नहीं होना बीमार
इस पाठ का महत्व
ज़रा सच-सच बताइए। क्या कभी आपका स्कूल जाने का मन नहीं किया? क्या कभी आपने सोचा कि “काश, आज छुट्टी मिल जाती”?
अगर हाँ, तो यह कहानी ठीक आपके लिए है।
इस कहानी का बच्चा भी ऐसा ही सोचता है। उसका होमवर्क पूरा नहीं हुआ। उसे स्कूल जाने में डर लगता है। तो वह एक चालाकी सोचता है — क्यों न बीमार पड़ने का बहाना बना लूँ? फिर न स्कूल जाना पड़ेगा, न सज़ा मिलेगी। ऊपर से आराम और मज़े मिलेंगे।
पर क्या सचमुच ऐसा होता है? यही इस कहानी का मज़ा है।
यह कहानी हँसते-हँसते हमें एक बड़ी बात सिखाती है। वह यह कि बहाने बनाने से काम नहीं बनता। और स्वस्थ रहना ही सबसे बड़ा सुख है। पढ़ने के बाद आप खुद हँसेंगे भी और सोचेंगे भी।
मूल भाव
इस कहानी का मूल भाव है — बहाना बनाने और झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं होता, उल्टा अपना ही नुकसान होता है। बच्चा स्कूल से बचने के लिए बीमारी का नाटक करता है। पर इस नाटक में उसे कड़वी दवा मिलती है, दिनभर भूखा रहना पड़ता है, और अकेलेपन से ऊब जाता है। अंत में उसे समझ आता है कि स्वस्थ और सच्चा रहना ही असली सुख है। मेहनत से भागने के लिए झूठ बोलना, अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने कहानी का सरल सारांश और व्याख्या अपने शब्दों में दी है। पूरी मूल कहानी अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक मल्हार (कक्षा 7) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। लेखक स्वयं प्रकाश के असली शब्दों का मज़ा वहीं मिलेगा।
कहानी का सारांश
आइए पूरी कहानी को सरल शब्दों में, क्रम से समझते हैं।
अस्पताल का दृश्य। एक दिन बच्चा अपनी नानीजी के साथ पड़ोसी सुधाकर काका को देखने अस्पताल जाता है। काका बीमार थे। बच्चे का यह पहला अस्पताल था। उसे वहाँ का माहौल बहुत अच्छा लगा — साफ़-सुथरे सफ़ेद बिस्तर, बड़ी खिड़कियाँ, बाहर झूमते हरे पेड़, और चारों ओर शांति। नानीजी काका के लिए साबूदाने की खीर बनाकर लाई थीं। उन्होंने प्यार से चम्मच से काका को खीर खिलाई।
यह सब देखकर बच्चे के मन में एक गलत विचार आया। उसने सोचा — “बीमारों के क्या ठाठ हैं! साफ़ बिस्तर पर आराम से लेटे रहो और साबूदाने की खीर खाओ। काश, मैं भी बीमार पड़ जाता!”
