मनुष्यता
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए — दुनिया में रोज़ करोड़ों लोग जन्म लेते हैं, खाते-पीते हैं, और एक दिन चले जाते हैं। पर हम कुछ ही लोगों को याद रखते हैं। हम महात्मा गांधी, मदर टेरेसा या किसी ऐसे इंसान को क्यों याद करते हैं जिसने किसी की जान बचाई हो? और रोज़ सड़क पर मिलने वाले हज़ारों लोगों को क्यों भूल जाते हैं?
इसका जवाब इसी कविता में है। कवि कहते हैं कि सिर्फ़ जी लेना और मर जाना कोई बड़ी बात नहीं — यह तो पशु भी करते हैं। बड़ी बात है दूसरों के काम आना। जो इंसान दूसरों के लिए जीता और मरता है, वही सच में “मनुष्य” कहलाने लायक है। बाकी लोग तो बस साँस लेकर चले जाते हैं।
यह कविता केवल कुछ पुरानी पंक्तियाँ नहीं हैं। यह आपको बताती है कि एक अच्छी और सार्थक ज़िंदगी कैसे जी जाए। यही बात इसे परीक्षा के बाद, पूरे जीवन भर, याद रखने लायक बनाती है।
कवि-परिचय
इस कविता के रचयिता हैं मैथिलीशरण गुप्त — हिंदी के एक बहुत बड़े और सम्मानित कवि। आगे बढ़ने से पहले इनके बारे में कुछ ज़रूरी बातें जान लेते हैं।
मूल भाव
इस कविता का मूल भाव है — सच्ची मनुष्यता क्या है, यह समझाना। कवि कहते हैं कि असली मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए जिए और मरे — यानी परोपकार, सहानुभूति और बंधुत्व ही सच्ची मनुष्यता है। केवल अपने लिए जीना तो पशु की प्रवृत्ति है। कवि रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण और बुद्ध जैसे महान त्यागियों के उदाहरण देकर बताते हैं कि महानता दूसरों के लिए त्याग करने में है। वे यह भी कहते हैं कि सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं, इसलिए “मनुष्य मात्र बंधु है” — सब आपस में भाई हैं।
इस मूल अंतर को — पशु की तरह जीना बनाम सच्चे मनुष्य की तरह जीना — नीचे चित्र 3.1 में आमने-सामने देखिए।
मूल पाठ और व्याख्या
अब कविता को क्रम से, छंद-दर-छंद पढ़ते हैं। पहले मूल पंक्तियाँ, और फिर तुरंत उनका भावार्थ सरल हिंदी में। इससे आपको शब्द भी मिलेंगे और उनका अर्थ भी। यह कविता मैथिलीशरण गुप्त की है, जिनका देहांत 1964 में हुआ — इसलिए यह अब सार्वजनिक धरोहर (public domain) है और इसे यहाँ ज्यों-का-त्यों दिया गया है।
छंद 1 — “वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे”
विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।
हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा वही कि जो जिया न आपके लिए।
वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
कवि शुरुआत में ही एक गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं — सोच लो कि तुम मर्त्य हो, यानी एक दिन तुम्हें मरना ही है (हर इंसान मरता है)। इसलिए मौत से कभी मत डरो। पर अगर मरना ही है, तो ऐसे मरो कि सब तुम्हें याद रखें — यानी कुछ अच्छा काम करके जाओ। ऐसी सुंदर मृत्यु को कवि “सुमृत्यु” कहते हैं। अगर ऐसी सुमृत्यु न मिली, तो समझो जीना-मरना दोनों व्यर्थ गए। कवि साफ़ कहते हैं — असल में मरा तो वही है जो कभी दूसरों के लिए जिया ही नहीं। केवल अपने लिए पेट भरना और जीना तो पशु की प्रवृत्ति है। सच्चा मनुष्य तो वही है जो दूसरों के लिए अपनी जान तक दे दे।
छंद 2 — उदार व्यक्ति की कीर्ति
उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
इस छंद में कवि बताते हैं कि उदार (दानी, दिल खोलकर देने वाले) व्यक्ति को कितना मान मिलता है। वे कहते हैं — सरस्वती (विद्या और वाणी की देवी, यानी कविता और कथा) उसी उदार व्यक्ति का गुणगान करती है। धरती माँ भी उसी से अपने को कृतार्थ (धन्य, सफल) मानती है। उसकी कीर्ति (अच्छा नाम) हमेशा जीवित रहकर चारों ओर गूँजती रहती है, और पूरी सृष्टि उसी की पूजा करती है। जो व्यक्ति अपने भीतर के “अखंड आत्म भाव” को — यानी इस भावना को कि “सब मुझमें हैं और मैं सब में हूँ”, पूरी अनंत दुनिया में फैला देता है, सबको अपना मान लेता है — वही सच्चा मनुष्य है।
छंद 3 — महान त्यागियों के उदाहरण
क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया पराया अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे?
