परीक्षा
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए। मान लीजिए किसी बड़े पद के लिए लोग चुने जा रहे हैं। आप क्या सोचेंगे — जीतेगा वही जो सबसे ज़्यादा होशियार है? जो सबसे अच्छी पढ़ाई जानता है? जो सबसे तेज़ है?
अक्सर हम यही सोचते हैं। हमें लगता है कि सिर्फ़ हुनर से ही आदमी आगे बढ़ता है। हुनर का मतलब है — कोई काम अच्छे से करने की कला, जैसे अच्छी पढ़ाई या तेज़ दौड़।
पर यह कहानी एक अलग बात कहती है। इसमें एक राज्य को नया दीवान (राजा का सबसे बड़ा मंत्री, जो पूरा राज-काज सँभालता है) चुनना है। बहुत-से होशियार लोग आते हैं। सबकी कई दिन तक परीक्षा होती है। पर असली परीक्षा एक छिपी हुई परीक्षा थी — जिसके बारे में किसी को बताया ही नहीं गया।
उस छिपी परीक्षा में जीता वही, जिसने रास्ते में रुककर एक मुसीबत में फँसे आदमी की मदद की — जबकि बाकी सब बिना रुके आगे निकल गए। इस कहानी से हमें एक गहरी बात पता चलती है — सच्ची महानता सिर्फ़ हुनर में नहीं, बल्कि अच्छे चरित्र और दूसरों की सेवा में है।
मूल भाव
इस पाठ का मूल भाव है — सच्ची परीक्षा हुनर की नहीं, चरित्र और सेवा-भाव की होती है। एक राज्य को नया दीवान चुनना था। बहुत-से होशियार उम्मीदवार आए, पर चुना वही गया जिसने रास्ते में फँसी एक गाड़ी और बूढ़े किसान को देखकर रुककर उसकी मदद की। बाकी सब अपनी परीक्षा की जल्दी में बिना रुके निकल गए। कहानी बताती है कि बड़े पद के लिए सबसे ज़रूरी गुण है — दूसरों के दुख को समझना और निःस्वार्थ होकर मदद करना।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने कहानी का सार और व्याख्या दी है। पूरी मूल कहानी अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 6) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें।
कहानी का सार
यह कहानी हिंदी के बहुत बड़े लेखक प्रेमचंद की लिखी हुई है। आइए इसे सरल भाषा में, क्रम से समझते हैं।
देवगढ़ नाम के एक राज्य में सरदार सुजान सिंह दीवान थे। वे बहुत बूढ़े हो चुके थे। अब वे चाहते थे कि कोई और उनकी जगह नया दीवान बने और वे आराम करें।
यहाँ एक ज़रूरी बात है। सुजान सिंह का अपना बेटा भी था। पर उन्होंने अपने बेटे को दीवान नहीं बनाया। उन्हें बदनामी का डर था — यानी डर था कि लोग कहेंगे कि उन्होंने अपने बेटे को जान-बूझकर आगे कर दिया, चाहे वह योग्य हो या न हो। इसलिए उन्होंने सबके लिए खुला रास्ता रखा।
उन्होंने एक विज्ञापन (अखबार में छपी सूचना) निकाला कि राज्य को एक नया दीवान चाहिए। कोई भी योग्य आदमी इसके लिए आ सकता है। विज्ञापन में एक खास शर्त भी थी — विद्या (पढ़ाई) तो कम देखी जाएगी, पर कर्तव्य और अच्छे चरित्र पर ज़्यादा ध्यान दिया जाएगा।
इस विज्ञापन को पढ़कर पूरे देश से बहुत-से होशियार लोग देवगढ़ आ गए। पूरे एक महीने तक उनकी अलग-अलग तरह से परीक्षा हुई — घुड़सवारी, खेल, पढ़ाई, बातचीत और रहन-सहन। सबके चाल-चलन पर नज़र रखी गई।
