गोल
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए। आप कोई खेल खेल रहे हैं। तभी सामने वाला खिलाड़ी गुस्से में आपको चोट पहुँचा देता है। आपका पैर दुखने लगता है। अब आपके मन में क्या आएगा? शायद यह कि “मैं भी इसे चोट पहुँचाऊँगा। मैं इससे बदला लूँगा।”
यह गुस्सा आना बहुत आम बात है। पर सोचिए — क्या बदला लेना सही जवाब है?
यह पाठ ठीक इसी सवाल का जवाब देता है। यह कहानी हमें एक बहुत बड़े खिलाड़ी के बारे में बताती है — मेजर ध्यानचंद। उन्हें दुनिया “हॉकी का जादूगर” कहती है। (“जादूगर” का मतलब है जादू करने वाला। ध्यानचंद हॉकी में इतना अच्छा खेलते थे कि लगता था जैसे गेंद उनकी स्टिक से चिपक गई हो — मानो वे जादू कर रहे हों।)
एक मैच में एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर ध्यानचंद के पैर पर हॉकी की स्टिक दे मारी। पर ध्यानचंद ने बदला नहीं लिया। उन्होंने कुछ और ही किया — कुछ बहुत बड़ा। यही इस कहानी की जान है। इसे पढ़कर हम सीखते हैं कि सच्चा खिलाड़ी गुस्से से नहीं, अपने खेल और अच्छे व्यवहार से जीतता है।
मूल भाव
इस पाठ का मूल भाव है — खेल में गुस्सा और बदला नहीं, बल्कि खेल-भावना और मेहनत ही सबसे बड़ी बात है। चोट लगने पर भी मेजर ध्यानचंद ने बदला नहीं लिया। उन्होंने अपने शानदार खेल से जवाब दिया और एक के बाद एक छह गोल किए। फिर उन्होंने उसी खिलाड़ी को भी गोल का मौका दे दिया। इससे वह खिलाड़ी शर्मिंदा हुआ। कहानी सिखाती है कि बुरे काम का जवाब अच्छाई से देना ही असली जीत है। साथ ही, ध्यानचंद हमेशा देश के लिए खेलते थे, अपनी शान के लिए नहीं।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने पाठ का सरल अर्थ और व्याख्या दी है। पूरा मूल पाठ अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 6) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें।
कहानी का सार
यह कहानी खुद मेजर ध्यानचंद ने सुनाई है। यानी यह उनकी अपनी ज़िंदगी की सच्ची बात है। आइए इसे क्रम से, सरल भाषा में समझते हैं।
ध्यानचंद बताते हैं कि उनका जन्म सन 1905 में प्रयाग (आज का प्रयागराज) में हुआ। वे एक साधारण परिवार से थे। जब वे 16 साल के हुए, तब वे फ़ौज में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गए। उनकी रेजिमेंट यानी फ़ौज की टुकड़ी का नाम था “फ़र्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट”।
शुरू में हॉकी में उनकी कोई खास रुचि नहीं थी। ध्यान दीजिए — उस समय हॉकी के अभ्यास (प्रैक्टिस) का कोई तय समय नहीं था। सिपाही जब चाहें मैदान में जाकर खेलने लगते थे। धीरे-धीरे ध्यानचंद का खेल निखरता गया और वे बहुत अच्छे खिलाड़ी बन गए। दुनिया उन्हें “हॉकी का जादूगर” कहने लगी।
नीचे दिया चित्र 2.1 पूरी कहानी को एक नज़र में दिखाता है — शुरू से अंत तक क्या-क्या हुआ।
अब आती है कहानी की सबसे ज़रूरी घटना। यह सन 1933 की बात है। एक मैच चल रहा था — “पंजाब रेजिमेंट” और “सैपर्स एंड माइनर्स टीम” के बीच। (“टीम” का मतलब है खिलाड़ियों का दल।)
माइनर्स टीम के एक खिलाड़ी ने ध्यानचंद से गेंद छीनने की बहुत कोशिश की। पर वह नाकाम रहा यानी सफल नहीं हुआ। इस पर वह बहुत गुस्सा हो गया। गुस्से में आकर उसने अपनी हॉकी की स्टिक ध्यानचंद के पैर पर दे मारी। यह खेल के नियम के खिलाफ़ था। ध्यानचंद को चोट लगी और वे मैदान से बाहर चले गए।
