क्या लिखूँ?

Chapter 2 · Hindi · Class 9 22 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए। परीक्षा में सवाल आता है — “किसी एक विषय पर निबंध लिखिए।” आप कलम हाथ में लेते हैं। कागज़ सामने है। पर मन में बस एक ही सवाल घूमता है — “अब लिखूँ क्या?”

यह उलझन सबको होती है। शुरू कहाँ से करें? कौन-सी बात पहले लिखें? विषय छोटा-सा है, उस पर पाँच पेज कैसे भरें? यही वह पल है जिसके बारे में यह पाठ बात करता है।

इस निबंध का नाम ही है — “क्या लिखूँ?”। लेखक ने अपनी इसी उलझन को बहुत मज़ेदार ढंग से सामने रखा है। उसे दो विषयों पर “आदर्श निबंध” लिखने हैं, पर दो ही घंटे हैं। वह सोचता है, परेशान होता है, किताबें खोलता है, और हम पाठक उसके साथ-साथ यह सब देखते चलते हैं।

इसकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि लेखक हमें निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया अंदर से दिखा देता है — वह भी हँसते-हँसते। पढ़ते-पढ़ते आप समझ जाएँगे कि अच्छा निबंध बनता कैसे है, और उसमें असली चीज़ क्या होती है। यह सीख आपके अपने हर निबंध-लेखन में काम आएगी।

मूल भाव

मूल भाव: अच्छा निबंध लिखने में असली चीज़ विषय नहीं, लेखक के मन के सच्चे भाव हैं। लेखक हँसी-मज़ाक के अंदाज़ में निबंध-लेखन की पूरी प्रक्रिया और उसकी कठिनाइयाँ दिखाता है। वह बताता है कि नियमों के बोझ से दबी कठिन, दुर्बोध शैली से बेहतर है मॉन्टेन जैसी सरल, सच्ची और आत्मपरक शैली — जिसमें लेखक अपने ही देखे-सुने और अनुभव किए को सहज ढंग से लिख देता है।

आगे बढ़ने से पहले एक शब्द साफ़ कर लें, जो इस पूरे पाठ की जान है।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: यह रचना अभी कॉपीराइट के अधीन है, इसलिए इसका पूरा मूल पाठ यहाँ नहीं दिया गया है। कृपया मूल पाठ अपनी पाठ्यपुस्तक “गंगा” (कक्षा 9) में पढ़ें। नीचे हमने उसका विस्तृत सार और व्याख्या दी है — पुस्तक के साथ इसे पढ़कर आप पाठ को पूरी तरह समझ सकते हैं।

पाठ का सार

निबंध की शुरुआत लेखक की एक उलझन से होती है — “मुझे आज लिखना ही पड़ेगा।” अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध निबंधकार ए.जी. गार्डिनर कहते हैं कि लिखने की एक ख़ास मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में अपने-आप उमंग उठती है और भाव बहने लगते हैं। तब विषय की चिंता नहीं रहती — कोई भी विषय ले लो, उसमें हम अपने मन के भाव भर देते हैं।

पर लेखक ईमानदारी से कहता है — मुझे तो वैसी स्थिति कभी मिली ही नहीं। मुझे तो सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं एक निबंध बनता है। और आज तो उसे ख़ास परिश्रम करना है, क्योंकि उसे साधारण निबंध नहीं लिखना। उसे नमिता और अमिता के लिए “आदर्श निबंध” लिखकर दिखाने हैं। नमिता चाहती है कि वह “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” पर लिखे, और अमिता चाहती है “समाज-सुधार” पर। दोनों परीक्षा में आ चुके विषय हैं।

लेखक सोचता है — पहले यह जान लूँ कि आदर्श निबंध होता क्या है। इसलिए वह निबंध-शास्त्र के आचार्यों (विद्वानों) की राय देखता है। आचार्य कहते हैं — निबंध छोटा होना चाहिए, उसके दो अंग होते हैं (सामग्री और शैली), पहले सामग्री जुटाओ, फिर रूपरेखा बनाओ। पर लेखक हर नियम पर हँसते-हँसते अटक जाता है। वह कहता है — दो ही घंटे हैं, यहाँ न पुस्तकालय है न विश्वकोश, तो सामग्री कहाँ से जुटाऊँ? रूपरेखा वह बना ही नहीं पाता — वह बताता है कि ख़ुद गार्डिनर तक को अपने लेख का शीर्षक तक रखना सबसे कठिन लगता था।

