तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए — कोई इंसान अपनी सारी कमाई, सारी मेहनत और सारा दिल किसी एक काम में लगा दे, और बदले में उसे घाटा हो जाए। फिर भी वह काम इतना सुंदर बने कि सालों बाद भी लोग उसे याद करें। क्या ऐसा करना समझदारी है, या पागलपन? या शायद यही असली कला है?
यह पाठ ठीक इसी सवाल से जुड़ा है। यह एक मशहूर गीतकार शैलेंद्र की कहानी है। शैलेंद्र फ़िल्मों के लिए गीत लिखते थे और बहुत प्रसिद्ध थे। पर उनके मन में एक सपना था — एक ऐसी फ़िल्म बनाना जो उनके दिल की हो। उन्होंने वह फ़िल्म बनाई — ‘तीसरी कसम’ (सन् 1966)। यह फ़िल्म कला की दृष्टि से बहुत ऊँची थी, पर पैसे के मामले में नाकाम रही। शैलेंद्र को भारी घाटा हुआ।
यह पाठ हमें एक गहरी बात समझाता है — कला और व्यापार में फ़र्क होता है। हर अच्छी चीज़ ज़्यादा पैसा नहीं कमाती, और हर ज़्यादा कमाने वाली चीज़ अच्छी नहीं होती। शैलेंद्र जैसे सच्चे कलाकार मुनाफ़े के पीछे नहीं भागते; वे दिल की बात कहते हैं। इसी वजह से यह पाठ मन को छू जाता है और सोचने पर मजबूर करता है।
लेखक-परिचय
इस पाठ को समझने से पहले इसके लेखक के बारे में थोड़ा जान लेना अच्छा रहेगा।
मूल भाव
इस पाठ का मूल भाव है — सच्चा कलाकार कला को मुनाफ़े से ऊपर रखता है। गीतकार शैलेंद्र ने अपनी एकमात्र फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि दिल से, एक सुंदर कलाकृति रचने के लिए बनाई। फ़िल्म कला की दृष्टि से बहुत ऊँची रही, पर बाज़ार में असफल हो गई और शैलेंद्र को घाटा हुआ। फिर भी वे झुके नहीं। पाठ हमें सिखाता है कि असली कला घिसे-पिटे बाज़ारू फ़ॉर्मूलों से नहीं, बल्कि सच्ची भावना और संवेदनशील हृदय से जन्म लेती है।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: यह रचना अभी कॉपीराइट के अधीन है, इसलिए इसका पूरा मूल पाठ यहाँ नहीं दिया गया है। कृपया मूल पाठ अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “स्पर्श भाग 2” में पढ़ें। नीचे हमने उसका विस्तृत सार और व्याख्या दी है — पुस्तक के साथ इसे पढ़कर आप पाठ को पूरी तरह समझ सकते हैं।
पाठ का सार
आइए पूरे पाठ की बात को सरल भाषा में, अपने शब्दों में, क्रम से समझते हैं।
यह पाठ एक निबंध है, यानी किसी विषय पर लेखक की सोच और जानकारी से भरा लेख। इसका विषय है — मशहूर गीतकार शैलेंद्र और उनकी बनाई एकमात्र फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ (सन् 1966)। शैलेंद्र फ़िल्मों के लिए गीत लिखकर पहले से ही बहुत प्रसिद्ध थे। पर ‘तीसरी कसम’ में उन्होंने पहली बार सिर्फ़ गीत नहीं लिखे — उन्होंने पूरी फ़िल्म खुद बनाई (निर्माण किया)।
