पेड़ की बात
इस पाठ का महत्व
ज़रा अपने आस-पास देखिए। सड़क किनारे, स्कूल के बाहर, या घर के आँगन में एक पेड़ ज़रूर खड़ा होगा।
हम उसके पास से रोज़ गुज़रते हैं। पर कभी रुककर सोचा है — यह पेड़ हमें क्या-क्या देता है? और क्या यह पेड़ भी हमारी तरह “जीवित” है?
यह पाठ ठीक यही बात कहता है। इसका नाम है “पेड़ की बात”। इसे लिखा है एक बहुत बड़े वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु ने। उन्होंने ही दुनिया को बताया था कि पेड़-पौधों में भी जान होती है — वे भी हमारी तरह जीवित प्राणी हैं।
इस पाठ में एक छोटे-से बीज की कहानी है। वह बीज कैसे अंकुर बनता है, फिर पौधा, फिर एक बड़ा पेड़। रास्ते में हमें पता चलता है कि पेड़ भी खाता है, साँस लेता है, रोशनी की ओर बढ़ता है, और अपने बच्चों (बीजों) के लिए अपना सब कुछ दे देता है।
यह पाठ पढ़कर पेड़ हमें सिर्फ़ “एक हरी चीज़” नहीं लगेगा। वह हमें एक जीता-जागता साथी लगेगा, जिसकी हमें रक्षा करनी है।
मूल भाव
इस पाठ का मूल भाव है — पेड़ भी हमारी तरह एक जीवित प्राणी है, और वह बिल्कुल निःस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए जीता है। एक छोटा-सा बीज बढ़कर बड़ा पेड़ बनता है। वह मिट्टी से भोजन लेता है, पत्तों से साँस लेता है, और हमारी ज़हरीली हवा को शुद्ध करके हमें जीवन देता है। अंत में वह अपनी संतान (बीज) के लिए अपना पूरा जीवन ही न्योछावर कर देता है। इसलिए पेड़ हमारे सबसे बड़े उपकारी हैं — हमें उन्हें लगाना और बचाना चाहिए।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने कविता का सरल अर्थ और व्याख्या दी है। पूरी मूल कविता अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 6) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें।
आगे बढ़ने से पहले दो शब्द साफ़ कर लेते हैं, जो पूरे पाठ में बार-बार काम आएँगे।
कविता का भावार्थ
आइए, इस पाठ की बात को शुरू से, क्रम से और बहुत आसान भाषा में समझते हैं। लेखक यहाँ एक बीज की पूरी ज़िंदगी की कहानी सुनाते हैं।
बीज से अंकुर। सबसे पहले एक बीज मिट्टी के नीचे बोया जाता है। कई दिनों तक वह वहीं पड़ा रहता है। फिर वर्षा की पहली बूँदें उसे जगा देती हैं — मानो कह रही हों, “अब सोना मत, ऊपर उठ जाओ, सूरज की रोशनी देखो।” तब बीज की कठोर खाल फटती है और उसमें से एक नन्हा अंकुर बाहर निकलता है।
जड़ और तना। इस अंकुर के दो हिस्से होते हैं। एक हिस्सा मिट्टी के भीतर, नीचे की ओर जाता है — इसे जड़ कहते हैं। दूसरा हिस्सा ऊपर, रोशनी की ओर बढ़ता है — इसे तना कहते हैं। मज़े की बात यह है कि चाहे बीज को उल्टा भी रख दो, जड़ हमेशा नीचे ही जाएगी और तना ऊपर ही आएगा। यानी पेड़ को पता है कि उसे क्या करना है।
पेड़ भी खाता है। हम भोजन करते हैं, तो पेड़ भी करता है। पर एक फ़र्क है — हमारे दाँत होते हैं, इसलिए हम कड़ी चीज़ें भी चबा सकते हैं। पेड़ के दाँत नहीं होते। इसलिए वह केवल तरल (पतला) भोजन ले सकता है। उसकी जड़ें पतली नली की तरह मिट्टी से रस खींचती हैं, और वही रस पूरे पेड़ में फैल जाता है।
पेड़ साँस भी लेता है। पेड़ के पत्तों पर अनगिनत छोटे-छोटे “मुँह” होते हैं। इन्हीं से पेड़ हवा लेता है। और यहाँ एक बहुत सुंदर बात है — हम जो ज़हरीली अंगारक वायु छोड़ते हैं, पेड़ उसी को पीकर हवा को पूरी तरह शुद्ध कर देता है। अगर पेड़ न होते, तो यह ज़हरीली हवा बढ़ती जाती और जीव-जंतुओं के लिए मुश्किल हो जाती। इसलिए लेखक कहते हैं कि यह विधाता (भगवान) की एक करुणा है।
