अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले

Chapter 12 · Hindi · Class 10 22 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा एक पल रुककर सोचिए। पिछली बार आपने कब किसी की तकलीफ़ देखकर अपने दिल में दर्द महसूस किया था? किसी घायल जानवर को, किसी रोते बच्चे को, या एक टूटे हुए घोंसले को देखकर?

आजकल ज़िंदगी बहुत तेज़ हो गई है। हर कोई अपने काम, अपने फ़ोन, अपनी चिंताओं में डूबा है। हम अक्सर दूसरों के दुख के पास से ऐसे गुज़र जाते हैं जैसे वह हमारा मामला ही न हो। यह पाठ ठीक इसी बात पर हमें झकझोरता है।

लेखक निदा फ़ाज़ली कहते हैं कि इंसान धीरे-धीरे आत्मकेंद्रित होता जा रहा है। आत्मकेंद्रित का मतलब है — सिर्फ़ अपने बारे में सोचने वाला। पहले इंसान दूसरे लोगों के, और यहाँ तक कि पशु-पक्षियों और प्रकृति के दुख से भी दुखी होता था। आज वह संवेदना खोता जा रहा है।

यह पाठ इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह सिर्फ़ परीक्षा का एक पाठ नहीं है। यह हमें एक बेहतर इंसान बनना सिखाता है — ऐसा इंसान जो सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि अपने आस-पास के हर जीव और पूरी प्रकृति के लिए भी दिल में जगह रखता है।

लेखक-परिचय

पाठ में उतरने से पहले इसके लेखक को थोड़ा जान लेते हैं — इससे पाठ का भाव और गहराई से समझ आता है।

मूल भाव

इस पाठ का मूल भाव है — इंसान धीरे-धीरे अपनी संवेदनशीलता खोता जा रहा है। पहले वह दूसरों के, यहाँ तक कि पशु-पक्षियों और प्रकृति के दुख से भी दुखी होता था। आज वह आत्मकेंद्रित हो गया है। बढ़ती आबादी और अपनी सुविधा के लालच में उसने प्रकृति और दूसरे जीवों का घर छीन लिया है। लेखक यह संदेश देते हैं कि इस धरती पर सिर्फ़ इंसान का हक़ नहीं है — पशु-पक्षी, पेड़, समुद्र, सबका साझा हक़ है। हमें फिर से संवेदनशील बनना होगा और सबके साथ मिल-जुलकर रहना (सहअस्तित्व) सीखना होगा।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: यह रचना अभी कॉपीराइट के अधीन है, इसलिए इसका पूरा मूल पाठ यहाँ नहीं दिया गया है। कृपया मूल पाठ अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “स्पर्श भाग 2” में पढ़ें। नीचे हमने उसका विस्तृत सार और व्याख्या दी है — पुस्तक के साथ इसे पढ़कर आप पाठ को पूरी तरह समझ सकते हैं।

पाठ का सार

यह एक आत्मकथात्मक निबंध है। आत्मकथात्मक का मतलब है — जिसमें लेखक अपने ही जीवन के अनुभव और यादें सुनाते हैं। आइए पाठ की बातों को सरल भाषा में, क्रम से समझते हैं।

लेखक शुरुआत एक चिंता से करते हैं। वे कहते हैं कि अब इंसान आत्मकेंद्रित हो गया है। पहले लोग आपस में, और प्रकृति के साथ, गहराई से जुड़े रहते थे। एक का दुख दूसरे को छू जाता था। अब हर कोई बस अपने में मगन है। दूसरों के, और दूसरे जीवों के दुख से दुखी होने वाली भावना खत्म होती जा रही है।

फिर लेखक अपनी एक निजी याद बताते हैं। उनके घर में कबूतरों का एक जोड़ा रहता था। एक दिन घटना यह हुई कि कबूतर का एक अंडा टूट गया, और दूसरा खतरे में आ गया। कबूतर बहुत बेचैन हो गए — बार-बार फड़फड़ाते, परेशान घूमते। पर घर के लोगों ने इस बेचैनी को कबूतरों का दुख नहीं, बल्कि अपने लिए एक असुविधा माना। उन्हें कबूतरों का शोर और फड़फड़ाना खलने लगा। यानी इंसान दूसरे जीव के दुख को समझने के बजाय अपनी ही सुविधा सोचने लगा। यह छोटी-सी घटना घटती संवेदनशीलता की बड़ी मिसाल है।