यह फ़िल्म मशहूर कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर बनी थी। फ़िल्म में नायक (हीरो) की भूमिका राज कपूर ने निभाई — वे एक भोले-भाले गाड़ीवान हीरामन बने। नायिका (हीरोइन) वहीदा रहमान थीं, जिन्होंने एक नर्तकी हीराबाई की भूमिका की। यह एक सीधी-सादी, गाँव-देहात की भावनापूर्ण कहानी थी, जिसमें दो साधारण लोगों के दिल के रिश्ते को बड़ी कोमलता से दिखाया गया।
यहाँ कहानी का सबसे मार्मिक मोड़ आता है। फ़िल्म कला की दृष्टि से बहुत उत्कृष्ट (बेहतरीन) बनी। पर व्यावसायिक रूप से, यानी कमाई के मामले में, वह असफल रही। उस ज़माने की भीड़ को जो मसालेदार, फ़ॉर्मूले वाली फ़िल्में पसंद थीं, यह उससे अलग थी। इसलिए सिनेमाघरों में यह उतनी नहीं चली। शैलेंद्र को इससे भारी आर्थिक घाटा हुआ।
लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि शैलेंद्र ने यह फ़िल्म मुनाफ़े की परवाह किए बिना, पूरे दिल से बनाई थी। उनका मकसद पैसा कमाना नहीं था; वे एक सच्ची और सुंदर कलाकृति रचना चाहते थे। वे जानते थे कि यह फ़िल्म शायद ज़्यादा न कमाए, फिर भी उन्होंने अपने सपने से समझौता नहीं किया।
पाठ में राज कपूर का भी ज़िक्र है। राज कपूर उस समय बहुत बड़े और महँगे अभिनेता थे, पर शैलेंद्र के इस सपने में उनका साथ देने के लिए उन्होंने बहुत कम पैसों में, बस एक रुपए जैसी मामूली रकम पर काम किया। यह दिखाता है कि कला से प्यार करने वाले कलाकार मुनाफ़े से ऊपर भी सोच सकते हैं।
पाठ शैलेंद्र की संवेदनशीलता (दूसरों के दुख-दर्द को गहराई से महसूस करने की क्षमता) को भी सामने लाता है। एक कवि और गीतकार के रूप में उनका हृदय बहुत कोमल था। यही कोमलता और सच्चाई उनके गीतों और इस फ़िल्म, दोनों में झलकती है। वे बनावटी या दिखावटी इंसान नहीं थे; वे सरल, सीधे और सच्चे थे।
आइए गहराई से समझें
अब केवल “क्या हुआ” से आगे बढ़कर “ऐसा क्यों है” समझते हैं। यही इस पाठ की असली गहराई है।
फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ — पूरी जानकारी एक नज़र में
बातचीत में जिन नाम और भूमिकाओं का बार-बार ज़िक्र होगा, पहले उन्हें एक जगह साफ़ कर लेते हैं। नीचे चित्र 11.2 में फ़िल्म की पूरी जानकारी एक कार्ड में दी गई है।
ध्यान दीजिए — फ़िल्म एक प्रसिद्ध कहानी पर बनी और इसमें उस समय के बड़े कलाकार थे। फिर भी यह बाज़ार में क्यों नहीं चली, यह आगे समझेंगे।
कला बनाम व्यावसायिकता
यह पाठ का सबसे केंद्रीय विचार है। इसे ठीक से समझना ज़रूरी है। पहले एक छोटा-सा फ़र्क साफ़ कर लें।
अब इन दोनों रास्तों को साथ-साथ देखिए। चित्र 11.1 इस फ़र्क को साफ़ करता है।
अब सबसे ज़रूरी प्रश्न — कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं है। आइए दो गहरे “क्यों” समझते हैं।
