गिरिधर कविराय की कुंडलिया
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए। क्या आपने कभी जल्दबाज़ी में कोई काम किया और बाद में पछताए?
शायद आपने बिना अच्छी तरह पढ़े परीक्षा का उत्तर लिख दिया। या गुस्से में किसी दोस्त को कुछ कह दिया। या बिना सोचे किसी अनजान मैसेज पर भरोसा कर लिया। ऐसा हम सबके साथ होता है।
लगभग तीन सौ साल पहले एक कवि ने इसी बात को बहुत सरल शब्दों में कहा था। उनका नाम था गिरिधर कविराय। वे अठारहवीं सदी में हुए थे। उनकी छोटी-छोटी कविताएँ इतनी काम की थीं कि लोग आज भी उन्हें कहावत की तरह बोलते हैं।
इस पाठ में उनकी दो प्रसिद्ध कुंडलियाँ हैं। “कुंडलिया” एक तरह का छंद है — हम आगे समझेंगे कि यह कैसा होता है। ये कुंडलियाँ हमें जीवन जीने के दो ज़रूरी सबक देती हैं। पढ़ने के बाद आप काम करने से पहले रुककर सोचेंगे, और बीती बातों का बोझ कम ढोएँगे।
मूल भाव
इस पाठ में दो नीति-कुंडलियाँ हैं। पहली कुंडलिया कहती है — कोई भी काम बिना सोचे-समझे मत करो, वरना बाद में पछताना पड़ता है। दूसरी कुंडलिया कहती है — बीती बातों को भूल जाओ और आगे (भविष्य) की सुध लो। दोनों का साझा मक़सद एक ही है — हमारा मन शांत और सुखी रहे। गिरिधर कविराय ये बातें इतने सीधे और सरल शब्दों में कहते हैं कि वे सीधे दिल तक पहुँचती हैं।
पाठ पढ़ने से पहले एक ज़रूरी बात ध्यान दें कि मूल कुंडलियाँ कहाँ पढ़नी हैं।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने दोनों कुंडलियों का सरल अर्थ और व्याख्या अपने शब्दों में दी है। पूरी मूल कुंडलियाँ अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 7) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। यहाँ हमने केवल वही प्रसिद्ध पंक्तियाँ ज्यों-की-त्यों दी हैं जो कहावत बन चुकी हैं — जैसे “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय” और “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ”।
पहली कुंडलिया का भावार्थ
पहली कुंडलिया की सबसे मशहूर पंक्ति है — “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय।” आइए इसका भाव धीरे-धीरे समझते हैं।
कवि कहते हैं — जो व्यक्ति बिना सोचे-समझे कोई काम करता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। “बिना बिचारे” यानी बिना विचार किए, बिना सोचे। “पछताय” यानी पछतावा होना।
ऐसा क्यों होता है? कवि आगे कारण बताते हैं। बिना सोचे काम करने से तीन नुकसान होते हैं:
- पहला, अपना काम बिगड़ जाता है (“काम बिगारे आपनो”)। जल्दबाज़ी में किया काम अक्सर ठीक नहीं होता।
- दूसरा, इससे दुनिया में हँसी होती है (“जग में होत हँसाय”)। लोग उस गलती पर हँसते हैं।
- तीसरा, इससे मन को चैन नहीं मिलता (“चित्त में चैन न पावै”)। “चित्त” यानी मन।
कवि कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को फिर कुछ भी अच्छा नहीं लगता — न अच्छा खाना-पीना, न सम्मान, न राग-रंग (मनोरंजन)। मन हर समय बेचैन रहता है। बिना सोचे किया हुआ काम मन में खटकता रहता है, यानी काँटे की तरह चुभता रहता है। यह दुख टालने से भी नहीं टलता।
संक्षेप में, पहली कुंडलिया का भाव है — पहले सोचो, फिर करो। जल्दबाज़ी का अंत पछतावे में होता है।
दूसरी कुंडलिया का भावार्थ
दूसरी कुंडलिया की मशहूर पंक्ति है — “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।” इसका भाव पहली से अलग है, पर उतना ही ज़रूरी है।
कवि कहते हैं — जो बात बीत चुकी है, उसे भूल जाओ (“बीती ताहि बिसारि दे”)। “बीती” यानी जो बीत गया, अतीत की बात। “बिसारि दे” यानी भुला दो। इसके बजाय आगे की सुध लो (“आगे की सुधि लेइ”)। “आगे” यानी भविष्य, और “सुधि” यानी ध्यान, सुध। मतलब — भविष्य पर ध्यान दो।