थोड़ी देर बाद ध्यानचंद की चोट थोड़ी ठीक हुई और वे फिर मैदान में लौट आए। अब उनके मन में क्या था? उन्होंने बदला लेने के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने उस खिलाड़ी के पास जाकर शांति से कहा — “तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं ज़रूर लूँगा।” वह खिलाड़ी डर गया कि अब ध्यानचंद उसे चोट पहुँचाएँगे।
पर ध्यानचंद का “बदला” बिलकुल अलग था। जैसे ही गेंद उनके पास आई, वे आगे बढ़े और एक के बाद एक, छह गोल कर डाले। हर गोल के बाद वे उस खिलाड़ी से कहते — “लो, यह रहा मेरा बदला।” यानी उन्होंने अपना बदला अपने खेल से लिया, स्टिक से नहीं।
और सबसे बड़ी बात अंत में हुई। सातवीं बार जब गेंद उनके पास आई, तो ध्यानचंद ने गोल खुद नहीं किया। उन्होंने वह गेंद उसी खिलाड़ी को दे दी, ताकि गोल करने का श्रेय यानी इनाम उसे मिले। ध्यानचंद ने कहा — “दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते, तो शायद मैं तुम्हें सिर्फ़ दो ही गोल से हराता।”
यह सुनकर वह खिलाड़ी बहुत शर्मिंदा हुआ। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। ध्यानचंद कहते हैं — सच मानो, बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।
बाद में, सन 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारत की हॉकी टीम ने सोने का तमगा (गोल्ड मेडल) जीता। उस मैच में ध्यानचंद के खेल को देखकर लोग दंग रह गए। ध्यानचंद कहते हैं कि वे खेलते समय हमेशा एक बात का ध्यान रखते थे — जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।
आइए गहराई से समझें
अब हम कहानी के पात्रों, उसके मुख्य भाव और सबसे ज़रूरी “क्यों” को समझेंगे।
कहानी के पात्र
इस छोटी-सी कहानी में मुख्य रूप से दो लोग हैं — एक खुद ध्यानचंद, और दूसरा वह गुस्सैल विरोधी खिलाड़ी। नीचे चित्र 2.2 दोनों का परिचय देता है, साथ ही वह खेल भी जिसमें यह घटना घटी।
- मेजर ध्यानचंद — कहानी के नायक। शांत स्वभाव के, बहुत मेहनती और सच्ची खेल-भावना वाले। वे गुस्से से नहीं, अपने खेल से जवाब देते हैं। देश को सबसे ऊपर रखते हैं।
- विरोधी खिलाड़ी — गुस्सैल और अधीर। हार बर्दाश्त नहीं कर पाता और गलत काम (स्टिक मारना) कर बैठता है। पर अंत में उसे अपनी गलती का एहसास होता है और वह शर्मिंदा होता है। यह दिखाता है कि गलती सुधारी जा सकती है।
कहानी का मुख्य भाव और संदेश
इस कहानी से हमें कई अच्छी बातें सीखने को मिलती हैं। नीचे चित्र 2.3 इन सब बातों को एक साथ दिखाता है।
मुख्य संदेश ये हैं:
- खेल-भावना — खेल को सिर्फ़ खेल की तरह खेलो। हार-जीत से ज़्यादा ज़रूरी है अच्छा व्यवहार। गुस्सा, बदला और झगड़ा खेल को खराब कर देते हैं।
- मेहनत और लगन — ध्यानचंद शुरू में कोई खास खिलाड़ी नहीं थे। वे लगातार मेहनत से इतने बड़े खिलाड़ी बने। मेहनत और लगन ही सफलता का असली मंत्र है। (“लगन” का मतलब है किसी काम में मन लगाकर, पूरी तरह जुट जाना।)
- बदला न लेना — बुरे काम का जवाब बुरे काम से देना सही नहीं। ध्यानचंद ने अपने खेल से, अच्छाई से जवाब दिया।
- देश के लिए खेलना — ध्यानचंद के लिए जीत निजी शान की बात नहीं थी। वे देश के लिए खेलते थे।
“क्यों” को समझें — ध्यानचंद ने बदला क्यों नहीं लिया?
