गिरिधर कविराय की कुंडलिया

Chapter 6 · Hindi · Class 7 19 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। क्या आपने कभी जल्दबाज़ी में कोई काम किया और बाद में पछताए?

शायद आपने बिना अच्छी तरह पढ़े परीक्षा का उत्तर लिख दिया। या गुस्से में किसी दोस्त को कुछ कह दिया। या बिना सोचे किसी अनजान मैसेज पर भरोसा कर लिया। ऐसा हम सबके साथ होता है।

लगभग तीन सौ साल पहले एक कवि ने इसी बात को बहुत सरल शब्दों में कहा था। उनका नाम था गिरिधर कविराय। वे अठारहवीं सदी में हुए थे। उनकी छोटी-छोटी कविताएँ इतनी काम की थीं कि लोग आज भी उन्हें कहावत की तरह बोलते हैं।

इस पाठ में उनकी दो प्रसिद्ध कुंडलियाँ हैं। “कुंडलिया” एक तरह का छंद है — हम आगे समझेंगे कि यह कैसा होता है। ये कुंडलियाँ हमें जीवन जीने के दो ज़रूरी सबक देती हैं। पढ़ने के बाद आप काम करने से पहले रुककर सोचेंगे, और बीती बातों का बोझ कम ढोएँगे।

मूल भाव

इस पाठ में दो नीति-कुंडलियाँ हैं। पहली कुंडलिया कहती है — कोई भी काम बिना सोचे-समझे मत करो, वरना बाद में पछताना पड़ता है। दूसरी कुंडलिया कहती है — बीती बातों को भूल जाओ और आगे (भविष्य) की सुध लो। दोनों का साझा मक़सद एक ही है — हमारा मन शांत और सुखी रहे। गिरिधर कविराय ये बातें इतने सीधे और सरल शब्दों में कहते हैं कि वे सीधे दिल तक पहुँचती हैं।

पाठ पढ़ने से पहले एक ज़रूरी बात ध्यान दें कि मूल कुंडलियाँ कहाँ पढ़नी हैं।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने दोनों कुंडलियों का सरल अर्थ और व्याख्या अपने शब्दों में दी है। पूरी मूल कुंडलियाँ अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 7) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें। यहाँ हमने केवल वही प्रसिद्ध पंक्तियाँ ज्यों-की-त्यों दी हैं जो कहावत बन चुकी हैं — जैसे “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय” और “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ”।

पहली कुंडलिया का भावार्थ

पहली कुंडलिया की सबसे मशहूर पंक्ति है — “बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय।” आइए इसका भाव धीरे-धीरे समझते हैं।

कवि कहते हैं — जो व्यक्ति बिना सोचे-समझे कोई काम करता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। “बिना बिचारे” यानी बिना विचार किए, बिना सोचे। “पछताय” यानी पछतावा होना।

ऐसा क्यों होता है? कवि आगे कारण बताते हैं। बिना सोचे काम करने से तीन नुकसान होते हैं:

  • पहला, अपना काम बिगड़ जाता है (“काम बिगारे आपनो”)। जल्दबाज़ी में किया काम अक्सर ठीक नहीं होता।
  • दूसरा, इससे दुनिया में हँसी होती है (“जग में होत हँसाय”)। लोग उस गलती पर हँसते हैं।
  • तीसरा, इससे मन को चैन नहीं मिलता (“चित्त में चैन न पावै”)। “चित्त” यानी मन।

कवि कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को फिर कुछ भी अच्छा नहीं लगता — न अच्छा खाना-पीना, न सम्मान, न राग-रंग (मनोरंजन)। मन हर समय बेचैन रहता है। बिना सोचे किया हुआ काम मन में खटकता रहता है, यानी काँटे की तरह चुभता रहता है। यह दुख टालने से भी नहीं टलता।

संक्षेप में, पहली कुंडलिया का भाव है — पहले सोचो, फिर करो। जल्दबाज़ी का अंत पछतावे में होता है।

दूसरी कुंडलिया का भावार्थ

दूसरी कुंडलिया की मशहूर पंक्ति है — “बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।” इसका भाव पहली से अलग है, पर उतना ही ज़रूरी है।

