क्या लिखूँ?
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए। परीक्षा में सवाल आता है — “किसी एक विषय पर निबंध लिखिए।” आप कलम हाथ में लेते हैं। कागज़ सामने है। पर मन में बस एक ही सवाल घूमता है — “अब लिखूँ क्या?”
यह उलझन सबको होती है। शुरू कहाँ से करें? कौन-सी बात पहले लिखें? विषय छोटा-सा है, उस पर पाँच पेज कैसे भरें? यही वह पल है जिसके बारे में यह पाठ बात करता है।
इस निबंध का नाम ही है — “क्या लिखूँ?”। लेखक ने अपनी इसी उलझन को बहुत मज़ेदार ढंग से सामने रखा है। उसे दो विषयों पर “आदर्श निबंध” लिखने हैं, पर दो ही घंटे हैं। वह सोचता है, परेशान होता है, किताबें खोलता है, और हम पाठक उसके साथ-साथ यह सब देखते चलते हैं।
इसकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि लेखक हमें निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया अंदर से दिखा देता है — वह भी हँसते-हँसते। पढ़ते-पढ़ते आप समझ जाएँगे कि अच्छा निबंध बनता कैसे है, और उसमें असली चीज़ क्या होती है। यह सीख आपके अपने हर निबंध-लेखन में काम आएगी।
मूल भाव
मूल भाव: अच्छा निबंध लिखने में असली चीज़ विषय नहीं, लेखक के मन के सच्चे भाव हैं। लेखक हँसी-मज़ाक के अंदाज़ में निबंध-लेखन की पूरी प्रक्रिया और उसकी कठिनाइयाँ दिखाता है। वह बताता है कि नियमों के बोझ से दबी कठिन, दुर्बोध शैली से बेहतर है मॉन्टेन जैसी सरल, सच्ची और आत्मपरक शैली — जिसमें लेखक अपने ही देखे-सुने और अनुभव किए को सहज ढंग से लिख देता है।
आगे बढ़ने से पहले एक शब्द साफ़ कर लें, जो इस पूरे पाठ की जान है।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: यह रचना अभी कॉपीराइट के अधीन है, इसलिए इसका पूरा मूल पाठ यहाँ नहीं दिया गया है। कृपया मूल पाठ अपनी पाठ्यपुस्तक “गंगा” (कक्षा 9) में पढ़ें। नीचे हमने उसका विस्तृत सार और व्याख्या दी है — पुस्तक के साथ इसे पढ़कर आप पाठ को पूरी तरह समझ सकते हैं।
पाठ का सार
निबंध की शुरुआत लेखक की एक उलझन से होती है — “मुझे आज लिखना ही पड़ेगा।” अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध निबंधकार ए.जी. गार्डिनर कहते हैं कि लिखने की एक ख़ास मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में अपने-आप उमंग उठती है और भाव बहने लगते हैं। तब विषय की चिंता नहीं रहती — कोई भी विषय ले लो, उसमें हम अपने मन के भाव भर देते हैं।
पर लेखक ईमानदारी से कहता है — मुझे तो वैसी स्थिति कभी मिली ही नहीं। मुझे तो सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं एक निबंध बनता है। और आज तो उसे ख़ास परिश्रम करना है, क्योंकि उसे साधारण निबंध नहीं लिखना। उसे नमिता और अमिता के लिए “आदर्श निबंध” लिखकर दिखाने हैं। नमिता चाहती है कि वह “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” पर लिखे, और अमिता चाहती है “समाज-सुधार” पर। दोनों परीक्षा में आ चुके विषय हैं।