आखिरी दिन एक खेल का मैदान सजा। उम्मीदवार खेल खेलकर, फिर अपने-अपने घर लौट रहे थे। रास्ते में एक तंग जगह थी, जहाँ कीचड़ भरा एक नाला था।
वहीं एक बूढ़े किसान की गाड़ी (बैलगाड़ी) कीचड़ में फँस गई थी। गाड़ी पर भूसे (सूखी घास) का भारी बोझ लदा था। किसान के बैल कमज़ोर थे। गाड़ी किसी तरह आगे नहीं बढ़ पा रही थी। बूढ़ा किसान अकेला बहुत परेशान था। उसकी आँखों में मदद की पुकार थी।
पर हुआ क्या? एक-एक करके उम्मीदवार वहाँ से गुज़रते रहे। किसी ने रुककर मदद नहीं की। सब अपनी जल्दी में आगे निकल गए। शायद उन्हें लगा कि रुकने से वे परीक्षा में पीछे रह जाएँगे।
तभी एक युवक आया। उसने किसान की हालत देखी और रुक गया। वह घोड़े से उतरा। उसने किसान से कहा कि घबराओ मत, मैं गाड़ी निकाल देता हूँ। उसने अपने कंधे का कपड़ा कसकर बाँधा और गाड़ी को ज़ोर लगाकर धकेला। उसने कमज़ोर बैलों का भी सहारा दिया। आखिर गाड़ी कीचड़ से बाहर निकल आई।
बूढ़ा किसान बहुत खुश हुआ। उसने युवक से उसका नाम पूछा। युवक ने हँसकर कहा कि किसी की मदद करना तो उसका कर्तव्य था, इसमें नाम की क्या बात।
अब आखिरी दिन आया। सरदार सुजान सिंह ने सबके सामने अपना फ़ैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा दीवान चाहिए जिसके दिल में दूसरों के लिए दया, उदारता और सेवा-भाव हो — न कि सिर्फ़ पढ़ाई और हुनर। और यह गुण उन्हें पंडित जानकीनाथ में दिखा — वही युवक, जिसने रास्ते में रुककर बूढ़े किसान की मदद की थी। इसलिए नया दीवान उसी को चुना गया।
पूरी कहानी का क्रम एक नज़र में देखने के लिए, नीचे चित्र 10.1 देखिए।
आइए गहराई से समझें
अब केवल “क्या हुआ” से आगे बढ़कर “ऐसा क्यों है” समझते हैं। यही इस कहानी की असली गहराई है।
पात्र — कहानी के मुख्य लोग
इस कहानी में कुछ ही पात्र हैं, पर हर एक का अपना महत्व है।
सरदार सुजान सिंह बूढ़े और समझदार दीवान हैं। वे बहुत ईमानदार और दूरदर्शी (आगे की सोचने वाले) हैं। वे जानते हैं कि एक अच्छा दीवान वही होगा जिसका चरित्र अच्छा हो। इसलिए वे एक चतुर तरीका सोचते हैं — एक छिपी परीक्षा। वे अपने बेटे को भी सिर्फ़ इसलिए आगे नहीं करते, क्योंकि वे कोई बदनामी या पक्षपात नहीं चाहते।
पंडित जानकीनाथ कहानी का असली नायक है। वह होशियार तो है ही, पर उसकी सबसे बड़ी खूबी उसका दयालु और सेवा-भाव वाला दिल है। वह दूसरों का दुख देखकर रुक नहीं पाता। उसके लिए किसी की मदद करना अपने फ़ायदे से बड़ी बात है। इसी गुण ने उसे बाकी सबसे अलग और खास बना दिया।
बूढ़ा किसान एक साधारण, गरीब आदमी है। वह कहानी में छोटा-सा पात्र लगता है, पर असल में वही “छिपी परीक्षा” का केंद्र है। उसकी फँसी गाड़ी ही वह कसौटी (परखने का पैमाना) बन जाती है, जिससे हर उम्मीदवार का सच्चा दिल परखा जाता है।
बाकी उम्मीदवार होशियार और हुनरमंद थे, पर उनमें वह रुककर मदद करने वाला दिल नहीं था। वे परीक्षा जीतने की जल्दी में थे, इसलिए सामने पड़ी असली परीक्षा को पहचान ही नहीं पाए।
