नहीं सी सकती। यानी बड़ा होना ही सब कुछ नहीं। हर किसी की अपनी जगह और अपना महत्व है। इसीलिए हमें हर व्यक्ति और हर चीज़ का सम्मान करना चाहिए।
रहीम कहते हैं कि सुई का काम तलवार नहीं कर सकती। इससे वे क्या सिखाना चाहते हैं?
परोपकार — दूसरों के काम आना
दूसरा दोहा सिखाता है — परोपकार। परोपकार यानी दूसरों की भलाई करना, उनके काम आना।
रहीम पेड़ और तालाब का उदाहरण देते हैं। पर सोचिए — रहीम ने यही दो चीज़ें क्यों चुनीं? क्योंकि ये दोनों रोज़ हमारे सामने रहती हैं, और दोनों चुपचाप दूसरों को देती रहती हैं। पेड़ अपने फल खुद नहीं खाता, तालाब अपना पानी खुद नहीं पीता। ये बिना कुछ माँगे, बिना दिखावे के, दूसरों के काम आते हैं।
इसी भाव को चित्र 5.2 में देखिए।
रहीम कहते हैं कि भले लोग भी ऐसे ही होते हैं। वे अपनी संपत्ति सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों की भलाई के लिए जोड़ते हैं। यही असली अमीरी है — जो आपके पास है, उसे दूसरों के काम लाना।
सच्चा प्रेम — रिश्ता सँभालकर रखो
तीसरा दोहा प्रेम और रिश्तों के बारे में है। रहीम प्रेम को धागे जैसा बताते हैं। पर वे ऐसा क्यों कहते हैं?
क्योंकि धागा नाज़ुक होता है, ठीक रिश्ते की तरह। और एक बार धागा झटके से टूट जाए, तो उसमें क्या होता है? जोड़ने पर भी गाँठ पड़ जाती है। वह पहले जैसा सीधा नहीं रहता। ठीक यही रिश्तों के साथ होता है।
यह बात चित्र 5.3 में तीन चरणों में देखिए।
इसीलिए रहीम कहते हैं — रिश्ता झटके से मत तोड़ो। गुस्से में आकर कोई कड़वी बात कह देना आसान है, पर बाद में सुलह हो भी जाए, तो मन की वह गाँठ मिटना मुश्किल है। रिश्ते को धागे की तरह सँभालकर रखो।
रहीम प्रेम को 'धागे' की तरह क्यों बताते हैं?
मर्यादा — अपनी इज़्ज़त और अपनी जीभ सँभालो
चौथे और छठे दोहे एक ही बड़ी बात कहते हैं — मर्यादा। मर्यादा यानी अपनी इज़्ज़त और सही व्यवहार की सीमा बनाए रखना।
चौथे दोहे का “पानी” शब्द कमाल का है। इसके तीन मतलब हैं, और तीनों रहीम एक साथ कह जाते हैं। नीचे की तालिका इन तीन अर्थों को साफ़ करती है।
| किसका 'पानी' | 'पानी' का मतलब | पानी न रहे तो |
|---|---|---|
| मोती | चमक | मोती बेकार, फीका |
| मानुष (इंसान) | इज़्ज़त, मान | इंसान का जीवन सूना |
| चून (आटा) | सचमुच का जल | आटा गुँधे ही नहीं |
इन तीनों में सबसे ज़रूरी है — इंसान का “पानी”, यानी उसकी इज़्ज़त। रहीम कहते हैं, इज़्ज़त एक बार चली गई तो वापस नहीं आती। इसलिए उसे बहुत सँभालकर रखो।
अब छठे दोहे की बात। रहीम जीभ को “बावरी” (पागल) क्यों कहते हैं? क्योंकि जीभ बिना सोचे कुछ भी बोल जाती है। पर मज़े की बात — बोलकर तो जीभ मुँह के अंदर छिप जाती है, और उसकी गलती की सज़ा सिर को भुगतनी पड़ती है। यानी बिना सोचे बोलना अपनी ही मुसीबत बुलाना है। इसलिए मर्यादा में रहकर, सोच-समझकर बोलना चाहिए।
सच्चा मित्र — मुसीबत ही कसौटी है
पाँचवाँ और सातवाँ दोहा एक ही गहरी बात कहते हैं — सच्चे मित्र की पहचान।
रहीम कहते हैं कि अच्छे दिनों में बहुत-से लोग दोस्त बन जाते हैं। पर असली परख मुसीबत में होती है। ऐसा क्यों? क्योंकि अच्छे दिनों में किसी का साथ देना आसान है — उसमें कोई त्याग नहीं। पर बुरे दिन में साथ देने के लिए सच्चा प्रेम चाहिए। इसीलिए मुसीबत एक कसौटी की तरह काम करती है — वह नकली दोस्तों को असली दोस्तों से अलग कर देती है।