लेखक सोचता है — पहले यह जान लूँ कि आदर्श निबंध होता क्या है। इसलिए वह निबंध-शास्त्र के आचार्यों (विद्वानों) की राय देखता है। आचार्य कहते हैं — निबंध छोटा होना चाहिए, उसके दो अंग होते हैं (सामग्री और शैली), पहले सामग्री जुटाओ, फिर रूपरेखा बनाओ। पर लेखक हर नियम पर हँसते-हँसते अटक जाता है। वह कहता है — दो ही घंटे हैं, यहाँ न पुस्तकालय है न विश्वकोश, तो सामग्री कहाँ से जुटाऊँ? रूपरेखा वह बना ही नहीं पाता — वह बताता है कि ख़ुद गार्डिनर तक को अपने लेख का शीर्षक तक रखना सबसे कठिन लगता था।
फिर शैली की बात आती है। आचार्य कहते हैं — भाषा में प्रवाह हो, वाक्य छोटे-छोटे पर जुड़े हुए हों। लेखक मज़ाक में कहता है — “पर मैं तो मास्टर हूँ!” विद्वत्ता दिखाने के लिए तो वाक्य लंबे और अस्पष्ट होने चाहिए (जैसे बाणभट्ट और श्रीहर्ष के थे)। यानी आचार्यों की पद्धति उसे उलझाने वाली लगती है।
तभी वह अंग्रेज़ी निबंधकारों की दूसरी पद्धति की ओर मुड़ता है, जिसके जनक मॉन्टेन माने जाते हैं। उन्होंने जो ख़ुद देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को सहज ढंग से लिख दिया। ऐसे निबंध मन की स्वच्छंद रचनाएँ हैं — उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति और उल्लास रहता है। लेखक को यही रास्ता भाता है।
अब समस्या बची — उसे दो विषयों पर लिखना है। यहाँ उसे अमीर खुसरो की कहानी याद आती है, जिन्होंने एक ही पद्य में चार औरतों की चार अलग इच्छाएँ पूरी कर दी थीं। लेखक सोचता है — मैं भी दोनों विषयों को एक ही निबंध में समा दूँगा।
इसके बाद वह “दूर के ढोल सुहावने” का अर्थ खोलता है — दूरी से ढोल की कर्कशता मिट जाती है, इसलिए दूर की चीज़ें सुहावनी लगती हैं। फिर वह इसी को ज़िंदगी से जोड़ता है — तरुण भविष्य के सपने देखते हैं, वृद्ध अतीत के, दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। इसी खिंचाव के कारण वर्तमान सदा सुधारों का काल बना रहता है। इस तरह वह “समाज-सुधार” वाला दूसरा विषय भी उसी प्रवाह में बुन लेता है।
आइए गहराई से समझें
अब निबंध के मुख्य विचारों को एक-एक करके खोलते हैं।
निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया
यह पूरा निबंध असल में निबंध लिखने की प्रक्रिया का ही नक़्शा है। लेखक एक-एक कदम पर अटकता है, और हम उसके साथ पूरी राह देख लेते हैं। नीचे चित्र 2.1 इन्हीं चरणों को क्रम से दिखाता है।
ध्यान दीजिए — लेखक इनमें से कई चरणों पर हँसते हुए कहता है कि वह उन्हें कर ही नहीं पा रहा। पर मज़े की बात यह है कि लिखते-लिखते उसका निबंध इन्हीं चरणों से होकर तैयार हो जाता है। यही इस पाठ की चतुराई है।
असली चीज़ — विषय या भाव? (हैट और खूँटी)
निबंध की सबसे ज़रूरी सीख यहीं छिपी है। गार्डिनर का एक सुंदर उदाहरण लेखक उठाता है — हैट (टोपी) टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। असली चीज़ है हैट, खूँटी नहीं।
अब “कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं” — यहाँ रुककर पूछिए: इस उदाहरण का मतलब क्या है? इसमें हैट हैं लेखक के मन के भाव, और खूँटी है निबंध का विषय। जैसे एक ही हैट को किसी भी खूँटी पर टाँगा जा सकता है, वैसे ही मन के एक ही भाव को किसी भी विषय में भरा जा सकता है। इसलिए असली चीज़ भाव है, विषय नहीं — यही गार्डिनर कहना चाहते हैं। चित्र 2.2 इस रूपक को साफ़ कर देता है।
यह बात बहुत गहरी है। इसका अर्थ यह नहीं कि विषय बेकार है। अर्थ यह है कि अगर मन में सच्चे भाव हों, तो विषय की चिंता गौण हो जाती है — भाव ख़ुद ही विषय को सजीव बना देते हैं।
