जलाते चलो
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए। शाम हो गई है। चारों ओर अँधेरा छा गया है। आपको कुछ दिख नहीं रहा। तभी कोई एक छोटा-सा दीपक जला देता है। बस, थोड़ा-सा उजाला हो जाता है। डर कम हो जाता है। रास्ता दिखने लगता है।
अब एक और सोच। हमारी ज़िंदगी में भी कभी-कभी “अँधेरा” आता है। यह अँधेरा आँखों वाला नहीं होता। यह मन का अँधेरा होता है — जैसे दुख, निराशा, बुराई या किसी की मुश्किल। ऐसे समय में अगर कोई एक अच्छा काम कर दे, किसी की मदद कर दे, किसी को हिम्मत दे — तो वह भी एक “दीपक” जलाने जैसा है।
यह कविता ठीक यही बात कहती है। कवि हमसे कहते हैं — रुको मत। एक के बाद एक, प्रेम से भरे दीपक जलाते चलो। आज दुनिया में चाहे कितना भी अँधेरा क्यों न हो, अगर हम लगातार अच्छाई के दीपक जलाते रहें, तो एक दिन यह अँधेरा ज़रूर मिट जाएगा।
यह पाठ इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि यह हमें हार न मानना सिखाता है। यह सिखाता है कि एक अकेला छोटा-सा अच्छा काम भी बेकार नहीं जाता।
मूल भाव
इस कविता का मूल भाव है — हिम्मत मत हारो, अच्छाई और आशा के दीपक जलाते चलो। दुनिया में आज भले ही दुख और कठिनाई का अँधेरा छाया हो, पर अगर हम प्रेम से भरे दीपक जलाते रहें और रुके बिना अपनी नाव चलाते रहें, तो एक दिन इस अँधेरे का अंत ज़रूर होगा। यहाँ “दीपक” का अर्थ है ज्ञान, आशा और अच्छाई, और “अँधेरे” का अर्थ है दुख, निराशा और बुराई। असली बात है — प्रयास कभी रुकना नहीं चाहिए, और हर दीपक में स्नेह यानी प्रेम होना चाहिए।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने कविता का सरल अर्थ और व्याख्या दी है। पूरी मूल कविता अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 6) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें।
इस कविता के रचयिता (लिखने वाले) हैं द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998)। वे बच्चों के लिए कविताएँ लिखने वाले एक प्रसिद्ध हिंदी कवि थे। उनकी एक मशहूर कविता है — “हम सब सुमन एक उपवन के”। उनकी कविताएँ सरल होती हैं, पर बड़ी गहरी बात कहती हैं।
कविता का भावार्थ
आइए, अब पूरी कविता का भाव अपने शब्दों में, एक-एक करके, बहुत आसान भाषा में समझते हैं। (भावार्थ का मतलब है — कविता का भाव यानी असली मतलब, सरल शब्दों में।)
पहली बात — दीपक जलाते चलो। कवि कहते हैं कि प्रेम से भरे दीपक एक के बाद एक जलाते चलो। ऐसा करते रहोगे, तो एक दिन इस धरती का अँधेरा ज़रूर मिट जाएगा। यहाँ “स्नेह” का अर्थ है प्रेम। तो “स्नेह भरे दीपक” का मतलब है — प्रेम से भरे अच्छे काम।
दूसरी बात — दुनिया में अभी अँधेरा है। कवि कहते हैं कि विज्ञान में बहुत शक्ति है। विज्ञान चाहे तो अमावस की रात को भी पूर्णिमा-सी उजली बना दे। (अमावस = वह रात जब चाँद बिल्कुल नहीं दिखता, सबसे अँधेरी रात। पूर्णिमा = वह रात जब पूरा चाँद दिखता है, सबसे उजली रात।) पर अफ़सोस, इतनी शक्ति होते हुए भी, आज दुनिया पर अमावस जैसी अँधेरी रात छाई हुई है। यानी दुख और मुश्किलें बहुत हैं।
तीसरी बात — बिना प्रेम का उजाला बेकार है। कवि एक बहुत सुंदर बात कहते हैं। वे कहते हैं कि जो दीपक बिना स्नेह के, यानी बिना प्रेम के जल रहे हैं, उन्हें बुझा दो। ऐसे उजाले से सही रास्ता नहीं मिलेगा। इसका मतलब — सिर्फ़ रोशनी होना काफ़ी नहीं। उस रोशनी में, उस काम में प्रेम भी होना चाहिए। प्रेम के बिना किया गया काम सच्चा रास्ता नहीं दिखाता।
