कारतूस
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए — आपका सबसे बड़ा दुश्मन आपको ढूँढ़ रहा हो, उसने जंगल में सेना के साथ डेरा डाल रखा हो, और आप क्या करें? आप उसी दुश्मन के खेमे में, रात के अँधेरे में, अकेले घुस जाएँ — और उसी से अपनी बंदूक के लिए कारतूस माँग लें! सुनने में यह पागलपन लगता है, है ना?
पर यही इस एकांकी का असली रोमांच है। “कारतूस” एक सच्ची ऐतिहासिक घटना पर आधारित नाटक है। इसमें एक नौजवान नवाब है — वज़ीर अली — जो अंग्रेज़ों के खिलाफ़ बगावत करता है। अंग्रेज़ उसे पकड़ने के लिए जान लगा देते हैं, पर वह हर बार अपनी हिम्मत और दिमाग़ से उन्हें चकमा दे जाता है।
यह पाठ हमें दिखाता है कि सच्ची बहादुरी सिर्फ़ ताकत की बात नहीं है। असली वीर वह है जो डर के बीच भी ठंडे दिमाग़ से सोच सके और दुश्मन को ही उसकी चाल में मात दे दे। साथ ही यह आज़ादी के उन गुमनाम लड़ाकों की याद दिलाता है, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अंग्रेज़ों से लोहा लिया। इसीलिए यह छोटी-सी एकांकी पढ़ते-पढ़ते आपकी साँसें थम जाती हैं।
लेखक-परिचय
इस एकांकी के लेखक के बारे में थोड़ा जान लेना ज़रूरी है, क्योंकि उनकी पहचान इस पाठ की शैली को समझने में मदद करती है।
मूल भाव
इस एकांकी का मूल भाव है — सच्ची देशभक्ति, अदम्य साहस और तेज़ बुद्धि का मेल। वज़ीर अली एक ऐसा नायक है जो अंग्रेज़ी शासन के सामने झुकता नहीं। वह अपने ही दुश्मन के खेमे में अकेले जाकर, बड़ी चतुराई से, उसी से कारतूस ले लेता है और सुरक्षित निकल जाता है। एकांकी यह संदेश देती है कि आज़ादी के दीवाने अपनी जान की भी परवाह नहीं करते, और असली वीरता ताकत के साथ-साथ हिम्मत और सूझबूझ से बनती है — इतनी कि दुश्मन भी उसकी बहादुरी का कायल हो जाए।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: यह एकांकी अभी कॉपीराइट के अधीन है, इसलिए इसका पूरा मूल पाठ यहाँ नहीं दिया गया है। कृपया मूल एकांकी अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “स्पर्श भाग 2” में पढ़ें। नीचे हमने उसका विस्तृत सार और व्याख्या दी है — पुस्तक के साथ इसे पढ़कर आप एकांकी को पूरी तरह समझ सकते हैं।
एकांकी का सार
आइए पूरी कहानी को सरल भाषा में, क्रम से समझते हैं। यह घटना सन् 1857 के विद्रोह से कुछ पहले के समय की है, जब अंग्रेज़ धीरे-धीरे भारत के राज्यों पर कब्ज़ा कर रहे थे।
कहानी एक जंगल में शुरू होती है। यहाँ एक अंग्रेज़ कर्नल अपनी सेना के साथ डेरा डाले हुए है। उसके साथ एक लेफ़्टिनेंट (छोटा अफ़सर) भी है। ये अंग्रेज़ अवध के एक विद्रोही नवाब — वज़ीर अली — को पकड़ने आए हैं। वज़ीर अली ने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ बगावत कर दी है, और तब से वह जंगलों में छिपकर उनसे लड़ रहा है।