निबंध की दो पद्धतियाँ
पूरे निबंध में लेखक दो रास्तों के बीच झूलता रहता है। एक है आचार्यों की पद्धति (शास्त्र के नियमों वाली), दूसरी है मॉन्टेन की पद्धति (आत्मपरक, अनुभव वाली)। इन दोनों का फ़र्क़ समझ लेना पूरे पाठ को समझने की चाबी है। चित्र 2.3 दोनों को आमने-सामने रखता है।
अब “कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं” — पूछिए: लेखक किस पद्धति को बेहतर मानता है और क्यों? वह साफ़-साफ़ नहीं कहता, पर पूरे व्यंग्य से इशारा कर देता है। आचार्यों की पद्धति की वह हँसी उड़ाता है — “मैं तो मास्टर हूँ, मुझे लंबे और अस्पष्ट वाक्य लिखने होंगे!” यह कहकर वह उस पद्धति की बेतुकी बात दिखा देता है। दूसरी ओर मॉन्टेन की पद्धति को वह प्रेम से बताता है — उसमें लेखक की सच्ची अनुभूति और उल्लास रहता है। इसी से समझ आता है कि उसका झुकाव सरल, आत्मपरक शैली की ओर है।
अमीर खुसरो की तरकीब — दो विषय, एक निबंध
लेखक के सामने एक अड़चन थी — उसे दो विषयों पर निबंध चाहिए था, पर समय कम था। यहाँ उसे अमीर खुसरो याद आते हैं।
कहानी ऐसी है — एक बार खुसरो को प्यास लगी और वे एक कुएँ पर पहुँचे। वहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर हर औरत ने अलग शर्त रखी — एक ने खीर पर कविता सुनाने को कहा, दूसरी ने चरखे पर, तीसरी ने कुत्ते पर, चौथी ने ढोल पर। खुसरो प्रतिभाशाली थे — उन्होंने एक ही पद्य में चारों की इच्छाएँ पूरी कर दीं:
“खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।”
लेखक विनम्रता से कहता है — “मुझमें खुसरो की प्रतिभा नहीं है, पर उनकी इस तरकीब को अपनाने से मेरी आधी कठिनाई कम हो जाती है।” यानी वह भी अपने दोनों विषयों — “दूर के ढोल” और “समाज-सुधार” — को एक ही निबंध में बुन देगा।
दूर के ढोल सुहावने होते हैं
अब लेखक पहले विषय को खोलता है। ढोल की आवाज़ तो कर्कश (कानों को चुभने वाली) होती है। फिर वह सुहावनी कैसे लगती है?
अब “कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं” — यहाँ रुककर पूछिए: एक ही ढोल किसी को कर्कश और किसी को मधुर क्यों लगता है? लेखक का जवाब बहुत सुंदर है। ढोल के पास बैठे लोगों के कानों के पर्दे मानो फटते रहते हैं — उन्हें वह कठोर लगता है। पर वही आवाज़ जब किसी दूर बैठे व्यक्ति तक, किसी नदी-तट पर संध्या के समय पहुँचती है, तो मधुर बन जाती है। कारण साफ़ है — कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। दूरी आवाज़ की कठोरता को छान देती है, और बची रहती है बस मीठी-सी गूँज। चित्र 2.4 इसी को दिखाता है।
लेखक इसमें एक प्यारी कल्पना भी जोड़ता है — दूर बैठा व्यक्ति उसी ढोल को सुनकर मन में किसी के विवाह का चित्र बना लेता है, घर के कोने में बैठी लजाती नववधू की कल्पना कर लेता है। उस नववधू के प्रेम और उल्लास के कंपन ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं।
तरुण, वृद्ध और सुधारों का काल
अब लेखक “दूर की चीज़ सुहावनी” वाली बात को बड़ी सच्चाई से जोड़ देता है। दूर रहने से हमें यथार्थ (असलियत) की कठोरता का अनुभव नहीं होता। इसी कारण —