फिर शैली की बात आती है। आचार्य कहते हैं — भाषा में प्रवाह हो, वाक्य छोटे-छोटे पर जुड़े हुए हों। लेखक मज़ाक में कहता है — “पर मैं तो मास्टर हूँ!” विद्वत्ता दिखाने के लिए तो वाक्य लंबे और अस्पष्ट होने चाहिए (जैसे बाणभट्ट और श्रीहर्ष के थे)। यानी आचार्यों की पद्धति उसे उलझाने वाली लगती है।

तभी वह अंग्रेज़ी निबंधकारों की दूसरी पद्धति की ओर मुड़ता है, जिसके जनक मॉन्टेन माने जाते हैं। उन्होंने जो ख़ुद देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को सहज ढंग से लिख दिया। ऐसे निबंध मन की स्वच्छंद रचनाएँ हैं — उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति और उल्लास रहता है। लेखक को यही रास्ता भाता है।

अब समस्या बची — उसे दो विषयों पर लिखना है। यहाँ उसे अमीर खुसरो की कहानी याद आती है, जिन्होंने एक ही पद्य में चार औरतों की चार अलग इच्छाएँ पूरी कर दी थीं। लेखक सोचता है — मैं भी दोनों विषयों को एक ही निबंध में समा दूँगा।

इसके बाद वह “दूर के ढोल सुहावने” का अर्थ खोलता है — दूरी से ढोल की कर्कशता मिट जाती है, इसलिए दूर की चीज़ें सुहावनी लगती हैं। फिर वह इसी को ज़िंदगी से जोड़ता है — तरुण भविष्य के सपने देखते हैं, वृद्ध अतीत के, दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। इसी खिंचाव के कारण वर्तमान सदा सुधारों का काल बना रहता है। इस तरह वह “समाज-सुधार” वाला दूसरा विषय भी उसी प्रवाह में बुन लेता है।

आइए गहराई से समझें

अब निबंध के मुख्य विचारों को एक-एक करके खोलते हैं।

निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया

यह पूरा निबंध असल में निबंध लिखने की प्रक्रिया का ही नक़्शा है। लेखक एक-एक कदम पर अटकता है, और हम उसके साथ पूरी राह देख लेते हैं। नीचे चित्र 2.1 इन्हीं चरणों को क्रम से दिखाता है।

निबंध लेखन की प्रक्रिया के छह चरण
Figure 2.1 — निबंध लेखन की प्रक्रिया के छह चरण, तीरों से क्रम में जुड़े हुए। (1) प्रेरणा — लिखने का मन बनना। (2) विषय चयन — किस पर लिखना है यह तय करना। (3) सामग्री संग्रह — उस विषय के विचार-समूह जुटाना। (4) रूपरेखा निर्माण — निबंध का ढाँचा और क्रम तय करना। (5) शैली निर्धारण — कहने का ढंग चुनना। (6) लेखन व समापन — असल में निबंध लिख देना। नीचे की पंक्ति बताती है कि यह प्रेरणा से शुरू होकर लेखन पर पूरी होने वाली एक सीधी राह है। निबंध में लेखक हर चरण पर अटकता है, इसी से पूरी प्रक्रिया हमारे सामने खुल जाती है।

ध्यान दीजिए — लेखक इनमें से कई चरणों पर हँसते हुए कहता है कि वह उन्हें कर ही नहीं पा रहा। पर मज़े की बात यह है कि लिखते-लिखते उसका निबंध इन्हीं चरणों से होकर तैयार हो जाता है। यही इस पाठ की चतुराई है।

असली चीज़ — विषय या भाव? (हैट और खूँटी)

निबंध की सबसे ज़रूरी सीख यहीं छिपी है। गार्डिनर का एक सुंदर उदाहरण लेखक उठाता है — हैट (टोपी) टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। असली चीज़ है हैट, खूँटी नहीं।

अब “कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं” — यहाँ रुककर पूछिए: इस उदाहरण का मतलब क्या है? इसमें हैट हैं लेखक के मन के भाव, और खूँटी है निबंध का विषय। जैसे एक ही हैट को किसी भी खूँटी पर टाँगा जा सकता है, वैसे ही मन के एक ही भाव को किसी भी विषय में भरा जा सकता है। इसलिए असली चीज़ भाव है, विषय नहीं — यही गार्डिनर कहना चाहते हैं। चित्र 2.2 इस रूपक को साफ़ कर देता है।