पेड़ को रोशनी चाहिए। पेड़ बिना सूरज की रोशनी के जी नहीं सकता। इसीलिए वह हमेशा रोशनी की ओर झुकता और बढ़ता है। अगर गमले को खिड़की के पास रखो, तो उसके सारे पत्ते उसी तरफ़ मुड़ जाएँगे, जहाँ से रोशनी आती है। पेड़ के भीतर सूरज की यही रोशनी छिपी रहती है — इसी कारण लकड़ी जलाने पर हमें प्रकाश और गर्मी मिलती है।
पेड़ अपनी संतान के लिए। अब आती है सबसे भावुक बात। पेड़ अपने बीज (संतान) को बचाने के लिए पहले सुंदर फूल बनाता है। फूल मधुमक्खी और तितली को बुलाते हैं, जो एक फूल का पराग दूसरे फूल तक पहुँचाती हैं — इससे ही बीज पकते हैं। फिर पेड़ अपना सारा रस उस बीज को देकर खुद कमज़ोर और सूखा होता जाता है। अंत में एक दिन बूढ़ा पेड़ जड़ समेत गिर पड़ता है। यानी पेड़ अपनी संतान के लिए अपना पूरा जीवन ही न्योछावर कर देता है।
पूरी बात को एक नज़र में देखने के लिए, नीचे चित्र 13.1 देखिए — पेड़ हमें क्या-क्या देता है।
आइए गहराई से समझें
अब केवल “क्या हुआ” से आगे बढ़ते हैं। आइए इस पाठ के तीन सबसे ज़रूरी भाव ठीक से समझें — पेड़ का महत्व, पेड़ का जीवित होना और परोपकार, और पर्यावरण का संदेश।
मुख्य भाव — पेड़ हमारी तरह जीवित है
लेखक जगदीशचंद्र बसु की सबसे बड़ी बात यही है — पेड़ कोई बेजान चीज़ नहीं है। वह भी हमारी तरह एक जीवित प्राणी है। वह खाता है, साँस लेता है, रोशनी की ओर बढ़ता है, और बड़ा होता है — ठीक हमारी तरह।
यह बात चित्र 13.2 में चार आसान हिस्सों में दिखाई गई है।
लेखक एक छोटा-सा प्रयोग बताते हैं, जिससे यह बात बिल्कुल साफ़ हो जाती है। ज़रा सोचिए — पेड़ बिना आँखों के रोशनी कैसे ढूँढ़ लेता है?
अगर एक गमले के पौधे को खिड़की के पास रखें, तो उसके पत्ते किस ओर मुड़ जाते हैं और क्यों?
पौधे के पत्ते उसी ओर मुड़ जाते हैं, जहाँ से रोशनी आ रही होती है — यानी खिड़की की तरफ़। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि पेड़ को जीने के लिए सूरज की रोशनी चाहिए। बिना रोशनी के वह कमज़ोर पड़ जाता है। इसलिए वह रोशनी पाने के लिए उसी तरफ़ बढ़ता है। यही दिखाता है कि पेड़ बेजान नहीं, बल्कि एक जीवित प्राणी है, जो अपनी ज़रूरत समझता है।
पेड़ का परोपकार — माँ जैसा त्याग
अब पाठ की सबसे प्यारी बात। पेड़ अपने बीज (संतान) के लिए जो करता है, वह बिल्कुल एक माँ जैसा त्याग है।
लेखक कहते हैं कि पेड़ पहले सुंदर फूल बनाता है, ताकि उसका बीज सुरक्षित बने। फिर वह अपना सारा रस उस बीज को दे देता है। ऐसा करते-करते पेड़ खुद कमज़ोर और सूखा हो जाता है। अंत में वह जड़ समेत गिर पड़ता है। यानी वह अपनी संतान के लिए अपनी जान तक दे देता है।
इस त्याग के चार कदम चित्र 13.3 में दिखाए गए हैं।
यहाँ लेखक एक सुंदर तुलना भी करते हैं। वे कहते हैं कि फूल की सुंदरता ऐसी लगती है, जैसे किसी माँ का अपने बच्चे के लिए प्यार और ममता हो। सोचिए, फूल को छूते ही लजवंती (छुई-मुई) का पौधा सिकुड़ जाता है — जैसे उसमें भी एक नाज़ुक भावना हो।
पर्यावरण-संदेश — पेड़ लगाओ, पेड़ बचाओ
अब सोचिए। जो पेड़ हमें छाया, फल, लकड़ी और सबसे ज़रूरी शुद्ध हवा देता है — और बदले में कुछ माँगता भी नहीं — क्या उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य नहीं?