- तरुण (युवा) संसार के संघर्ष से दूर हैं, इसलिए उन्हें भविष्य बड़ा मनमोहक लगता है। वे क्रांति चाहते हैं, भविष्य को वर्तमान में खींच लाना चाहते हैं।
- वृद्ध अपनी जवानी से दूर हट आए हैं, इसलिए उन्हें अपना अतीत बड़ा सुखद लगता है। वे अतीत के गौरव के संरक्षक बन जाते हैं।
दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं और उसे अपनी-अपनी दिशा में खींचते हैं। चित्र 2.5 इस खिंचाव को दिखाता है।
अब “कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं” — पूछिए: इस खिंचाव से सुधार क्यों जन्म लेते हैं? कारण यह है — जब दोनों पीढ़ियाँ वर्तमान से असंतुष्ट होकर उसे बदलना चाहती हैं, तो वर्तमान कभी शांत-स्थिर नहीं रह पाता। यह बेचैनी ही नए सुधारों को जन्म देती है। लेखक एक और गहरी बात कहता है — जो कभी सुधार थे, वही आज दोष बन जाते हैं, और उन पर फिर नया सुधार होता है। न दोषों का अंत है, न सुधारों का। इसी से जीवन प्रगतिशील (आगे बढ़ने वाला) माना गया है। इस तरह लेखक “समाज-सुधार” वाला विषय भी पूरा कर देता है।
भाव / विषय (मुख्य भाव)
अब पाठ के मुख्य भावों को एक नज़र में देख लेते हैं — और हर एक के साथ यह भी कि वह ज़रूरी क्यों है।
- लेखन में असली चीज़ भाव है, विषय नहीं — यही पूरे पाठ का दिल है। यह सीख इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह बताती है कि सच्चा लेखन भीतर से आता है, ऊपरी विषय से नहीं।
- सरल, आत्मपरक शैली श्रेष्ठ है — कठिन और दुर्बोध शैली केवल विद्वत्ता का दिखावा है। सरल, सच्ची शैली ज़रूरी है क्योंकि वही पाठक के मन तक पहुँचती है।
- दूरी चीज़ों को सुहावना बना देती है — यह भाव इसलिए मायने रखता है क्योंकि यह हमारे जीवन की एक सच्चाई खोल देता है — हम दूर की चीज़ को अक्सर ज़्यादा अच्छा मान बैठते हैं।
- वर्तमान सदा सुधारों का काल है — यह भाव ज़रूरी है क्योंकि यह बदलाव को जीवन का स्वाभाविक नियम बताता है, और बताता है कि प्रगति कभी रुकती नहीं।
लेखक की शैली और स्वर
लेखक का स्वर पूरे निबंध में हल्का-फुल्का और आत्मपरक है। आत्मपरक का अर्थ है — जिसमें लेखक का अपना “मैं” सामने रहे, वह खुद अपनी बात कहे। यहाँ लेखक हमसे बातें-सी करता चलता है, अपनी उलझन हमें दिखाता है, खुद पर हँसता है।
इसी से जुड़ा है उसका हास्य-व्यंग्य। व्यंग्य का अर्थ है — किसी बात की कमी को सीधे न कहकर, हँसी-मज़ाक के ज़रिए दिखाना। जैसे जब लेखक कहता है “मैं तो मास्टर हूँ, मुझे लंबे-अस्पष्ट वाक्य लिखने होंगे” — तो वह असल में आडंबरी शैली की हँसी उड़ा रहा है। यह स्वर पूरे पाठ को जीवंत और रोचक बना देता है।
लेखक ने अपनी बात पुख़्ता करने के लिए जगह-जगह साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भ भी जोड़े हैं — गार्डिनर और मॉन्टेन (पश्चिमी), बाणभट्ट-श्रीहर्ष-अमीर खुसरो (भारतीय)। इससे निबंध और समृद्ध हो जाता है।
आम भ्रांतियाँ
इस पाठ को पढ़ते समय कुछ ग़लतफ़हमियाँ अक्सर हो जाती हैं। उन्हें पहले ही साफ़ कर लें।
लोग अक्सर निबंध का नाम पढ़कर ही उलझ जाते हैं।
लेखक को सचमुच समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखे, इसलिए निबंध अधूरी जानकारी वाला है।