हैट और खूँटी का रूपक
Figure 2.2 — हैट और खूँटी का रूपक। दीवार पर कई अलग-अलग खूँटियाँ लगी हैं — हर खूँटी एक अलग विषय है (जैसे समाज-सुधार, दूर के ढोल, या कोई भी विषय)। उन्हीं में से एक खूँटी पर एक नीली हैट टँगी है, और यह हैट लेखक के मन के भाव हैं। नीचे का पीला बॉक्स पूरा सार कहता है — वही हैट किसी भी खूँटी पर टाँगी जा सकती है, यानी मन के एक ही भाव को किसी भी विषय में भरा जा सकता है। इसलिए असली चीज़ भाव है, विषय नहीं।

यह बात बहुत गहरी है। इसका अर्थ यह नहीं कि विषय बेकार है। अर्थ यह है कि अगर मन में सच्चे भाव हों, तो विषय की चिंता गौण हो जाती है — भाव ख़ुद ही विषय को सजीव बना देते हैं।

निबंध की दो पद्धतियाँ

पूरे निबंध में लेखक दो रास्तों के बीच झूलता रहता है। एक है आचार्यों की पद्धति (शास्त्र के नियमों वाली), दूसरी है मॉन्टेन की पद्धति (आत्मपरक, अनुभव वाली)। इन दोनों का फ़र्क़ समझ लेना पूरे पाठ को समझने की चाबी है। चित्र 2.3 दोनों को आमने-सामने रखता है।

निबंध लिखने की दो पद्धतियों की तुलना
Figure 2.3 — निबंध लिखने की दो पद्धतियों की तुलना। बायाँ लाल खाना — आचार्यों की पद्धति: इसमें वाक्य लंबे (आधे पृष्ठ तक) होते हैं, जान-बूझकर अस्पष्टता रखी जाती है, अलंकारों-मुहावरों का बोझ रहता है और विद्वत्ता का प्रदर्शन होता है, इसलिए पढ़ने में यह कठिन और दुर्बोध लगती है (उदाहरण — बाणभट्ट, श्रीहर्ष, सेनापति)। दायाँ हरा खाना — मॉन्टेन की पद्धति: इसमें लेखक जो देखता-सुनता-अनुभव करता है उसी को सरल, स्वच्छंद ढंग से लिख देता है, इसमें सच्ची अनुभूति और लेखक का अपना उल्लास होता है, इसलिए यह पढ़ने में जीवंत और आत्मीय लगती है (उदाहरण — मॉन्टेन, आधुनिक निबंध-शैली के जनक)। नीचे की पंक्ति बताती है कि लेखक का झुकाव सरल, सच्ची, आत्मपरक पद्धति की ओर है।

अब “कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं” — पूछिए: लेखक किस पद्धति को बेहतर मानता है और क्यों? वह साफ़-साफ़ नहीं कहता, पर पूरे व्यंग्य से इशारा कर देता है। आचार्यों की पद्धति की वह हँसी उड़ाता है — “मैं तो मास्टर हूँ, मुझे लंबे और अस्पष्ट वाक्य लिखने होंगे!” यह कहकर वह उस पद्धति की बेतुकी बात दिखा देता है। दूसरी ओर मॉन्टेन की पद्धति को वह प्रेम से बताता है — उसमें लेखक की सच्ची अनुभूति और उल्लास रहता है। इसी से समझ आता है कि उसका झुकाव सरल, आत्मपरक शैली की ओर है।

अमीर खुसरो की तरकीब — दो विषय, एक निबंध

लेखक के सामने एक अड़चन थी — उसे दो विषयों पर निबंध चाहिए था, पर समय कम था। यहाँ उसे अमीर खुसरो याद आते हैं।

कहानी ऐसी है — एक बार खुसरो को प्यास लगी और वे एक कुएँ पर पहुँचे। वहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर हर औरत ने अलग शर्त रखी — एक ने खीर पर कविता सुनाने को कहा, दूसरी ने चरखे पर, तीसरी ने कुत्ते पर, चौथी ने ढोल पर। खुसरो प्रतिभाशाली थे — उन्होंने एक ही पद्य में चारों की इच्छाएँ पूरी कर दीं:

“खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला।

आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।”

लेखक विनम्रता से कहता है — “मुझमें खुसरो की प्रतिभा नहीं है, पर उनकी इस तरकीब को अपनाने से मेरी आधी कठिनाई कम हो जाती है।” यानी वह भी अपने दोनों विषयों — “दूर के ढोल” और “समाज-सुधार” — को एक ही निबंध में बुन देगा।

दूर के ढोल सुहावने होते हैं

अब लेखक पहले विषय को खोलता है। ढोल की आवाज़ तो कर्कश (कानों को चुभने वाली) होती है। फिर वह सुहावनी कैसे लगती है?

अब “कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं” — यहाँ रुककर पूछिए: एक ही ढोल किसी को कर्कश और किसी को मधुर क्यों लगता है? लेखक का जवाब बहुत सुंदर है। ढोल के पास बैठे लोगों के कानों के पर्दे मानो फटते रहते हैं — उन्हें वह कठोर लगता है। पर वही आवाज़ जब किसी दूर बैठे व्यक्ति तक, किसी नदी-तट पर संध्या के समय पहुँचती है, तो मधुर बन जाती है। कारण साफ़ है — कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। दूरी आवाज़ की कठोरता को छान देती है, और बची रहती है बस मीठी-सी गूँज। चित्र 2.4 इसी को दिखाता है।

दूर के ढोल सुहावने — पास और दूर का अनुभव
Figure 2.4 — दूर के ढोल सुहावने होते हैं। बीच में एक ढोल है। बायीं ओर ढोल के पास बैठा व्यक्ति है — उसकी ओर लाल टेढ़ी ध्वनि-रेखाएँ जा रही हैं, और वह अपने कान बंद किए है, क्योंकि उसके कानों के पर्दे फटते हैं और आवाज़ कर्कश, चुभने वाली लगती है। दायीं ओर दूर नदी-तट पर बैठा व्यक्ति है — उसकी ओर हल्की हरी, मद्धम पड़ती ध्वनि-रेखाएँ जा रही हैं, क्योंकि कर्कशता वहाँ तक पहुँचती ही नहीं और वही ध्वनि मधुर, सुहावनी लगती है। नीचे की पंक्ति सार कहती है — दूरी कठोरता मिटा देती है, इसी से दूर की चीज़ें ज़्यादा अच्छी लगती हैं।

लेखक इसमें एक प्यारी कल्पना भी जोड़ता है — दूर बैठा व्यक्ति उसी ढोल को सुनकर मन में किसी के विवाह का चित्र बना लेता है, घर के कोने में बैठी लजाती नववधू की कल्पना कर लेता है। उस नववधू के प्रेम और उल्लास के कंपन ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं।

तरुण, वृद्ध और सुधारों का काल

अब लेखक “दूर की चीज़ सुहावनी” वाली बात को बड़ी सच्चाई से जोड़ देता है। दूर रहने से हमें यथार्थ (असलियत) की कठोरता का अनुभव नहीं होता। इसी कारण —

  • तरुण (युवा) संसार के संघर्ष से दूर हैं, इसलिए उन्हें भविष्य बड़ा मनमोहक लगता है। वे क्रांति चाहते हैं, भविष्य को वर्तमान में खींच लाना चाहते हैं।
  • वृद्ध अपनी जवानी से दूर हट आए हैं, इसलिए उन्हें अपना अतीत बड़ा सुखद लगता है। वे अतीत के गौरव के संरक्षक बन जाते हैं।

दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं और उसे अपनी-अपनी दिशा में खींचते हैं। चित्र 2.5 इस खिंचाव को दिखाता है।