इसके बाद लेखक बंबई (अब मुंबई) के अपने अनुभव सुनाते हैं। बंबई समुद्र किनारे बसा शहर है। लेखक बताते हैं कि जैसे-जैसे शहर की आबादी बढ़ती गई, रहने के लिए जगह कम पड़ने लगी। इसलिए लोगों ने समुद्र को पाटकर (समुद्र में मिट्टी-पत्थर भरकर) नई ज़मीन बनाई और उस पर मकान खड़े कर दिए। इस तरह समुद्र धीरे-धीरे सिमटता गया, पीछे हटता गया। लेखक को लगता है मानो समुद्र इस ज़्यादती से नाराज़-सा है।

शहर के फैलने का असर सिर्फ़ समुद्र पर नहीं पड़ा। मकानों और सड़कों के लिए पेड़ काटे गए। पेड़ कटने से उन पर रहने वाले पक्षियों के घोंसले उजड़ गए। पहले जो चिड़िया, कबूतर, गिलहरी आँगन और पेड़ों पर दिखते थे, वे अब कम होते गए। इंसान ने अपनी सुविधा के लिए इन सब जीवों का घर छीन लिया, पर इस बात का उसे दुख तक नहीं हुआ।

बीच-बीच में लेखक अपने पिता की याद भी करते हैं। वे एक भाव से याद करते हैं कि माता-पिता और बड़ों ने हमें प्रकृति और दूसरे जीवों से प्रेम करना, उनके दुख को महसूस करना सिखाया था। पर अब वह संस्कार और वह संवेदना धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।

अंत में लेखक का संदेश बहुत साफ़ है। मनुष्य को फिर से प्रकृति और सभी जीवों के प्रति संवेदनशील बनना चाहिए। यह धरती सिर्फ़ इंसान के लिए नहीं बनी — पशु, पक्षी, पेड़, समुद्र, सबका इस पर बराबर का हक़ है। अगर इंसान दूसरों का घर उजाड़ता रहेगा और किसी के दुख से दुखी नहीं होगा, तो अंत में वह खुद भी सुखी नहीं रह पाएगा। हमें सहअस्तित्व सीखना होगा — यानी सबको साथ-साथ जीने देना।

आइए गहराई से समझें

अब केवल “क्या कहा गया” से आगे बढ़कर “ऐसा क्यों कहा गया” समझते हैं। यही पाठ की असली गहराई है। पहले पाठ के तीन सबसे यादगार उदाहरणों को एक साथ देख लेते हैं।

ये तीन उदाहरण ही पूरे पाठ की रीढ़ हैं — नीचे चित्र 12.4 में तीनों को एक नज़र में देखिए।

पाठ के तीन उदाहरण — कबूतरों का जोड़ा, सिमटता समुद्र, घटते पेड़-पक्षी
Figure 12.4 — यह चित्र पाठ के तीन यादगार उदाहरण दिखाता है, और हर एक किस भाव की ओर इशारा करता है। पैनल (क) कबूतरों का जोड़ा — लेखक के घर में कबूतर का अंडा टूटा और कबूतर बेचैन हो गए, पर घर के लोगों ने इसे कबूतरों का दुख नहीं, अपनी असुविधा माना; यह इंसान की घटती संवेदना दिखाता है। पैनल (ख) सिमटता समुद्र — बंबई की बढ़ती आबादी के कारण लोगों ने समुद्र पाटकर ज़मीन बनाई, समुद्र पीछे हटता गया और मानो नाराज़ हुआ; यह प्रकृति से छेड़छाड़ दिखाता है। पैनल (ग) घटते पेड़-पक्षी — शहर फैलने से पेड़ कटे, घोंसले उजड़े और चिड़िया-कबूतर-गिलहरी दिखना कम हुए; यह मनुष्य और प्रकृति के बिगड़ते तालमेल को दिखाता है।