कवि कहते हैं — जो बात बीत चुकी है, उसे भूल जाओ (“बीती ताहि बिसारि दे”)। “बीती” यानी जो बीत गया, अतीत की बात। “बिसारि दे” यानी भुला दो। इसके बजाय आगे की सुध लो (“आगे की सुधि लेइ”)। “आगे” यानी भविष्य, और “सुधि” यानी ध्यान, सुध। मतलब — भविष्य पर ध्यान दो।

कवि एक और सलाह देते हैं — जो चीज़ सहज रूप से, अपने आप मिल जाए, उसी में मन लगाओ (“जो बनि आवै सहज में ताही में चित देइ”)। “सहज” यानी जो आसानी से, बिना ज़बरदस्ती मिल जाए। यानी जो हमारे पास है उसी में संतोष रखो, असंभव चीज़ों के पीछे मत भागो।

इसका फल क्या होगा? कवि बताते हैं — ऐसा करने से कोई दुर्जन हँस नहीं पाएगा (“दुर्जन हँसै न कोइ”)। “दुर्जन” यानी बुरा व्यक्ति। और मन में कोई दोष या अपराधबोध नहीं रहेगा (“चित्त में खता न पावै”)। कवि कहते हैं कि मन को यही विश्वास कराओ कि बीती सो बीती — जो बीत गया सो बीत गया। तभी आगे सुख मिलेगा

संक्षेप में, दूसरी कुंडलिया का भाव है — बीते का बोझ मत ढोओ, आगे देखो, और जो है उसी में संतोष रखो।

दोनों कुंडलियों के संदेश को एक साथ देखने पर बात और साफ़ हो जाती है। नीचे का भाव-जाल दोनों को आमने-सामने रखता है।

दोनों कुंडलियों के संदेश का भाव-जाल — पहली सोच-समझकर काम करना सिखाती है, दूसरी बीती बातें भूलकर आगे देखना सिखाती है
Figure 6.1 — चित्र 6.1 — दो कुंडलियाँ, दो जीवन-मंत्र। बाईं ओर नीला बक्सा पहली कुंडलिया का है — सोच-समझकर काम करो, क्योंकि जल्दबाज़ी से काम बिगड़ता है, पछतावा होता है और बात मन में खटकती रहती है; इसकी सीख है पहले विचार, फिर काम। दाईं ओर हरा बक्सा दूसरी कुंडलिया का है — बीती बातें भूल जाओ, आगे की सुध लो, जो सहज मिले उसमें मन लगाओ; तब दुर्जन हँस नहीं पाएगा और आगे सुख मिलेगा; इसकी सीख है बीते का बोझ मत ढोओ। नीचे बैंगनी पट्टी दोनों का साझा भाव बताती है — मन को शांत और सुखी रखना।

चित्र 6.1 से दिख जाता है कि दोनों कुंडलियों की राह भले अलग हो, मंज़िल एक ही है — एक शांत और सुखी मन।

आइए गहराई से समझें

अब इन कुंडलियों के पीछे की दो बड़ी बातें समझते हैं — पहली, यह “कुंडलिया” छंद आख़िर है क्या; और दूसरी, इनका संदेश इतना सच क्यों है।

कुंडलिया छंद की खास बात

सबसे पहले एक छोटा शब्द समझ लें, जो आगे काम आएगा।

“कुंडलिया” शब्द “कुंडली” से बना है। कुंडली का मतलब है कड़ी या घेरा — जैसे चूड़ी या साँप का घेरा। इस छंद का नाम कुंडलिया इसलिए पड़ा, क्योंकि इसमें शब्द एक कड़ी की तरह आपस में जुड़ जाते हैं। इसकी दो खास बातें हैं। नीचे का चित्र इन्हें दिखाता है।