क्यों, एक बेहतरीन फ़िल्म होते हुए भी ‘तीसरी कसम’ बाज़ार में असफल रही? यह बात पहली नज़र में उल्टी लगती है — अच्छी चीज़ तो चलनी चाहिए! पर ज़रा सोचिए। उस ज़माने में ज़्यादातर दर्शक सिनेमाघर मनोरंजन के लिए जाते थे — एक्शन, नाच-गाना, चमक-दमक और मसालेदार कहानी देखने। ‘तीसरी कसम’ एक धीमी, कोमल और गहरी भावना वाली फ़िल्म थी। इसमें गाँव-देहात की सच्चाई और एक सीधे-सादे रिश्ते की मार्मिकता थी, पर भीड़ को लुभाने वाला मसाला नहीं। इसलिए आम दर्शक तक इसकी बात पहुँच ही नहीं पाई। इसका मतलब यह नहीं कि फ़िल्म खराब थी — इसका मतलब सिर्फ़ यह है कि बाज़ार की पसंद और कला की ऊँचाई हमेशा एक जैसी नहीं होतीं।
क्यों, शैलेंद्र ने घाटे का खतरा जानते हुए भी यह फ़िल्म बनाई? यही पाठ का असली मर्म है। इसका जवाब उनके कलाकार-हृदय में है। शैलेंद्र के लिए फ़िल्म बनाना दुकानदारी नहीं, बल्कि अपने दिल की बात कहना था। जैसे एक चित्रकार सिर्फ़ बेचने के लिए नहीं, अपने मन की सुंदरता उतारने के लिए तस्वीर बनाता है, वैसे ही शैलेंद्र एक सच्ची कलाकृति रचना चाहते थे। उन्होंने तय कर लिया था कि वे भीड़ की पसंद के आगे झुककर अपनी कला से समझौता नहीं करेंगे। मुनाफ़ा हो या न हो, फ़िल्म वैसी ही बनेगी जैसी उनका दिल कहता है। यही जुनून और ईमानदारी उन्हें एक सच्चा कलाकार बनाती है।
अगर 'तीसरी कसम' कला में इतनी अच्छी थी, तो उसका बाज़ार में पिटना शैलेंद्र की हार क्यों नहीं मानी जाती?
सच्चे कलाकार का जुनून और शैलेंद्र का व्यक्तित्व
अब उस इंसान को समझते हैं जिसके बारे में यह पूरा पाठ है। शैलेंद्र कैसे व्यक्ति थे? उनके स्वभाव के मुख्य गुण नीचे चित्र 11.3 में एक साथ देखिए।
शैलेंद्र का व्यक्तित्व इन गुणों से मिलकर बनता है। आइए दो और गहरे “क्यों” से इसे समझें।
क्यों, शैलेंद्र जैसा सरल और भोला स्वभाव एक कलाकार के लिए ताकत भी है और कमज़ोरी भी? यह सुनने में अजीब लगता है, पर सच है। उनका भोलापन ताकत था, क्योंकि उसी सच्चाई और कोमलता से उनके गीत और फ़िल्म इतने सुंदर और दिल को छूने वाले बने — बनावटी इंसान ऐसी सच्ची कला नहीं रच सकता। पर वही भोलापन कमज़ोरी भी था, क्योंकि फ़िल्म-व्यवसाय में चालाकी, मोल-भाव और बाज़ार की गणित ज़रूरी होती है, जिसमें वे माहिर नहीं थे। इसीलिए उन्हें आर्थिक घाटा सहना पड़ा। यह हमें सिखाता है कि एक ही गुण किसी जगह वरदान और किसी जगह नुकसान बन सकता है।
क्यों, लेखक प्रहलाद अग्रवाल इस पाठ में शैलेंद्र को सिर्फ़ एक गीतकार नहीं, बल्कि एक “शिल्पकार” कहते हैं? पाठ के शीर्षक में ही जवाब है — “तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र”। शिल्पकार का अर्थ है — कुशलता और लगन से किसी चीज़ को गढ़ने वाला, जैसे मूर्तिकार पत्थर से मूर्ति गढ़ता है। शैलेंद्र ने ‘तीसरी कसम’ को सिर्फ़ बनाया नहीं, उसे एक कलाकार की तरह गढ़ा — पूरी मेहनत, बारीकी और दिल से। इसलिए लेखक उन्हें “शिल्पकार” कहकर इस बात का सम्मान करते हैं कि यह फ़िल्म एक व्यापारी का माल नहीं, एक कलाकार की रची हुई कलाकृति थी।
देख सकते हैं कि शैलेंद्र की पूरी कहानी कुछ साफ़ नतीजों की ओर इशारा करती है। नीचे की तुलना यह दिखाती है कि इस पाठ से हमें क्या-क्या समझ मिलती है।