कवि एक और सलाह देते हैं — जो चीज़ सहज रूप से, अपने आप मिल जाए, उसी में मन लगाओ (“जो बनि आवै सहज में ताही में चित देइ”)। “सहज” यानी जो आसानी से, बिना ज़बरदस्ती मिल जाए। यानी जो हमारे पास है उसी में संतोष रखो, असंभव चीज़ों के पीछे मत भागो।
इसका फल क्या होगा? कवि बताते हैं — ऐसा करने से कोई दुर्जन हँस नहीं पाएगा (“दुर्जन हँसै न कोइ”)। “दुर्जन” यानी बुरा व्यक्ति। और मन में कोई दोष या अपराधबोध नहीं रहेगा (“चित्त में खता न पावै”)। कवि कहते हैं कि मन को यही विश्वास कराओ कि बीती सो बीती — जो बीत गया सो बीत गया। तभी आगे सुख मिलेगा।
संक्षेप में, दूसरी कुंडलिया का भाव है — बीते का बोझ मत ढोओ, आगे देखो, और जो है उसी में संतोष रखो।
दोनों कुंडलियों के संदेश को एक साथ देखने पर बात और साफ़ हो जाती है। नीचे का भाव-जाल दोनों को आमने-सामने रखता है।
चित्र 6.1 से दिख जाता है कि दोनों कुंडलियों की राह भले अलग हो, मंज़िल एक ही है — एक शांत और सुखी मन।
आइए गहराई से समझें
अब इन कुंडलियों के पीछे की दो बड़ी बातें समझते हैं — पहली, यह “कुंडलिया” छंद आख़िर है क्या; और दूसरी, इनका संदेश इतना सच क्यों है।
कुंडलिया छंद की खास बात
सबसे पहले एक छोटा शब्द समझ लें, जो आगे काम आएगा।
“कुंडलिया” शब्द “कुंडली” से बना है। कुंडली का मतलब है कड़ी या घेरा — जैसे चूड़ी या साँप का घेरा। इस छंद का नाम कुंडलिया इसलिए पड़ा, क्योंकि इसमें शब्द एक कड़ी की तरह आपस में जुड़ जाते हैं। इसकी दो खास बातें हैं। नीचे का चित्र इन्हें दिखाता है।
चित्र 6.2 दो खास बातें दिखाता है:
- शब्द-दोहराव: एक पंक्ति का अंतिम शब्द (या उसका आखिरी हिस्सा) अगली पंक्ति के शुरू में फिर आता है। जैसे ”…पाछे पछताय” के बाद अगली पंक्ति “पछताय…” से शुरू होती है। इसी तरह ”…होत हँसाय” के बाद “जग में होत हँसाय…” आता है।
- शुरू और अंत एक: कुंडलिया जिस शब्द से शुरू होती है, उसी शब्द पर खत्म होती है। पहली कुंडलिया “बिना” से शुरू होकर “बिना” पर ही खत्म होती है।
इसके अलावा कुंडलिया में एक और सुंदरता है — सब पंक्तियों को बोलने में बराबर समय लगता है, इसलिए उसमें एक प्यारी लय बन जाती है। और कुंडलिया ऐसे लगती है मानो कोई हमसे बातचीत कर रहा हो — सीधे और अपनेपन से।
'कुंडलिया' को कुंडलिया क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इसमें शब्द एक कड़ी (कुंडली) की तरह आपस में जुड़ जाते हैं। एक पंक्ति का अंतिम शब्द अगली पंक्ति के आरंभ में फिर आता है, और जिस शब्द से कुंडलिया शुरू होती है उसी पर वह खत्म होती है। इसी घेरे जैसी जुड़ाई के कारण इसका नाम “कुंडलिया” पड़ा।
संदेश के पीछे का “क्यों”
अब सबसे ज़रूरी सवाल। पहली कुंडलिया कहती है कि बिना सोचे काम करने से पछतावा होता है। पर क्यों? सिर्फ़ इतना कहना कि “ऐसा होता है” काफ़ी नहीं। आइए कारण समझते हैं।
जब हम सोच-विचार करते हैं, तो हम आगे के परिणाम देख पाते हैं। हम सोचते हैं — “अगर मैं यह करूँगा, तो क्या होगा?” इससे हम गलती होने से पहले ही उसे रोक लेते हैं। पर जब हम बिना सोचे करते हैं, तो हमें परिणाम का पता ही नहीं होता। काम बिगड़ने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। और एक बार काम बिगड़ जाए, तो उसे ठीक करना मुश्किल होता है। इसलिए पछतावा होता है।
यह पछतावा एक के बाद एक कई रूप लेता है। नीचे की कारण-शृंखला यही दिखाती है।
चित्र 6.3 दिखाता है कि एक छोटी-सी जल्दबाज़ी कैसे एक पूरी शृंखला में बदल जाती है। इसीलिए कवि कहते हैं — पहले विचार करो।
अब दूसरी कुंडलिया का “क्यों”। वह कहती है — बीती बातें भूल जाओ। पर ऐसा क्यों करना चाहिए? बीती बात को याद रखने में हर्ज़ क्या है?