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
यह कविता का सबसे ज़रूरी छंद है, क्योंकि इसमें कवि पाँच महान त्यागियों के उदाहरण देते हैं। इन कथाओं को समझ लीजिए:
- रंतिदेव — एक दानी राजा। वे खुद कई दिनों से भूखे (क्षुधार्त) थे। तभी एक भूखा अतिथि आ गया। रंतिदेव ने अपने हाथ में पकड़ा भोजन का थाल (करस्थ थाल) भी उस अतिथि को दे दिया — खुद भूखे रहकर।
- दधीचि — एक ऋषि। देवताओं को एक राक्षस को हराने के लिए ऐसे हथियार की ज़रूरत थी जो दधीचि की हड्डियों से ही बन सकता था। दधीचि ने देवताओं की भलाई के लिए अपनी हड्डियाँ (अस्थिजाल) तक दान कर दीं — यानी अपने प्राण दे दिए।
- उशीनर — एक राजा (क्षितीश का अर्थ है राजा)। एक बार एक कबूतर बाज़ से बचने उनकी शरण में आया। कबूतर की जान बचाने के लिए उशीनर ने अपने शरीर का मांस (स्वमांस) काटकर बाज़ को दे दिया।
- कर्ण — महाभारत का वीर। उसे जन्म से ही शरीर पर एक रक्षा-कवच और कान में कुंडल मिले थे, जो उसे अजेय बनाते थे। फिर भी कर्ण ने माँगने पर वह शरीर का कवच-चर्म (शरीर-चर्म) हँसते-हँसते (सहर्ष) दान कर दिया।
कवि कहते हैं — इन सबने यह समझा कि शरीर तो अनित्य (नश्वर, एक दिन नष्ट होने वाला) है, पर आत्मा अनादि (जिसका न आदि है न अंत, अमर) है। फिर इस नश्वर शरीर के लिए मनुष्य क्यों डरे? जो दूसरों के लिए शरीर तक न्योछावर कर दे, वही सच्चा मनुष्य है।
ये पाँचों त्यागी और उनका दान एक नज़र में याद रखने के लिए, चित्र 3.2 देखिए।
छंद 4 — सहानुभूति और बुद्ध
सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरूद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
इस छंद में कवि सहानुभूति की महिमा बताते हैं। सहानुभूति का अर्थ है — दूसरों का दुख अपना समझकर उनसे प्रेम और दया करना। कवि कहते हैं कि यही सबसे बड़ा धन (महाविभूति) है। जिसके पास सहानुभूति है, उसके आगे पूरी धरती (मही) अपने-आप वश में हो जाती है (वशीकृता) — यानी उसे सब अपना लेते हैं। फिर वे बुद्ध का उदाहरण देते हैं। महात्मा बुद्ध ने उस ज़माने की हिंसा और ऊँच-नीच के भेदभाव का विरोध किया (विरुद्धवाद), पर तलवार से नहीं — दया और करुणा के प्रवाह से। उनकी इस दया के आगे सारा संसार (लोकवर्ग) विनम्र होकर झुक गया। कवि भाव-विभोर होकर कहते हैं — “अहा! सच में उदार वही है जो परोपकार करता है; और वही सच्चा मनुष्य है जो दूसरों के लिए मरे।“
छंद 5 — धन का घमंड मत करो
रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।
अतीव भाग्यहीन है अधीर भाव जो भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
यहाँ कवि एक ज़रूरी सीख देते हैं — धन का घमंड मत करो। वे कहते हैं — भूलकर भी इस तुच्छ (मामूली) धन-दौलत (वित्त) के नशे में अंधे (मदांध) मत हो जाना। यह मत सोचो कि “मेरे पास सब कुछ है, मैं तो सनाथ (जिसका रक्षक हो, यानी सुरक्षित) हूँ” — और मन में घमंड भर लो। फिर कवि एक सुंदर बात कहते हैं — सच तो यह है कि यहाँ कोई अनाथ है ही नहीं। क्योंकि सबके साथ त्रिलोकनाथ (तीनों लोकों के स्वामी, ईश्वर) हैं। वह दीनबंधु (दीन-दुखियों का साथी ईश्वर) बहुत दयालु है, और उसके हाथ बहुत बड़े (विशाल) हैं — यानी वह सबकी रक्षा करता है। इसलिए जो व्यक्ति घबराकर अधीर (बेचैन, धैर्यहीन) हो जाता है, वह बड़ा अभागा है। ईश्वर पर भरोसा रखो और दूसरों के लिए जीओ — वही सच्चा मनुष्य है।