| आधार | आम सोच | पाठ का संदेश |
|---|---|---|
| किसी फ़िल्म का बड़ा होना | जो ज़्यादा कमाए, वही बड़ी फ़िल्म | जो कला में सच्ची और गहरी हो, वह बड़ी फ़िल्म |
| कलाकार की सफलता | नाम, पैसा और हिट फ़िल्में | दिल की बात ईमानदारी से कह पाना |
| व्यापार और कला | दोनों एक ही चीज़ हैं | दोनों अलग हैं; पसंद और गुणवत्ता हमेशा साथ नहीं चलते |
| शैलेंद्र की पहचान | बस एक मशहूर गीतकार | एक संवेदनशील, सच्चा कला-शिल्पकार |
इस तालिका से साफ़ है कि पाठ हमें सिखाता है — किसी रचना को सिर्फ़ उसकी कमाई से मत आँको, बल्कि उसकी सच्चाई और सुंदरता से आँको।
आम भूलें
ये वे गलतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक को ध्यान से पढ़िए — “ऐसा क्यों लगता है” वाला भाग जाल दिखाता है, और “असल बात” उसे सुधार देती है।
शैलेंद्र मूल रूप से एक फ़िल्म-निर्माता (फ़िल्में बनाने वाले) थे, और 'तीसरी कसम' उनकी कई फ़िल्मों में से एक थी।
वे फ़िल्मी दुनिया से जुड़े थे और एक फ़िल्म बनाई भी, इसलिए स्वाभाविक रूप से लगता है कि फ़िल्में बनाना ही उनका मुख्य काम रहा होगा।
असल में शैलेंद्र मूल रूप से एक प्रसिद्ध गीतकार (गीत लिखने वाले) थे। 'तीसरी कसम' उनकी बनाई हुई एकमात्र फ़िल्म थी — उन्होंने पहली और आखिरी बार खुद फ़िल्म-निर्माता बनकर इसे रचा।
'तीसरी कसम' बाज़ार में पिटी, इसका मतलब वह एक खराब, घटिया फ़िल्म थी।
हम अक्सर सोचते हैं कि जो फ़िल्म नहीं चली, वह अच्छी नहीं होगी — कमाई को ही गुणवत्ता का पैमाना मान लेते हैं।
यह फ़िल्म कलात्मक रूप से बहुत उत्कृष्ट और पुरस्कृत थी; उसका न चलना उसकी खराबी नहीं, बल्कि उस समय के दर्शकों की मसालेदार फ़िल्मों वाली पसंद का नतीजा था। कमाई और कला की ऊँचाई हमेशा एक जैसी नहीं होतीं।
राज कपूर ने 'तीसरी कसम' में अपने बड़े नाम और स्टार-कद के कारण भारी पैसा (पूरी फ़ीस) लिया।
राज कपूर उस ज़माने के बहुत बड़े और महँगे अभिनेता थे, इसलिए मान लेना आसान है कि उन्होंने अपनी पूरी ऊँची फ़ीस ही ली होगी।
राज कपूर ने शैलेंद्र की दोस्ती और इस सपने के साथ खड़े होने के लिए लगभग नाममात्र की रकम पर काम किया, अपनी सामान्य ऊँची फ़ीस नहीं ली। यह दिखाता है कि कला से प्यार करने वाले कलाकार मुनाफ़े से ऊपर भी सोचते हैं।
जाँचिए अपनी समझ
खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।
फ़िल्म 'तीसरी कसम' किस लेखक की कहानी पर आधारित थी?
'तीसरी कसम' में नायक और नायिका कौन थे और उन्होंने कौन-सी भूमिकाएँ निभाईं?
'तीसरी कसम' के बारे में कौन-सा कथन सही है?
अभ्यास
पहले अपना उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए। उत्तर की लंबाई पर ध्यान दीजिए — लघु उत्तर में 2-3 वाक्य, दीर्घ उत्तर में पूरा अनुच्छेद।
सरल
शैलेंद्र मूल रूप से क्या थे, और 'तीसरी कसम' उनके जीवन में किस मायने में खास थी?