यहाँ एक बहुत ज़रूरी सवाल है, जिसे अक्सर हम छोड़ देते हैं। ध्यानचंद चाहते तो उस खिलाड़ी को आसानी से चोट पहुँचा सकते थे। फिर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? आइए इसे सोचें।
ध्यानचंद ने उस खिलाड़ी से चोट का बदला स्टिक मारकर क्यों नहीं लिया?
क्योंकि ध्यानचंद के लिए खेल सबसे ऊपर था, गुस्सा नहीं। अगर वे भी पलटकर स्टिक मारते, तो वे भी उसी खिलाड़ी जैसे गलत हो जाते। इसके बजाय उन्होंने अपने खेल से जवाब दिया — छह गोल करके। इससे दो बातें हुईं — खेल भी साफ़-सुथरा रहा, और उस खिलाड़ी को अपनी गलती का एहसास भी हो गया। यही असली और बड़ी जीत थी।
अब एक और गहरी बात समझिए। यह कहानी का सबसे सुंदर मोड़ है — ध्यानचंद ने आखिरी गेंद उसी खिलाड़ी को क्यों दे दी? नीचे चित्र 2.4 उस पूरे पल को दिखाता है, जब ध्यानचंद के सामने दो रास्ते थे।
ध्यानचंद ने आखिरी गोल का मौका उस खिलाड़ी को इसलिए दिया, क्योंकि वे उसे नीचा नहीं दिखाना चाहते थे। वे सिर्फ़ यह दिखाना चाहते थे कि गुस्सा करना बेकार है। आखिरी गेंद देकर उन्होंने अपनी बड़ी सोच और दिल की भलाई दिखाई। यही “खेल-भावना” है — सामने वाले को हराना नहीं, बल्कि खेल और रिश्ते दोनों को सुंदर रखना।
आम भूलें
इस कहानी को समझते समय बच्चे अक्सर कुछ बातों में उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ करें।
ध्यानचंद ने 'बदला लूँगा' कहा, इसका मतलब वे सचमुच उस खिलाड़ी को चोट पहुँचाने वाले थे।
यह सोचना आसान है, क्योंकि रोज़ की भाषा में 'बदला लेना' का मतलब अक्सर सामने वाले को नुकसान पहुँचाना होता है, और खिलाड़ी खुद भी डर गया था।
ध्यानचंद का 'बदला' बिलकुल अलग था। उन्होंने एक के बाद एक छह गोल करके अपने खेल से जवाब दिया। उन्होंने उस खिलाड़ी को छुआ तक नहीं। यह बदला चोट का नहीं, अच्छे खेल का था।
यह कहानी सिर्फ़ हॉकी के बारे में है — कि हॉकी कैसे खेली जाती है।
कहानी का नाम 'गोल' है और इसमें मैच, स्टिक और गोल की बात है, इसलिए लगता है कि यह बस एक खेल की कहानी है।
हॉकी तो सिर्फ़ पृष्ठभूमि है। कहानी का असली मकसद है खेल-भावना, मेहनत, गुस्से पर काबू और देश-प्रेम सिखाना। ये बातें ज़िंदगी के हर हिस्से में काम आती हैं, सिर्फ़ खेल में नहीं।
ध्यानचंद शुरू से ही बहुत बड़े और मशहूर हॉकी खिलाड़ी थे।
आज हम उन्हें 'हॉकी का जादूगर' के रूप में जानते हैं, इसलिए लगता है कि वे हमेशा से ऐसे ही रहे होंगे।
शुरू में हॉकी में उनकी कोई खास रुचि नहीं थी, और अभ्यास का कोई तय समय भी नहीं था। वे लगातार मेहनत और लगन से धीरे-धीरे इतने बड़े खिलाड़ी बने। यही कहानी की एक बड़ी सीख है।
जाँचिए अपनी समझ
खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।
इस पाठ 'गोल' के लेखक कौन हैं?
मैच में विरोधी खिलाड़ी ने गुस्से में आकर ध्यानचंद के साथ क्या किया?
ध्यानचंद ने अपना 'बदला' किस तरह लिया?