बहाने का दिन। कुछ दिन बाद एक सुबह बच्चे का स्कूल जाने का मन नहीं हुआ। उसने होमवर्क भी नहीं किया था। उसे डर था कि स्कूल जाएगा तो सज़ा मिलेगी। उसने सोचा — “आज बीमार पड़ने का सही दिन है। चलो बीमार पड़ जाते हैं।” जब नानीजी उठाने आईं, तो उसने कहा कि उसके सिर में दर्द है, पेट दुख रहा है और बुखार भी है।
दवा और भूख। नानाजी आए। उन्होंने माथा छुआ और नब्ज़ देखी। उन्हें बुखार नहीं लगा। बच्चे ने चाल चली — “थर्मामीटर लगाकर देखिए।” पर घर में थर्मामीटर मिला ही नहीं। फिर नानाजी ने उसे कड़वी पुड़िया (दवा) खिलाई और काढ़े जैसी चाय पिलाई। और कह दिया — “आज इसे कुछ खाने को मत देना। तबियत ढीली हो तो भूखे रहना ही सबसे अच्छा इलाज है। इससे सारे विकार निकल जाएँगे।”
अकेलापन और ऊब। अब सब लोग अपने-अपने काम पर चले गए। बच्चा घर में अकेला रह गया। वह रजाई में पड़ा-पड़ा घर और गली की हलचल का अनुमान लगाता रहा। उसे बाहर जाकर खेलने और गली देखने का बहुत मन था, पर मजबूरी थी — लेटे ही रहना था। धीरे-धीरे उसे ज़ोर की भूख लगी। उसे खाने की चीज़ें — कचौड़ी, बर्फ़ी, गोलगप्पे, और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर — याद आने लगीं।
मुन्नू का आम। दोपहर में मुन्नू (उसका छोटा भाई) स्कूल से लौटा। सब लोग खाना खाने बैठे — दाल-चावल, तली हरी मिर्च। पर किसी ने एक बार भी बच्चे से नहीं पूछा कि वह क्या खाएगा। खुशबू से मजबूर होकर बच्चा चुपके से दरवाज़े तक गया और झाँककर देखा। मुन्नू मज़े से आम चूस रहा था! आम देखकर बच्चा जलन, गुस्से और कुढ़न से भर गया। पर वह कुछ नहीं कर सका, क्योंकि वह तो “बीमार” था।
सीख। उस पूरे दिन बच्चे को भूखे पेट ही रहना पड़ा। “सारे विकार निकल गए” — यानी कुछ हाथ नहीं आया, बस भूख और अकेलापन मिला। इसके बाद उसने एक पक्का फैसला किया — स्कूल से छुट्टी पाने के लिए उसने फिर कभी बीमारी का बहाना नहीं बनाया।
नीचे का चित्र पूरी कहानी को एक नज़र में, क्रम से दिखाता है।
पात्र
कहानी में कुछ ही पात्र हैं, पर हर पात्र की अपनी भूमिका है। आइए उन्हें जान लें।
नीचे का पात्र-मानचित्र सब पात्रों को एक साथ दिखाता है।
- बच्चा (कथावाचक) — कहानी का मुख्य पात्र। वही यह पूरी कहानी सुना रहा है। वह चालाक तो है, पर उसकी चालाकी उसी पर उल्टी पड़ती है। अंत में वह समझदार बन जाता है।
- नानीजी — बच्चे की देखभाल करने वाली। वे काका के लिए खीर बनाती हैं और बच्चे की भी फ़िक्र करती हैं।
- नानाजी — घर के बड़े-बूढ़े। वे दवा देते हैं और भूखे रहने की पुरानी सलाह देते हैं। उनकी “दवा” ही बच्चे के बहाने की पोल खोल देती है।
- सुधाकर काका — पड़ोसी, जो सचमुच बीमार थे। उन्हें देखकर ही बच्चे के मन में गलत विचार आया।
- मुन्नू — बच्चे का छोटा भाई। उसका मज़े से आम चूसना बच्चे की जलन का कारण बनता है।
आइए गहराई से समझें
अब कहानी के पीछे छिपी बातों को थोड़ा गहराई से देखते हैं। हम समझेंगे कि पात्र ऐसा क्यों करते हैं, और कहानी हमें असल में क्या सिखाना चाहती है।
बच्चे ने बहाना क्यों बनाया?
सबसे पहला सवाल — बच्चा झूठ क्यों बोला?
इसके पीछे दो कारण थे। पहला, उसने होमवर्क नहीं किया था, और स्कूल जाने पर सज़ा का डर था। दूसरा, अस्पताल में काका के “ठाठ” देखकर उसे लगा कि बीमार होना मज़ेदार है। इन दोनों ने मिलकर उसे झूठ बोलने के लिए उकसाया।
पर यहाँ बच्चे से एक बड़ी गलती हुई। उसने सिर्फ़ बीमारी का ऊपरी मज़ा देखा — आराम और खीर। उसने यह नहीं देखा कि बीमारी का मतलब है दर्द, कमज़ोरी, कड़वी दवा और परहेज़। काका के लिए वह आराम ज़रूरी था, क्योंकि वे सचमुच बीमार थे। पर एक स्वस्थ बच्चे के लिए वही “आराम” एक सज़ा बन जाता है।
बच्चा सचमुच बीमार क्यों नहीं था — पर “बीमारी” कैसे मिली?