शैलेंद्र मूल रूप से एक प्रसिद्ध गीतकार थे, यानी फ़िल्मों के लिए गीत लिखने वाले। ‘तीसरी कसम’ (सन् 1966) इस मायने में खास थी कि यह उनकी एकमात्र बनाई हुई (निर्मित) फ़िल्म थी। पहली और आखिरी बार उन्होंने खुद फ़िल्म-निर्माता बनकर, अपने दिल का यह सपना पूरा किया।
फ़िल्म 'तीसरी कसम' किस कहानी पर आधारित थी और इसमें मुख्य कलाकार कौन थे?
फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर आधारित थी। इसमें नायक राज कपूर थे, जिन्होंने गाड़ीवान हीरामन की भूमिका निभाई, और नायिका वहीदा रहमान थीं, जिन्होंने नर्तकी हीराबाई की भूमिका की।
मध्यम
'तीसरी कसम' कलात्मक रूप से बेहतरीन होते हुए भी व्यावसायिक रूप से असफल क्यों रही? समझाइए।
‘तीसरी कसम’ एक धीमी, कोमल और गहरी भावना वाली फ़िल्म थी। इसमें गाँव-देहात की सच्चाई और दो साधारण लोगों के दिल के रिश्ते की मार्मिकता थी।
पर उस ज़माने के ज़्यादातर दर्शक सिनेमाघर मनोरंजन के लिए जाते थे — नाच-गाना, चमक-दमक और मसालेदार कहानी देखने। ‘तीसरी कसम’ में भीड़ को लुभाने वाला यह मसाला नहीं था। इसलिए आम दर्शक तक इसकी बात नहीं पहुँच पाई और यह सिनेमाघरों में कम चली।
इसका मतलब यह नहीं कि फ़िल्म खराब थी। इसका मतलब बस यह है कि बाज़ार की पसंद और कला की ऊँचाई हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। फ़िल्म कला में सफल थी, पर कमाई में नहीं।
इस पाठ के आधार पर शैलेंद्र के व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
शैलेंद्र के व्यक्तित्व की कई खास बातें इस पाठ से सामने आती हैं।
पहली, वे एक संवेदनशील हृदय वाले इंसान थे — दूसरों के दुख-दर्द को गहराई से महसूस करते थे, और यही कोमलता उनके गीतों और फ़िल्म में झलकती है। दूसरी, वे एक सच्चे कलाकार थे, जो कला को मुनाफ़े से ऊपर रखते थे और बाज़ार के दबाव में झुककर अपनी कला से समझौता नहीं करते थे।
तीसरी, उनका स्वभाव सरल और भोला था; वे व्यापार के दाँव-पेच में कुशल नहीं थे, इसीलिए फ़िल्म-व्यवसाय में उन्हें घाटा भी सहना पड़ा। चौथी, उनमें दृढ़ निश्चय और जुनून था — मन की फ़िल्म बनाने का सपना उन्होंने हर मुश्किल के बावजूद नहीं छोड़ा। इन्हीं गुणों के कारण वे एक खास और यादगार कला-शिल्पकार बने।
चुनौती
'तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र' पाठ के आधार पर 'कला बनाम व्यावसायिकता' के विषय पर लेखक का दृष्टिकोण विस्तार से समझाइए।
“तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र” प्रहलाद अग्रवाल का लिखा एक मार्मिक निबंध है, जो कला और व्यावसायिकता के फ़र्क को बहुत सुंदर ढंग से सामने रखता है।
लेखक का पहला दृष्टिकोण यह है कि कला और व्यापार दो अलग चीज़ें हैं। किसी रचना का बाज़ार में ज़्यादा कमाना यह साबित नहीं करता कि वह कला में भी ऊँची है, और न चलना यह साबित नहीं करता कि वह घटिया है। ‘तीसरी कसम’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है — यह कला में उत्कृष्ट और पुरस्कृत थी, पर कमाई में पिट गई, क्योंकि उस समय की भीड़ को मसालेदार फ़िल्में पसंद थीं।