छंद 6 — परस्पर सहारा बनो
अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े,
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े।
परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी,
अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
रहो न यों कि एक से न काम और का सरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
इस छंद में कवि मिलकर आगे बढ़ने का संदेश देते हैं। वे कहते हैं — अनंत आकाश (अंतरिक्ष) में अनगिनत देवता खड़े हैं, और वे अपनी बड़ी-बड़ी भुजाएँ (स्वबाहु) तुम्हारी ओर बढ़ा रहे हैं — यानी ऊपर उठने में तुम्हारी मदद को तैयार हैं। तो तुम सब परस्परावलंब से — यानी एक-दूसरे का सहारा बनकर — उठो और आगे बढ़ो। तुम सब निष्कलंक (अपंक, बिना किसी दाग़ के, यानी अच्छे कर्म करके) होकर देवताओं की गोद (अमर्त्य-अंक) में जा चढ़ो, यानी अमरता और महानता पाओ। ऐसे मत जिओ कि तुम्हारे रहते हुए भी किसी दूसरे का कोई काम न बने। दूसरों के काम आओ — वही सच्चा मनुष्य है।
छंद 7 — मनुष्य मात्र बंधु है
‘मनुष्य मात्र बंधु है’ यही बड़ा विवेक है,
पुरातनी यही प्रथा स्वबंधु पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद हैं,
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
अनेक हैं कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
यह छंद कविता का सबसे बड़ा संदेश देता है — “मनुष्य मात्र बंधु है।” यानी हर मनुष्य आपस में भाई है। कवि कहते हैं कि यही समझना सबसे बड़ी समझदारी (विवेक) है। यह कोई नई बात नहीं, बल्कि बहुत पुरानी (पुरातनी) परंपरा है — क्योंकि हम सबका पिता एक ही है (स्वबंधु पिता, यानी ईश्वर सबका पिता)। वे यह भी मानते हैं कि कर्मों के फल के अनुसार लोगों में ऊपरी (बाहरी) भेद ज़रूर दिखते हैं — कोई अमीर, कोई गरीब, कोई ऊँचे पद पर, कोई नीचे। पर भीतर से सब एक हैं (अंतरैक्य), और इसका प्रमाण स्वयं वेद देते हैं। दुख की बात यह है कि बहुत-से ऐसे भी हैं जो भाई होकर भी भाई का दुख (व्यथा) नहीं हरते। पर सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों का दुख दूर करे।
इस केंद्रीय भाव को — कि सब मनुष्य एक ही पिता की संतान होने के कारण भाई हैं और एक-दूसरे का सहारा बनकर आगे बढ़ते हैं — चित्र 3.3 में देखिए।
छंद 8 — साथ चलो, मिलकर तरो
चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
अंतिम छंद में कवि सबको साथ चलने का न्योता देते हैं। वे कहते हैं — आओ, अपने मनचाहे लक्ष्य (अभीष्ट मार्ग) पर खुशी-खुशी (सहर्ष), खेलते हुए चलें। रास्ते में जो भी मुसीबत (विपत्ति) या रुकावट (विघ्न) आए, उसे मिलकर हटाते हुए आगे बढ़ें। ध्यान रहे — हमारे बीच का प्रेम और मेल-जोल (हेलमेल) कभी कम न हो, और आपस में दूरी या फूट (भिन्नता) कभी न बढ़े। हम सब बिना किसी विवाद (अतर्क) के, एक ही रास्ते (एक पंथ) के सावधान (सतर्क) राही बनकर चलें। तभी सच्ची सामर्थ्य (शक्ति) यह है कि मनुष्य खुद तो भवसागर पार करे ही, दूसरों को भी पार कराता चले (तारता हुआ तरे)। यही सच्चा मनुष्य है।
आइए गहराई से समझें
अब केवल “कवि ने क्या कहा” से आगे बढ़कर “ऐसा क्यों कहा” समझते हैं। यही इस कविता की असली गहराई है।
सच्ची मनुष्यता क्या है?