चौथी बात — तुमने ही पहल की थी। कवि उस इंसान की तारीफ़ करते हैं जिसने सबसे पहले अँधेरे (तिमिर) के खिलाफ़ दीपक जलाया। (तिमिर = अँधेरा।) कवि कहते हैं — तुमने ही सबसे पहले अँधेरे को चुनौती दी थी। तुमने ही हिम्मत दिखाई थी। यानी जो पहल करता है, अच्छाई की शुरुआत करता है, वह सबसे बड़ा होता है।
पाँचवीं बात — नाव चलाते चलो। कवि कहते हैं — अपनी नाव लगातार चलाते चलो। रुको मत। एक दिन इस अँधेरे का किनारा ज़रूर मिल जाएगा। यहाँ “नाव चलाना” का मतलब है — कोशिश करते रहना। और “किनारा” का मतलब है — मुश्किलों का अंत, मंज़िल।
छठी बात — हवा बुझा दे तो फिर जलाओ। कवि कहते हैं कि अनगिनत दीपक जलाते चलो। (अनगिनत = जिन्हें गिना न जा सके, बहुत सारे।) हवा भले ही इन दीपकों को बुझा दे, पर तुम हार मत मानो। बार-बार फिर से जला दो। यही कविता का सबसे ज़रूरी संदेश है — रुकना नहीं, हार नहीं मानना।
तो कविता की पूरी बात बस इतनी है — प्रेम से भरे दीपक जलाते रहो, रुको मत, और एक दिन अँधेरा ज़रूर मिटेगा।
आइए गहराई से समझें
अब हम सिर्फ़ “कविता क्या कहती है” से आगे बढ़ते हैं। अब हम समझेंगे कि कवि ने ऐसा क्यों कहा, और इसमें छिपी सुंदरता क्या है। यही असली समझ है।
मुख्य भाव — आशा, प्रेरणा और निरंतर प्रयास
इस कविता में तीन बड़े भाव छिपे हैं। आइए, इन्हें एक चित्र की मदद से एक साथ देखते हैं। नीचे चित्र 7.1 कविता के मुख्य भाव को दिखाता है।
पहला भाव है आशा। कवि निराश नहीं हैं। वे मानते हैं कि अँधेरा हमेशा नहीं रहेगा। एक दिन उजाला होकर रहेगा। यह सोच हमें भी हिम्मत देती है।
दूसरा भाव है प्रेरणा। कविता हमें कुछ अच्छा करने के लिए उकसाती है, प्रेरित करती है। वह कहती है — तुम भी एक दीपक जलाओ, तुम भी अच्छाई फैलाओ।
तीसरा भाव है निरंतर प्रयास। “निरंतर” का अर्थ है — बिना रुके, लगातार। कवि बार-बार कहते हैं — जलाते चलो, बहाते चलो, फिर जलाओ। यह दोहराना यही सिखाता है कि कोशिश कभी रुकनी नहीं चाहिए।
दीपक और अँधेरे का प्रतीक-अर्थ
अब एक बहुत ज़रूरी शब्द समझ लेते हैं — प्रतीक। यह कविता को समझने की चाबी है।
तो इस कविता में दीपक और अँधेरा किन-किन बातों के प्रतीक हैं? नीचे चित्र 7.2 इसे साफ़-साफ़ दिखाता है।
देखिए, अगर हम दीपक को सिर्फ़ दीया समझें, तो कविता बहुत छोटी-सी बात लगेगी। पर जैसे ही हम समझते हैं कि दीपक का मतलब आशा और अच्छाई है, तो कविता बड़ी और गहरी बन जाती है।
अब एक सुंदर बात। एक दीपक से दूसरा दीपक जलता है। एक अच्छे काम से दूसरा अच्छा काम जन्म लेता है। नीचे चित्र 7.3 यही दिखाता है।
इसका मतलब — आपका एक छोटा-सा अच्छा काम भी बेकार नहीं जाता। वह किसी और को भी अच्छा करने की प्रेरणा देता है।
“क्यों” — कविता के पीछे की सोच
अब सबसे ज़रूरी बात। कुछ भी अपने-आप मान लेने जैसा नहीं है। आइए, कुछ गहरे “क्यों” समझते हैं।
कवि कहते हैं कि बिना स्नेह यानी बिना प्रेम के जलते दीपकों को बुझा दो। भला कोई जलते दीपक को बुझाने के लिए क्यों कहेगा?
हवा दीपक को बुझा देती है, फिर भी कवि बार-बार दीपक जलाने को क्यों कहते हैं? क्या यह बेकार की मेहनत नहीं है?
