गोल

Chapter 2 · Hindi · Class 6 16 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। आप कोई खेल खेल रहे हैं। तभी सामने वाला खिलाड़ी गुस्से में आपको चोट पहुँचा देता है। आपका पैर दुखने लगता है। अब आपके मन में क्या आएगा? शायद यह कि “मैं भी इसे चोट पहुँचाऊँगा। मैं इससे बदला लूँगा।”

यह गुस्सा आना बहुत आम बात है। पर सोचिए — क्या बदला लेना सही जवाब है?

यह पाठ ठीक इसी सवाल का जवाब देता है। यह कहानी हमें एक बहुत बड़े खिलाड़ी के बारे में बताती है — मेजर ध्यानचंद। उन्हें दुनिया “हॉकी का जादूगर” कहती है। (“जादूगर” का मतलब है जादू करने वाला। ध्यानचंद हॉकी में इतना अच्छा खेलते थे कि लगता था जैसे गेंद उनकी स्टिक से चिपक गई हो — मानो वे जादू कर रहे हों।)

एक मैच में एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर ध्यानचंद के पैर पर हॉकी की स्टिक दे मारी। पर ध्यानचंद ने बदला नहीं लिया। उन्होंने कुछ और ही किया — कुछ बहुत बड़ा। यही इस कहानी की जान है। इसे पढ़कर हम सीखते हैं कि सच्चा खिलाड़ी गुस्से से नहीं, अपने खेल और अच्छे व्यवहार से जीतता है।

मूल भाव

इस पाठ का मूल भाव है — खेल में गुस्सा और बदला नहीं, बल्कि खेल-भावना और मेहनत ही सबसे बड़ी बात है। चोट लगने पर भी मेजर ध्यानचंद ने बदला नहीं लिया। उन्होंने अपने शानदार खेल से जवाब दिया और एक के बाद एक छह गोल किए। फिर उन्होंने उसी खिलाड़ी को भी गोल का मौका दे दिया। इससे वह खिलाड़ी शर्मिंदा हुआ। कहानी सिखाती है कि बुरे काम का जवाब अच्छाई से देना ही असली जीत है। साथ ही, ध्यानचंद हमेशा देश के लिए खेलते थे, अपनी शान के लिए नहीं।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने पाठ का सरल अर्थ और व्याख्या दी है। पूरा मूल पाठ अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “मल्हार” (कक्षा 6) में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें।

कहानी का सार

यह कहानी खुद मेजर ध्यानचंद ने सुनाई है। यानी यह उनकी अपनी ज़िंदगी की सच्ची बात है। आइए इसे क्रम से, सरल भाषा में समझते हैं।

ध्यानचंद बताते हैं कि उनका जन्म सन 1905 में प्रयाग (आज का प्रयागराज) में हुआ। वे एक साधारण परिवार से थे। जब वे 16 साल के हुए, तब वे फ़ौज में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गए। उनकी रेजिमेंट यानी फ़ौज की टुकड़ी का नाम था “फ़र्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट”।

शुरू में हॉकी में उनकी कोई खास रुचि नहीं थी। ध्यान दीजिए — उस समय हॉकी के अभ्यास (प्रैक्टिस) का कोई तय समय नहीं था। सिपाही जब चाहें मैदान में जाकर खेलने लगते थे। धीरे-धीरे ध्यानचंद का खेल निखरता गया और वे बहुत अच्छे खिलाड़ी बन गए। दुनिया उन्हें “हॉकी का जादूगर” कहने लगी।

नीचे दिया चित्र 2.1 पूरी कहानी को एक नज़र में दिखाता है — शुरू से अंत तक क्या-क्या हुआ।