तरुण और वृद्ध की तुलना और सुधारों का काल
Figure 2.5 — तरुण और वृद्ध — दो दिशाओं के सपने। बायाँ नीला खाना — तरुण (युवा): उन्हें भविष्य उज्ज्वल लगता है, वे भविष्य को आज में लाना चाहते हैं, क्रांति के समर्थक होते हैं, उनका खिंचाव आगे की ओर है। दायाँ बैंगनी खाना — वृद्ध (बुज़ुर्ग): उन्हें अतीत सुखद लगता है, वे अतीत को आज में खींचते हैं, अतीत-गौरव के संरक्षक होते हैं, उनका खिंचाव पीछे की ओर है। बीच का पीला खाना — वर्तमान: दोनों के विपरीत खिंचाव से वह सदा क्षुब्ध यानी बेचैन रहता है (दोनों तरफ़ से तीर वर्तमान की ओर आ रहे हैं)। नीचे का हरा खाना निष्कर्ष देता है — इसी खिंचाव के कारण वर्तमान काल सदा सुधारों का काल बना रहता है।

अब “कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं” — पूछिए: इस खिंचाव से सुधार क्यों जन्म लेते हैं? कारण यह है — जब दोनों पीढ़ियाँ वर्तमान से असंतुष्ट होकर उसे बदलना चाहती हैं, तो वर्तमान कभी शांत-स्थिर नहीं रह पाता। यह बेचैनी ही नए सुधारों को जन्म देती है। लेखक एक और गहरी बात कहता है — जो कभी सुधार थे, वही आज दोष बन जाते हैं, और उन पर फिर नया सुधार होता है। न दोषों का अंत है, न सुधारों का। इसी से जीवन प्रगतिशील (आगे बढ़ने वाला) माना गया है। इस तरह लेखक “समाज-सुधार” वाला विषय भी पूरा कर देता है।

भाव / विषय (मुख्य भाव)

अब पाठ के मुख्य भावों को एक नज़र में देख लेते हैं — और हर एक के साथ यह भी कि वह ज़रूरी क्यों है।

  • लेखन में असली चीज़ भाव है, विषय नहीं — यही पूरे पाठ का दिल है। यह सीख इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह बताती है कि सच्चा लेखन भीतर से आता है, ऊपरी विषय से नहीं।
  • सरल, आत्मपरक शैली श्रेष्ठ है — कठिन और दुर्बोध शैली केवल विद्वत्ता का दिखावा है। सरल, सच्ची शैली ज़रूरी है क्योंकि वही पाठक के मन तक पहुँचती है।
  • दूरी चीज़ों को सुहावना बना देती है — यह भाव इसलिए मायने रखता है क्योंकि यह हमारे जीवन की एक सच्चाई खोल देता है — हम दूर की चीज़ को अक्सर ज़्यादा अच्छा मान बैठते हैं।
  • वर्तमान सदा सुधारों का काल है — यह भाव ज़रूरी है क्योंकि यह बदलाव को जीवन का स्वाभाविक नियम बताता है, और बताता है कि प्रगति कभी रुकती नहीं।

लेखक की शैली और स्वर

लेखक का स्वर पूरे निबंध में हल्का-फुल्का और आत्मपरक है। आत्मपरक का अर्थ है — जिसमें लेखक का अपना “मैं” सामने रहे, वह खुद अपनी बात कहे। यहाँ लेखक हमसे बातें-सी करता चलता है, अपनी उलझन हमें दिखाता है, खुद पर हँसता है।

इसी से जुड़ा है उसका हास्य-व्यंग्य। व्यंग्य का अर्थ है — किसी बात की कमी को सीधे न कहकर, हँसी-मज़ाक के ज़रिए दिखाना। जैसे जब लेखक कहता है “मैं तो मास्टर हूँ, मुझे लंबे-अस्पष्ट वाक्य लिखने होंगे” — तो वह असल में आडंबरी शैली की हँसी उड़ा रहा है। यह स्वर पूरे पाठ को जीवंत और रोचक बना देता है।

लेखक ने अपनी बात पुख़्ता करने के लिए जगह-जगह साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भ भी जोड़े हैं — गार्डिनर और मॉन्टेन (पश्चिमी), बाणभट्ट-श्रीहर्ष-अमीर खुसरो (भारतीय)। इससे निबंध और समृद्ध हो जाता है।

आम भ्रांतियाँ

इस पाठ को पढ़ते समय कुछ ग़लतफ़हमियाँ अक्सर हो जाती हैं। उन्हें पहले ही साफ़ कर लें।

लोग अक्सर निबंध का नाम पढ़कर ही उलझ जाते हैं।

⚠️ Common mistake
What students think

लेखक को सचमुच समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखे, इसलिए निबंध अधूरी जानकारी वाला है।