कर्नल और लेफ़्टिनेंट आपस में बातें करते हैं। उनकी बातचीत से पता चलता है कि वज़ीर अली बहुत बहादुर और बहुत चतुर है। अंग्रेज़ उससे बुरी तरह परेशान हैं। वह एक ऐसा शेर है जिसे पकड़ना उनके लिए बहुत मुश्किल हो रहा है। हम यह भी जानते हैं कि वज़ीर अली पहले एक अंग्रेज़ अफ़सर की हत्या कर चुका है और बड़ी सफ़ाई से बच निकला है।
फिर रात के समय कहानी में एक मोड़ आता है। अचानक एक रहस्यमय घुड़सवार अकेले ही कर्नल के खेमे में आ पहुँचता है। वह बेखौफ़ है। वह कर्नल से कहता है कि वह भी वज़ीर अली का दुश्मन है और उसे पकड़ना चाहता है। इसके लिए वह कर्नल से कारतूस (बंदूक में भरी जाने वाली गोलियाँ) माँगता है। उसकी बातों में इतना आत्मविश्वास है कि कर्नल उस पर भरोसा कर लेता है और उसे कारतूस दे देता है।
अब आता है एकांकी का सबसे चौंकाने वाला पल। जाते-जाते वह सवार बताता है कि वह असल में कौन है — वह स्वयं वज़ीर अली है! यानी जिस दुश्मन को पकड़ने के लिए कर्नल ने पूरा जंगल छान मारा था, वही दुश्मन खुद उसके खेमे में आया, उसी से कारतूस ले गया, और अपनी पहचान बताकर बेधड़क सुरक्षित निकल गया।
यह जानकर कर्नल हैरान रह जाता है। उसे गुस्सा नहीं, बल्कि वज़ीर अली की इस अद्भुत हिम्मत और चालाकी पर हैरानी और प्रशंसा होती है। वह उसकी बहादुरी का कायल हो जाता है।
पूरी एकांकी की रूपरेखा एक नज़र में देखने के लिए, नीचे चित्र 14.1 देखिए।
आइए गहराई से समझें
अब केवल “क्या हुआ” से आगे बढ़कर “ऐसा क्यों है” समझते हैं। यही इस एकांकी की असली गहराई है।
पात्र — वज़ीर अली, कर्नल, लेफ़्टिनेंट और सवार
इस एकांकी में पात्र बहुत कम हैं, पर हर पात्र अपनी जगह ज़रूरी है। नीचे चित्र 14.2 में सभी पात्रों को एक साथ देखिए।
वज़ीर अली इस एकांकी का नायक है। वह अवध का विद्रोही नवाब है। उसके चरित्र में तीन बड़ी खूबियाँ हैं — गहरी देशभक्ति, अदम्य साहस और तेज़ चतुराई। वह अंग्रेज़ों की गुलामी स्वीकार नहीं करता। पकड़े जाने का डर भी उसे झुका नहीं पाता। उसका भेस बदलकर दुश्मन से ही कारतूस ले आना उसकी बुद्धि का सबसे बड़ा सबूत है।
कर्नल एक अंग्रेज़ अफ़सर है। वह कुशल और अनुशासित सैनिक है, पर वज़ीर अली को पकड़ नहीं पा रहा। ध्यान देने वाली बात यह है कि वह अपने दुश्मन की बहादुरी की भी क़द्र करता है — अंत में वह वज़ीर अली की हिम्मत का कायल हो जाता है। इससे पता चलता है कि सच्ची वीरता का सम्मान दुश्मन भी करता है।
लेफ़्टिनेंट कर्नल का सहायक है। उसका मुख्य काम कर्नल के साथ बातचीत करना है। इसी बातचीत के ज़रिए हमें वज़ीर अली की बहादुरी और उसकी पिछली घटनाओं की जानकारी मिलती है। यानी लेफ़्टिनेंट कहानी की पृष्ठभूमि (background) हम तक पहुँचाने का काम करता है।
रहस्यमय सवार एकांकी का सबसे रोमांचक पात्र है। पूरी एकांकी में वह एक अनजान बहादुर आदमी लगता है, और अंत में उसका असली रूप सामने आता है — वही वज़ीर अली है। यह पहचान का खुलासा ही एकांकी को इतना यादगार बनाता है।
कर्नल वज़ीर अली का दुश्मन था, फिर भी अंत में वह उसकी प्रशंसा क्यों करता है?