अब इसी “रुकना नहीं” वाले भाव को नीचे चित्र 7.4 में देखिए।
देखिए, कवि एक भी जगह यह नहीं कहते कि “थक गए तो रुक जाओ”। वे हमेशा कहते हैं — चलते चलो, जलाते चलो। यही इस कविता की सबसे बड़ी सीख है।
आम भूलें
इस कविता को समझते समय बच्चे कुछ आम गलतियाँ करते हैं। आइए, इन्हें ठीक कर लें।
कविता सिर्फ़ दीपावली पर दीये जलाने के बारे में है।
क्योंकि कविता में 'दीपक' और 'जलाना' शब्द बार-बार आते हैं, और दीपावली पर सचमुच दीये जलाए जाते हैं — इसलिए ऊपरी तौर पर ऐसा लगता है कि बात त्योहार की हो रही है।
कविता दीपावली के दीये जलाने के बारे में नहीं है। यहाँ 'दीपक' एक प्रतीक है। वह आशा, अच्छाई और प्रेम का प्रतीक है। कविता का असली संदेश है — दुनिया में अच्छाई और हिम्मत फैलाते रहो।
कविता में 'अँधेरा' का मतलब सिर्फ़ रात का अँधेरा है।
क्योंकि हम रोज़ देखते हैं कि रात होने पर अँधेरा हो जाता है, और दीपक जलाने से वह दूर हो जाता है — इसलिए सीधा-सीधा यही अर्थ मन में आता है।
यहाँ 'अँधेरा' (तिमिर, अमावस) एक प्रतीक है। यह दुख, निराशा, बुराई और अज्ञान का प्रतीक है। कविता असली रात के अँधेरे की नहीं, बल्कि मन और समाज में फैली मुश्किलों की बात कर रही है।
कवि कहते हैं हार मानकर रुक जाओ, क्योंकि हवा तो दीपक बुझा ही देगी।
क्योंकि कविता में सच में लिखा है कि हवा दीपक को बुझा देती है — इसे पढ़कर लगता है कि कोशिश का कोई फ़ायदा नहीं और रुक जाना ही ठीक है।
कवि का संदेश इसका बिल्कुल उल्टा है। वे कहते हैं कि हवा बुझा दे तो भी फिर से जला दो। कभी हार मत मानो। निरंतर प्रयास करते रहो — एक दिन अँधेरा ज़रूर मिटेगा।
जाँचिए अपनी समझ
अब कुछ सवालों से अपनी समझ जाँचते हैं। हर सवाल के बाद उसका कारण भी दिया गया है।
इस कविता में मुख्य रूप से कौन-सी बात कही गई है?
कविता में 'स्नेह' शब्द का अर्थ क्या है?
'कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा' — इस पंक्ति का सही भाव क्या है?
कविता में 'अमावस' और 'पूर्णिमा' किसके प्रतीक हैं?
अभ्यास (श्रेणीबद्ध)
अब कुछ अभ्यास करते हैं — आसान से कठिन की ओर। पहले खुद सोचिए, फिर उत्तर देखिए।
सरल
कविता के कवि कौन हैं? और इस कविता का मुख्य संदेश एक वाक्य में लिखिए।
इस कविता के कवि हैं द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998)।
इस कविता का मुख्य संदेश है — हार मत मानो, प्रेम और अच्छाई के दीपक लगातार जलाते चलो, क्योंकि एक दिन दुख का अँधेरा ज़रूर मिटेगा।
कविता में 'दीपक' और 'अँधेरा' किस-किस बात के प्रतीक हैं?
दीपक आशा, ज्ञान, अच्छाई और प्रेम का प्रतीक है।
अँधेरा (तिमिर, अमावस) दुख, निराशा, बुराई और अज्ञान का प्रतीक है।
इसलिए “दीपक जलाना” का असली मतलब है — अच्छाई और आशा फैलाना। और “अँधेरा मिटाना” का मतलब है — दुख और बुराई दूर करना।
मध्यम
नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ लिखिए — (क) स्नेह (ख) तिमिर (ग) निशा (घ) अनगिनत (ङ) निरंतर।
शब्दार्थ:
- स्नेह — प्रेम, प्यार
- तिमिर — अँधेरा
- निशा — रात
- अनगिनत — जिन्हें गिना न जा सके, बहुत सारे
- निरंतर — बिना रुके, लगातार
कवि कहते हैं कि हवा दीपक को बुझा देती है। फिर भी वे बार-बार दीपक जलाने को क्यों कहते हैं? अपने शब्दों में समझाइए।
यहाँ “हवा” मुश्किलों और रुकावटों का प्रतीक है। जैसे हवा दीपक को बुझा देती है, वैसे ही ज़िंदगी की मुश्किलें हमारी कोशिश को बार-बार रोकने की कोशिश करती हैं।
पर कवि कहते हैं — हार मत मानो। अगर हर बार बुझने पर हम रुक जाएँ, तो अँधेरा कभी नहीं मिटेगा। इसलिए दीपक बुझे तो उसे फिर से जला दो।