बात यह है कि जो बीत गया, वह अब बदला नहीं जा सकता। अगर हम पुरानी गलती या पुराने दुख को बार-बार याद करते रहें, तो वह हमारे आज को भी खराब कर देता है। मन उसी में उलझा रहता है। नया काम करने की शक्ति नहीं बचती। इसलिए कवि कहते हैं — बीती सो बीती। उसे छोड़ो, आगे देखो। ध्यान रहे, इसका मतलब गलती से सीखना मना नहीं है — मतलब बस इतना है कि बीते दुख का बोझ ढोते मत रहो।
कवि बीती बातों को भूलने की सलाह क्यों देते हैं?
क्योंकि जो बीत गया उसे अब बदला नहीं जा सकता। उसे बार-बार याद करने से सिर्फ़ दुख होता है और आज का काम भी बिगड़ता है। बीते का बोझ छोड़कर आगे (भविष्य) पर ध्यान देने से ही मन शांत रहता है और आगे सुख मिलता है।
आम भूलें
कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें विद्यार्थी अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।
'बीती ताहि बिसारि दे' का मतलब है कि हमें अपनी गलतियों से कभी कुछ नहीं सीखना चाहिए।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कुंडलिया साफ़-साफ़ कहती है 'बीती बातें भूल जाओ', तो लगता है मानो अतीत को पूरी तरह मिटा देने की बात हो रही है।
कवि का मतलब है कि बीते दुख और पछतावे का बोझ मन पर मत ढोओ। गलती से सीखना अलग बात है। हम सीख याद रखें, पर दुख और चिंता छोड़ दें, ताकि मन आगे बढ़ सके।
'जो बनि आवै सहज में' का मतलब है कि हमें कभी मेहनत ही नहीं करनी चाहिए, जो मिले उसी से खुश रहो।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि 'सहज में मिलना' सुनकर लगता है मानो बिना कोशिश बैठे रहने की बात हो रही हो।
कवि कहते हैं कि असंभव और ज़बरदस्ती वाली चीज़ों के पीछे भागकर मन मत दुखाओ। जो उचित प्रयास से मिल सके उसमें संतोष रखो — यह आलस नहीं, बल्कि मन की शांति की बात है।
कुंडलिया और दोहा एक ही चीज़ हैं, दोनों में कोई फ़र्क नहीं।
ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि दोनों ही छोटी, नीति की बात कहने वाली कविताएँ हैं और एक जैसी सरल भाषा में होती हैं।
दोहा दो पंक्तियों का छंद है, जबकि कुंडलिया बड़ी होती है और उसकी खास पहचान शब्द-दोहराव है — एक पंक्ति का अंतिम शब्द अगली के आरंभ में आता है, और शुरू का शब्द अंत में फिर आता है।
जाँचिए अपनी समझ
अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।
'बिना बिचारे' काम करने का मुख्य परिणाम क्या होता है, जैसा कुंडलिया में बताया गया है?
कुंडलिया कहती है “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय” और “काम बिगारे आपनो”। यानी बिना सोचे काम करने से काम बिगड़ता है और पछतावा होता है।
'चित्त में चैन न पावै' का क्या अर्थ है?
“चित्त” का अर्थ है मन और “चैन” का अर्थ है शांति। इसका मतलब है कि बिना सोचे किए काम के बाद मन को शांति नहीं मिलती।
'बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ' पंक्ति कौन-सी सलाह देती है?
“बीती ताहि बिसारि दे” यानी बीती बातें भुला दो, और “आगे की सुधि लेइ” यानी आगे यानी भविष्य की सुध लो। यानी अतीत छोड़कर भविष्य पर ध्यान दो।
कुंडलिया छंद की सबसे खास पहचान क्या है?