शीर्षक 'क्या लिखूँ?' सीधे एक सवाल जैसा लगता है, इसलिए पढ़ने वाला मान लेता है कि लेखक सचमुच असमंजस में फँसा बैठा है।
यह असमंजस लेखक की एक रोचक तरकीब है। इसी 'क्या लिखूँ' की उलझन को दिखाते-दिखाते वह निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया हमें समझा देता है। निबंध पूरा और सुगठित है।
ढोल वाली बात को भी लोग ग़लत समझ बैठते हैं।
ढोल की आवाज़ दूर जाकर सचमुच मीठी और बदली हुई हो जाती है।
हमारा रोज़मर्रा का अनुभव यही है कि दूर की आवाज़ धीमी सुनाई देती है, इसलिए लगता है कि आवाज़ ख़ुद ही मधुर हो गई।
आवाज़ वही रहती है, बदलता है उसका अनुभव। दूरी के कारण कर्कशता हम तक नहीं पहुँचती, इसलिए हमें वह मधुर लगती है। यह आवाज़ का नहीं, हमारे अनुभव का बदलना है।
दो पद्धतियों को लेकर भी एक भूल आम है।
लेखक आचार्यों की पद्धति को पूरी तरह सही और श्रेष्ठ मानता है।
लेखक आचार्यों के नियम बड़े आदर के साथ गिनाता है, इसलिए लगता है कि वह उन्हीं को मानता है।
लेखक उन नियमों को व्यंग्य के साथ दोहराता है और हँसी उड़ाता है। उसका असली झुकाव मॉन्टेन की सरल, सच्ची, आत्मपरक पद्धति की ओर है।
समाज-सुधार वाले हिस्से को भी कई बार ग़लत पढ़ा जाता है।
लेखक के अनुसार एक दिन सारे सुधार पूरे हो जाएँगे और समाज में कोई दोष नहीं बचेगा।
'सुधार' शब्द से लगता है कि वह किसी मंज़िल की ओर ले जाता है, जहाँ पहुँचकर सब ठीक हो जाएगा।
लेखक कहता है कि न दोषों का अंत है, न सुधारों का। जो कभी सुधार थे वही आगे दोष बन जाते हैं और फिर नया सुधार होता है। यही चक्र जीवन को प्रगतिशील बनाता है।
झटपट जाँच
अब अपनी समझ परख लीजिए। हर प्रश्न का सही उत्तर चुनिए।
'हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है' — इस उदाहरण में 'खूँटी' किसका प्रतीक है?
दूर बैठे व्यक्ति को ढोल की आवाज़ मधुर क्यों लगती है?
लेखक ने अमीर खुसरो की कहानी किस उद्देश्य से दी है?
अभ्यास (परीक्षा-शैली)
अब परीक्षा जैसे प्रश्नों पर हाथ आज़माइए। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” दबाकर मिलाइए।
लघु उत्तर
निबंध लेखन के विषय में ए.जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?
गार्डिनर मानते हैं कि लिखने की एक ख़ास मानसिक स्थिति होती है, जिसमें मन में अपने-आप उमंग और भाव उठते हैं, और तब लेख अपने-आप लिखा जाता है। पर लेखक कहता है कि उसे कभी ऐसी स्थिति मिली ही नहीं। उसे तो सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है और परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं एक निबंध बनता है। यानी गार्डिनर के लिए लेखन सहज प्रवाह है, और लेखक के लिए कठिन परिश्रम।
'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' — लेखक ने इसका क्या कारण बताया है?
लेखक कहता है कि ढोल की कर्कशता (कठोर आवाज़) दूर तक नहीं पहुँचती। ढोल के पास बैठे लोगों के कानों के पर्दे मानो फटते रहते हैं, पर दूर बैठे व्यक्ति तक केवल मीठी-सी गूँज पहुँचती है। इसलिए वही आवाज़ पास वालों को कर्कश और दूर वालों को मधुर लगती है। मूल बात यह है कि दूरी कठोरता को मिटा देती है, इसी से दूर की चीज़ें सुहावनी लगती हैं।
नमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं, और लेखक को क्या कठिनाई आती है?