भाव 1 — संवेदनशीलता का ह्रास

“ह्रास” का मतलब है — कम होना, घटना। पाठ का सबसे केंद्रीय भाव यही है कि इंसान की संवेदनशीलता घट रही है। संवेदनशीलता यानी दूसरों के सुख-दुख को अपने दिल में महसूस करने की क्षमता।

पहले इंसान का दिल बड़ा था। वह सिर्फ़ अपने परिवार के नहीं, बल्कि पड़ोसी के, राह चलते अजनबी के, और पशु-पक्षियों तक के दुख से दुखी हो जाता था। अब वह सीमा सिमटकर सिर्फ़ “मैं और मेरा” तक रह गई है।

इस “पहले बनाम अब” वाले बदलाव को नीचे चित्र 12.1 साफ़-साफ़ दिखाता है।

पहले बनाम अब — इंसान का प्रकृति और दूसरे जीवों से रिश्ता
Figure 12.1 — यह तुलना-चित्र दिखाता है कि इंसान का प्रकृति और दूसरे जीवों से रिश्ता पहले कैसा था और अब कैसा हो गया है। बायाँ हरा पैनल (क) 'पहले' — बीच में संवेदनशील इंसान है, जिससे चारों ओर ठोस हरी रेखाओं द्वारा पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, समुद्र-नदी और दूसरे लोग जुड़े हैं; नीचे लिखा है कि वह सबके दुख से दुखी होता था और सब जीवों के साथ तालमेल व सहअस्तित्व का भाव रखता था। दायाँ लाल पैनल (ख) 'अब' — बीच में आत्मकेंद्रित इंसान अकेला है, और उसकी ओर जाने वाली रेखाएँ टूटी (बिंदुदार) हैं, चारों जीव-समूह फीके पड़ गए हैं; नीचे लिखा है कि अब वह किसी के दुख से दुखी नहीं होता, सिर्फ़ अपनी चिंता करता है और बाकी जीवों से कटा-कटा रहता है।

अब सबसे ज़रूरी सवाल — कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं है। आइए इस “क्यों” को खोलते हैं।

Concept check

इंसान पहले की तुलना में अब आत्मकेंद्रित क्यों होता जा रहा है?

भाव 2 — मनुष्य और प्रकृति का बिगड़ता संबंध

पाठ का दूसरा बड़ा भाव यह है कि इंसान और प्रकृति के बीच का तालमेल बिगड़ गया है। पहले इंसान खुद को प्रकृति का एक हिस्सा मानता था। अब वह खुद को प्रकृति का मालिक समझने लगा है, जो जैसे चाहे उसका इस्तेमाल कर सकता है।

बंबई के समुद्र और कटते पेड़ों का उदाहरण ठीक यही दिखाता है। इंसान ने अपनी सुविधा के लिए समुद्र को पीछे धकेला और पेड़ों को काट डाला। उसने यह नहीं सोचा कि ये भी जीवित प्रकृति का हिस्सा हैं, और इन पर अनगिनत जीवों का जीवन टिका है।

अब एक गहरा “क्यों” — आबादी बढ़ने का प्रकृति पर असर क्यों और कैसे पड़ता है? यह कारण-और-प्रभाव की एक सीधी कड़ी है, जिसे नीचे चित्र 12.2 खोलकर दिखाता है।

बढ़ती आबादी का प्रकृति पर कारण-प्रभाव
Figure 12.2 — यह कारण-प्रभाव चित्र दिखाता है कि बढ़ती आबादी किस तरह प्रकृति को सिकोड़ देती है। बाईं ओर पीला 'कारण' बक्सा है — बढ़ती आबादी, यानी शहरों में भीड़ और मकानों की माँग। उससे तीन तीर निकलकर दाईं ओर के तीन लाल 'प्रभाव' बक्सों की ओर जाते हैं। प्रभाव 1 — समुद्र सिमटा: समुद्र पाटकर ज़मीन बनाई गई और समुद्र पीछे हटता गया। प्रभाव 2 — पेड़ घटे: मकानों और सड़कों के लिए पेड़ काटे गए और हरियाली कम हुई। प्रभाव 3 — पक्षी कम हुए: घर और घोंसले उजड़ने से चिड़िया-कबूतर दिखना कम हुआ। सबसे नीचे नीले बक्से में संदेश है — इंसान की सुविधा तो बढ़ी, पर प्रकृति और दूसरे जीवों का घर छिनता गया।