यहाँ एक मज़ेदार बात है। बच्चा बीमार था ही नहीं। फिर भी उसे बीमारी जैसी तकलीफ़ें मिल गईं — कड़वी दवा, भूख, अकेलापन। क्यों?
इसका जवाब साफ़ है। उसने खुद को बीमार साबित करने की कोशिश की। और जैसे ही घरवालों ने उसे बीमार मान लिया, वैसे ही उन्होंने वही किया जो बीमार के साथ किया जाता है — दवा, परहेज़, आराम। यानी बच्चे ने अपने झूठ से ही अपने लिए एक जाल बना लिया। उसी जाल में वह खुद फँस गया।
यह कहानी का सबसे ज़रूरी “क्यों” है — झूठ हमें वही नहीं देता जो हम चाहते हैं, बल्कि वह देता है जो झूठ के साथ अपने आप जुड़ा होता है। बच्चा खीर और आराम चाहता था, पर झूठ ने उसे दवा और भूख दे दी।
हम बीमार क्यों पड़ते हैं, और स्वस्थ कैसे रहें?
कहानी का बच्चा बीमारी को मज़ा समझता है। पर असल में बीमारी कोई मज़ा नहीं, तकलीफ़ है। तो बीमारी होती क्यों है, और हम स्वस्थ कैसे रहें?
तो स्वस्थ रहने का मतलब है — शरीर को वह सब देना जो उसे चाहिए, और गंदगी-कीटाणुओं से बचना। नीचे का भाव-जाल स्वस्थ रहने के मुख्य उपाय दिखाता है।
चित्र 5.3 से एक बात साफ़ है। स्वस्थ रहना हमारे अपने हाथ में है। बच्चे को आराम का जो मज़ा दिखा, वह असल में बीमारी की मजबूरी थी। असली मज़ा तो स्वस्थ रहकर खेलने, घूमने और खाने में है — जो बच्चे ने अपने ही झूठ से खो दिया।
कहानी का संदेश — मेहनत से भागो मत
अब पूरी कहानी का असली संदेश समझ लें।
बच्चा एक छोटी मुश्किल (बिना होमवर्क के स्कूल जाना) से बचना चाहता था। उसने इसका हल झूठ में ढूँढा। पर झूठ ने उसकी मुश्किल बढ़ा दी — पूरा दिन बेकार गया, भूख लगी, अकेलापन मिला, और होमवर्क भी जहाँ का तहाँ रह गया।
अगर वह स्कूल चला जाता, तो ज़्यादा से ज़्यादा थोड़ी सज़ा मिलती। पर वह दोस्तों के साथ रहता, रिसेस में अमरूद खाता, और दिन अच्छा बीतता। यानी सच का रास्ता आसान था, और झूठ का रास्ता मुश्किल निकला।
एक छोटी जाँच करते हैं, ताकि यह बात पक्की हो जाए।
बच्चे ने अंत में यह फैसला क्यों किया कि वह फिर कभी बीमारी का बहाना नहीं बनाएगा?