नमिता चाहती है कि लेखक “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” विषय पर लिखे, और अमिता चाहती है कि वह “समाज-सुधार” पर लिखे। दोनों परीक्षा में आ चुके विषय हैं। लेखक की कठिनाई यह है कि उसे दो आदर्श निबंध केवल दो घंटों में लिखने हैं, जबकि न उसके पास पुस्तकालय है, न विश्वकोश और न पर्याप्त सामग्री। ये छोटे-से विषय हैं, इन पर पाँच पेज भरना भी उसे कठिन लगता है।
दीर्घ उत्तर / ससंदर्भ व्याख्या
लेखक निबंध लिखने की कौन-कौन-सी पद्धतियों की चर्चा करता है, और वह किसे बेहतर मानता है? कारण सहित लिखिए।
लेखक दो पद्धतियों की चर्चा करता है।
पहली है आचार्यों की पद्धति — शास्त्र के नियमों वाली। इसमें वाक्य लंबे और प्रायः अस्पष्ट होते हैं, अलंकारों-मुहावरों का बोझ रहता है, और लेखक अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करता है। बाणभट्ट, श्रीहर्ष और सेनापति की दुर्बोध शैली इसका उदाहरण है। यह पद्धति पढ़ने में कठिन और भारी लगती है।
दूसरी है मॉन्टेन की पद्धति — आत्मपरक और अनुभव वाली। इसमें लेखक जो ख़ुद देखता, सुनता और अनुभव करता है, उसी को सरल और स्वच्छंद ढंग से लिख देता है। ऐसे निबंधों में सच्ची अनुभूति और लेखक का अपना उल्लास होता है, इसलिए वे जीवंत और आत्मीय लगते हैं।
लेखक मॉन्टेन की पद्धति को बेहतर मानता है। आचार्यों की पद्धति की वह व्यंग्य से हँसी उड़ाता है (“मैं तो मास्टर हूँ”), जबकि मॉन्टेन की पद्धति को प्रेम से बताता है। इसका कारण यह है कि सरल और सच्ची शैली ही पाठक के मन तक पहुँचती है, जबकि दिखावटी कठिन शैली केवल आडंबर रह जाती है।
लेखक के अनुसार तरुण और वृद्ध दोनों वर्तमान से असंतुष्ट क्यों रहते हैं, और इससे 'वर्तमान सदा सुधारों का काल' कैसे बन जाता है?
लेखक कहता है कि दूर रहने से यथार्थ की कठोरता का अनुभव नहीं होता, इसलिए दूर की चीज़ सुहावनी लगती है। तरुण (युवा) संसार के संघर्ष से दूर हैं, इसलिए उन्हें भविष्य बड़ा मनमोहक लगता है — वे क्रांति चाहते हैं और भविष्य को वर्तमान में खींच लाना चाहते हैं। वहीं वृद्ध अपनी जवानी से दूर हट आए हैं, इसलिए उन्हें अपना अतीत सुखद लगता है — वे अतीत-गौरव के संरक्षक बन जाते हैं और उसे वर्तमान में खींचना चाहते हैं।
इस तरह दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, बस उनकी दिशाएँ उलटी हैं। दोनों वर्तमान को अपनी-अपनी ओर खींचते हैं, इसलिए वर्तमान कभी शांत-स्थिर नहीं रह पाता — वह सदा क्षुब्ध (बेचैन) रहता है। यही बेचैनी नए सुधारों को जन्म देती है। लेखक यह भी कहता है कि जो कभी सुधार थे, वही आगे चलकर दोष बन जाते हैं और उन पर फिर नया सुधार होता है। इसी अंतहीन चक्र के कारण वर्तमान सदा सुधारों का काल बना रहता है — और इसी से जीवन प्रगतिशील माना जाता है।
ससंदर्भ व्याख्या कीजिए — 'असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।'
संदर्भ: यह पंक्ति पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के निबंध “क्या लिखूँ?” से ली गई है। लेखक यहाँ अंग्रेज़ी निबंधकार गार्डिनर के एक उदाहरण के सहारे यह समझा रहा है कि निबंध-लेखन में सबसे महत्वपूर्ण क्या है।
व्याख्या: लेखक कहता है कि हैट (टोपी) टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है — असली और ज़रूरी चीज़ हैट है, खूँटी तो बस उसे टाँगने का सहारा है। इसी रूपक को वह लेखन पर लागू करता है। यहाँ हैट हैं लेखक के मन के सच्चे भाव, और खूँटी है निबंध का विषय। जैसे एक ही हैट किसी भी खूँटी पर टँग सकती है, वैसे ही मन के एक ही भाव को किसी भी विषय में भरा जा सकता है।
इसका अर्थ यह है कि निबंध की असली जान विषय नहीं, बल्कि लेखक के भीतर के भाव हैं। अगर भाव सच्चे और गहरे हों, तो किसी भी साधारण विषय को भी सजीव बनाया जा सकता है। इस तरह लेखक यह गहरी बात कहता है कि अच्छा लेखन भीतर से आता है, ऊपरी विषय से नहीं।