पूरी कविता एक ही सवाल का जवाब देती है — असली मनुष्य कौन है? कवि के अनुसार, सच्ची मनुष्यता तीन चीज़ों से बनती है। पहले एक शब्द साफ़ कर लें।
अब सबसे बड़ा सवाल — कवि के अनुसार केवल अपने लिए जीना “पशु की प्रवृत्ति” क्यों है? कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं, तो आइए कारण समझें। ज़रा सोचिए — एक गाय या बकरी क्या करती है? वह घास चरती है, अपना पेट भरती है, और बस। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि दूसरे का क्या हाल है। उसमें सोचने-समझने की वह शक्ति नहीं जिससे वह दूसरों के बारे में सोच सके। पर मनुष्य के पास यह शक्ति है — वह सोच सकता है, दूसरों का दुख समझ सकता है, और मदद कर सकता है। अब अगर कोई इंसान भी सिर्फ़ अपना पेट भरने और अपने सुख में लगा रहे, दूसरों की बिल्कुल परवाह न करे, तो वह अपनी इस खास इंसानी शक्ति का इस्तेमाल ही नहीं कर रहा। इसलिए कवि कहते हैं — ऐसा जीना तो पशु जैसा हुआ। मनुष्य होने का असली अर्थ ही दूसरों के काम आना है।
कविता में 'सुमृत्यु' का क्या अर्थ है, और कवि इसे क्यों चाहते हैं?
त्याग के उदाहरण — कवि कथाएँ क्यों देते हैं?
कवि सीधे “त्याग करो” कहकर रुक नहीं जाते। वे रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण और बुद्ध की कथाएँ सुनाते हैं (चित्र 3.2)। अब सोचिए — कवि इतने सारे उदाहरण क्यों देते हैं?
इसके दो कारण हैं। पहला — उदाहरण से बात मन में बैठ जाती है। अगर कोई बस कहे “दान करना अच्छा है”, तो यह सूखा उपदेश लगता है। पर जब कवि बताते हैं कि रंतिदेव खुद भूखे रहकर अपना भोजन दे देते हैं, या उशीनर एक कबूतर के लिए अपना मांस काट देते हैं, तो यह बात दिल को छू जाती है और हमेशा याद रहती है। दूसरा कारण और गहरा है — ये उदाहरण दिखाते हैं कि त्याग की कोई सीमा नहीं। एक ने भोजन दिया, दूसरे ने हड्डियाँ, तीसरे ने मांस, चौथे ने अपना कवच, और बुद्ध ने अपना पूरा जीवन दया फैलाने में लगा दिया। यानी असली मनुष्य ज़रूरत पड़ने पर अपना सब कुछ दूसरों के लिए दे सकता है। इन कथाओं से कवि यह विश्वास जगाते हैं कि ऐसा करना सचमुच मुमकिन है — क्योंकि ये महान लोग कर चुके हैं।
एक और ज़रूरी “क्यों” — कवि कहते हैं कि शरीर के लिए मत डरो, क्योंकि “देह अनित्य है पर जीव अनादि है।” इसका क्या मतलब? इसका सीधा अर्थ है — हमारा शरीर (देह) एक दिन नष्ट हो जाएगा, यह अनित्य यानी अस्थायी है। पर आत्मा (जीव) अनादि है — उसका न आरंभ है न अंत, वह कभी नहीं मरती। तो जब शरीर वैसे भी एक दिन चला जाना है, तो उसे बचाने के लिए डरना और स्वार्थी बने रहना बेकार है। बेहतर है कि इस नश्वर शरीर का उपयोग दूसरों की भलाई में कर लिया जाए — यही उसका सही उपयोग है। यही सोच रंतिदेव, दधीचि और कर्ण को इतना बड़ा त्याग करने की हिम्मत देती है।
“मनुष्य मात्र बंधु है” — सबसे बड़ा संदेश
कविता का सबसे ऊँचा विचार है — सभी मनुष्य आपस में भाई हैं (चित्र 3.3)। कवि इसके पीछे एक तर्क देते हैं। अब समझिए — कवि किस आधार पर कहते हैं कि सब मनुष्य भाई हैं?