गोल कहानी का घटना-क्रम
Figure 2.1 — कहानी के पाँच पड़ाव बाएँ से दाएँ। (1) परिचय — ध्यानचंद फ़ौज में हॉकी खेलते हैं। (2) चोट — एक मैच में विरोधी खिलाड़ी गुस्से में उनके पैर पर स्टिक मार देता है। (3) चुनाव — ध्यानचंद बदला नहीं लेते, गेंद लेकर आगे बढ़ जाते हैं। (4) छह गोल — वे एक के बाद एक छह गोल करते हैं, फिर विरोधी को भी पास देते हैं। (5) संदेश — विरोधी शर्मिंदा होता है और खेल-भावना की जीत होती है। नीचे का नीला बॉक्स कहानी का सार बताता है।

अब आती है कहानी की सबसे ज़रूरी घटना। यह सन 1933 की बात है। एक मैच चल रहा था — “पंजाब रेजिमेंट” और “सैपर्स एंड माइनर्स टीम” के बीच। (“टीम” का मतलब है खिलाड़ियों का दल।)

माइनर्स टीम के एक खिलाड़ी ने ध्यानचंद से गेंद छीनने की बहुत कोशिश की। पर वह नाकाम रहा यानी सफल नहीं हुआ। इस पर वह बहुत गुस्सा हो गया। गुस्से में आकर उसने अपनी हॉकी की स्टिक ध्यानचंद के पैर पर दे मारी। यह खेल के नियम के खिलाफ़ था। ध्यानचंद को चोट लगी और वे मैदान से बाहर चले गए।

थोड़ी देर बाद ध्यानचंद की चोट थोड़ी ठीक हुई और वे फिर मैदान में लौट आए। अब उनके मन में क्या था? उन्होंने बदला लेने के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने उस खिलाड़ी के पास जाकर शांति से कहा — “तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं ज़रूर लूँगा।” वह खिलाड़ी डर गया कि अब ध्यानचंद उसे चोट पहुँचाएँगे।

पर ध्यानचंद का “बदला” बिलकुल अलग था। जैसे ही गेंद उनके पास आई, वे आगे बढ़े और एक के बाद एक, छह गोल कर डाले। हर गोल के बाद वे उस खिलाड़ी से कहते — “लो, यह रहा मेरा बदला।” यानी उन्होंने अपना बदला अपने खेल से लिया, स्टिक से नहीं।

और सबसे बड़ी बात अंत में हुई। सातवीं बार जब गेंद उनके पास आई, तो ध्यानचंद ने गोल खुद नहीं किया। उन्होंने वह गेंद उसी खिलाड़ी को दे दी, ताकि गोल करने का श्रेय यानी इनाम उसे मिले। ध्यानचंद ने कहा — “दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते, तो शायद मैं तुम्हें सिर्फ़ दो ही गोल से हराता।”

यह सुनकर वह खिलाड़ी बहुत शर्मिंदा हुआ। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। ध्यानचंद कहते हैं — सच मानो, बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।

बाद में, सन 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारत की हॉकी टीम ने सोने का तमगा (गोल्ड मेडल) जीता। उस मैच में ध्यानचंद के खेल को देखकर लोग दंग रह गए। ध्यानचंद कहते हैं कि वे खेलते समय हमेशा एक बात का ध्यान रखते थे — जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।

आइए गहराई से समझें

अब हम कहानी के पात्रों, उसके मुख्य भाव और सबसे ज़रूरी “क्यों” को समझेंगे।

कहानी के पात्र

इस छोटी-सी कहानी में मुख्य रूप से दो लोग हैं — एक खुद ध्यानचंद, और दूसरा वह गुस्सैल विरोधी खिलाड़ी। नीचे चित्र 2.2 दोनों का परिचय देता है, साथ ही वह खेल भी जिसमें यह घटना घटी।

