मैया मैं नहिं माखन खायो

Chapter 9 · Hindi · Class 6 18 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। आप छोटे थे। आपने चुपके से कोई शरारत की। फिर माँ ने पूछा, “यह तुमने किया?” तब आपने क्या किया?

शायद आपने भी कोई प्यारा-सा बहाना बनाया होगा। “मैंने नहीं किया!” या “वो तो ऐसे ही हो गया!” है न?

यह पद ठीक यही दृश्य दिखाता है। नन्हा कृष्ण माखन (मक्खन) चुराकर खा लेता है। उसके मुँह पर माखन भी लगा है। फिर भी वह माँ से कहता है — “मैया, मैंने माखन नहीं खाया!”

यह पद हमें हँसाता भी है और मन को छू भी जाता है। इसमें एक बच्चे का भोलापन है, उसकी चतुराई है, और एक माँ का गहरा प्यार है। यही प्यार, जो माँ का अपने बच्चे के लिए होता है, उसे वात्सल्य कहते हैं। इस पद को पढ़कर आप समझेंगे कि सूरदास जैसे कवि छोटी-सी बात में कितना बड़ा प्यार भर देते हैं।

कवि-परिचय

पद पढ़ने से पहले उसके रचनाकार सूरदास को थोड़ा जान लेते हैं।

मूल भाव

इस पद का मूल भाव है — एक बच्चे का भोलापन और माँ का अटूट वात्सल्य। नन्हा कृष्ण माखन चुराकर खा लेता है, पर माँ के पूछने पर साफ़ मना कर देता है। वह एक-एक करके प्यारे और चतुर बहाने गढ़ता है। माँ यशोदा सब समझती हैं, फिर भी उसके भोलेपन पर रीझकर हँस पड़ती हैं और उसे गले से लगा लेती हैं। यही माँ-बेटे का सच्चा, निश्छल प्रेम इस पद की आत्मा है।

मूल पाठ और व्याख्या

अब पूरा पद क्रम से पढ़ते हैं। हर छोटे हिस्से के तुरंत बाद उसका भावार्थ (मतलब) आसान हिंदी में दिया है। पहले मूल पंक्तियाँ, फिर उनका अर्थ।

मैया मैं नहिं माखन खायो।
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो॥

भावार्थ: कृष्ण माँ से कहता है — “मैया, मैंने माखन (मक्खन) नहीं खाया!” फिर वह सफ़ाई देता है — “सुबह होते ही (भोर भयो) तुमने मुझे गायों के पीछे (गैयन के पाछे) मधुबन (जंगल) भेज दिया था। मैं तो दिन भर वहीं था, तो माखन खाता कब?”

चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो।
मैं बालक बहियन को छोटो, छींको केहि बिधि पायो॥

भावार्थ: कृष्ण कहता है — “मैं तो चारों पहर (पूरे दिन) बंसीवट नाम की जगह पर भटकता रहा, और शाम ढलने (साँझ परे) पर घर लौटा हूँ।” फिर वह एक और चतुर बात कहता है — “मैं तो छोटा-सा बालक हूँ, मेरी बाँहें (बहियन) भी छोटी हैं। फिर इतने ऊँचे लटके छींके (रस्सी से लटकती माखन की मटकी) तक मैं पहुँचता कैसे?”

ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो॥
तू माता मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो॥

भावार्थ: अब कृष्ण दोष दूसरों पर डालता है — “ये ग्वाल-बाल (गाय चराने वाले लड़के) सब मुझसे बैर (दुश्मनी) रखते हैं। इन्होंने ही ज़बरदस्ती (बरबस) मेरे मुँह पर माखन मल दिया!” फिर माँ से कहता है — “तू तो माँ है, मन की बहुत भोली (अति भोरी) है। इन शरारती लड़कों की बात मानकर तूने यूँ ही मुझ पर यकीन (पतियायो) कर लिया!”

जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो॥
ये ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो॥

भावार्थ: अब कृष्ण रूठने का नाटक करता है — “लगता है तेरे मन में मेरे लिए कुछ भेदभाव आ गया है। शायद तू मुझे पराया (किसी और का) बेटा समझने लगी है!” फिर गुस्से में कहता है — “ये ले, अपनी लाठी (लकुटि) और कंबल (कमरिया) वापस रख। तूने तो मुझे बहुत नाच नचाया (बहुत परेशान किया)!” यानी वह चरवाहे का सामान लौटाने का नाटक करके अपनी सच्चाई जताना चाहता है।

सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो॥

भावार्थ: सूरदास कहते हैं — माँ यशोदा अपने बेटे की ये प्यारी, भोली बातें सुनकर मुस्कुरा (बिहँसि) पड़ीं। उनका सारा गुस्सा प्यार में बदल गया। उन्होंने कृष्ण को अपने हृदय (उर) और गले (कंठ) से लगा लिया। यही माँ का वात्सल्य है।

आइए गहराई से समझें

अब “क्या कहा” से आगे बढ़कर “ऐसा क्यों” समझते हैं। यही इस पद की असली मिठास है।

कृष्ण के तीन बहाने

कृष्ण माखन खा तो लेता है, पर पकड़े जाने पर एक-एक करके तीन बहाने बनाता है। ये बहाने बड़े चतुर हैं। इन्हें एक साथ चित्र 9.1 में देखिए।

कृष्ण के तीन बहानों की सूची
Figure 9.1 — यह चित्र कृष्ण के तीन बहाने क्रम से दिखाता है। सबसे ऊपर वह माँ से कहता है — मैंने माखन नहीं खाया। फिर तीन कारण देता है। बहाना 1 (नीला): मैं सुबह से गायों के पीछे मधुबन गया था, दिन भर वहीं रहा, इसलिए चोरी का समय ही नहीं था। बहाना 2 (हरा): मैं तो छोटा बच्चा हूँ, छींका इतना ऊँचा है कि मेरे हाथ माखन तक पहुँच ही नहीं सकते। बहाना 3 (लाल): ग्वाल-बाल मुझसे चिढ़ते हैं, इसलिए उन्होंने ज़बरदस्ती मेरे मुँह पर माखन मल दिया। नीचे लिखा है कि तीनों बहाने भोले भी हैं और चतुर भी — यही बाल-स्वभाव का रस है।

देखा आपने? कृष्ण कितनी सफ़ाई से अपनी बात रखता है। एक छोटा बच्चा भी, जब डर जाता है, तो ऐसे ही बहाने गढ़ता है। यही बात इस पद को इतना सच्चा बनाती है।

कृष्ण का भोलापन और चतुराई

यहाँ एक मज़ेदार बात है। कृष्ण एक साथ भोला भी है और चतुर भी।

वह भोला इसलिए है क्योंकि उसके मुँह पर तो माखन लगा ही है — झूठ साफ़ पकड़ा जाता है। पर वह चतुर इसलिए है क्योंकि उसके बहाने बड़े होशियारी से गढ़े हैं। “मैं छोटा हूँ, ऊँचे छींके तक पहुँचूँ कैसे?” — यह तर्क सुनने में बिलकुल सही लगता है।

इस “छोटे हाथ, ऊँचा छींका” वाले बहाने को चित्र 9.2 में देखिए।

ऊँचे छींके का दृश्य जिसमें नन्हा कृष्ण नीचे खड़ा है
Figure 9.2 — यह चित्र कृष्ण के दूसरे बहाने को दिखाता है। ऊपर छत की कड़ी से रस्सी का छींका लटका है, और उसमें माखन की पीली मटकी रखी है। मटकी बहुत ऊँचाई पर है — बीच में लाल तीर यह ऊँचाई दिखाता है। नीचे नन्हा कृष्ण खड़ा है, उसके हाथ छोटे हैं। वह पीले बुलबुले में कहता है — मैं तो छोटा हूँ, कैसे पहुँचता? चित्र से साफ़ होता है कि उसका तर्क सुनने में सच्चा क्यों लगता है — सचमुच एक छोटे बच्चे के हाथ इतने ऊँचे छींके तक नहीं पहुँच सकते।

अब एक “क्यों” सोचिए।

Concept check

कृष्ण के बहाने सुनने में सच्चे क्यों लगते हैं, जबकि उसके मुँह पर माखन लगा है?