कवि का तर्क है कि सबका पिता एक ही है — वह ईश्वर है। जब एक घर में दो बच्चे एक ही माता-पिता से जन्म लेते हैं, तो वे भाई कहलाते हैं। उसी तरह, जब सारी मनुष्यता एक ही ईश्वर की संतान है, तो सब आपस में भाई हुए। कवि यह भी मानते हैं कि लोगों में बाहरी भेद ज़रूर दिखते हैं — कोई अमीर है तो कोई गरीब, कोई किसी जाति का तो कोई किसी और जाति का। पर ये भेद बस ऊपरी हैं, कर्मों के फल से बने हैं। भीतर से, आत्मा के स्तर पर, सब एक हैं — और कवि कहते हैं कि इसका प्रमाण स्वयं वेद देते हैं। इसीलिए किसी से ऊँच-नीच का भाव रखना गलत है; हमें हर इंसान को अपना भाई मानकर उसका दुख दूर करना चाहिए।
कविता का पूरा संदेश
अब तक हमने कविता के अलग-अलग भाव देखे। इन सबको एक साथ, एक जगह जोड़कर देखना ज़रूरी है, ताकि पूरी तस्वीर साफ़ हो जाए। यह चित्र 3.4 में देखिए।
आम भूलें
ये वे गलतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक को ध्यान से पढ़िए — “ऐसा क्यों लगता है” वाला भाग जाल दिखाता है, और “असल बात” उसे सुधार देती है।
कविता कहती है कि मनुष्य को मृत्यु से प्यार करना चाहिए या मर जाना चाहिए।
कविता में बार-बार 'मरो', 'मृत्यु से डरो कभी', और 'मनुष्य के लिए मरे' जैसी पंक्तियाँ आती हैं, इसलिए पहली बार पढ़ने पर लगता है मानो कवि मरने पर ज़ोर दे रहे हों।
कवि मरने पर नहीं, बल्कि 'कैसे जीना चाहिए' पर ज़ोर दे रहे हैं। उनका कहना है कि चूँकि मृत्यु तो आनी ही है, इसलिए उससे डरकर स्वार्थी मत बनो; बल्कि ऐसा जीवन जिओ कि मृत्यु भी सार्थक (सुमृत्यु) हो जाए। 'मनुष्य के लिए मरना' का अर्थ है — दूसरों के लिए जीना और त्याग करना, न कि सचमुच मर जाना।
कविता में दिए गए रंतिदेव, दधीचि, कर्ण आदि काल्पनिक पात्र हैं, बस कहानी भर हैं।
ये नाम पुरानी कथाओं और पुराणों से आए हैं और आज के जीवन से दूर लगते हैं, इसलिए छात्र इन्हें सिर्फ़ किस्से समझकर इनके पीछे के संदेश को हल्के में ले लेते हैं।
कवि इन उदाहरणों को किस्से के लिए नहीं, बल्कि एक ठोस संदेश के लिए लाते हैं। हर उदाहरण यह सिद्ध करता है कि सच्चा मनुष्य दूसरों के लिए अपना सब कुछ — भोजन, हड्डियाँ, मांस, कवच — तक दे सकता है। ये त्याग के आदर्श हैं, जिन्हें हमें अपने जीवन में उतारना है।
'मनुष्य मात्र बंधु है' का मतलब है कि सभी लोग एक जैसे हैं, उनमें कोई अंतर ही नहीं।
'सब भाई हैं' सुनकर लगता है कि कवि सारे भेद नकार रहे हैं, इसलिए छात्र सोचते हैं कि कवि अमीर-गरीब या किसी भी फ़र्क़ को मानते ही नहीं।
कवि बाहरी भेदों को मानते हैं — वे साफ़ कहते हैं कि कर्मों के फल के अनुसार 'बाह्य भेद' ज़रूर होते हैं। उनका कहना केवल इतना है कि ये भेद ऊपरी हैं; भीतर से, आत्मा के स्तर पर, सब एक हैं और एक ही ईश्वर की संतान हैं। इसीलिए सबको भाई मानकर प्रेम और सहानुभूति देनी चाहिए।
जाँचिए अपनी समझ
खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।
कवि मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार सच्चा मनुष्य कौन है?