कुंडलिया छंद की संरचना — पहली पंक्ति का अंतिम शब्द अगली पंक्ति के आरंभ में दोहराया जाता है, और रचना का पहला शब्द अंत में फिर आता है
Figure 6.2 — चित्र 6.2 — कुंडलिया कैसे बनती है। ऊपर नीली पट्टी पहली पंक्ति है, जिसका अंतिम शब्द 'पछताय' पीले बक्से में है। हरी पट्टी अगली पंक्ति है, जो उसी शब्द 'पछताय' से शुरू होती है — यानी पहली पंक्ति का अंतिम शब्द अगली के आरंभ में फिर दोहराया गया (हरा तीर यही दिखाता है)। नीचे बैंगनी बक्से बताते हैं कि कुंडलिया जिस शब्द से शुरू होती है ('बिना'), उसी शब्द पर वह खत्म भी होती है (बैंगनी तीर)। सबसे नीचे पीली पट्टी बताती है कि इसी दोहराव से पंक्तियाँ एक कड़ी की तरह जुड़ जाती हैं — इसीलिए नाम 'कुंडलिया' पड़ा।

चित्र 6.2 दो खास बातें दिखाता है:

  • शब्द-दोहराव: एक पंक्ति का अंतिम शब्द (या उसका आखिरी हिस्सा) अगली पंक्ति के शुरू में फिर आता है। जैसे ”…पाछे पछताय” के बाद अगली पंक्ति “पछताय…” से शुरू होती है। इसी तरह ”…होत हँसाय” के बाद “जग में होत हँसाय…” आता है।
  • शुरू और अंत एक: कुंडलिया जिस शब्द से शुरू होती है, उसी शब्द पर खत्म होती है। पहली कुंडलिया “बिना” से शुरू होकर “बिना” पर ही खत्म होती है।

इसके अलावा कुंडलिया में एक और सुंदरता है — सब पंक्तियों को बोलने में बराबर समय लगता है, इसलिए उसमें एक प्यारी लय बन जाती है। और कुंडलिया ऐसे लगती है मानो कोई हमसे बातचीत कर रहा हो — सीधे और अपनेपन से।

Concept check

'कुंडलिया' को कुंडलिया क्यों कहा जाता है?

संदेश के पीछे का “क्यों”

अब सबसे ज़रूरी सवाल। पहली कुंडलिया कहती है कि बिना सोचे काम करने से पछतावा होता है। पर क्यों? सिर्फ़ इतना कहना कि “ऐसा होता है” काफ़ी नहीं। आइए कारण समझते हैं।

जब हम सोच-विचार करते हैं, तो हम आगे के परिणाम देख पाते हैं। हम सोचते हैं — “अगर मैं यह करूँगा, तो क्या होगा?” इससे हम गलती होने से पहले ही उसे रोक लेते हैं। पर जब हम बिना सोचे करते हैं, तो हमें परिणाम का पता ही नहीं होता। काम बिगड़ने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। और एक बार काम बिगड़ जाए, तो उसे ठीक करना मुश्किल होता है। इसलिए पछतावा होता है।

यह पछतावा एक के बाद एक कई रूप लेता है। नीचे की कारण-शृंखला यही दिखाती है।

बिना सोचे काम करने की कारण-शृंखला — काम बिगड़ना, जग में हँसी, मन को चैन न मिलना और बात का मन में खटकना
Figure 6.3 — चित्र 6.3 — बिना सोचे काम → एक के बाद एक नुकसान। सबसे ऊपर लाल बक्सा शुरुआत है — बिना सोचे-समझे काम कर दिया। उससे नीचे तीर के क्रम में नुकसान आते हैं — अपना काम बिगड़ जाता है, फिर जग (दुनिया) में हँसी होती है, फिर मन (चित्त) को चैन नहीं मिलता। सबसे नीचे पीला बक्सा बताता है कि तब खान-पान, सम्मान और राग-रंग — कुछ भी अच्छा नहीं लगता और बात मन में खटकती रहती है। सबसे नीचे हरी पट्टी सीख देती है — पहले सोचो, फिर करो, तभी पछतावा नहीं होगा।

चित्र 6.3 दिखाता है कि एक छोटी-सी जल्दबाज़ी कैसे एक पूरी शृंखला में बदल जाती है। इसीलिए कवि कहते हैं — पहले विचार करो।

अब दूसरी कुंडलिया का “क्यों”। वह कहती है — बीती बातें भूल जाओ। पर ऐसा क्यों करना चाहिए? बीती बात को याद रखने में हर्ज़ क्या है?