कुंडलिया में शब्द कड़ी की तरह जुड़ते हैं — पंक्ति का अंतिम शब्द अगली पंक्ति के शुरू में आता है, और जिस शब्द से कुंडलिया शुरू होती है उसी पर खत्म होती है।
अभ्यास (श्रेणीबद्ध)
अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।
सरल
शब्दार्थ लिखिए: (क) बिचारे (ख) पछताय (ग) चित्त (घ) सुधि।
- बिचारे — विचार किया, सोचा। “बिना बिचारे” यानी बिना सोचे।
- पछताय — पछतावा होना, बाद में दुखी होना।
- चित्त — मन।
- सुधि — सुध, ध्यान, याद। “आगे की सुधि” यानी भविष्य का ध्यान।
पहली कुंडलिया में बिना विचार किए काम करने के कौन-कौन से नुकसान बताए गए हैं? कोई तीन लिखिए।
पहली कुंडलिया में तीन मुख्य नुकसान बताए गए हैं:
- अपना काम बिगड़ जाता है।
- जग (दुनिया) में हँसी होती है — लोग गलती पर हँसते हैं।
- मन को चैन नहीं मिलता — बात मन में खटकती रहती है, और खान-पान, सम्मान, राग-रंग कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
मध्यम
दूसरी कुंडलिया का मुख्य संदेश अपने शब्दों में समझाइए।
दूसरी कुंडलिया का संदेश है — बीती बातों का बोझ मत ढोओ, आगे देखो।
कवि कहते हैं कि जो बात बीत चुकी है उसे भूल जाओ, क्योंकि अब उसे बदला नहीं जा सकता। उसके बजाय भविष्य की सुध लो, यानी आगे पर ध्यान दो। साथ ही जो चीज़ सहज रूप से, उचित प्रयास से मिल जाए, उसी में मन लगाओ और संतोष रखो।
ऐसा करने से कोई दुर्जन (बुरा व्यक्ति) तुम पर हँस नहीं पाएगा, मन में कोई दोष या अपराधबोध नहीं रहेगा, और आगे जीवन में सुख मिलेगा।
'कुंडलिया' छंद की दो खास विशेषताएँ बताइए और हर एक को पाठ से उदाहरण देकर समझाइए।
कुंडलिया की दो खास विशेषताएँ ये हैं:
-
शब्द-दोहराव: एक पंक्ति का अंतिम शब्द अगली पंक्ति के आरंभ में फिर आता है। उदाहरण — पहली कुंडलिया में ”…जग में होत हँसाय” के बाद अगली पंक्ति “जग में होत हँसाय…” से शुरू होती है।
-
शुरू और अंत का एक होना: कुंडलिया जिस शब्द से शुरू होती है, उसी शब्द पर खत्म होती है। उदाहरण — पहली कुंडलिया “बिना” से शुरू होकर “बिना” पर ही खत्म होती है।
इसी कड़ी जैसी जुड़ाई के कारण इसका नाम “कुंडलिया” पड़ा।
चुनौती
इन कुंडलियों की बातें सैकड़ों साल पहले कही गई थीं। क्या ये आज भी आपके जीवन में उपयोगी हैं? एक-एक उदाहरण देकर समझाइए।
हाँ, ये बातें आज भी उतनी ही उपयोगी हैं।
पहली कुंडलिया (बिना बिचारे जो करै…) का आज का उदाहरण: आजकल फ़ोन पर कई बार ठगी वाले मैसेज आते हैं — जैसे “आपने लॉटरी जीती है, फ़ीस भेजें” या “तुरंत पैसे भेजो”। अगर हम बिना सोचे ऐसे मैसेज पर भरोसा करके पैसे भेज दें, तो बाद में पछताना पड़ता है। यहाँ कुंडलिया की सीख काम आती है — पहले सोचो, फिर करो। इसी तरह बिना हेलमेट जल्दबाज़ी में बाइक चलाने पर चालान कट सकता है।
दूसरी कुंडलिया (बीती ताहि बिसारि दे…) का आज का उदाहरण: मान लीजिए किसी परीक्षा में अंक कम आए। अगर हम उसी दुख में डूबे रहें, तो अगली परीक्षा की तैयारी भी बिगड़ जाएगी। कुंडलिया की सीख है — बीती बात छोड़ो, आगे की तैयारी पर ध्यान दो। इससे मन शांत रहता है और आगे सफलता मिलती है।
इस तरह तीन सौ साल पुरानी ये बातें आज भी हमारे रोज़मर्रा के जीवन में सच्ची उतरती हैं।
सारांश