गोल कहानी के मुख्य पात्र
Figure 2.2 — ऊपर बीच में मेजर ध्यानचंद — कहानी के लेखक और मुख्य पात्र, जिन्हें 'हॉकी का जादूगर' कहा जाता है। वे शांत, मेहनती और खेल-भावना वाले हैं। नीचे बाएँ लाल बॉक्स में विरोधी खिलाड़ी — गुस्सैल, जो गेंद छीनने में नाकाम होने पर ध्यानचंद के पैर पर स्टिक मार देता है। नीचे दाएँ हरे बॉक्स में हॉकी का खेल — वह मैदान जहाँ यह घटना घटी।
  • मेजर ध्यानचंद — कहानी के नायक। शांत स्वभाव के, बहुत मेहनती और सच्ची खेल-भावना वाले। वे गुस्से से नहीं, अपने खेल से जवाब देते हैं। देश को सबसे ऊपर रखते हैं।
  • विरोधी खिलाड़ी — गुस्सैल और अधीर। हार बर्दाश्त नहीं कर पाता और गलत काम (स्टिक मारना) कर बैठता है। पर अंत में उसे अपनी गलती का एहसास होता है और वह शर्मिंदा होता है। यह दिखाता है कि गलती सुधारी जा सकती है।

कहानी का मुख्य भाव और संदेश

इस कहानी से हमें कई अच्छी बातें सीखने को मिलती हैं। नीचे चित्र 2.3 इन सब बातों को एक साथ दिखाता है।

गोल कहानी का संदेश
Figure 2.3 — बीच के नीले गोले में 'गोल' कहानी का संदेश, और चारों ओर चार सीखें। ऊपर बाएँ (हरा) — खेल-भावना: खेल को खेल की तरह खेलो। ऊपर दाएँ (पीला) — मेहनत और लगन: मेहनत ही सफलता का मंत्र है। नीचे बाएँ (लाल) — बदला न लेना: गुस्से का जवाब गुस्सा नहीं होता। नीचे दाएँ (बैंगनी) — देश के लिए खेलना: जीत मेरी नहीं, देश की है।

मुख्य संदेश ये हैं:

  • खेल-भावना — खेल को सिर्फ़ खेल की तरह खेलो। हार-जीत से ज़्यादा ज़रूरी है अच्छा व्यवहार। गुस्सा, बदला और झगड़ा खेल को खराब कर देते हैं।
  • मेहनत और लगन — ध्यानचंद शुरू में कोई खास खिलाड़ी नहीं थे। वे लगातार मेहनत से इतने बड़े खिलाड़ी बने। मेहनत और लगन ही सफलता का असली मंत्र है। (“लगन” का मतलब है किसी काम में मन लगाकर, पूरी तरह जुट जाना।)
  • बदला न लेना — बुरे काम का जवाब बुरे काम से देना सही नहीं। ध्यानचंद ने अपने खेल से, अच्छाई से जवाब दिया।
  • देश के लिए खेलना — ध्यानचंद के लिए जीत निजी शान की बात नहीं थी। वे देश के लिए खेलते थे।

“क्यों” को समझें — ध्यानचंद ने बदला क्यों नहीं लिया?

यहाँ एक बहुत ज़रूरी सवाल है, जिसे अक्सर हम छोड़ देते हैं। ध्यानचंद चाहते तो उस खिलाड़ी को आसानी से चोट पहुँचा सकते थे। फिर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? आइए इसे सोचें।

Concept check

ध्यानचंद ने उस खिलाड़ी से चोट का बदला स्टिक मारकर क्यों नहीं लिया?

अब एक और गहरी बात समझिए। यह कहानी का सबसे सुंदर मोड़ है — ध्यानचंद ने आखिरी गेंद उसी खिलाड़ी को क्यों दे दी? नीचे चित्र 2.4 उस पूरे पल को दिखाता है, जब ध्यानचंद के सामने दो रास्ते थे।

गोल कहानी का मुख्य दृश्य — दो रास्ते
Figure 2.4 — चोट लगने के बाद ध्यानचंद के सामने दो रास्ते थे। ऊपर लाल बॉक्स में हालत — विरोधी ने स्टिक मारी। बाईं ओर गलत रास्ता (लाल) — गुस्से में बदला लेना, जो ध्यानचंद ने नहीं चुना। दाईं ओर सही रास्ता (हरा) — गेंद लेकर आगे बढ़ना और खेल से जवाब देना, जो उन्होंने चुना। नीचे नीले बॉक्स में नतीजा — उन्होंने छह गोल किए, फिर विरोधी को भी गोल का मौका दिया, और विरोधी शर्मिंदा हुआ।