बात यह है कि जो बीत गया, वह अब बदला नहीं जा सकता। अगर हम पुरानी गलती या पुराने दुख को बार-बार याद करते रहें, तो वह हमारे आज को भी खराब कर देता है। मन उसी में उलझा रहता है। नया काम करने की शक्ति नहीं बचती। इसलिए कवि कहते हैं — बीती सो बीती। उसे छोड़ो, आगे देखो। ध्यान रहे, इसका मतलब गलती से सीखना मना नहीं है — मतलब बस इतना है कि बीते दुख का बोझ ढोते मत रहो।

Concept check

कवि बीती बातों को भूलने की सलाह क्यों देते हैं?

आम भूलें

कुछ बातें ऐसी हैं जिनमें विद्यार्थी अक्सर उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ कर लें, ताकि आप ये भूलें न करें।

⚠️ Common mistake
What students think

'बीती ताहि बिसारि दे' का मतलब है कि हमें अपनी गलतियों से कभी कुछ नहीं सीखना चाहिए।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कुंडलिया साफ़-साफ़ कहती है 'बीती बातें भूल जाओ', तो लगता है मानो अतीत को पूरी तरह मिटा देने की बात हो रही है।

What actually happens

कवि का मतलब है कि बीते दुख और पछतावे का बोझ मन पर मत ढोओ। गलती से सीखना अलग बात है। हम सीख याद रखें, पर दुख और चिंता छोड़ दें, ताकि मन आगे बढ़ सके।

⚠️ Common mistake
What students think

'जो बनि आवै सहज में' का मतलब है कि हमें कभी मेहनत ही नहीं करनी चाहिए, जो मिले उसी से खुश रहो।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि 'सहज में मिलना' सुनकर लगता है मानो बिना कोशिश बैठे रहने की बात हो रही हो।

What actually happens

कवि कहते हैं कि असंभव और ज़बरदस्ती वाली चीज़ों के पीछे भागकर मन मत दुखाओ। जो उचित प्रयास से मिल सके उसमें संतोष रखो — यह आलस नहीं, बल्कि मन की शांति की बात है।

⚠️ Common mistake
What students think

कुंडलिया और दोहा एक ही चीज़ हैं, दोनों में कोई फ़र्क नहीं।

Why it seems right

ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि दोनों ही छोटी, नीति की बात कहने वाली कविताएँ हैं और एक जैसी सरल भाषा में होती हैं।

What actually happens

दोहा दो पंक्तियों का छंद है, जबकि कुंडलिया बड़ी होती है और उसकी खास पहचान शब्द-दोहराव है — एक पंक्ति का अंतिम शब्द अगली के आरंभ में आता है, और शुरू का शब्द अंत में फिर आता है।

जाँचिए अपनी समझ

अब अपनी समझ परखते हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़िए और सही विकल्प चुनिए।

'बिना बिचारे' काम करने का मुख्य परिणाम क्या होता है, जैसा कुंडलिया में बताया गया है?

'चित्त में चैन न पावै' का क्या अर्थ है?

'बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ' पंक्ति कौन-सी सलाह देती है?

कुंडलिया छंद की सबसे खास पहचान क्या है?

अभ्यास (श्रेणीबद्ध)

अब थोड़ा अभ्यास करते हैं। पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।

सरल

सरल

शब्दार्थ लिखिए: (क) बिचारे (ख) पछताय (ग) चित्त (घ) सुधि।

सरल

पहली कुंडलिया में बिना विचार किए काम करने के कौन-कौन से नुकसान बताए गए हैं? कोई तीन लिखिए।

मध्यम

मध्यम

दूसरी कुंडलिया का मुख्य संदेश अपने शब्दों में समझाइए।

मध्यम

'कुंडलिया' छंद की दो खास विशेषताएँ बताइए और हर एक को पाठ से उदाहरण देकर समझाइए।

चुनौती

चुनौती

इन कुंडलियों की बातें सैकड़ों साल पहले कही गई थीं। क्या ये आज भी आपके जीवन में उपयोगी हैं? एक-एक उदाहरण देकर समझाइए।