ध्यानचंद खेलते समय हमेशा किस बात का ध्यान रखते थे?
अभ्यास (श्रेणीबद्ध)
पहले अपना उत्तर खुद लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए।
सरल
मेजर ध्यानचंद का जन्म कब और कहाँ हुआ था? वे फ़ौज में किस उम्र में भर्ती हुए?
मेजर ध्यानचंद का जन्म सन 1905 में प्रयाग (आज का प्रयागराज) में हुआ था। वे एक साधारण परिवार से थे। जब वे 16 साल के हुए, तब वे फ़ौज में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गए।
मैच में विरोधी खिलाड़ी ने ध्यानचंद के साथ बुरा व्यवहार क्यों किया?
वह खिलाड़ी ध्यानचंद से गेंद छीनने की बार-बार कोशिश कर रहा था, पर वह कामयाब नहीं हो पा रहा था। इसी बात पर वह बहुत गुस्सा हो गया। गुस्से में आकर उसने अपनी हॉकी स्टिक ध्यानचंद के पैर पर दे मारी, जिससे उन्हें चोट लग गई।
मध्यम
ध्यानचंद ने उस खिलाड़ी से क्या कहा, और उसे अपनी गलती का एहसास कैसे हुआ?
छह गोल करने के बाद ध्यानचंद ने आखिरी गेंद उसी खिलाड़ी को दे दी, ताकि गोल का श्रेय उसे मिले। फिर उन्होंने प्यार से कहा — “दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते, तो शायद मैं तुम्हें सिर्फ़ दो ही गोल से हराता।”
इस बात ने उस खिलाड़ी का दिल छू लिया। उसे समझ आया कि उसके गुस्से की वजह से ही ध्यानचंद ने इतने गोल किए। ध्यानचंद ने उसे चोट नहीं पहुँचाई, उल्टा अच्छाई से पेश आए। इससे वह खिलाड़ी बहुत शर्मिंदा हुआ।
इस कहानी से हमें कौन-कौन सी सीख मिलती है? कोई तीन बताइए।
इस कहानी से हमें कई अच्छी सीखें मिलती हैं:
- खेल-भावना — खेल को खेल की तरह खेलो। गुस्सा और बदला खेल को खराब कर देते हैं।
- बदला नहीं, अच्छाई — बुरे काम का जवाब बुरे काम से नहीं, बल्कि अच्छाई से देना चाहिए। ध्यानचंद ने अपने खेल से जवाब दिया।
- मेहनत और लगन — ध्यानचंद शुरू में खास खिलाड़ी नहीं थे। लगातार मेहनत से वे “हॉकी का जादूगर” बने।
(चौथी सीख — हमेशा देश के लिए खेलना, अपनी शान के लिए नहीं।)
चुनौती
शब्दार्थ लिखिए — (क) जादूगर (ख) रेजिमेंट (ग) नाकाम (घ) शर्मिंदा। फिर 'नाकाम' और 'शर्मिंदा' का अपने वाक्य में प्रयोग कीजिए।
शब्दार्थ:
- जादूगर — जादू दिखाने वाला। यहाँ इसका मतलब है ऐसा खिलाड़ी जो इतना कमाल खेले मानो जादू कर रहा हो।
- रेजिमेंट — फ़ौज की एक बड़ी टुकड़ी यानी सैनिकों का एक दल।
- नाकाम — असफल, जो अपने काम में सफल न हो पाए।
- शर्मिंदा — जिसे अपनी गलती पर शर्म महसूस हो।
वाक्य प्रयोग:
- नाकाम — विरोधी खिलाड़ी गेंद छीनने में नाकाम रहा।
- शर्मिंदा — अपनी गलती समझकर वह खिलाड़ी बहुत शर्मिंदा हुआ।
'गुस्से का जवाब अच्छाई से देना ही सबसे बड़ी जीत है' — इस कहानी के आधार पर इस बात को समझाइए।
यह कहानी इसी बात को बहुत सुंदर तरीके से समझाती है।
जब विरोधी खिलाड़ी ने ध्यानचंद के पैर पर स्टिक मारी, तो ध्यानचंद चाहते तो पलटकर बदला ले सकते थे। पर अगर वे ऐसा करते, तो वे भी उसी खिलाड़ी जैसे गलत हो जाते। झगड़ा बढ़ता और खेल खराब होता।