Why it seems right

शीर्षक 'क्या लिखूँ?' सीधे एक सवाल जैसा लगता है, इसलिए पढ़ने वाला मान लेता है कि लेखक सचमुच असमंजस में फँसा बैठा है।

What actually happens

यह असमंजस लेखक की एक रोचक तरकीब है। इसी 'क्या लिखूँ' की उलझन को दिखाते-दिखाते वह निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया हमें समझा देता है। निबंध पूरा और सुगठित है।

ढोल वाली बात को भी लोग ग़लत समझ बैठते हैं।

⚠️ Common mistake
What students think

ढोल की आवाज़ दूर जाकर सचमुच मीठी और बदली हुई हो जाती है।

Why it seems right

हमारा रोज़मर्रा का अनुभव यही है कि दूर की आवाज़ धीमी सुनाई देती है, इसलिए लगता है कि आवाज़ ख़ुद ही मधुर हो गई।

What actually happens

आवाज़ वही रहती है, बदलता है उसका अनुभव। दूरी के कारण कर्कशता हम तक नहीं पहुँचती, इसलिए हमें वह मधुर लगती है। यह आवाज़ का नहीं, हमारे अनुभव का बदलना है।

दो पद्धतियों को लेकर भी एक भूल आम है।

⚠️ Common mistake
What students think

लेखक आचार्यों की पद्धति को पूरी तरह सही और श्रेष्ठ मानता है।

Why it seems right

लेखक आचार्यों के नियम बड़े आदर के साथ गिनाता है, इसलिए लगता है कि वह उन्हीं को मानता है।

What actually happens

लेखक उन नियमों को व्यंग्य के साथ दोहराता है और हँसी उड़ाता है। उसका असली झुकाव मॉन्टेन की सरल, सच्ची, आत्मपरक पद्धति की ओर है।

समाज-सुधार वाले हिस्से को भी कई बार ग़लत पढ़ा जाता है।

⚠️ Common mistake
What students think

लेखक के अनुसार एक दिन सारे सुधार पूरे हो जाएँगे और समाज में कोई दोष नहीं बचेगा।

Why it seems right

'सुधार' शब्द से लगता है कि वह किसी मंज़िल की ओर ले जाता है, जहाँ पहुँचकर सब ठीक हो जाएगा।

What actually happens

लेखक कहता है कि न दोषों का अंत है, न सुधारों का। जो कभी सुधार थे वही आगे दोष बन जाते हैं और फिर नया सुधार होता है। यही चक्र जीवन को प्रगतिशील बनाता है।

झटपट जाँच

अब अपनी समझ परख लीजिए। हर प्रश्न का सही उत्तर चुनिए।

'हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है' — इस उदाहरण में 'खूँटी' किसका प्रतीक है?

दूर बैठे व्यक्ति को ढोल की आवाज़ मधुर क्यों लगती है?

लेखक ने अमीर खुसरो की कहानी किस उद्देश्य से दी है?

अभ्यास (परीक्षा-शैली)

अब परीक्षा जैसे प्रश्नों पर हाथ आज़माइए। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” दबाकर मिलाइए।

लघु उत्तर

सरल

निबंध लेखन के विषय में ए.जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?

सरल

'दूर के ढोल सुहावने होते हैं' — लेखक ने इसका क्या कारण बताया है?

सरल

नमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं, और लेखक को क्या कठिनाई आती है?

दीर्घ उत्तर / ससंदर्भ व्याख्या

मध्यम

लेखक निबंध लिखने की कौन-कौन-सी पद्धतियों की चर्चा करता है, और वह किसे बेहतर मानता है? कारण सहित लिखिए।

मध्यम

लेखक के अनुसार तरुण और वृद्ध दोनों वर्तमान से असंतुष्ट क्यों रहते हैं, और इससे 'वर्तमान सदा सुधारों का काल' कैसे बन जाता है?