लेखक का दूसरा और गहरा दृष्टिकोण है कि सच्चा कलाकार मुनाफ़े के पीछे नहीं भागता। शैलेंद्र ने यह फ़िल्म पैसा कमाने के लिए नहीं, बल्कि अपने दिल की बात कहने के लिए, एक सुंदर कलाकृति रचने के लिए बनाई। उन्हें घाटे का अंदेशा था, फिर भी उन्होंने अपने सपने और कला से समझौता नहीं किया। उनका भोला, सरल स्वभाव व्यापार के लायक नहीं था, पर यही सच्चाई उनकी कला को इतना गहरा बनाती है।
इस तरह लेखक यह संदेश देता है कि किसी रचना को सिर्फ़ उसकी कमाई से मत आँको। असली कसौटी उसकी सच्चाई, सुंदरता और गहराई है। ‘तीसरी कसम’ आज भी याद की जाती है, जबकि उस साल की कई ‘हिट’ फ़िल्में लोग भूल चुके हैं — और यही बात लेखक के दृष्टिकोण को सही साबित करती है। सच्ची कला समय की कसौटी पर जीतती है, एक हफ़्ते की कमाई पर नहीं।
पाठ का शीर्षक 'तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र' है। 'शिल्पकार' शब्द यहाँ कितना सटीक है? अपने तर्क के साथ समझाइए।
पाठ का शीर्षक “तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र” बहुत सोच-समझकर रखा गया है, और यह शब्द यहाँ पूरी तरह सटीक है।
शिल्पकार का अर्थ है — कुशलता, लगन और कला से किसी चीज़ को गढ़ने वाला, जैसे मूर्तिकार पत्थर से मूर्ति गढ़ता है। यह शब्द किसी मामूली कारीगर या व्यापारी के लिए नहीं, बल्कि एक सच्चे कलाकार के लिए इस्तेमाल होता है।
यह शब्द शैलेंद्र पर इसलिए सटीक बैठता है क्योंकि उन्होंने ‘तीसरी कसम’ को सिर्फ़ “बनाया” नहीं, बल्कि एक कलाकार की तरह गढ़ा। उन्होंने इसमें अपना दिल, अपनी मेहनत, अपनी संवेदनशीलता और अपनी पूरी कला उँडेल दी। उनका मकसद पैसा नहीं, एक सुंदर कलाकृति रचना था — ठीक वैसे ही जैसे एक शिल्पकार अपनी मूर्ति को प्यार और बारीकी से तराशता है।
अगर लेखक केवल “निर्माता” शब्द इस्तेमाल करते, तो वह सिर्फ़ यह बताता कि शैलेंद्र ने फ़िल्म बनाई। पर “शिल्पकार” शब्द उससे आगे जाकर यह सम्मान देता है कि यह फ़िल्म एक व्यापारी का माल नहीं, बल्कि एक कलाकार की रची हुई कलाकृति थी। इसलिए यह शीर्षक न केवल सटीक है, बल्कि पूरे पाठ के मूल भाव — कला की सच्चाई और शैलेंद्र की कलाकार-आत्मा — को एक ही शब्द में पकड़ लेता है।
सारांश
याद रखने योग्य सब कुछ, संक्षेप में:
- “तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र” प्रहलाद अग्रवाल (जन्म 1947, जबलपुर) का लिखा एक निबंध है, जो गीतकार शैलेंद्र और उनकी फ़िल्म पर केंद्रित है।
- शैलेंद्र मूल रूप से एक प्रसिद्ध गीतकार थे; ‘तीसरी कसम’ (सन् 1966) उनकी एकमात्र बनाई हुई फ़िल्म थी।
- फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर बनी; नायक राज कपूर (गाड़ीवान हीरामन), नायिका वहीदा रहमान (नर्तकी हीराबाई) थीं (चित्र 11.2)।
- फ़िल्म कलात्मक रूप से उत्कृष्ट और पुरस्कृत थी, पर व्यावसायिक रूप से असफल रही, क्योंकि उस समय के दर्शकों को मसालेदार फ़िल्में पसंद थीं; शैलेंद्र को घाटा हुआ।