यही इस पाठ का सबसे बड़ा संदेश है। पेड़ हमारे सच्चे साथी और उपकारी हैं। इसलिए हमें ज़्यादा-से-ज़्यादा पेड़ लगाने चाहिए और उन्हें कटने से बचाना चाहिए। यह बात चित्र 13.4 में दिखाई गई है।
आम भूलें
इस पाठ को पढ़ते समय बच्चे कुछ बातें अक्सर उलझा देते हैं। आइए उन्हें साफ़ करें।
पेड़ बेजान होता है — वह न खाता है, न साँस लेता है।
पेड़ हमारी तरह चलता-फिरता या बोलता नहीं, और एक ही जगह चुपचाप खड़ा रहता है, इसलिए लगता है कि उसमें जान नहीं होगी।
पेड़ बिल्कुल जीवित है। वह जड़ों से तरल भोजन लेता है, पत्तों से साँस लेता है, रोशनी की ओर बढ़ता है और बीज से बड़ा होता है। जगदीशचंद्र बसु ने ही यह सिद्ध किया कि पेड़-पौधों में जान होती है।
पेड़ हमारी तरह कुछ भी, कड़ी चीज़ें भी, खा सकता है।
हम पेड़ को भी 'खाते हुए' सोचते हैं, और हम तो हर तरह की चीज़ चबा लेते हैं, इसलिए लगता है पेड़ भी ऐसा ही करता होगा।
पेड़ के दाँत नहीं होते, इसलिए वह केवल तरल (पतला) भोजन ले सकता है। उसकी जड़ें मिट्टी से घुला हुआ रस ही खींचती हैं — कोई ठोस चीज़ नहीं।
पेड़ हमारे लिए ज़हरीली हवा छोड़ता है।
हम जानते हैं कि पेड़ अंगारक वायु यानी ज़हरीली हवा से जुड़ा है, इसलिए जल्दी में लगता है कि शायद वह यही ज़हरीली हवा हमें देता है।
उल्टा सच है। पेड़ हमारी छोड़ी हुई ज़हरीली अंगारक वायु को खुद पी लेता है और बदले में हवा को शुद्ध कर देता है। यही पेड़ का हम पर सबसे बड़ा उपकार है।
जाँचिए अपनी समझ
अब छोटे-छोटे सवालों से अपनी समझ परखिए।
इस पाठ 'पेड़ की बात' के लेखक कौन हैं?
इस पाठ के लेखक हैं प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि पेड़-पौधों में भी जान होती है। इस बांग्ला रचना का हिंदी अनुवाद शंकर सेन ने किया है।
पेड़ केवल तरल भोजन ही क्यों लेता है?
हमारे दाँत होते हैं, इसलिए हम कड़ी चीज़ें भी चबा लेते हैं। पेड़ के दाँत नहीं होते, इसलिए वह केवल तरल (पतला) भोजन ले सकता है। उसकी जड़ें मिट्टी से घुला हुआ रस खींचती हैं।
पेड़ हवा को शुद्ध कैसे करता है?
हम साँस छोड़ते समय ज़हरीली अंगारक वायु (कार्बन डाइऑक्साइड) बाहर निकालते हैं। पेड़ अपने पत्तों के छोटे मुँहों से इसी ज़हरीली हवा को पी लेता है और हवा को शुद्ध कर देता है। यही जीव-जंतुओं के लिए उसका वरदान है।
लेखक का सबसे बड़ा संदेश क्या है?