सारांश
इस पाठ को पढ़ने के बाद अब आप ये सब समझा सकते हैं —
- “क्या लिखूँ?” एक आत्मपरक, हास्य-व्यंग्य से भरा निबंध है, जिसमें लेखक अपनी उलझन दिखाते-दिखाते निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया समझा देता है।
- निबंध-लेखन के चरण — प्रेरणा, विषय चयन, सामग्री संग्रह, रूपरेखा, शैली निर्धारण और लेखन — और इन पर आने वाली कठिनाइयाँ।
- “हैट और खूँटी” के रूपक से यह सीख कि लेखन में असली चीज़ भाव हैं, विषय नहीं।
- निबंध की दो पद्धतियाँ — आचार्यों की कठिन-दुर्बोध पद्धति और मॉन्टेन की सरल-आत्मपरक पद्धति — और लेखक का सरल पद्धति की ओर झुकाव।
- अमीर खुसरो की तरकीब, जिससे लेखक दो विषयों को एक ही निबंध में बुन लेता है।
- “दूर के ढोल सुहावने” का अर्थ — दूरी कठोरता मिटा देती है, इसलिए दूर की चीज़ें अच्छी लगती हैं।
- तरुण-वृद्ध का खिंचाव और यह विचार कि वर्तमान सदा सुधारों का काल बना रहता है, जिससे जीवन प्रगतिशील है।
आगे क्या
इस पाठ में हमने निबंध-लेखन की प्रक्रिया और शैली को समझा — कि असली चीज़ भाव हैं। अगले पाठ में हम एक नई कथा की ओर बढ़ेंगे, जहाँ भावों और रिश्तों का एक अलग ही रंग दिखेगा।
अगला पाठ पढ़िए — पाठ 3 — संवादहीन।
Frequently Asked Questions
क्या लिखूँ निबंध का मुख्य भाव क्या है?
इस निबंध का मुख्य भाव यह है कि अच्छा निबंध लिखने में असली चीज़ विषय नहीं, बल्कि लेखक के मन के सच्चे भाव हैं। लेखक मज़ाकिया अंदाज़ में निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया और उसकी कठिनाइयों को दिखाता है। साथ ही वह बताता है कि सरल और आत्मपरक शैली ही सबसे अच्छी होती है।
दूर के ढोल सुहावने होते हैं का क्या मतलब है?
इसका मतलब है कि जो चीज़ हमसे दूर होती है वह ज़्यादा अच्छी लगती है। ढोल के पास बैठे व्यक्ति को आवाज़ कर्कश और चुभने वाली लगती है, पर दूर बैठे व्यक्ति को वही आवाज़ मधुर लगती है। कारण यह है कि दूरी कठोरता को मिटा देती है, इसलिए दूर की चीज़ें हमें अधिक सुहावनी लगती हैं।
हैट और खूँटी के उदाहरण से लेखक क्या समझाना चाहता है?
लेखक गार्डिनर के हवाले से कहता है कि हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। यहाँ हैट लेखक के मन के भाव हैं और खूँटी निबंध का विषय है। इससे यह बात साफ़ होती है कि असली चीज़ भाव हैं, विषय नहीं — मन के एक ही भाव को किसी भी विषय में भरा जा सकता है।
क्या लिखूँ पाठ में अमीर खुसरो की कहानी क्यों दी गई है?
अमीर खुसरो ने एक ही पद्य में चार औरतों की चार अलग-अलग इच्छाओं (खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल) को एक साथ पूरा कर दिया था। लेखक यह कहानी इसलिए देता है क्योंकि उसे भी दो अलग विषयों पर निबंध लिखने थे। इसी तरकीब से वह दोनों विषयों को एक ही निबंध में समा देने का रास्ता निकालता है।
लेखक के अनुसार वर्तमान सदा सुधारों का काल क्यों रहता है?
लेखक कहता है कि तरुण भविष्य के सपने देखते हैं और क्रांति चाहते हैं, जबकि वृद्ध अतीत के गौरव को याद करते हैं। दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं और उसे अपनी-अपनी दिशा में खींचते हैं। इसी खिंचाव और बेचैनी के कारण वर्तमान काल हमेशा बदलाव और सुधारों का काल बना रहता है।
क्या लिखूँ निबंध के लेखक कौन हैं और यह किस विधा में है?
इस निबंध के लेखक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हैं, जो हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार और आलोचक थे। यह एक आत्मपरक और हास्य-व्यंग्य से भरा निबंध है, जिसमें लेखक खुद पाठकों से बातें करता-सा चलता है। इसी आत्मीय शैली के कारण यह पाठ जीवंत और रोचक बन जाता है।