इस फ़र्क़ को चित्र 5.4 में देखिए।
तो जब अगली बार मुश्किल आए, तो ध्यान देना — कौन साथ रहा। वही आपका सच्चा मित्र है। और पाँचवाँ दोहा तो यहाँ तक कहता है कि थोड़े दिन की मुसीबत भी अच्छी है, क्योंकि वही असली और नकली का फ़र्क़ दिखा देती है।
काव्य-सौंदर्य — रहीम की भाषा का जादू
इन दोहों की सुंदरता सिर्फ़ सीख में नहीं, इनकी भाषा में भी है।
रहीम अवधी और ब्रज के मेल वाली सरल बोली में लिखते हैं। उनकी सबसे बड़ी खूबी है — रोज़ की चीज़ों से बड़ी बात कहना। सुई, तलवार, पेड़, तालाब, धागा, पानी, जीभ, कसौटी — ये सब हमारे रोज़ के जीवन की चीज़ें हैं। रहीम इन्हीं जानी-पहचानी चीज़ों से गहरी सीख समझा देते हैं, इसलिए उनकी बात तुरंत मन में बैठ जाती है।
दूसरी खूबी है दोहे की कसावट। सिर्फ़ दो पंक्तियों में पूरी बात — न एक शब्द ज़्यादा, न कम। यही कसावट दोहे को याद रखने में आसान बनाती है।
आम भूलें
ये कुछ ग़लतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक में “ऐसा क्यों लगता है” वाला भाग सिर्फ़ जाल दिखाता है, और “असल बात” उसे सुधारती है।
दोहा 4 में 'पानी' का मतलब हर जगह सचमुच का जल (water) ही है।
'पानी' शब्द का रोज़ का, सबसे आम मतलब तो जल ही होता है, और दोहे में आटे के साथ यह मतलब सही भी बैठता है — इसलिए पूरे दोहे में वही एक मतलब मान लेना आसान लगता है।
यहाँ 'पानी' के तीन अलग मतलब हैं। मोती के लिए 'पानी' यानी उसकी चमक, इंसान के लिए 'पानी' यानी उसकी इज़्ज़त, और आटे के लिए 'पानी' यानी सचमुच का जल। रहीम एक ही शब्द से तीन बातें कह जाते हैं।
दोहा 5 का मतलब है कि मुसीबत हमेशा अच्छी चीज़ है, इसलिए मुसीबत आनी ही चाहिए।
रहीम 'बिपदाहु भली' यानी 'विपदा भी अच्छी' कहते हैं, इसलिए ऊपर से लगता है मानो वे हर मुसीबत को अच्छा बता रहे हों।
रहीम मुसीबत को अच्छा नहीं कह रहे। वे सिर्फ़ इतना कहते हैं कि 'थोड़े दिन' की मुसीबत का एक फ़ायदा है — वह सच्चे और झूठे लोगों की पहचान करा देती है। उनका ज़ोर मुसीबत पर नहीं, उससे मिलने वाली पहचान पर है।
दोहा 6 में रहीम कह रहे हैं कि जीभ सचमुच पागल या बीमार होती है।
रहीम सीधे 'जिह्वा बावरी' यानी 'जीभ पागल है' कहते हैं, इसलिए इसे सचमुच की बात समझ लेना स्वाभाविक है।
यह एक सुंदर कल्पना है, सचमुच की बात नहीं। रहीम जीभ को 'पागल' कहकर यह समझा रहे हैं कि वह बिना सोचे कुछ भी बोल देती है। असली सीख यह है कि हमें सोच-समझकर बोलना चाहिए, वरना उसका नतीजा भुगतना पड़ता है।
जाँचिए अपनी समझ
अब खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।
दोहे 1 में रहीम सुई और तलवार के उदाहरण से क्या सिखाते हैं?
दोहे 2 में पेड़ और तालाब किस मानवीय गुण के उदाहरण हैं?
दोहे 7 के अनुसार सच्चे मित्र की पहचान कब होती है?
दोहे 4 में 'मानुष' (इंसान) का 'पानी' किसका प्रतीक है?
अभ्यास
पहले अपना उत्तर सोचिए या लिखिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए। उत्तर की लंबाई पर ध्यान दीजिए।
सरल
दोहे 1 में रहीम ने सुई और तलवार का उदाहरण क्यों दिया है?