पाठ बताता है कि पेड़ हमारी तरह जीवित प्राणी है, जो निःस्वार्थ भाव से हमें हवा, छाया, फल और जीवन देता है, और अपनी संतान के लिए अपना जीवन तक न्योछावर कर देता है। इसलिए हमें ज़्यादा पेड़ लगाने और उनकी रक्षा करने चाहिए।
अभ्यास (श्रेणीबद्ध)
अब अपनी समझ को लिखकर पक्का कीजिए। पहले खुद सोचिए, फिर उत्तर खोलिए।
सरल
बीज से निकलने वाले अंकुर के दो हिस्सों के नाम लिखिए। कौन-सा हिस्सा ऊपर जाता है और कौन-सा नीचे?
उत्तर: अंकुर के दो हिस्से होते हैं — जड़ और तना।
- जड़ मिट्टी के भीतर, नीचे की ओर जाती है।
- तना रोशनी की ओर, ऊपर की ओर बढ़ता है।
मज़े की बात यह है कि बीज को उल्टा रख देने पर भी जड़ नीचे और तना ऊपर ही जाता है।
इस पाठ के लेखक कौन हैं, और उन्होंने दुनिया को क्या ख़ास बात बताई?
उत्तर: इस पाठ के लेखक हैं प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु। उन्होंने दुनिया को यह ख़ास बात बताई कि पेड़-पौधों में भी जान होती है — यानी वे भी हमारी तरह जीवित प्राणी हैं। इस बांग्ला रचना का हिंदी अनुवाद शंकर सेन ने किया है।
मध्यम
पेड़ हमें कौन-कौन-सी चीज़ें देता है? कोई पाँच बताइए।
उत्तर: पेड़ हमें बहुत कुछ देता है। पाँच चीज़ें ये हैं —
- ठंडी छाया — धूप से राहत मिलती है।
- मीठे फल — खाने को मिलते हैं।
- शुद्ध हवा (ऑक्सीजन) — साँस लेने को मिलती है।
- पक्षियों को घर — चिड़ियाँ पेड़ पर अपना बसेरा बनाती हैं।
- लकड़ी और ईंधन — पेड़ से लकड़ी मिलती है।
और सबसे बड़ी बात — पेड़ यह सब बिना कुछ माँगे देता है।
नीचे दिए शब्दों के अर्थ लिखिए — अंकुर, अंगारक वायु, न्योछावर, परोपकार, करुणा।
उत्तर (शब्दार्थ):
- अंकुर — बीज से निकलने वाला नन्हा, नया पौधा।
- अंगारक वायु — साँस छोड़ते समय निकलने वाली ज़हरीली हवा (कार्बन डाइऑक्साइड)।
- न्योछावर — किसी के लिए अपनी प्यारी चीज़, जान तक, खुशी-खुशी दे देना।
- परोपकार — दूसरों का भला करना, बिना कुछ बदले में चाहे।
- करुणा — दया; दूसरों के लिए मन में उठने वाला प्यार और तरस।
चुनौती
लेखक पेड़ की तुलना एक माँ से करते हैं। यह तुलना सही क्यों है? अपने शब्दों में समझाइए।
उत्तर: लेखक पेड़ को माँ जैसा बताते हैं, और यह तुलना बिल्कुल सही है।
एक माँ अपने बच्चे के लिए सब कुछ करती है। वह खुद भूखी रहकर भी बच्चे को खिलाती है, और अपना सुख छोड़कर बच्चे का ख़याल रखती है। उसका प्यार निःस्वार्थ होता है — यानी वह बदले में कुछ नहीं चाहती।
पेड़ भी ठीक ऐसा ही करता है। वह अपने बीज (संतान) को बचाने के लिए पहले सुंदर फूल बनाता है। फिर अपना सारा रस उस बीज को देकर खुद कमज़ोर और सूखा हो जाता है। अंत में वह जड़ समेत गिर पड़ता है — यानी अपनी संतान के लिए अपना पूरा जीवन ही न्योछावर कर देता है।
इस तरह माँ और पेड़, दोनों अपने बच्चों के लिए निःस्वार्थ भाव से सब कुछ दे देते हैं। यही कारण है कि लेखक की यह तुलना मन को छू जाती है।
सारांश
- पेड़ की बात के लेखक हैं वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु; इसका हिंदी अनुवाद शंकर सेन ने किया है।
- एक छोटा-सा बीज मिट्टी में बोया जाता है, और वर्षा की बूँदें मिलते ही उसमें से अंकुर फूटता है।
- अंकुर के दो हिस्से होते हैं — जड़ नीचे जाती है, तना ऊपर रोशनी की ओर बढ़ता है।
- पेड़ के दाँत नहीं होते, इसलिए वह जड़ों से केवल तरल भोजन लेता है।
- पेड़ पत्तों से साँस लेता है, और हमारी छोड़ी ज़हरीली अंगारक वायु को पीकर हवा को शुद्ध कर देता है।
- पेड़ को जीने के लिए रोशनी चाहिए, इसलिए वह हमेशा रोशनी की ओर झुकता और बढ़ता है।
- पेड़ अपनी संतान (बीज) के लिए अपना सारा रस देकर, अंत में अपना जीवन तक न्योछावर कर देता है — बिल्कुल माँ जैसा त्याग।
- पाठ का संदेश — पेड़ हमारी तरह जीवित और हमारे उपकारी हैं, इसलिए हमें ज़्यादा पेड़ लगाने और उनकी रक्षा करनी चाहिए।
आगे क्या?