क्योंकि बहाना बनाने से उसे कोई फायदा नहीं हुआ — उल्टा नुकसान हुआ। उसे कड़वी दवा खानी पड़ी, दिनभर भूखा और अकेला रहना पड़ा, और होमवर्क भी नहीं हुआ। उसे समझ आ गया कि स्कूल चला जाता तो कहीं अच्छा रहता। इसलिए उसने झूठ का बहाना छोड़ने का फैसला किया।
आम भूलें
कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें बच्चे अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।
कहानी का बच्चा सचमुच बीमार था, इसलिए उसे आराम करना पड़ा।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि बच्चा बार-बार सिरदर्द, पेटदर्द और बुखार की बात करता है, और घरवाले उसे दवा भी देते हैं।
बच्चा बिल्कुल बीमार नहीं था। यह सब झूठा बहाना था, ताकि स्कूल न जाना पड़े। दवा और आराम उसे इसलिए मिले क्योंकि घरवालों ने उसका झूठ सच मान लिया।
कहानी बता रही है कि बीमार पड़ने में सचमुच मज़े होते हैं।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि शुरू में बच्चा खुद सोचता है — 'बीमारों के क्या ठाठ हैं', आराम और खीर देखकर।
यह सिर्फ़ बच्चे की गलत सोच है, कहानी का संदेश नहीं। कहानी आगे दिखाती है कि बीमारी का नाटक करने में सिर्फ़ तकलीफ़ मिली — कड़वी दवा, भूख और अकेलापन। असली सुख स्वस्थ रहने में है।
नानाजी ने बच्चे को भूखा रखकर उसके साथ बुरा किया।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि पूरा दिन भूखे रहना बहुत कठोर लगता है, और हमें बच्चे पर दया आती है।
नानाजी को तो लगा कि बच्चा सचमुच बीमार है, और बीमारी में हल्का खाना या परहेज़ करना उस ज़माने की आम सलाह थी। वे अपनी समझ से बच्चे का भला ही कर रहे थे — गलती बच्चे के झूठ की थी।
जाँचिए अपनी समझ
अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।
बच्चे ने बीमारी का बहाना मुख्य रूप से क्यों बनाया?
बच्चे का होमवर्क पूरा नहीं था। स्कूल जाने पर सज़ा मिलने का डर था। इसीलिए उसने स्कूल से बचने के लिए बीमार पड़ने का झूठा बहाना बनाया।
अस्पताल में काका को देखकर बच्चे के मन में क्या विचार आया?
साफ़ बिस्तर पर आराम और साबूदाने की खीर देखकर बच्चे ने सोचा — “बीमारों के क्या ठाठ हैं!” यही गलत विचार आगे उसके बहाने की जड़ बना।
बीमारी के बहाने में बच्चे को असल में क्या-क्या मिला?
बच्चा खीर और आराम की उम्मीद कर रहा था, पर झूठ ने उसे उल्टा दे दिया — कड़वी पुड़िया, काढ़े जैसी चाय, दिनभर की भूख और अकेलापन।
कहानी का मुख्य संदेश क्या है?
कहानी हँसते-हँसते यह सिखाती है कि मेहनत से भागने के लिए झूठ बोलना अपना ही नुकसान करता है। सच बोलना और स्वस्थ रहना ही सही रास्ता है।
अभ्यास (श्रेणीबद्ध)
अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।
सरल
शब्दार्थ लिखिए: (क) वार्ड (ख) नर्स (ग) काढ़ा (घ) थर्मामीटर।
- वार्ड — अस्पताल में किसी खास काम के लिए घेरकर बनाया हुआ बड़ा कमरा, जहाँ कई बिस्तर लाइन से लगे होते हैं।
- नर्स — वह व्यक्ति जो अस्पताल में रोगियों, घायलों या बुज़ुर्गों की देखभाल करता है।
- काढ़ा — कई जड़ी-बूटियों को पानी में उबालकर बनाया गया रस जैसा पेय, जो सर्दी-खाँसी और बुखार में लाभदायक माना जाता है।
- थर्मामीटर — शरीर का तापमान (बुखार) नापने का छोटा यंत्र।