मुख्य भाव — सच्ची परीक्षा चरित्र और सेवा की होती है
यह कहानी का दिल है। आइए इसे ठीक से समझें।
बाहर से देखें, तो परीक्षा घुड़सवारी, खेल और पढ़ाई की थी। यह सब हुनर की बातें हैं। हुनर ज़रूरी है, पर अकेला काफ़ी नहीं। एक होशियार आदमी अगर बेरहम हो, तो वह बड़े पद पर बैठकर लोगों का भला नहीं कर सकता।
इसलिए सरदार सुजान सिंह ने एक और परीक्षा रखी — पर छिपाकर। उन्होंने किसी को नहीं बताया कि रास्ते में फँसी गाड़ी भी एक परीक्षा है। यही इस परीक्षा की खूबी है। नीचे चित्र 10.2 इस छिपी परीक्षा का दृश्य दिखाता है।
ध्यान दीजिए — क्योंकि किसी को बताया नहीं गया था, इसलिए हर आदमी ने वही किया जो उसके दिल में सच में था। जो लोग दिखावे के लिए अच्छे बनते हैं, वे यहाँ पकड़े गए। जिसका दिल सच में दयालु था, वही रुका। यही छिपी परीक्षा की सबसे बड़ी ताकत है — वह आदमी का असली रूप सामने ले आती है।
हुनर और चरित्र — दोनों में क्या फ़र्क है, यह नीचे चित्र 10.3 से और साफ़ हो जाएगा।
इस तुलना से साफ़ है कि हुनर ऊपर से चमकता है, पर चरित्र भीतर छिपा होता है। और बड़े पद के लिए भीतर का यही गुण सबसे ज़्यादा मायने रखता है।
वह क्यों चुना गया — कहानी का सबसे ज़रूरी “क्यों”
कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं है। आइए सबसे ज़रूरी सवाल पर रुकें — मदद करने वाला युवक ही क्यों दीवान चुना गया?
रास्ते में फँसी गाड़ी देखकर हर उम्मीदवार के सामने दो रास्ते थे। नीचे चित्र 10.4 इन दोनों रास्तों को दिखाता है।
जवाब साफ़ है। दीवान का काम है पूरे राज्य के लोगों की देखभाल करना — खासकर कमज़ोर और गरीब लोगों की। अगर कोई आदमी एक अकेले बूढ़े किसान का दुख देखकर भी नहीं रुकता, तो वह पूरे राज्य के दुख की परवाह कैसे करेगा? और जो आदमी अपने फ़ायदे (परीक्षा जीतने) से पहले दूसरे की मदद को रखता है, वही सच में लोगों का भला कर सकता है। इसलिए युवक का रुकना सिर्फ़ एक अच्छा काम नहीं था — वह इस बात का सबूत था कि उसका दिल एक सच्चे दीवान जैसा है।
बाकी उम्मीदवार बहुत होशियार थे, फिर भी वे यह छिपी परीक्षा क्यों हार गए?
देखने में बाकी उम्मीदवार और चुना गया युवक एक जैसे ही होशियार थे। पर भीतर से वे बहुत अलग थे। नीचे की तुलना यह फ़र्क साफ़ करती है।
| आधार | बाकी उम्मीदवार | चुना गया उम्मीदवार |
|---|---|---|
| हुनर | होशियार और हुनरमंद | होशियार और हुनरमंद |
| फँसी गाड़ी देखकर | बिना रुके आगे निकल गए | रुककर मदद की |
| सबसे पहले क्या सोचा | अपनी परीक्षा और अपना फ़ायदा | किसी ज़रूरतमंद का दुख |
| दिल का गुण | जल्दी और स्वार्थ | दया, उदारता, सेवा-भाव |
| नतीजा | परीक्षा में पीछे रह गए | नया दीवान चुना गया |
इस तालिका से एक बात बिलकुल साफ़ है — हुनर में सब बराबर थे, पर फ़र्क दिल के गुण का था। और यही फ़र्क सब कुछ तय कर गया।