माँ-बेटे का प्रेम — वात्सल्य

पद का सबसे प्यारा हिस्सा अंत में आता है। माँ यशोदा जानती हैं कि कृष्ण ने ही माखन खाया है। उसके मुँह पर माखन लगा है, बहाने भी झूठे हैं। फिर भी वे डाँटती नहीं। वे हँस पड़ती हैं और बेटे को गले लगा लेती हैं।

यहाँ एक ज़रूरी “क्यों” है — माँ डाँटने के बजाय हँसकर गले क्यों लगा लेती हैं? इसका उत्तर ही पूरे पद का दिल है।

माँ यशोदा हँसकर गले इसलिए लगाती हैं क्योंकि उनके मन में बेटे के लिए वात्सल्य भरा है। उनके लिए कृष्ण का झूठ पकड़ना ज़रूरी नहीं; उनके लिए तो बेटे का भोलापन और प्यारी बातें ही सब कुछ हैं। उसकी शरारत उन्हें प्यारी लगती है, गुस्सा नहीं आता। यही माँ का सच्चा प्रेम है — जहाँ गलती भी माफ़ हो जाती है और शरारत भी मीठी लगती है।

इस प्यार-भरे पल को चित्र 9.3 में देखिए।

माँ यशोदा नन्हे कृष्ण को हँसकर गले लगाती हुई
Figure 9.3 — यह चित्र पद के अंतिम और सबसे प्यारे पल को दिखाता है। बीच में गुलाबी रंग की माँ यशोदा मुस्कुरा रही हैं और अपनी बाँह से नन्हे कृष्ण (नीले रंग में) को गले लगाए हुए हैं। चारों ओर दिल के निशान उनके भीतर उमड़ते प्यार यानी वात्सल्य को दिखाते हैं। नीचे पद की वही पंक्ति लिखी है — सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो — यानी माँ हँसकर बेटे को गले लगा लेती हैं। चित्र से साफ़ होता है कि माँ का गुस्सा कैसे प्यार में बदल जाता है।

काव्य-सौंदर्य और ब्रजभाषा

इस पद की सुंदरता केवल कहानी में नहीं, इसकी भाषा में भी है।

इसकी भाषा ब्रजभाषा है। यह मथुरा-गोकुल इलाके की बोली है। यह बहुत कोमल, मीठी और गाने लायक (गेय) है। इसमें “मैया”, “गैयन”, “लकुटि”, “कमरिया” जैसे प्यारे शब्द हैं, जो बच्चे की तोतली, भोली बोली जैसे लगते हैं। यही मिठास इस वात्सल्य-भरे पद के लिए एकदम सही है।

पूरे पद के सारे भाव कैसे एक-दूसरे से जुड़े हैं, यह चित्र 9.4 में एक नज़र में देखिए।

पद के मुख्य भावों का भाव-जाल
Figure 9.4 — यह भाव-जाल पूरे पद को एक नज़र में जोड़ता है। बीच के पीले घेरे में पद का केंद्र है — बाल-कृष्ण और माखन। इससे चार भाव जुड़े हैं। ऊपर बाएँ (नीला): तीन बहाने — गाय, छींका और ग्वाल वाले। ऊपर दाएँ (हरा): भोलापन — कृष्ण की मासूम बाल-सफ़ाई। नीचे बाएँ (बैंगनी): चतुराई — उसके चालाक तर्क। नीचे दाएँ (गुलाबी): वात्सल्य — माँ का हँसकर गले लगाना। सबसे नीचे (लाल): मीठी ब्रजभाषा, जो इन सब भावों को कोमलता से बाँधती है। चित्र दिखाता है कि भोलापन, चतुराई और वात्सल्य मिलकर इस एक छोटे पद को इतना प्यारा बना देते हैं।