अस्पताल में बच्चे को कौन-कौन सी चीज़ें अच्छी लगीं? कोई तीन लिखिए।
अस्पताल में बच्चे को ये चीज़ें अच्छी लगीं:
- साफ़-सुथरे सफ़ेद बिस्तर — लाइन से लगे एक जैसे पलंग, सफ़ेद चादर और लाल कंबल।
- बड़ी खिड़कियाँ और हरे पेड़ — खिड़कियों के पास झूमते हरे-हरे पेड़।
- शांति — न ट्रैफ़िक का शोर, न धूल, न मच्छर-मक्खी; बस धीमी-धीमी बातचीत की गुनगुन।
मध्यम
बच्चे ने सोचा था कि बीमार पड़ने में मज़े हैं, पर असल में उसके साथ क्या हुआ? अपने शब्दों में समझाइए।
बच्चे की सोच और असलियत में बहुत फ़र्क निकला।
उसने सोचा था कि बीमार पड़ते ही उसे आराम और साबूदाने की खीर मिलेगी — ठीक वैसे ही जैसे काका को मिली थी।
पर असल में उल्टा हुआ:
- उसे कड़वी पुड़िया (दवा) और काढ़े जैसी चाय पीनी पड़ी।
- पूरे दिन कुछ खाने को नहीं मिला — वह भूखा रहा।
- घर में अकेला रह गया और ऊब गया।
- खाने की खुशबू और मुन्नू का आम देखकर वह जलन और कुढ़न से भर गया।
यानी जो मज़ा उसने सोचा था, उसकी जगह सिर्फ़ तकलीफ़ मिली। क्योंकि बीमारी का “ठाठ” तो सचमुच के बीमार के लिए मजबूरी होती है, मज़ा नहीं।
नानाजी-नानीजी ने बच्चे को बीमार मानकर दवा दी और खाना नहीं दिया। उनके इस व्यवहार के पीछे क्या कारण था? क्या उनकी गलती थी?
नानाजी-नानीजी की कोई गलती नहीं थी।
बच्चे ने खुद को बीमार बताया था — सिरदर्द, पेटदर्द और बुखार की शिकायत की थी। घरवालों ने उसकी बात पर भरोसा किया और उसे सचमुच बीमार समझा।
उस समझ के हिसाब से उन्होंने वही किया जो ठीक लगा — दवा दी, आराम करने को कहा, और परहेज़ के लिए हल्का/कम खाना दिया। पुराने ज़माने में बीमारी में थोड़ा भूखा रहना आम सलाह थी, ताकि “विकार निकल जाएँ”।
तो असली गलती बच्चे के झूठ की थी। घरवाले तो अपनी समझ से उसका भला ही कर रहे थे। यही कहानी की मज़ेदार बात है — बच्चे का अपना झूठ ही उस पर उल्टा पड़ गया।
चुनौती
कहानी का शीर्षक 'नहीं होना बीमार' है। क्या यह शीर्षक सही है? और इस कहानी से हम अपने जीवन में क्या सीख ले सकते हैं?
शीर्षक सही क्यों है: “नहीं होना बीमार” शीर्षक बिल्कुल सही है। पूरी कहानी इसी एक सीख पर टिकी है — बीमार पड़ने का नाटक मत करो। बच्चे ने जान-बूझकर बीमार बनने की कोशिश की, और उसी से उसका दिन ख़राब हुआ। अंत में उसने खुद तय किया कि अब कभी बीमारी का बहाना नहीं बनाएगा। यानी शीर्षक कहानी का पूरा संदेश एक ही पंक्ति में कह देता है।
जीवन की सीख:
- बहाने मत बनाओ। किसी काम से बचने के लिए झूठ बोलना समस्या हल नहीं करता, बल्कि बढ़ा देता है।
- अपना काम समय पर करो। अगर बच्चा होमवर्क कर लेता, तो उसे बहाने की ज़रूरत ही न पड़ती।
- सच बोलो। झूठ के पकड़े जाने का डर हमेशा बना रहता है, और झूठ अक्सर हम पर ही उल्टा पड़ता है।
- सेहत की कद्र करो। स्वस्थ रहकर खेलना, पढ़ना और दोस्तों के साथ रहना ही असली सुख है। बीमारी कोई मज़ा नहीं।
इस तरह यह छोटी-सी मज़ेदार कहानी हमें हँसते-हँसते एक बड़ी सीख दे जाती है — सच और मेहनत का रास्ता ही सबसे आसान रास्ता है।
सारांश
- कहानी के लेखक स्वयं प्रकाश हैं। यह एक मज़ेदार और सीख देने वाली कहानी है।
- बच्चा अस्पताल में बीमार सुधाकर काका का आराम और साबूदाने की खीर देखकर सोचता है कि “बीमारों के क्या ठाठ हैं!”