ध्यानचंद ने आखिरी गोल का मौका उस खिलाड़ी को इसलिए दिया, क्योंकि वे उसे नीचा नहीं दिखाना चाहते थे। वे सिर्फ़ यह दिखाना चाहते थे कि गुस्सा करना बेकार है। आखिरी गेंद देकर उन्होंने अपनी बड़ी सोच और दिल की भलाई दिखाई। यही “खेल-भावना” है — सामने वाले को हराना नहीं, बल्कि खेल और रिश्ते दोनों को सुंदर रखना।

आम भूलें

इस कहानी को समझते समय बच्चे अक्सर कुछ बातों में उलझ जाते हैं। आइए इन्हें साफ़ करें।

⚠️ Common mistake
What students think

ध्यानचंद ने 'बदला लूँगा' कहा, इसका मतलब वे सचमुच उस खिलाड़ी को चोट पहुँचाने वाले थे।

Why it seems right

यह सोचना आसान है, क्योंकि रोज़ की भाषा में 'बदला लेना' का मतलब अक्सर सामने वाले को नुकसान पहुँचाना होता है, और खिलाड़ी खुद भी डर गया था।

What actually happens

ध्यानचंद का 'बदला' बिलकुल अलग था। उन्होंने एक के बाद एक छह गोल करके अपने खेल से जवाब दिया। उन्होंने उस खिलाड़ी को छुआ तक नहीं। यह बदला चोट का नहीं, अच्छे खेल का था।

⚠️ Common mistake
What students think

यह कहानी सिर्फ़ हॉकी के बारे में है — कि हॉकी कैसे खेली जाती है।

Why it seems right

कहानी का नाम 'गोल' है और इसमें मैच, स्टिक और गोल की बात है, इसलिए लगता है कि यह बस एक खेल की कहानी है।

What actually happens

हॉकी तो सिर्फ़ पृष्ठभूमि है। कहानी का असली मकसद है खेल-भावना, मेहनत, गुस्से पर काबू और देश-प्रेम सिखाना। ये बातें ज़िंदगी के हर हिस्से में काम आती हैं, सिर्फ़ खेल में नहीं।

⚠️ Common mistake
What students think

ध्यानचंद शुरू से ही बहुत बड़े और मशहूर हॉकी खिलाड़ी थे।

Why it seems right

आज हम उन्हें 'हॉकी का जादूगर' के रूप में जानते हैं, इसलिए लगता है कि वे हमेशा से ऐसे ही रहे होंगे।

What actually happens

शुरू में हॉकी में उनकी कोई खास रुचि नहीं थी, और अभ्यास का कोई तय समय भी नहीं था। वे लगातार मेहनत और लगन से धीरे-धीरे इतने बड़े खिलाड़ी बने। यही कहानी की एक बड़ी सीख है।

जाँचिए अपनी समझ

खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।

इस पाठ 'गोल' के लेखक कौन हैं?

मैच में विरोधी खिलाड़ी ने गुस्से में आकर ध्यानचंद के साथ क्या किया?

ध्यानचंद ने अपना 'बदला' किस तरह लिया?

ध्यानचंद खेलते समय हमेशा किस बात का ध्यान रखते थे?

अभ्यास (श्रेणीबद्ध)

पहले अपना उत्तर खुद लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए।

सरल

easy

मेजर ध्यानचंद का जन्म कब और कहाँ हुआ था? वे फ़ौज में किस उम्र में भर्ती हुए?

easy

मैच में विरोधी खिलाड़ी ने ध्यानचंद के साथ बुरा व्यवहार क्यों किया?