- कला बनाम व्यावसायिकता (चित्र 11.1): कला की कसौटी सच्चाई और गुणवत्ता है, व्यावसायिकता की कसौटी कमाई; दोनों हमेशा साथ नहीं चलते।
- शैलेंद्र ने यह फ़िल्म मुनाफ़े की परवाह किए बिना, दिल से बनाई — यही उन्हें एक सच्चा कलाकार बनाता है।
- राज कपूर ने दोस्ती और सपने के लिए लगभग नाममात्र की रकम पर काम किया, अपनी ऊँची फ़ीस नहीं ली।
- शैलेंद्र का व्यक्तित्व (चित्र 11.3): संवेदनशील हृदय, सच्चा कलाकार, सरल-भोला स्वभाव और दृढ़ निश्चय।
- शीर्षक में “शिल्पकार” शब्द बताता है कि शैलेंद्र ने फ़िल्म को व्यापारी की तरह नहीं, कलाकार की तरह लगन से गढ़ा।
- केंद्रीय संदेश: किसी रचना को कमाई से नहीं, उसकी सच्चाई और सुंदरता से आँको; सच्ची कला समय की कसौटी पर जीतती है।
आगे क्या
अगले पाठ “अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले” (निदा फ़ाज़ली) में आप इंसान की एक और संवेदनशीलता की बात पढ़ेंगे — पर इस बार दूसरों के, और प्रकृति व जीव-जंतुओं के दुख-दर्द के प्रति। जहाँ इस पाठ में शैलेंद्र की कला और संवेदनशीलता की बात थी, वहीं अगला पाठ पूछता है कि क्या आज का इंसान दूसरों के दुख को महसूस करना भूलता जा रहा है। ध्यान वही रखिए — केवल “क्या कहा गया” नहीं, बल्कि लेखक जो महसूस कराना चाहते हैं और उसका संदेश क्या है, यह समझना।
Frequently Asked Questions
तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र पाठ का मुख्य भाव क्या है?
यह पाठ गीतकार शैलेंद्र की संवेदनशीलता और उनकी फ़िल्म 'तीसरी कसम' के बारे में है। पाठ का मुख्य भाव है कि सच्चा कलाकार व्यावसायिक सफलता की परवाह किए बिना अपने दिल की बात कहता है, भले ही उसे आर्थिक घाटा हो।
फ़िल्म तीसरी कसम किस कहानी पर आधारित है और इसके पात्र कौन हैं?
यह फ़िल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुलफ़ाम' पर आधारित है। इसमें राज कपूर ने हीरामन (एक भोला गाड़ीवान) और वहीदा रहमान ने हीराबाई (एक नाचने वाली) की भूमिका निभाई। यह एक भावनात्मक प्रेम-कथा है।
शैलेंद्र ने तीसरी कसम क्यों बनाई और उन्हें क्या हुआ?
शैलेंद्र एक सफल गीतकार थे पर उनके मन में एक ऐसी फ़िल्म बनाने का सपना था जो उनके दिल की हो — कला के लिए, पैसे के लिए नहीं। उन्होंने 1966 में 'तीसरी कसम' बनाई पर वह बॉक्स ऑफ़िस पर नाकाम रही और शैलेंद्र को भारी आर्थिक घाटा हुआ।
कला बनाम व्यावसायिकता का विषय इस पाठ में कैसे उठाया गया है?
पाठ में दिखाया गया है कि फ़िल्म उद्योग में पैसा कमाना ही सफलता मानी जाती है, पर शैलेंद्र ने इस सोच को चुनौती दी। उनकी फ़िल्म कला की दृष्टि से उत्कृष्ट थी पर व्यावसायिक रूप से असफल रही — यही कला और व्यापार का बुनियादी अंतर्विरोध है।
इस पाठ के लेखक प्रहलाद अग्रवाल का परिचय क्या है?
प्रहलाद अग्रवाल हिंदी के जाने-माने फ़िल्म-समीक्षक और लेखक हैं। उन्होंने इस पाठ में शैलेंद्र की जीवनदृष्टि, उनकी कला के प्रति समर्पण और 'तीसरी कसम' के निर्माण की पूरी कहानी को बहुत संवेदनशीलता से लिखा है।