- होमवर्क न करने पर, स्कूल से बचने के लिए वह बीमार पड़ने का झूठा बहाना बनाता है।
- उसके झूठ के बदले उसे कड़वी दवा, काढ़े जैसी चाय, दिनभर की भूख और अकेलापन मिलता है।
- मुन्नू का मज़े से आम चूसना देखकर वह जलन और कुढ़न से भर जाता है, पर कुछ कर नहीं पाता।
- अंत में बच्चा सीख लेता है और तय करता है कि फिर कभी बीमारी का बहाना नहीं बनाएगा।
- कहानी का संदेश — बहाने और झूठ से फायदा नहीं होता, उल्टा नुकसान होता है। अपना काम समय पर करना और सच बोलना ही सही रास्ता है।
- स्वस्थ रहना ही सबसे बड़ा सुख है — सही खाना, नींद, सफ़ाई, खेल-कूद और खुश मन से हम बीमार पड़ने से बचते हैं।
आगे क्या?
बहाने और झूठ की मज़ेदार सीख के बाद, अगला पाठ हमें पुराने कवियों की समझदारी से मिलाएगा। अगला पाठ है पाठ 6 — “गिरिधर कविराय की कुंडलियाँ”। ये छोटी-छोटी कविताएँ (कुंडलियाँ) हमें जीवन की सीधी-सच्ची सीखें देती हैं — कैसे बोलें, किस पर भरोसा करें, और मुश्किल में कैसे रहें। जैसे इस कहानी ने हमें सच और मेहनत का महत्व सिखाया, वैसे ही कुंडलियाँ हमें समझदारी से जीने के छोटे-छोटे नुस्खे देंगी।
Frequently Asked Questions
नहीं होना बीमार कहानी का सारांश क्या है?
एक बच्चा अस्पताल में बीमार सुधाकर काका को देखता है। उसे लगता है कि बीमार होने में बड़े मज़े हैं — आराम और साबूदाने की खीर। एक दिन होमवर्क न करने पर वह स्कूल से बचने के लिए बीमारी का झूठा बहाना बनाता है। पर उसे कड़वी दवा मिलती है, दिनभर भूखा और अकेला रहना पड़ता है। अंत में वह सीख लेता है कि बहाना बनाना ठीक नहीं।
नहीं होना बीमार कहानी का संदेश क्या है?
कहानी का संदेश है कि झूठ और बहाना बनाने से कोई फायदा नहीं होता, उल्टा नुकसान होता है। स्वस्थ रहना ही असली सुख है। मेहनत से भागने के लिए बीमारी का नाटक करना अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।
बच्चे ने बीमारी का बहाना क्यों बनाया?
उसने अपना होमवर्क नहीं किया था। स्कूल जाने पर सज़ा मिलने का डर था। इसलिए स्कूल से बचने के लिए उसने बीमार पड़ने का झूठा बहाना बनाया।
कहानी के अंत में बच्चे ने क्या फैसला किया?
बच्चे ने फैसला किया कि वह फिर कभी स्कूल से छुट्टी पाने के लिए बीमारी का बहाना नहीं बनाएगा, क्योंकि इस बहाने में उसे दिनभर अकेले और भूखे रहना पड़ा था।
नहीं होना बीमार कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?
हमें सीख मिलती है कि बहाने बनाने और झूठ बोलने से समस्या हल नहीं होती। अपना काम समय पर करना और सच बोलना ही सही रास्ता है। साथ ही, स्वस्थ रहना सबसे बड़ा सुख है।