मध्यम

medium

ध्यानचंद ने उस खिलाड़ी से क्या कहा, और उसे अपनी गलती का एहसास कैसे हुआ?

medium

इस कहानी से हमें कौन-कौन सी सीख मिलती है? कोई तीन बताइए।

चुनौती

challenge

शब्दार्थ लिखिए — (क) जादूगर (ख) रेजिमेंट (ग) नाकाम (घ) शर्मिंदा। फिर 'नाकाम' और 'शर्मिंदा' का अपने वाक्य में प्रयोग कीजिए।

challenge

'गुस्से का जवाब अच्छाई से देना ही सबसे बड़ी जीत है' — इस कहानी के आधार पर इस बात को समझाइए।

सारांश

  • यह पाठ “गोल” मेजर ध्यानचंद की अपनी ज़िंदगी की सच्ची कहानी है। उन्हें दुनिया “हॉकी का जादूगर” कहती है।
  • उनका जन्म सन 1905 में प्रयाग में हुआ। वे 16 साल की उम्र में फ़ौज में सिपाही बने।
  • शुरू में हॉकी में उनकी खास रुचि नहीं थी। पर मेहनत और लगन से वे बहुत बड़े खिलाड़ी बने।
  • सन 1933 के एक मैच में एक खिलाड़ी ने गुस्से में उनके पैर पर स्टिक मार दी।
  • ध्यानचंद ने बदला नहीं लिया। उन्होंने अपने खेल से जवाब दिया — एक के बाद एक छह गोल किए।
  • फिर उन्होंने आखिरी गेंद उसी खिलाड़ी को दे दी, जिससे वह शर्मिंदा हुआ। यही असली खेल-भावना है।
  • सन 1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारत ने सोने का तमगा जीता। ध्यानचंद हमेशा देश के लिए खेलते थे।
  • कहानी की मुख्य सीख — खेल-भावना, मेहनत, गुस्से पर काबू और देश-प्रेम।

आगे क्या?

इस कहानी में हमने एक सच्चे खिलाड़ी की भावना और अच्छाई को देखा। अगला पाठ हमें प्रकृति के पास ले जाता है। पाठ 3 — “पहली बूँद” में हम बारिश की पहली बूँद और उसकी सुंदरता के बारे में पढ़ेंगे। जैसे यहाँ ध्यानचंद की भावना ने मन छुआ, वैसे ही वहाँ बारिश की पहली बूँद का एहसास आपके मन को भिगो देगा।

Frequently Asked Questions

गोल पाठ का सारांश क्या है?

'गोल' मेजर ध्यानचंद की आत्मकथा का अंश है। एक मैच में विरोधी खिलाड़ी ने ध्यानचंद की टाँग पर चोट मारी। ध्यानचंद ने बदला नहीं लिया बल्कि उस मैच में छह गोल दागे और जीत अपने नाम की।

मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर क्यों कहते हैं?

मेजर ध्यानचंद की हॉकी खेलने की कला इतनी अद्भुत थी कि दुनिया भर के लोग देखते रह जाते थे। वे गेंद को इस तरह नियंत्रित करते थे जैसे उसमें जादू हो। इसीलिए उन्हें 'हॉकी का जादूगर' कहा जाता है।

'गोल' पाठ से हमें क्या सीख मिलती है?

इस पाठ से हमें सीख मिलती है कि बदला लेने से नहीं, अपने खेल से जवाब देना चाहिए। असली खेल-भावना यही है कि चोट या दुर्व्यवहार से हार न मानें और देश के लिए पूरी लगन से खेलें।

ध्यानचंद ने 1936 के ओलंपिक में क्या किया?

1936 के बर्लिन ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीता। ध्यानचंद ने इस जीत में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपनी असाधारण खेल-कला से पूरी दुनिया को चकित कर दिया।

ध्यानचंद का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

मेजर ध्यानचंद का जन्म 1905 में हुआ था। उन्होंने सोलह साल की उम्र में सेना में भर्ती होकर हॉकी खेलना शुरू किया और अपनी मेहनत और लगन से भारत के महान खिलाड़ी बने।