यही कविता का सबसे बड़ा संदेश है — निरंतर प्रयास। रुके बिना कोशिश करते रहो, तो एक दिन अँधेरे का किनारा ज़रूर मिलेगा।
चुनौती
कवि बिना स्नेह यानी बिना प्रेम के जलते दीपकों को बुझा देने के लिए क्यों कहते हैं? इसका गहरा अर्थ समझाइए।
पहली नज़र में यह बात अजीब लगती है — भला कोई जलते दीपक को बुझाने के लिए क्यों कहेगा? पर इसमें एक गहरा अर्थ छिपा है।
कवि के लिए सिर्फ़ रोशनी होना काफ़ी नहीं है। उस रोशनी में, उस काम में प्रेम (स्नेह) होना भी ज़रूरी है।
बिना प्रेम का उजाला झूठा और ठंडा होता है। जैसे कोई इंसान सिर्फ़ दिखावे के लिए मदद करे, पर उसके दिल में प्रेम न हो — तो वह मदद अधूरी रह जाती है। ऐसा उजाला सही रास्ता नहीं दिखा सकता।
इसलिए कवि कहते हैं कि ऐसे प्रेमहीन दीपक से अच्छा है कि वह बुझा ही रहे। असली और सच्चा दीपक वही है जिसमें स्नेह भरा हो। यही इस कविता की सबसे सुंदर और गहरी सीख है — हर अच्छे काम के पीछे सच्चा प्रेम होना चाहिए।
सारांश
- इस कविता के कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (1916–1998) हैं। यह बच्चों के लिए लिखी एक प्रेरणा देने वाली कविता है।
- कविता का मुख्य संदेश है — हार मत मानो, प्रेम और अच्छाई के दीपक जलाते चलो।
- यहाँ दीपक आशा, ज्ञान, अच्छाई और प्रेम का प्रतीक है।
- यहाँ अँधेरा (तिमिर, अमावस) दुख, निराशा, बुराई और अज्ञान का प्रतीक है।
- हर दीपक में स्नेह यानी प्रेम होना ज़रूरी है। बिना प्रेम का उजाला अधूरा है।
- कवि कहते हैं कि निरंतर यानी लगातार प्रयास करते रहो — रुको मत, नाव चलाते चलो।
- भले ही “हवा” (मुश्किलें) दीपक बुझा दे, बार-बार फिर से जलाओ। हार मत मानो।
- एक दिन इस अँधेरे का किनारा (अंत) ज़रूर मिलेगा — यही कविता की सबसे बड़ी आशा है।
आगे क्या?
इस कविता ने हमें सिखाया कि हिम्मत और प्रेम के साथ आगे बढ़ते रहना कितना ज़रूरी है। अगले पाठ — पाठ 8 “सत्रिया और बिहु नृत्य” — में हम भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम के दो सुंदर और प्रसिद्ध नृत्यों के बारे में पढ़ेंगे। वहाँ हम जानेंगे कि ये नृत्य कैसे होते हैं, इनका क्या महत्व है, और ये हमारी संस्कृति को कैसे जीवित रखते हैं। चलिए, आगे बढ़ते हैं!
Frequently Asked Questions
जलाते चलो कविता का सारांश क्या है?
'जलाते चलो' कविता में कवि कहते हैं कि हमें हमेशा प्रेम और उम्मीद के दीपक जलाते रहने चाहिए। चाहे तूफान आए या अँधेरा हो, हार मत मानो — बुझे दीपक को फिर से जलाओ और आगे बढ़ते रहो।
जलाते चलो कविता के कवि कौन हैं?
इस कविता के कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी हैं, जिनका जन्म 1916 और निधन 1998 में हुआ। वे बच्चों और युवाओं को प्रेरणा देने वाली कविताएँ लिखने के लिए जाने जाते हैं।
जलाते चलो कविता में दीपक किसका प्रतीक है?
इस कविता में दीपक उम्मीद, प्रेम, ज्ञान और अच्छाई का प्रतीक है। अँधेरा दुख, बुराई और निराशा का प्रतीक है। कवि कह रहे हैं कि हमें जीवन में हमेशा अच्छाई और उम्मीद की रोशनी बनाए रखनी चाहिए।
जलाते चलो कविता का मुख्य संदेश क्या है?
कविता का संदेश है कि जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन हमें हार नहीं माननी चाहिए। जैसे दीपक बुझ जाने पर फिर जलाया जाता है, वैसे ही हमें भी निराश होने पर नई कोशिश करनी चाहिए।
कविता में 'स्नेह के दीपक' जलाने का क्या मतलब है?
'स्नेह के दीपक' जलाने का मतलब है — प्रेम और दयालुता से लोगों के जीवन में रोशनी लाना। जब हम दूसरों से प्यार से पेश आते हैं और उनकी मदद करते हैं, तो हम उनके जीवन का अँधेरा दूर करते हैं।