आम भूलें

ये कुछ गलतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक को ध्यान से पढ़िए।

⚠️ Common mistake
What students think

कृष्ण सच बोल रहा है, उसने सचमुच माखन नहीं खाया।

Why it seems right

कृष्ण के बहाने इतने सिलसिलेवार और तर्क-भरे हैं कि पहली बार पढ़ने पर वे सच्चे लगते हैं — 'मैं छोटा हूँ', 'मैं दिन भर बाहर था' जैसी बातें सुनने में बिलकुल ठीक जान पड़ती हैं।

What actually happens

कृष्ण ने माखन खाया है — उसके मुँह पर माखन लगा होना ही इसका सबूत है। ये सब तो उसके भोले-चतुर बहाने हैं, ताकि वह डाँट से बच जाए। माँ भी यह जानती हैं, फिर भी प्यार के कारण उसे माफ़ कर देती हैं।

⚠️ Common mistake
What students think

माँ यशोदा को कृष्ण की चालाकी समझ नहीं आई, इसलिए वे चुप रहीं।

Why it seems right

माँ डाँटती नहीं और चुपचाप गले लगा लेती हैं, इसलिए लगता है मानो उन्हें कृष्ण का झूठ पकड़ में ही नहीं आया।

What actually happens

माँ यशोदा सब समझती हैं कि कृष्ण ने ही माखन खाया है। वे चुप नासमझी से नहीं, बल्कि वात्सल्य से रहती हैं। बेटे का भोलापन उन्हें इतना प्यारा लगता है कि वे डाँटने के बजाय हँसकर गले लगा लेती हैं।

⚠️ Common mistake
What students think

यह पद केवल एक शरारती बच्चे की हँसी-मज़ाक की कहानी है, इसमें गहरी बात कुछ नहीं।

Why it seems right

पद हल्का-फुल्का और हँसाने वाला है, इसलिए लगता है कि यह बस एक मज़ेदार किस्सा भर है।

What actually happens

हँसी के साथ-साथ इसमें एक गहरा भाव छिपा है — माँ का वात्सल्य, यानी अपने बच्चे के लिए बेशर्त प्यार। सूरदास एक छोटी-सी शरारत के ज़रिए माँ-बेटे के सच्चे, निश्छल प्रेम को दिखा देते हैं। यही इसे केवल मज़ाक से ऊपर उठा देता है।

जाँचिए अपनी समझ

खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।

कृष्ण माँ से क्या कहता है?

कृष्ण छींके तक न पहुँच पाने का क्या कारण बताता है?

कृष्ण ग्वाल-बालों पर क्या आरोप लगाता है?

पद के अंत में माँ यशोदा क्या करती हैं?

अभ्यास

पहले अपना उत्तर सोचिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए।

सरल

easy

कृष्ण माँ से क्या कहता है और क्यों?

easy

कृष्ण ने अपने न पकड़े जाने के लिए कौन-कौन से तीन बहाने बनाए?

मध्यम

medium

माँ यशोदा कृष्ण की चोरी जानते हुए भी उसे डाँटती क्यों नहीं? समझाइए।

medium

इस पद में कृष्ण का भोलापन और चतुराई दोनों एक साथ कैसे दिखते हैं? उदाहरण देकर बताइए।

चुनौती

challenge

'मैया मैं नहिं माखन खायो' पद के आधार पर बताइए कि सूरदास ने इस छोटी-सी शरारत के ज़रिए वात्सल्य और बाल-स्वभाव को कैसे चित्रित किया है? विस्तार से समझाइए।

challenge

शब्दार्थ लिखिए — (क) भोर (ख) गैयन (ग) छींका (घ) बरबस (ङ) लकुटि (च) बिहँसि।

सारांश

याद रखने योग्य बातें, संक्षेप में:

  • यह पद सूरदास का रचा हुआ है, जो कृष्ण के भक्त और वात्सल्य के सबसे बड़े कवि माने जाते हैं; इसकी भाषा ब्रजभाषा है।
  • नन्हा कृष्ण माखन चुराकर खा लेता है, पर माँ से कहता है — “मैया मैं नहिं माखन खायो।”
  • वह तीन बहाने बनाता है (चित्र 9.1): दिन भर गाय चराने गया था; वह छोटा है इसलिए ऊँचे छींके तक पहुँच नहीं सकता (चित्र 9.2); ग्वाल-बालों ने ज़बरदस्ती मुँह पर माखन मल दिया।
  • कृष्ण एक साथ भोला भी है और चतुर भी — उसका झूठ पकड़ा जाता है, पर उसके बहाने होशियारी-भरे हैं।
  • वह रूठने का नाटक करके अपनी लाठी और कंबल तक लौटाने लगता है।
  • माँ यशोदा सब समझती हैं, फिर भी डाँटती नहीं — हँसकर उसे गले लगा लेती हैं (चित्र 9.3)। यही वात्सल्य है।
  • पद के सभी भाव — बहाने, भोलापन, चतुराई और वात्सल्य — मीठी ब्रजभाषा से बँधे हैं (चित्र 9.4)।
  • मूल संदेश: एक छोटी-सी शरारत के ज़रिए सूरदास माँ-बेटे का सच्चा, निश्छल प्रेम दिखा देते हैं।

आगे क्या

अगला पाठ 10 “परीक्षा” आपको कृष्ण की बाल-लीला की दुनिया से निकालकर एक अलग-सी कहानी में ले जाएगा। यहाँ बात होगी एक ऐसी परीक्षा की, जो किताबी इम्तिहान से अलग है — यह जीवन की परख है, इंसान की परख है। ध्यान वही रखिए — केवल “क्या हुआ” नहीं, बल्कि पात्र ऐसा क्यों करते हैं और कहानी हमें क्या सिखाती है, यह समझना।

Frequently Asked Questions

मैया मैं नहिं माखन खायो पद का सारांश क्या है?

इस पद में बाल कृष्ण माखन चुराने के बाद पकड़े जाते हैं और माँ यशोदा को तीन बहाने देते हैं। पहले कहते हैं कि मैं सारे दिन जंगल में गाय चराता रहा, फिर कहते हैं मेरे हाथ छोटे हैं — छींके तक नहीं पहुँच सकते, और तीसरे बहाने में कहते हैं कि दूसरे ग्वालों ने मुँह पर माखन लगा दिया।

मैया मैं नहिं माखन खायो के कवि कौन हैं?

यह पद महाकवि सूरदास का है जो 15वीं-16वीं सदी के महान भक्त कवि थे। वे श्रीकृष्ण के अंधे भक्त थे और उन्होंने कृष्ण की बाल-लीलाओं पर बहुत सुंदर पद लिखे हैं।

इस पद में कृष्ण ने माँ यशोदा को कौन-कौन से बहाने दिए?

कृष्ण ने तीन बहाने दिए: (1) मैं दिनभर जंगल में था, माखन खाने का समय कहाँ मिला? (2) मेरे हाथ इतने छोटे हैं कि छींके तक नहीं पहुँच सकते। (3) ग्वाले मेरे साथी हैं जिन्होंने खुद माखन खाया और थोड़ा मेरे मुँह पर लगा दिया।

इस पद में वात्सल्य रस का क्या उदाहरण है?

जब माँ यशोदा कृष्ण के भोले-चतुर बहाने सुनती हैं तो वे मुस्कुराती हैं और उन्हें गले लगा लेती हैं। यही वात्सल्य रस है — माँ की वह ममता और प्यार जो बच्चे की हर शरारत पर भी कम नहीं होती।

ब्रजभाषा क्या है और यह पद उसमें क्यों लिखा गया?

ब्रजभाषा उत्तर भारत के ब्रज क्षेत्र (मथुरा-वृंदावन के आसपास) की भाषा है। सूरदास इसी इलाके के थे और उनके समय में यह भाषा भक्ति कविताओं के लिए बहुत लोकप्रिय थी। इसमें 'माखन', 'मैया', 'छींका', 'ग्वाल' जैसे शब्द आते हैं।