कहानी आखिर में जो संदेश देती है, वह नीचे चित्र 10.5 में एक नज़र में देखिए।
आम भूलें
ये वे गलतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक को ध्यान से पढ़िए — “ऐसा क्यों लगता है” वाला भाग जाल दिखाता है, और “असल बात” उसे सुधार देती है।
दीवान का बेटा सबसे आगे था, इसलिए नया दीवान उसका बेटा ही बना होगा।
असल ज़िंदगी में अक्सर बड़े लोग अपने बच्चों को आगे कर देते हैं, इसलिए स्वाभाविक रूप से लगता है कि यहाँ भी बेटा ही चुना गया होगा।
ऐसा नहीं हुआ। सरदार सुजान सिंह ने जान-बूझकर अपने बेटे को आगे नहीं किया, क्योंकि उन्हें बदनामी और पक्षपात का डर था। उन्होंने सबके लिए खुला विज्ञापन निकाला और दीवान उसी को चुना जिसका चरित्र सबसे अच्छा निकला।
जो उम्मीदवार पढ़ाई और खेल में सबसे आगे था, वही दीवान चुना गया।
हम बचपन से यही सुनते आए हैं कि होशियार और तेज़ आदमी ही जीतता है, इसलिए लगता है कि सबसे हुनरमंद उम्मीदवार ही जीता होगा।
कहानी इसी सोच को बदलती है। दीवान उसे चुना गया जिसने रास्ते में रुककर किसान की मदद की, न कि सबसे ज़्यादा होशियार को। असली परीक्षा हुनर की नहीं, बल्कि दया और सेवा-भाव की थी।
रास्ते में फँसी गाड़ी एक सच्ची घटना थी, उसका परीक्षा से कोई लेना-देना नहीं था।
गाड़ी का फँसना एक आम, रोज़मर्रा की बात लगती है, इसलिए लगता है कि यह बस एक संयोग था, परीक्षा का हिस्सा नहीं।
दरअसल यह फँसी गाड़ी ही असली, छिपी परीक्षा थी। दीवान देखना चाहते थे कि कौन उम्मीदवार किसी ज़रूरतमंद को देखकर रुकता है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि सोच-समझकर रखी गई कसौटी थी।
जाँचिए अपनी समझ
खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।
सरदार सुजान सिंह ने अपने बेटे को दीवान क्यों नहीं बनाया?
विज्ञापन में किस बात पर सबसे ज़्यादा ध्यान देने की बात कही गई थी?
रास्ते में फँसी गाड़ी देखकर बाकी उम्मीदवारों ने क्या किया?
नया दीवान किसे और क्यों चुना गया?
अभ्यास
पहले अपना उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए। उत्तर की लंबाई पर ध्यान दीजिए — सरल उत्तर में 2-3 वाक्य, बड़े उत्तर में पूरा अनुच्छेद।
सरल
सरदार सुजान सिंह कौन थे, और वे नया दीवान क्यों चुनना चाहते थे?
सरदार सुजान सिंह देवगढ़ राज्य के दीवान (राजा का सबसे बड़ा मंत्री) थे। वे अब बहुत बूढ़े हो चुके थे और आराम करना चाहते थे। इसलिए वे चाहते थे कि कोई योग्य आदमी उनकी जगह नया दीवान बने और राज-काज सँभाले।
विज्ञापन में कौन-सी खास शर्त लिखी थी?
विज्ञापन में यह खास शर्त लिखी थी कि नए दीवान में विद्या (पढ़ाई) तो कम देखी जाएगी, पर कर्तव्य और अच्छे चरित्र पर ज़्यादा ध्यान दिया जाएगा। इसी शर्त से पता चल जाता है कि असली परीक्षा हुनर की नहीं, बल्कि अच्छे दिल और चरित्र की होगी।
मध्यम
रास्ते में फँसी गाड़ी के पास क्या हुआ? बाकी उम्मीदवारों और चुने गए युवक के व्यवहार में क्या फ़र्क था?