सारांश

  • यह पाठ अठारहवीं सदी के कवि गिरिधर कविराय की दो प्रसिद्ध नीति-कुंडलियाँ हैं, जो आज भी कहावत की तरह बोली जाती हैं।
  • पहली कुंडलिया (“बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय”) सिखाती है कि बिना सोचे-समझे काम करने से काम बिगड़ता है, दुनिया में हँसी होती है और मन को चैन नहीं मिलता — इसलिए पहले सोचो, फिर करो।
  • दूसरी कुंडलिया (“बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ”) सिखाती है कि बीती बातें भूलकर आगे (भविष्य) की सुध लो, और जो सहज मिले उसी में संतोष रखो — तब आगे सुख मिलता है।
  • दोनों कुंडलियों का साझा भाव है — मन को शांत और सुखी रखना
  • कुंडलिया एक छंद है जिसमें शब्द कड़ी की तरह जुड़ते हैं — एक पंक्ति का अंतिम शब्द अगली पंक्ति के आरंभ में आता है, और जिस शब्द से कुंडलिया शुरू होती है उसी पर खत्म होती है।
  • बिना सोचे काम करने से पछतावा इसलिए होता है क्योंकि बिना विचार के हम परिणाम नहीं देख पाते और काम बिगड़ जाता है।
  • बीती बातें भूलने का मतलब गलती से न सीखना नहीं, बल्कि बीते दुख का बोझ न ढोना है।

आगे क्या?

सोच-समझकर जीना सीखने के बाद, अगला पाठ हमें प्रकृति की ओर ले चलेगा। अगला पाठ है पाठ 7 — “वर्षा बहार”। जैसे इन कुंडलियों ने हमारे मन की बात की, वैसे ही “वर्षा बहार” बारिश के मौसम की सुंदरता और उससे जुड़े मन के भावों को दिखाएगा। तैयार हो जाइए बरसात के रंग में भीगने के लिए।

Frequently Asked Questions

गिरिधर कविराय की कुंडलिया पाठ में कौन-सी दो कुंडलियाँ हैं?

इस पाठ में गिरिधर कविराय की दो प्रसिद्ध नीति-कुंडलियाँ हैं। पहली कुंडलिया 'बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय' सिखाती है कि बिना सोचे-समझे काम करने से नुकसान और पछतावा होता है। दूसरी कुंडलिया 'बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ' सिखाती है कि बीती बातों को भूलकर आगे यानी भविष्य की सुध लेनी चाहिए।

'बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछताय' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति बिना सोचे-समझे कोई काम करता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। उसका काम बिगड़ जाता है, दुनिया में उसकी हँसी होती है और उसके मन को चैन नहीं मिलता। कवि यहाँ यह सीख देते हैं कि कोई भी काम पहले अच्छी तरह सोच-विचार करके ही करना चाहिए।

'बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ' का क्या संदेश है?

इसका संदेश है कि बीती हुई बातों को भूल जाना चाहिए और आगे यानी भविष्य की सुध लेनी चाहिए। जो कुछ सहज रूप से मिल जाए उसी में मन लगाना चाहिए। ऐसा करने से कोई दुर्जन हँस नहीं पाएगा, मन में कोई दोष नहीं रहेगा और आगे सुख मिलेगा।

कुंडलिया छंद की मुख्य विशेषता क्या है?

कुंडलिया एक छंद है जिसमें पंक्तियाँ एक कड़ी की तरह आपस में जुड़ी रहती हैं। इसकी खास बात यह है कि पहली पंक्ति का अंतिम शब्द या भाग अगली पंक्ति के आरंभ में फिर दोहराया जाता है, और जिस शब्द से कुंडलिया शुरू होती है उसी शब्द पर वह खत्म भी होती है।

गिरिधर कविराय कौन थे?

गिरिधर कविराय अठारहवीं सदी के एक हिंदी कवि थे। वे अपनी लोकप्रिय कुंडलियों के लिए याद किए जाते हैं। उनकी रचनाओं में सरल और सीधे शब्दों में लोकनीति और घर-गृहस्थी के व्यवहार की बातें मिलती हैं, और कई कुंडलियाँ आज भी कहावत की तरह बोली जाती हैं।