निम्न में से कौन-सा उदाहरण कविता में त्याग के लिए नहीं दिया गया है?
कवि 'मनुष्य मात्र बंधु है' किस आधार पर कहते हैं?
कवि क्यों कहते हैं कि मनुष्य को मृत्यु से नहीं डरना चाहिए?
अभ्यास
पहले अपना उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए। उत्तर की लंबाई पर ध्यान दीजिए — लघु उत्तर में 2-3 वाक्य, दीर्घ उत्तर में पूरा अनुच्छेद।
सरल
कवि किस प्रकार की मृत्यु को 'सुमृत्यु' कहते हैं?
कवि उस मृत्यु को सुमृत्यु कहते हैं जिसके बाद लोग उस व्यक्ति को याद रखें (“याद जो करें सभी”)। यानी ऐसी मृत्यु जो किसी अच्छे, परोपकारी काम के कारण सार्थक बन जाए। जो व्यक्ति दूसरों के लिए जीता और मरता है, उसकी मृत्यु ही सुमृत्यु होती है। इसके विपरीत, जो केवल अपने लिए जीता है, उसका मरना व्यर्थ चला जाता है।
कवि के अनुसार 'पशु-प्रवृत्ति' किसे कहते हैं?
कवि के अनुसार पशु-प्रवृत्ति का अर्थ है — केवल अपने लिए जीना और अपना ही पेट भरना (“आप आप ही चरे”)। जैसे पशु बस अपना भोजन ढूँढ़ता है और दूसरों की परवाह नहीं करता, वैसे ही जो मनुष्य केवल अपने स्वार्थ में लगा रहता है और दूसरों के काम नहीं आता, वह पशु-प्रवृत्ति वाला है। कवि कहते हैं कि सच्चा मनुष्य इससे ऊपर उठकर दूसरों के लिए जीता है।
मध्यम
कविता में दिए गए त्याग के पाँच उदाहरण लिखिए और बताइए कि प्रत्येक ने क्या त्याग किया।
कवि सच्ची मनुष्यता समझाने के लिए पाँच महान त्यागियों के उदाहरण देते हैं:
- रंतिदेव — खुद भूखे रहते हुए भी अपने हाथ में पकड़ा भोजन का थाल भूखे अतिथि को दे दिया (दान — अपना भोजन)।
- दधीचि — देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियाँ तक दान कर दीं (दान — अपनी हड्डियाँ/प्राण)।
- उशीनर — एक कबूतर की जान बचाने के लिए अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया (दान — अपना मांस)।
- कर्ण — जन्म से मिला रक्षा-कवच और शरीर का चमड़ा हँसते हुए दान कर दिया (दान — अपना चर्म)।
- बुद्ध — हिंसा और भेदभाव के विरुद्ध दया और करुणा का प्रवाह बहाया, जिसके आगे सारा संसार झुक गया (दान — दया और करुणा)।
इन सबने यह दिखाया कि सच्चा मनुष्य दूसरों के लिए अपना सब कुछ दे सकता है।
कवि धन के घमंड के बारे में क्या कहते हैं? इस संदर्भ में 'अनाथ कौन है यहाँ?' का क्या आशय है?