- यह पाठ अठारहवीं सदी के कवि गिरिधर कविराय की दो प्रसिद्ध नीति-कुंडलियाँ हैं, जो आज भी कहावत की तरह बोली जाती हैं।
- पहली कुंडलिया (“बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय”) सिखाती है कि बिना सोचे-समझे काम करने से काम बिगड़ता है, दुनिया में हँसी होती है और मन को चैन नहीं मिलता — इसलिए पहले सोचो, फिर करो।
- दूसरी कुंडलिया (“बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ”) सिखाती है कि बीती बातें भूलकर आगे (भविष्य) की सुध लो, और जो सहज मिले उसी में संतोष रखो — तब आगे सुख मिलता है।
- दोनों कुंडलियों का साझा भाव है — मन को शांत और सुखी रखना।
- कुंडलिया एक छंद है जिसमें शब्द कड़ी की तरह जुड़ते हैं — एक पंक्ति का अंतिम शब्द अगली पंक्ति के आरंभ में आता है, और जिस शब्द से कुंडलिया शुरू होती है उसी पर खत्म होती है।
- बिना सोचे काम करने से पछतावा इसलिए होता है क्योंकि बिना विचार के हम परिणाम नहीं देख पाते और काम बिगड़ जाता है।
- बीती बातें भूलने का मतलब गलती से न सीखना नहीं, बल्कि बीते दुख का बोझ न ढोना है।
आगे क्या?
सोच-समझकर जीना सीखने के बाद, अगला पाठ हमें प्रकृति की ओर ले चलेगा। अगला पाठ है पाठ 7 — “वर्षा बहार”। जैसे इन कुंडलियों ने हमारे मन की बात की, वैसे ही “वर्षा बहार” बारिश के मौसम की सुंदरता और उससे जुड़े मन के भावों को दिखाएगा। तैयार हो जाइए बरसात के रंग में भीगने के लिए।
Frequently Asked Questions
गिरिधर कविराय की कुंडलिया पाठ में कौन-सी दो कुंडलियाँ हैं?
इस पाठ में गिरिधर कविराय की दो प्रसिद्ध नीति-कुंडलियाँ हैं। पहली कुंडलिया 'बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय' सिखाती है कि बिना सोचे-समझे काम करने से नुकसान और पछतावा होता है। दूसरी कुंडलिया 'बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ' सिखाती है कि बीती बातों को भूलकर आगे यानी भविष्य की सुध लेनी चाहिए।
'बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति बिना सोचे-समझे कोई काम करता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। उसका काम बिगड़ जाता है, दुनिया में उसकी हँसी होती है और उसके मन को चैन नहीं मिलता। कवि यहाँ यह सीख देते हैं कि कोई भी काम पहले अच्छी तरह सोच-विचार करके ही करना चाहिए।
'बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ' का क्या संदेश है?
इसका संदेश है कि बीती हुई बातों को भूल जाना चाहिए और आगे यानी भविष्य की सुध लेनी चाहिए। जो कुछ सहज रूप से मिल जाए उसी में मन लगाना चाहिए। ऐसा करने से कोई दुर्जन हँस नहीं पाएगा, मन में कोई दोष नहीं रहेगा और आगे सुख मिलेगा।
कुंडलिया छंद की मुख्य विशेषता क्या है?
कुंडलिया एक छंद है जिसमें पंक्तियाँ एक कड़ी की तरह आपस में जुड़ी रहती हैं। इसकी खास बात यह है कि पहली पंक्ति का अंतिम शब्द या भाग अगली पंक्ति के आरंभ में फिर दोहराया जाता है, और जिस शब्द से कुंडलिया शुरू होती है उसी शब्द पर वह खत्म भी होती है।
गिरिधर कविराय कौन थे?
गिरिधर कविराय अठारहवीं सदी के एक हिंदी कवि थे। वे अपनी लोकप्रिय कुंडलियों के लिए याद किए जाते हैं। उनकी रचनाओं में सरल और सीधे शब्दों में लोकनीति और घर-गृहस्थी के व्यवहार की बातें मिलती हैं, और कई कुंडलियाँ आज भी कहावत की तरह बोली जाती हैं।