लौटते समय रास्ते में एक तंग, कीचड़ भरी जगह पर एक बूढ़े किसान की भूसे से लदी गाड़ी फँस गई थी। उसके बैल कमज़ोर थे और गाड़ी आगे नहीं बढ़ पा रही थी। किसान अकेला बहुत परेशान था।
बाकी उम्मीदवार अपनी परीक्षा जीतने की जल्दी में थे। वे बिना रुके, किसान को छोड़कर आगे निकल गए।
पर एक युवक (पंडित जानकीनाथ) रुक गया। वह घोड़े से उतरा, ज़ोर लगाकर गाड़ी को धकेला और कमज़ोर बैलों का सहारा भी दिया। आखिर उसने गाड़ी कीचड़ से बाहर निकाल दी। यही फ़र्क था — बाकी सब निकल गए, पर वह रुककर मदद करने वाला अकेला निकला।
यह कहानी 'परीक्षा' हमें क्या सीख देती है? समझाइए।
यह कहानी हमें एक बहुत गहरी सीख देती है — सच्ची परीक्षा हुनर की नहीं, बल्कि अच्छे चरित्र और सेवा-भाव की होती है।
कहानी में बहुत-से होशियार उम्मीदवार थे। पर दीवान उसी को चुना गया जिसने रास्ते में रुककर एक बूढ़े किसान की मदद की। इससे पता चलता है कि कोई आदमी कितना भी होशियार क्यों न हो, अगर उसके दिल में दूसरों के लिए दया और मदद का भाव नहीं है, तो वह बड़ा काम नहीं कर सकता। इसलिए हमें भी अपने हुनर के साथ-साथ एक अच्छा, दयालु दिल बनाए रखना चाहिए।
चुनौती
सरदार सुजान सिंह ने एक 'छिपी परीक्षा' क्यों रखी? यह तरीका इतना अच्छा क्यों था? विस्तार से समझाइए।
सरदार सुजान सिंह एक समझदार और दूरदर्शी दीवान थे। वे जानते थे कि घुड़सवारी, खेल और पढ़ाई से सिर्फ़ किसी का हुनर परखा जा सकता है — उसका सच्चा दिल नहीं। इसलिए उन्होंने एक छिपी परीक्षा रखी।
यह तरीका इसलिए इतना अच्छा था क्योंकि किसी को बताया नहीं गया कि यह परीक्षा है। जब आदमी जानता है कि उसे परखा जा रहा है, तो वह दिखावे के लिए अच्छा बन सकता है। पर जब उसे पता ही नहीं कि कोई देख रहा है, तब वह वही करता है जो उसके दिल में सच में होता है।
रास्ते में फँसी गाड़ी एक आम-सी घटना लगती थी, परीक्षा नहीं। इसी वजह से हर उम्मीदवार ने अपना असली रूप दिखाया। जो दिखावे के अच्छे थे, वे बिना रुके निकल गए। और जिसका दिल सच में दयालु था, वही रुककर मदद करने को तैयार हुआ। इस तरह छिपी परीक्षा ने आसानी से सच्चे और दिखावटी आदमी में फ़र्क कर दिया। यही इस तरीके की सबसे बड़ी खूबी थी।
शब्दार्थ — नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ लिखिए और हर एक का एक छोटा वाक्य बनाइए: (क) दीवान (ख) उदारता (ग) कर्तव्य (घ) सेवा-भाव।
(क) दीवान — अर्थ: राजा का सबसे बड़ा मंत्री, जो पूरा राज-काज सँभालता है। वाक्य: सरदार सुजान सिंह देवगढ़ राज्य के दीवान थे।
(ख) उदारता — अर्थ: दिल का बड़ा होना; दूसरों को बिना सोचे देने और मदद करने का भाव। वाक्य: उसकी उदारता देखकर सब उसकी तारीफ़ करने लगे।
(ग) कर्तव्य — अर्थ: वह काम जो हमें करना ही चाहिए; अपना फ़र्ज़। वाक्य: मुसीबत में पड़े आदमी की मदद करना हमारा कर्तव्य है।
(घ) सेवा-भाव — अर्थ: दूसरों की मदद और सेवा करने की भावना। वाक्य: नर्स अपने सेवा-भाव के कारण हर मरीज़ का ख्याल रखती है।
सारांश
याद रखने योग्य सब कुछ, संक्षेप में:
- “परीक्षा” प्रेमचंद की लिखी एक कहानी है, जो सिखाती है कि सच्ची परीक्षा हुनर की नहीं, चरित्र और सेवा-भाव की होती है।