चुनौती

ससंदर्भ व्याख्या कीजिए — 'असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।'

सारांश

इस पाठ को पढ़ने के बाद अब आप ये सब समझा सकते हैं —

  • “क्या लिखूँ?” एक आत्मपरक, हास्य-व्यंग्य से भरा निबंध है, जिसमें लेखक अपनी उलझन दिखाते-दिखाते निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया समझा देता है।
  • निबंध-लेखन के चरण — प्रेरणा, विषय चयन, सामग्री संग्रह, रूपरेखा, शैली निर्धारण और लेखन — और इन पर आने वाली कठिनाइयाँ।
  • “हैट और खूँटी” के रूपक से यह सीख कि लेखन में असली चीज़ भाव हैं, विषय नहीं।
  • निबंध की दो पद्धतियाँ — आचार्यों की कठिन-दुर्बोध पद्धति और मॉन्टेन की सरल-आत्मपरक पद्धति — और लेखक का सरल पद्धति की ओर झुकाव।
  • अमीर खुसरो की तरकीब, जिससे लेखक दो विषयों को एक ही निबंध में बुन लेता है।
  • “दूर के ढोल सुहावने” का अर्थ — दूरी कठोरता मिटा देती है, इसलिए दूर की चीज़ें अच्छी लगती हैं।
  • तरुण-वृद्ध का खिंचाव और यह विचार कि वर्तमान सदा सुधारों का काल बना रहता है, जिससे जीवन प्रगतिशील है।

आगे क्या

इस पाठ में हमने निबंध-लेखन की प्रक्रिया और शैली को समझा — कि असली चीज़ भाव हैं। अगले पाठ में हम एक नई कथा की ओर बढ़ेंगे, जहाँ भावों और रिश्तों का एक अलग ही रंग दिखेगा।

अगला पाठ पढ़िए — पाठ 3 — संवादहीन

Frequently Asked Questions

क्या लिखूँ निबंध का मुख्य भाव क्या है?

इस निबंध का मुख्य भाव यह है कि अच्छा निबंध लिखने में असली चीज़ विषय नहीं, बल्कि लेखक के मन के सच्चे भाव हैं। लेखक मज़ाकिया अंदाज़ में निबंध लिखने की पूरी प्रक्रिया और उसकी कठिनाइयों को दिखाता है। साथ ही वह बताता है कि सरल और आत्मपरक शैली ही सबसे अच्छी होती है।

दूर के ढोल सुहावने होते हैं का क्या मतलब है?

इसका मतलब है कि जो चीज़ हमसे दूर होती है वह ज़्यादा अच्छी लगती है। ढोल के पास बैठे व्यक्ति को आवाज़ कर्कश और चुभने वाली लगती है, पर दूर बैठे व्यक्ति को वही आवाज़ मधुर लगती है। कारण यह है कि दूरी कठोरता को मिटा देती है, इसलिए दूर की चीज़ें हमें अधिक सुहावनी लगती हैं।

हैट और खूँटी के उदाहरण से लेखक क्या समझाना चाहता है?

लेखक गार्डिनर के हवाले से कहता है कि हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। यहाँ हैट लेखक के मन के भाव हैं और खूँटी निबंध का विषय है। इससे यह बात साफ़ होती है कि असली चीज़ भाव हैं, विषय नहीं — मन के एक ही भाव को किसी भी विषय में भरा जा सकता है।

क्या लिखूँ पाठ में अमीर खुसरो की कहानी क्यों दी गई है?

अमीर खुसरो ने एक ही पद्य में चार औरतों की चार अलग-अलग इच्छाओं (खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल) को एक साथ पूरा कर दिया था। लेखक यह कहानी इसलिए देता है क्योंकि उसे भी दो अलग विषयों पर निबंध लिखने थे। इसी तरकीब से वह दोनों विषयों को एक ही निबंध में समा देने का रास्ता निकालता है।

लेखक के अनुसार वर्तमान सदा सुधारों का काल क्यों रहता है?

लेखक कहता है कि तरुण भविष्य के सपने देखते हैं और क्रांति चाहते हैं, जबकि वृद्ध अतीत के गौरव को याद करते हैं। दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं और उसे अपनी-अपनी दिशा में खींचते हैं। इसी खिंचाव और बेचैनी के कारण वर्तमान काल हमेशा बदलाव और सुधारों का काल बना रहता है।

क्या लिखूँ निबंध के लेखक कौन हैं और यह किस विधा में है?

इस निबंध के लेखक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हैं, जो हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार और आलोचक थे। यह एक आत्मपरक और हास्य-व्यंग्य से भरा निबंध है, जिसमें लेखक खुद पाठकों से बातें करता-सा चलता है। इसी आत्मीय शैली के कारण यह पाठ जीवंत और रोचक बन जाता है।