रहीम ने यह उदाहरण इसलिए दिया ताकि हर चीज़ के अपने महत्व की बात साफ़ हो जाए। कपड़ा सीने का काम छोटी-सी सुई ही कर सकती है, बड़ी तलवार नहीं। इससे वे सिखाते हैं कि कोई चीज़ छोटी होने से बेकार नहीं हो जाती। इसलिए किसी छोटे को छोटा समझकर त्यागना या उसका अपमान करना नहीं चाहिए।
दोहे 3 में रहीम प्रेम को किसके समान बताते हैं और क्यों?
रहीम प्रेम को एक नाज़ुक धागे के समान बताते हैं। इसका कारण यह है कि जैसे धागा एक बार झटके से टूट जाए तो जोड़ने पर भी उसमें गाँठ पड़ जाती है, वैसे ही प्रेम का रिश्ता एक बार टूट जाए तो सुलह के बाद भी पहले जैसा नहीं रहता — मन में कड़वाहट की गाँठ रह जाती है। इसीलिए वे कहते हैं कि रिश्ते को झटके से तोड़ना नहीं चाहिए।
मध्यम
दोहे 2 में रहीम परोपकार का संदेश किस तरह देते हैं? समझाइए।
दोहे 2 में रहीम प्रकृति की दो जानी-पहचानी चीज़ों से परोपकार का संदेश देते हैं। वे कहते हैं कि पेड़ अपने फल खुद नहीं खाता, और तालाब अपना पानी खुद नहीं पीता। दोनों अपनी चीज़ बिना कुछ माँगे दूसरों के लिए रखते हैं।
इसी उदाहरण से वे समझाते हैं कि भले और समझदार लोग भी ऐसे ही होते हैं। वे अपनी संपत्ति सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों की भलाई के लिए जोड़ते और इस्तेमाल करते हैं। इस तरह रहीम बताते हैं कि दूसरों के काम आना ही सच्ची अमीरी और असली परोपकार है।
दोहे 5 और 7 दोनों मिलकर सच्चे मित्र के बारे में क्या सिखाते हैं?
ये दोनों दोहे एक ही गहरी बात सिखाते हैं — सच्चे मित्र की पहचान मुसीबत में होती है।
दोहा 7 कहता है कि अच्छे दिनों यानी संपत्ति के समय बहुत-से लोग कई तरीकों से अपने और मित्र बन जाते हैं। पर असली परख विपत्ति की कसौटी पर होती है — जो बुरे वक़्त में भी साथ निभाए, वही सच्चा मित्र है।
दोहा 5 इसी बात को और आगे बढ़ाता है। वह कहता है कि थोड़े दिन की मुसीबत भी अच्छी है, क्योंकि वही बता देती है कि कौन सच्चा हितैषी है और कौन भीतर से दुश्मन। इस तरह दोनों दोहे मिलकर यह सिखाते हैं कि मुसीबत असली और नकली दोस्त का फ़र्क़ खोल देती है।
चुनौती
रहीम अपने दोहों में रोज़मर्रा की चीज़ों (सुई, पेड़, धागा, कसौटी) का उदाहरण क्यों देते हैं? इसका उनकी सीख पर क्या असर पड़ता है? विस्तार से समझाइए।
रहीम अपने दोहों में जानबूझकर रोज़ की सीधी-सादी चीज़ों का उदाहरण देते हैं — जैसे सुई, तलवार, पेड़, तालाब, धागा, पानी, जीभ और कसौटी। इसके पीछे एक सोची-समझी वजह है।
पहली वजह — ये चीज़ें हर किसी की जानी-पहचानी हैं। पाठक ने सुई से कपड़ा सिलते, धागे को टूटते और गाँठ पड़ते देखा है। इसलिए जब रहीम इनसे बात समझाते हैं, तो वह बात तुरंत मन में बैठ जाती है। कोई कठिन या दूर की बात नहीं रहती।
दूसरी वजह — रहीम छोटी चीज़ से बड़ी सीख निकालते हैं। एक नाज़ुक धागे से वे प्रेम और रिश्तों की गहरी बात कह देते हैं; एक कसौटी पत्थर से सच्ची दोस्ती की पहचान समझा देते हैं। इससे उनकी सीख सरल भी रहती है और गहरी भी।
इसका असर यह होता है कि उनके दोहे आसानी से याद रह जाते हैं और जीवन भर काम आते हैं। यही रहीम के काव्य की सबसे बड़ी खूबी है — आसान शब्दों में, रोज़ की चीज़ों से, बहुत बड़ी बात कह जाना।
शब्दार्थ लिखिए: (क) तरुवर (ख) सरवर (ग) सुजान (घ) बिपति (ङ) साँचे मीत (च) चून।
नीचे हर शब्द का सरल अर्थ दिया गया है:
- तरुवर — पेड़ (वृक्ष)।
- सरवर — तालाब (सरोवर)।
- सुजान — समझदार, भला और गुणी व्यक्ति।
- बिपति — विपत्ति, यानी मुसीबत या बुरा समय।
- साँचे मीत — सच्चे मित्र (जो हर हाल में साथ निभाएँ)।
- चून — आटा।
(याद रखने का तरीका — ये सब दोहों में आए शब्द हैं; इन्हें दोहे के साथ जोड़कर याद करें, तो अर्थ पक्का रहेगा।)
सारांश
याद रखने योग्य सब कुछ, संक्षेप में:
- रहीम (अब्दुर्रहीम खानखाना, 1556–1627) अकबर के नवरत्नों में से एक, बड़े दानवीर और भक्त थे; उनके दोहे सरल पर गहरे हैं।
- दोहा 1 (चित्र 5.1): छोटे को छोटा समझकर त्यागो मत — हर चीज़ का अपना काम है; सुई का काम तलवार नहीं कर सकती। यह विनम्रता सिखाता है।
- दोहा 2 (चित्र 5.2): पेड़ और तालाब की तरह भले लोग अपनी संपत्ति दूसरों के लिए जोड़ते हैं। यह परोपकार है।
- दोहा 3 (चित्र 5.3): प्रेम का धागा झटके से मत तोड़ो — टूटकर जुड़े तो गाँठ रह जाती है। यह सच्चे प्रेम और रिश्ते की सीख है।
- दोहा 4: ‘पानी’ के तीन अर्थ — मोती की चमक, इंसान की इज़्ज़त, आटे का जल; सबसे ज़रूरी है अपनी इज़्ज़त (मर्यादा) बचाना।
- दोहा 5: थोड़े दिन की मुसीबत भी अच्छी है, क्योंकि वह सच्चे और झूठे की पहचान करा देती है।
- दोहा 6: बिना सोचे बोलने वाली ‘बावरी’ जीभ की कही बात का नतीजा सिर को भुगतना पड़ता है — सोच-समझकर बोलो।
- दोहा 7 (चित्र 5.4): अच्छे दिनों में बहुत मित्र बनते हैं, पर सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति की कसौटी पर खरा उतरे।
- रहीम की खूबी — रोज़ की चीज़ों से बड़ी सीख, और दोहे की कसावट, जिससे बात याद रह जाती है।
आगे क्या?
अगले पाठ “मेरी माँ” में आप एक बिलकुल अलग रंग में पहुँचेंगे। जहाँ इस पाठ में रहीम जीवन की सीख देते हैं, वहीं अगला पाठ दिल को छूने वाला है — एक बच्चे और उसकी माँ के प्यार की बात। पढ़ते हुए ध्यान वही रखिए — सिर्फ़ “क्या लिखा है” नहीं, बल्कि “लेखक यह भाव क्यों जगाना चाहता है”, यह समझना।
Frequently Asked Questions
रहीम के दोहे कक्षा 6 का सारांश क्या है?
इस पाठ में रहीम के सात दोहे हैं जो जीवन की सच्चाइयाँ सिखाते हैं — छोटी चीज़ों की अहमियत, परोपकार, प्रेम की नाज़ुकता, इज़्ज़त का महत्व और सच्चे मित्र की पहचान। हर दोहे में एक गहरी बात कम शब्दों में कही गई है।
रहीम कौन थे और उनके बारे में क्या जानते हैं?
रहीम का पूरा नाम अब्दुर रहीम खान-ए-खाना था। उनका जन्म 1556 और निधन 1627 में हुआ। वे मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक थे और हिंदी में बहुत सुंदर दोहे लिखते थे।
सुई और तलवार वाले दोहे का क्या अर्थ है?
रहीम कहते हैं कि सुई (छोटी चीज़) को हीन मत समझो। सुई जो काम करती है — कपड़ा जोड़ना — वह तलवार नहीं कर सकती। यानी छोटी और बड़ी दोनों चीज़ों की अपनी अलग उपयोगिता होती है।
'पानी' वाले दोहे में रहीम ने कितने अर्थ बताए हैं?
रहीम ने 'पानी' के तीन अर्थ बताए हैं — मोती का पानी यानी उसकी चमक, इंसान का पानी यानी उसकी इज़्ज़त और आटे का पानी यानी पानी जो उसे गूँधता है। तीनों के बिना वे बेकार हो जाते हैं।
सच्चे मित्र की पहचान रहीम के अनुसार क्या है?
रहीम के अनुसार सच्चे मित्र की पहचान विपत्ति (मुसीबत) के समय होती है। जो दोस्त मुसीबत में साथ दे, वही असली मित्र है। सुख में तो सब साथ होते हैं लेकिन दुख में जो न छोड़े, वही सच्चा दोस्त है।