इसके बजाय ध्यानचंद ने अपने खेल से जवाब दिया। उन्होंने छह गोल किए और फिर आखिरी गेंद उसी खिलाड़ी को दे दी। इससे तीन बातें हुईं — खेल साफ़-सुथरा रहा, ध्यानचंद की बड़ी सोच सामने आई, और वह खिलाड़ी खुद शर्मिंदा हो गया।
यानी ध्यानचंद ने बिना किसी को चोट पहुँचाए, बिना गुस्सा किए, सामने वाले का दिल भी जीत लिया और खेल भी जीता। इसलिए कह सकते हैं कि गुस्से का जवाब अच्छाई से देना ही सबसे बड़ी जीत है — क्योंकि इसमें कोई हारता नहीं, सब कुछ सुंदर बना रहता है।
सारांश
- यह पाठ “गोल” मेजर ध्यानचंद की अपनी ज़िंदगी की सच्ची कहानी है। उन्हें दुनिया “हॉकी का जादूगर” कहती है।
- उनका जन्म सन 1905 में प्रयाग में हुआ। वे 16 साल की उम्र में फ़ौज में सिपाही बने।
- शुरू में हॉकी में उनकी खास रुचि नहीं थी। पर मेहनत और लगन से वे बहुत बड़े खिलाड़ी बने।
- सन 1933 के एक मैच में एक खिलाड़ी ने गुस्से में उनके पैर पर स्टिक मार दी।
- ध्यानचंद ने बदला नहीं लिया। उन्होंने अपने खेल से जवाब दिया — एक के बाद एक छह गोल किए।
- फिर उन्होंने आखिरी गेंद उसी खिलाड़ी को दे दी, जिससे वह शर्मिंदा हुआ। यही असली खेल-भावना है।
- सन 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारत ने सोने का तमगा जीता। ध्यानचंद हमेशा देश के लिए खेलते थे।
- कहानी की मुख्य सीख — खेल-भावना, मेहनत, गुस्से पर काबू और देश-प्रेम।
आगे क्या?
इस कहानी में हमने एक सच्चे खिलाड़ी की भावना और अच्छाई को देखा। अगला पाठ हमें प्रकृति के पास ले जाता है। पाठ 3 — “पहली बूँद” में हम बारिश की पहली बूँद और उसकी सुंदरता के बारे में पढ़ेंगे। जैसे यहाँ ध्यानचंद की भावना ने मन छुआ, वैसे ही वहाँ बारिश की पहली बूँद का एहसास आपके मन को भिगो देगा।
Frequently Asked Questions
गोल पाठ का सारांश क्या है?
'गोल' मेजर ध्यानचंद की आत्मकथा का अंश है। एक मैच में विरोधी खिलाड़ी ने ध्यानचंद की टाँग पर चोट मारी। ध्यानचंद ने बदला नहीं लिया बल्कि उस मैच में छह गोल दागे और जीत अपने नाम की।
मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर क्यों कहते हैं?
मेजर ध्यानचंद की हॉकी खेलने की कला इतनी अद्भुत थी कि दुनिया भर के लोग देखते रह जाते थे। वे गेंद को इस तरह नियंत्रित करते थे जैसे उसमें जादू हो। इसीलिए उन्हें 'हॉकी का जादूगर' कहा जाता है।
'गोल' पाठ से हमें क्या सीख मिलती है?
इस पाठ से हमें सीख मिलती है कि बदला लेने से नहीं, अपने खेल से जवाब देना चाहिए। असली खेल-भावना यही है कि चोट या दुर्व्यवहार से हार न मानें और देश के लिए पूरी लगन से खेलें।
ध्यानचंद ने 1936 के ओलंपिक में क्या किया?
1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीता। ध्यानचंद ने इस जीत में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपनी असाधारण खेल-कला से पूरी दुनिया को चकित कर दिया।
ध्यानचंद का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
मेजर ध्यानचंद का जन्म 1905 में हुआ था। उन्होंने सोलह साल की उम्र में सेना में भर्ती होकर हॉकी खेलना शुरू किया और अपनी मेहनत और लगन से भारत के महान खिलाड़ी बने।