शाबाश! आपने “पेड़ की बात” के साथ अपनी कक्षा 6 की हिंदी पुस्तक “मल्हार” का सफ़र पूरा कर लिया। यह इस पुस्तक का आख़िरी पाठ था — आपने पूरी किताब पढ़ डाली, इसके लिए बहुत-बहुत बधाई!
ज़रा सोचिए, इस साल आपने कितना कुछ सीखा — मातृभूमि का प्यार, रहीम के दोहों की सीख, हार की जीत की करुणा, असम के नृत्य, बाल-कृष्ण की लीला, और अब पेड़ का निःस्वार्थ त्याग। हर पाठ ने आपको एक नई सोच दी।
अब एक छोटा-सा काम कीजिए — अपने आस-पास किसी एक पेड़ को चुनिए, उसे रोज़ देखिए, और हो सके तो एक नया पौधा लगाइए। यही इस पाठ की सबसे सुंदर सीख है। और जब मन करे, तो किसी भी पुराने पाठ पर लौटकर उसे फिर से पढ़िए — पाठों की सूची हमेशा आपके लिए तैयार है। पढ़ते रहिए, बढ़ते रहिए!
Frequently Asked Questions
पेड़ की बात पाठ का सारांश क्या है?
'पेड़ की बात' जगदीशचंद्र बसु का वैज्ञानिक निबंध है जिसका हिंदी अनुवाद शंकर सेन ने किया। इसमें बताया गया है कि पेड़ भी हमारी तरह जीवित प्राणी हैं — वे खाते हैं, साँस लेते हैं, रोशनी की ओर बढ़ते हैं और अपनी संतान के लिए सब कुछ न्योछावर कर देते हैं।
पेड़ की बात पाठ के लेखक कौन हैं?
यह निबंध जगदीशचंद्र बसु ने लिखा है, जो भारत के महान वैज्ञानिक थे। उन्होंने ही पहली बार वैज्ञानिक तरीके से यह सिद्ध किया कि पेड़-पौधों में भी जीवन और संवेदना होती है।
पेड़ कैसे खाना खाते और साँस लेते हैं?
पेड़ अपनी जड़ों के ज़रिए ज़मीन से पानी और खनिज पदार्थ (तरल खाना) खींचते हैं। पत्तियों पर छोटे-छोटे मुँह (रंध्र) होते हैं जिनसे वे 'अंगारक वायु' यानी CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड) लेकर सूरज की रोशनी से अपना खाना बनाते हैं।
पेड़ की बात पाठ में 'माँ जैसा त्याग' से क्या मतलब है?
जब पेड़ बूढ़ा होने लगता है तो वह अपनी पूरी जीवनशक्ति (रस) बीजों में भर देता है ताकि उसकी संतान (नए पेड़) पनप सकें। जिस तरह माँ अपने बच्चे के लिए सब कुछ देती है, उसी तरह पेड़ भी अपनी संतान के लिए सब कुछ लुटा देता है।
इस पाठ से हमें पेड़ों के बारे में क्या सीख मिलती है?
इस पाठ से सीख मिलती है कि पेड़ केवल लकड़ी या छाया नहीं हैं — वे हमारी तरह जीवित हैं, हवा शुद्ध करते हैं और निस्वार्थ भाव से देते रहते हैं। इसलिए हमें पेड़ काटने से बचना चाहिए और उन्हें लगाना-बचाना हमारी जिम्मेदारी है।