समझने वाली बात यह है कि ये तीनों प्रभाव अलग-अलग नहीं हैं। ये एक ही कारण — इंसान की बढ़ती माँग — की जुड़ी हुई कड़ियाँ हैं। जब हम प्रकृति से लेते ही जाते हैं और बदले में कुछ नहीं देते, तो यह असंतुलन एक दिन इंसान पर ही लौटकर वार करता है।

भाव 3 — सहअस्तित्व का संदेश

“सहअस्तित्व” शब्द दो हिस्सों से बना है — “सह” यानी साथ-साथ, और “अस्तित्व” यानी होना, जीना। तो सहअस्तित्व का मतलब है — सबका साथ-साथ मिल-जुलकर जीना।

यह पाठ का सबसे सकारात्मक और सबसे ज़रूरी संदेश है। लेखक यह नहीं कहते कि इंसान को विकास नहीं करना चाहिए। वे यह कहते हैं कि विकास करते समय हमें दूसरे जीवों का भी ध्यान रखना चाहिए। धरती पर सिर्फ़ इंसान का एकाधिकार (अकेला हक़) नहीं है।

पाठ के तीनों मुख्य भाव आपस में कैसे जुड़े हैं, यह नीचे चित्र 12.3 के भाव-जाल में देखिए।

पाठ के मुख्य भावों का भाव-जाल
Figure 12.3 — यह भाव-जाल पाठ के मुख्य भावों को जोड़कर दिखाता है। बीच के पीले घेरे में पाठ का केंद्रीय भाव है — संवेदनशीलता। इससे तीन भाव जुड़े हैं। ऊपर-बाएँ लाल बक्से में 'संवेदना का ह्रास' — इंसान आत्मकेंद्रित हो गया है और दूसरों का दुख अब उसे नहीं छूता। ऊपर-दाएँ हरे बक्से में 'मनुष्य-प्रकृति संबंध' — पेड़, पक्षी और समुद्र के साथ इंसान का तालमेल बिगड़ गया है। नीचे नीले बक्से में 'सहअस्तित्व' — सब जीवों को मिल-जुलकर जीने का हक़ देना चाहिए। यह जाल दिखाता है कि ये तीनों भाव अलग नहीं, बल्कि एक ही केंद्रीय भाव — संवेदनशीलता — से जुड़े हुए हैं।

अब सबसे गहरा “क्यों” — कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं।

Concept check

लेखक यह क्यों कहते हैं कि धरती पर सिर्फ़ इंसान का हक़ नहीं है? इससे इंसान को क्या फ़र्क पड़ता है?

आम भूलें

ये वे गलतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक को ध्यान से पढ़िए — “ऐसा क्यों लगता है” वाला भाग जाल दिखाता है, और “असल बात” उसे सुधार देती है।

⚠️ Common mistake
What students think

यह पाठ सिर्फ़ पर्यावरण-प्रदूषण (पॉल्यूशन) पर लिखा गया एक निबंध है।

Why it seems right

पाठ में समुद्र पाटने, पेड़ कटने और पक्षियों के उजड़ने की बात आती है, जो पर्यावरण से जुड़ी लगती है, इसलिए सहज ही लगता है कि यह बस प्रदूषण के बारे में है।

What actually happens

पाठ का असली विषय इंसान की घटती संवेदनशीलता है — दूसरों के दुख से दुखी न होने वाला आत्मकेंद्रित मन। प्रकृति और पशु-पक्षियों के उदाहरण तो इसी बड़ी बात को समझाने के साधन हैं। मूल बात भावना और संवेदना की है, सिर्फ़ पर्यावरण की नहीं।