- देवगढ़ के बूढ़े दीवान सरदार सुजान सिंह को रिटायर होना था, इसलिए उन्हें एक योग्य नया दीवान चाहिए था (चित्र 10.1)।
- उन्होंने अपने बेटे को नहीं चुना, क्योंकि उन्हें बदनामी और पक्षपात का डर था; उन्होंने सबके लिए खुला विज्ञापन निकाला।
- विज्ञापन की शर्त थी — विद्या कम, पर कर्तव्य और चरित्र ज़्यादा देखा जाएगा।
- देश भर से आए उम्मीदवारों की महीनेभर खेल, पढ़ाई और चाल-चलन की परीक्षा हुई।
- असली, छिपी परीक्षा लौटते समय हुई — रास्ते में बूढ़े किसान की फँसी गाड़ी; बाकी सब बिना रुके निकल गए, पर एक युवक रुककर मदद करता है (चित्र 10.2)।
- हुनर बनाम चरित्र (चित्र 10.3): सब उम्मीदवार हुनर में बराबर थे, फ़र्क सिर्फ़ दिल के गुण का था (चित्र 10.4)।
- नया दीवान पंडित जानकीनाथ को चुना गया — वही मदद करने वाला युवक, क्योंकि उसके दिल में दया, उदारता और सेवा-भाव था।
- केंद्रीय संदेश (चित्र 10.5): सच्ची महानता दूसरों की मदद, उदारता, निःस्वार्थ कर्म और अच्छे चरित्र में है — अच्छा दिल हुनर से बड़ा है।
आगे क्या
अगले पाठ “चेटक की वीरता” में आप एक बहादुर घोड़े की कहानी पढ़ेंगे। चेटक महाराणा प्रताप का प्रिय घोड़ा था, जिसने युद्ध के मैदान में अपने स्वामी के लिए अद्भुत वीरता और स्वामिभक्ति दिखाई। जहाँ “परीक्षा” एक इंसान के सेवा-भाव और चरित्र की बात करती है, वहीं अगला पाठ एक घोड़े की वफ़ादारी और साहस को दिखाता है। ध्यान वही रखिए — केवल “क्या हुआ” नहीं, बल्कि कवि या लेखक जो भाव महसूस कराना चाहते हैं और उसका संदेश क्या है, यह समझना।
Frequently Asked Questions
परीक्षा कहानी का सारांश क्या है?
प्रेमचंद की इस कहानी में बूढ़े दीवान सरदार सुजान सिंह अपना उत्तराधिकारी चुनना चाहते हैं। एक महीने की परीक्षा के बाद असली जाँच होती है — रास्ते में एक किसान का बैलगाड़ी कीचड़ में फँसी है। बाकी सब आगे निकल जाते हैं, केवल पंडित जानकीनाथ रुककर मदद करते हैं और वही नए दीवान चुने जाते हैं।
परीक्षा कहानी के लेखक कौन हैं?
इस कहानी के लेखक मुंशी प्रेमचंद हैं, जो हिंदी के महान कथाकार थे। उन्होंने बहुत-सी प्रसिद्ध कहानियाँ और उपन्यास लिखे जो आम इंसान की ज़िंदगी और अच्छे मूल्यों पर आधारित हैं।
सरदार सुजान सिंह ने असली परीक्षा कैसे ली?
सरदार सुजान सिंह ने एक बूढ़े किसान को उनकी बैलगाड़ी कीचड़ में फँसवाकर असली परीक्षा ली। उन्होंने देखा कि कौन-सा उम्मीदवार मदद के लिए रुकता है और कौन व्यस्त बहाने बनाकर आगे निकल जाता है।
पंडित जानकीनाथ को दीवान क्यों चुना गया?
जानकीनाथ ने रास्ते में किसान की बैलगाड़ी कीचड़ में फँसी देखकर बिना सोचे मदद की — कपड़े खराब होने की परवाह नहीं की, बस काम में लग गए। इसी सेवा-भाव और सच्चे चरित्र की वजह से उन्हें दीवान चुना गया।
परीक्षा कहानी का मुख्य संदेश क्या है?
इस कहानी का संदेश है कि असली योग्यता केवल पढ़ाई-लिखाई या घुड़सवारी जैसे कामों में नहीं है। जो इंसान दूसरों की मदद करने में देरी नहीं करता और जिसमें सेवा-भाव है, वही असली योग्य व्यक्ति है।