कवि कहते हैं कि मनुष्य को कभी अपने धन (वित्त) के नशे में अंधा (मदांध) नहीं होना चाहिए। उन्हें यह घमंड नहीं करना चाहिए कि “मेरे पास सब कुछ है, मैं ही सुरक्षित हूँ।” क्योंकि यह धन तुच्छ और अस्थायी है।
इसी संदर्भ में वे पूछते हैं — “अनाथ कौन है यहाँ?” इसका आशय है कि सच में यहाँ कोई अनाथ है ही नहीं। क्योंकि सबके साथ त्रिलोकनाथ (ईश्वर) हैं, जो दयालु दीनबंधु हैं और जिनके बड़े विशाल हाथ सबकी रक्षा करते हैं। इसलिए न तो धन का घमंड करना चाहिए, और न ही गरीब होकर घबराना (अधीर होना) चाहिए — ईश्वर सबका साथी है।
चुनौती
'मनुष्यता' कविता के आधार पर बताइए कि कवि मैथिलीशरण गुप्त सच्ची मनुष्यता का क्या स्वरूप प्रस्तुत करते हैं? विस्तार से समझाइए।
‘मनुष्यता’ कविता में मैथिलीशरण गुप्त सच्ची मनुष्यता का एक सुंदर और ऊँचा स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार सच्ची मनुष्यता का सार यही है — दूसरों के लिए जीना और मरना। वे कहते हैं कि केवल अपने लिए जीना और पेट भरना तो पशु-प्रवृत्ति है; असली मनुष्य वही है जो परोपकार करे।
कवि सच्ची मनुष्यता को तीन स्तंभों पर खड़ा करते हैं — परोपकार (दूसरों के लिए त्याग), सहानुभूति (दूसरों का दुख अपना समझना), और बंधुत्व (सबको अपना भाई मानना)। इसे समझाने के लिए वे रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण और बुद्ध जैसे महान त्यागियों के उदाहरण देते हैं, जिन्होंने दूसरों के लिए अपना भोजन, हड्डियाँ, मांस, कवच और पूरा जीवन तक दे दिया।
कवि यह भी सिखाते हैं कि मनुष्य को मृत्यु से नहीं डरना चाहिए, क्योंकि शरीर नश्वर है पर आत्मा अमर है। धन का घमंड करना और स्वार्थी बनना व्यर्थ है। उनका सबसे बड़ा संदेश है — “मनुष्य मात्र बंधु है।” सब एक ही ईश्वर की संतान हैं, इसलिए सबको भाई मानकर एक-दूसरे का सहारा बनना चाहिए और मिलकर आगे बढ़ना चाहिए। इस प्रकार कवि एक ऐसी मनुष्यता की कल्पना करते हैं जहाँ हर व्यक्ति दूसरों के काम आए और सबको साथ लेकर चले।
'मनुष्य मात्र बंधु है' — इस कथन से कवि क्या कहना चाहते हैं? आज के समाज में इसकी क्या प्रासंगिकता है?
‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से कवि कहना चाहते हैं कि हर मनुष्य आपस में भाई है। उनका तर्क है कि सारी मनुष्यता एक ही पिता — ईश्वर — की संतान है, इसलिए सब आपस में भाई हुए। कवि मानते हैं कि कर्मों के फल के अनुसार लोगों में बाहरी भेद (अमीर-गरीब, ऊँच-नीच) ज़रूर दिखते हैं, पर ये भेद केवल ऊपरी हैं। भीतर से, आत्मा के स्तर पर, सब एक हैं — और इसका प्रमाण स्वयं वेद देते हैं। इसलिए किसी से भेदभाव करना या उसका दुख न हरना गलत है।
आज के समय में यह संदेश और भी ज़रूरी है। आज दुनिया में जाति, धर्म, भाषा, देश और रंग के नाम पर लोगों के बीच झगड़े और नफ़रत बढ़ रही है। ऐसे में यह विचार हमें याद दिलाता है कि सब इंसान एक ही परिवार के सदस्य हैं। अगर हम एक-दूसरे को भाई मानें, एक-दूसरे का दुख बाँटें और मिलकर आगे बढ़ें (परस्परावलंब), तो समाज से बहुत-से झगड़े और अन्याय अपने-आप दूर हो जाएँ। इसलिए कवि का यह संदेश आज के बँटे हुए समाज के लिए एक बहुत बड़ी सीख है।
सारांश
याद रखने योग्य सब कुछ, संक्षेप में:
- यह कविता मैथिलीशरण गुप्त (1886–1964, राष्ट्रकवि, खड़ी बोली के प्रमुख कवि) की रचना है।
- मूल भाव: सच्ची मनुष्यता दूसरों के लिए जीने और मरने में है — केवल अपने लिए जीना पशु-प्रवृत्ति है (चित्र 3.1)।
- कवि सुमृत्यु चाहते हैं — ऐसी मृत्यु जिसके बाद सब याद करें; और कहते हैं कि मृत्यु से मत डरो, क्योंकि शरीर अनित्य है पर आत्मा अमर है।
- सच्ची मनुष्यता के तीन स्तंभ हैं — परोपकार, सहानुभूति और बंधुत्व (चित्र 3.4)।
- त्याग के पाँच उदाहरण (चित्र 3.2): रंतिदेव (भोजन), दधीचि (हड्डियाँ), उशीनर (मांस), कर्ण (कवच-चर्म), बुद्ध (दया का प्रवाह)।
- कवि धन के घमंड से बचने को कहते हैं — कोई अनाथ नहीं, क्योंकि त्रिलोकनाथ (ईश्वर) सबके साथ हैं।
- सबसे बड़ा संदेश: “मनुष्य मात्र बंधु है” — सब एक ही ईश्वर की संतान हैं, इसलिए सब भाई हैं; भीतर से सब एक हैं (चित्र 3.3)।
- कवि परस्परावलंब का संदेश देते हैं — एक-दूसरे का सहारा बनकर मिलकर आगे बढ़ो और दूसरों को भी पार कराते चलो।
आगे क्या
अगले पाठ “पर्वत प्रदेश में पावस” (सुमित्रानंदन पंत) में आप मनुष्यता के विचार-भरे संसार से निकलकर प्रकृति के सुंदर रूप में पहुँचेंगे। यह कविता वर्षा ऋतु (पावस) में पहाड़ी इलाके के बदलते, मनमोहक दृश्यों का वर्णन करती है — झरते झरने, बादलों में छिपते पर्वत, और हर पल बदलता मौसम। जहाँ “मनुष्यता” में गहरा जीवन-दर्शन है, वहीं अगले पाठ में प्रकृति-चित्रण और मानवीकरण (प्रकृति को जीवित इंसान की तरह दिखाना) का सौंदर्य है। ध्यान वही रखिए — केवल “क्या दिखाया” नहीं, बल्कि कवि किस चीज़ की तुलना किससे करता है और क्यों, यह समझना।
Frequently Asked Questions
मनुष्यता कविता का मुख्य संदेश क्या है?
मैथिलीशरण गुप्त की इस कविता का मुख्य संदेश है कि सिर्फ़ जी लेना और मर जाना मनुष्यता नहीं है — असली मनुष्य वह है जो दूसरों के लिए जीता है, परोपकार करता है और सबको अपना भाई मानता है।
मनुष्यता कविता में किन-किन महापुरुषों के उदाहरण दिए गए हैं?
कविता में रंतिदेव (जिन्होंने भूखे अतिथि को अपना खाना दे दिया), दधीचि (जिन्होंने देवताओं के लिए अपनी हड्डियाँ दे दीं), उशीनर (जिन्होंने कबूतर को बचाने के लिए खुद का माँस दिया), कर्ण और बुद्ध के त्याग के उदाहरण दिए गए हैं।
मनुष्य मात्र बंधु है इस पंक्ति का क्या अर्थ है?
इस पंक्ति का अर्थ है कि संसार का हर इंसान हमारा भाई है। कवि कहते हैं कि जाति, धर्म, देश की सीमाएँ भुलाकर सब मनुष्यों को एक परिवार मानना ही सच्ची मनुष्यता है।
मनुष्यता कविता के कवि कौन हैं और उनका परिचय क्या है?
इस कविता के कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं जिन्हें 'राष्ट्रकवि' कहा जाता है। वे खड़ी बोली हिंदी काव्य के प्रमुख कवि थे और उनकी रचनाएँ राष्ट्रप्रेम, परोपकार और मानवता के मूल्यों पर आधारित हैं।
मनुष्यता कविता में परोपकार को इतना महत्व क्यों दिया गया है?
कवि का मानना है कि परोपकार ही वह काम है जो इंसान को अमर बना देता है। जो लोग दूसरों के लिए कुछ करते हैं, उन्हें दुनिया हमेशा याद रखती है। स्वार्थ में जीने वाले मर जाते हैं पर सेवा में जीने वाले इतिहास में जीते हैं।