⚠️ Common mistake
What students think

कबूतरों की बेचैनी से घर के लोगों को परेशानी हुई, इसलिए घर वाले बिल्कुल सही थे।

Why it seems right

शोर और फड़फड़ाहट सचमुच असुविधा देती है, और अपनी सुविधा सोचना स्वाभाविक लगता है, इसलिए घर वालों का रवैया जायज़-सा प्रतीत होता है।

What actually happens

लेखक यह घटना घर वालों को सही ठहराने के लिए नहीं, बल्कि एक कमी दिखाने के लिए लाते हैं। असल बात यह है कि घर वालों ने कबूतरों का दुख समझने के बजाय सिर्फ़ अपनी असुविधा देखी — यही घटती संवेदनशीलता की निशानी है। एक संवेदनशील इंसान कबूतरों की पीड़ा को महसूस करता।

⚠️ Common mistake
What students think

लेखक चाहते हैं कि इंसान कोई विकास या निर्माण ही न करे, बस प्रकृति को वैसे ही छोड़ दे।

Why it seems right

पाठ में समुद्र पाटने और पेड़ काटने की आलोचना है, इसलिए लगता है कि लेखक हर तरह के निर्माण और तरक्की के खिलाफ़ हैं।

What actually happens

लेखक विकास के विरोधी नहीं हैं। उनका कहना सिर्फ़ इतना है कि विकास करते समय दूसरे जीवों और प्रकृति का भी ध्यान रखना चाहिए। संदेश 'विकास मत करो' नहीं, बल्कि 'सबके साथ मिल-जुलकर, संवेदना के साथ जियो' (सहअस्तित्व) है।

जाँचिए अपनी समझ

खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।

इस पाठ का केंद्रीय भाव क्या है?

कबूतरों के जोड़े वाली घटना से लेखक क्या दिखाना चाहते हैं?

'सहअस्तित्व' का इस पाठ में क्या अर्थ है?

अभ्यास

पहले अपना उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए। उत्तर की लंबाई पर ध्यान दीजिए — लघु उत्तर में 2-3 वाक्य, दीर्घ उत्तर में पूरा अनुच्छेद।

सरल

easy

कबूतरों के जोड़े के साथ लेखक के घर में क्या घटना घटी, और घर वालों ने उस पर कैसी प्रतिक्रिया दी?

easy

बंबई में समुद्र धीरे-धीरे क्यों सिमटता गया?

मध्यम

medium

लेखक के अनुसार इंसान की संवेदनशीलता क्यों और कैसे घट रही है? उदाहरण देकर समझाइए।

medium

शहरों के फैलने का प्रकृति और पशु-पक्षियों पर क्या असर पड़ा? पाठ के आधार पर लिखिए।

चुनौती

challenge

'अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले' पाठ के माध्यम से लेखक निदा फ़ाज़ली क्या संदेश देना चाहते हैं? विस्तार से समझाइए।

challenge

लेखक कहते हैं कि धरती पर सिर्फ़ इंसान का हक़ नहीं है। इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं? तर्क सहित अपने विचार लिखिए।

सारांश

याद रखने योग्य सब कुछ, संक्षेप में:

  • “अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले” निदा फ़ाज़ली का लिखा एक आत्मकथात्मक निबंध है।
  • पाठ का केंद्रीय भाव है — इंसान की घटती संवेदनशीलता; वह आत्मकेंद्रित होकर दूसरों के, और प्रकृति-जीवों के दुख से दुखी होना भूलता जा रहा है (चित्र 12.3)।
  • पहले इंसान सब जीवों और प्रकृति से गहराई से जुड़ा था; अब वह उनसे कट गया है — यही “पहले बनाम अब” का बदलाव है (चित्र 12.1)।
  • कबूतरों का जोड़ा (चित्र 12.4क): अंडा टूटने पर कबूतर बेचैन हुए, पर घर वालों ने इसे दुख नहीं, अपनी असुविधा माना।
  • सिमटता समुद्र (चित्र 12.4ख): बंबई की बढ़ती आबादी के कारण समुद्र पाटकर ज़मीन बनाई गई, समुद्र पीछे हटता गया।
  • घटते पेड़-पक्षी (चित्र 12.4ग): शहर फैलने से पेड़ कटे, घोंसले उजड़े और चिड़िया-कबूतर दिखना कम हुआ।
  • बढ़ती आबादी का प्रकृति पर सीधा कारण-प्रभाव है — समुद्र सिमटा, पेड़ घटे, पक्षी कम हुए (चित्र 12.2)।
  • लेखक पिता और बड़ों को याद करते हैं, जिन्होंने प्रकृति और जीवों से प्रेम करना सिखाया था — वह संस्कार अब लुप्त होता जा रहा है।
  • संदेश: धरती पर सिर्फ़ इंसान का हक़ नहीं; हमें फिर से संवेदनशील बनना होगा और सहअस्तित्व — यानी सबका मिल-जुलकर जीना — अपनाना होगा।

आगे क्या

अगले पाठ “पतझर में टूटी पत्तियाँ” (रवींद्र केलेकर) में आप दो छोटी-छोटी, पर गहरी बात कहने वाली रचनाओं से मिलेंगे — “गिन्नी का सोना” और “झेन की देन”। ये दोनों जीवन जीने के तरीके पर सोचने को मजबूर करती हैं — कि शुद्ध आदर्शों को थोड़े व्यवहार के साथ कैसे जिया जाए, और मन की भागदौड़ को रोककर वर्तमान में पूरी तरह जीने (झेन की चाय-विधि) से कैसे शांति मिलती है। जहाँ यह पाठ इंसान की संवेदना और प्रकृति के रिश्ते पर सोचने को कहता है, वहीं अगला पाठ अपने भीतर के मन और जीवन-शैली पर। ध्यान वही रखिए — केवल “क्या कहा” नहीं, बल्कि लेखक जो महसूस कराना चाहते हैं और उसका संदेश क्या है, यह समझना।

Frequently Asked Questions

अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले पाठ का मुख्य संदेश क्या है?

इस पाठ में निदा फ़ाज़ली कहते हैं कि इंसान आत्मकेंद्रित होता जा रहा है और उसकी संवेदनशीलता घटती जा रही है। पहले लोग दूसरे मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और प्रकृति के दुख से भी दुखी होते थे, पर आज यह भाव कम होता जा रहा है।

इस पाठ में कबूतरों के जोड़े का प्रसंग क्या है?

लेखक के घर में एक कबूतरों का जोड़ा रहता था। एक दिन माँ ने बिल्ली से डरकर उनके अंडे हटा दिए। इससे कबूतरनी बहुत दुखी हुई और दिन-रात बेचैन रही। यह प्रसंग दिखाता है कि पशुओं में भी भावनाएँ होती हैं और हमें उनका दुख समझना चाहिए।

इस पाठ में मनुष्य और प्रकृति के बिगड़ते संबंध को कैसे दिखाया गया है?

पाठ में बताया गया है कि शहरीकरण और विकास के कारण जंगल कट रहे हैं, समुद्र सिकुड़ रहा है, पेड़-पक्षी घट रहे हैं। इंसान अपनी सुविधा के लिए प्रकृति और दूसरे प्राणियों को नुकसान पहुँचा रहा है, जो एक गंभीर समस्या है।

सहअस्तित्व का क्या अर्थ है और यह पाठ इसे कैसे समझाता है?

सहअस्तित्व का अर्थ है — सभी जीव-जंतु और इंसान मिलकर, एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाए बिना साथ रहें। यह पाठ दिखाता है कि जब इंसान इस संतुलन को तोड़ता है तो प्रकृति और समाज दोनों को नुकसान होता है।

इस पाठ के लेखक निदा फ़ाज़ली कौन थे?

निदा फ़ाज़ली उर्दू के प्रसिद्ध शायर और लेखक थे। उनकी रचनाओं में जीवन की सरल पर गहरी बातें होती हैं। यह पाठ उनकी आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया निबंध है जिसमें उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों के माध्यम से बड़ी बात कही है।