वज़ीर अली का चरित्र — साहस और चतुराई का मेल
अब इस एकांकी के सबसे ज़रूरी सवाल पर आते हैं — कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं है। आइए कुछ गहरे “क्यों” समझते हैं। पहले वज़ीर अली के चरित्र को नीचे चित्र 14.3 में देख लीजिए।
क्यों, वज़ीर अली अपने ही दुश्मन के खेमे में जाने का इतना बड़ा जोखिम उठाता है? ऊपर से देखें तो यह आत्महत्या जैसा लगता है। पर इसके पीछे गहरी सोच है। वज़ीर अली जानता है कि उसे अंग्रेज़ों से लड़ते रहना है, और लड़ने के लिए कारतूस चाहिए। अंग्रेज़ों के पास ही ढेर सारे कारतूस हैं। तो उसने सबसे ख़तरनाक, पर सबसे सीधा रास्ता चुना — सीधे दुश्मन से ही ले आना। यह कदम बताता है कि वह डर के आगे अपने लक्ष्य को रखता है। उसके लिए आज़ादी की लड़ाई अपनी जान से बड़ी है। यही एक सच्चे क्रांतिकारी की निशानी है।
क्यों, कर्नल जैसे चतुर अफ़सर को भी वज़ीर अली धोखा दे पाता है? क्योंकि वज़ीर अली ने मनोविज्ञान का सहारा लिया। उसने अपने आप को वज़ीर अली का दुश्मन बताया — कर्नल ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई इतनी हिम्मत करेगा कि खुद को ही पकड़ने का दावा करते हुए दुश्मन के पास आ जाए। यही उसकी चाल थी। जो बात सबसे असंभव लगती है, वही सबसे बड़ी ढाल बन जाती है। कर्नल इसी भरोसे में आ गया। इससे पता चलता है कि अकेली बहादुरी काफ़ी नहीं — उसके साथ तेज़ दिमाग़ हो, तभी असली जीत मिलती है।
बहादुरी सिर्फ़ ताकत से नहीं, सोच और हिम्मत के मेल से बनती है। इस बात को नीचे की तुलना और साफ़ करती है।
| पहलू | केवल साहस होता तो | वज़ीर अली ने क्या किया |
|---|---|---|
| कारतूस पाने का तरीका | सीधे हमला करके छीनना — और शायद पकड़ा या मारा जाना | भेस बदलकर, बातों से कर्नल का भरोसा जीतकर कारतूस लेना |
| जोखिम का सामना | बिना सोचे कूद पड़ना | खतरा उठाना, पर पूरी योजना और सूझबूझ के साथ |
| नतीजा | पकड़े जाने का बड़ा ख़तरा | काम भी हुआ और सुरक्षित निकल भी गया |
| दुश्मन पर असर | डर या नफ़रत | हैरानी और प्रशंसा |
इस तालिका से साफ़ है कि वज़ीर अली की असली ताकत साहस और बुद्धि, दोनों का मेल है।
एकांकी विधा की विशेषताएँ
“कारतूस” एक एकांकी है। बहुत ज़रूरी है कि हम समझें कि एकांकी क्या होती है और कहानी से कैसे अलग है। आइए पहले एक छोटा-सा अंतर साफ़ कर लें।
एकांकी की कुछ खास विशेषताएँ होती हैं, और “कारतूस” इन सभी को पूरा करती है। नीचे चित्र 14.4 में इन्हें देखिए।
क्यों, “कारतूस” को एक सफल एकांकी कहा जाता है? क्योंकि यह एकांकी की हर माँग को पूरा करती है। पूरी घटना एक ही जगह (कर्नल का खेमा), थोड़े-से समय में और बहुत कम पात्रों के साथ घटती है। कथा सिर्फ़ संवादों से चलती है — कोई लंबा वर्णन नहीं। और सबसे बड़ी बात, इसका अंत एक ज़ोरदार चरम बिंदु पर होता है, जहाँ पहचान खुलते ही पाठक चौंक उठता है। छोटे आकार में इतना रोमांच और कसावट पैदा कर देना ही इसे सफल एकांकी बनाता है।
आम भूलें
ये वे गलतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक को ध्यान से पढ़िए — “ऐसा क्यों लगता है” वाला भाग जाल दिखाता है, और “असल बात” उसे सुधार देती है।
रहस्यमय सवार और वज़ीर अली दो अलग-अलग आदमी हैं।
पूरी एकांकी में सवार खुद को वज़ीर अली का दुश्मन बताकर उसे पकड़ने की बात करता है, इसलिए स्वाभाविक रूप से लगता है कि वह कोई और ही व्यक्ति होगा।
असल में वह सवार और कोई नहीं, स्वयं वज़ीर अली ही है। 'दुश्मन' होने का दिखावा तो उसकी चतुर चाल थी, ताकि कर्नल को कोई शक न हो और वह आसानी से कारतूस दे दे। अंत में जब वह अपनी पहचान बताता है, तभी यह चाल समझ आती है।
वज़ीर अली एक डाकू या लुटेरा था, जो कारतूस लूटने आया था।
वह रात को छिपकर, हथियारों के लिए दुश्मन के खेमे में घुसता है, इसलिए ऊपर से देखने पर वह किसी लुटेरे जैसा लग सकता है।
वह डाकू नहीं, बल्कि अवध का विद्रोही नवाब और एक सच्चा देशभक्त था। वह अपने लिए नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों के खिलाफ़ आज़ादी की लड़ाई जारी रखने के लिए कारतूस ले गया। उसका मकसद निजी लाभ नहीं, देश के लिए संघर्ष था।
कर्नल वज़ीर अली के निकल जाने पर उससे नफ़रत करने लगता है।
वज़ीर अली ने कर्नल को धोखा देकर उसी से कारतूस ले लिए, इसलिए लगता है कि कर्नल को गुस्सा और नफ़रत ही हुई होगी।
कर्नल को नफ़रत नहीं, बल्कि हैरानी और प्रशंसा होती है। एक सैनिक होने के नाते वह वज़ीर अली की अद्भुत हिम्मत और चतुराई की क़द्र करता है, और उसकी बहादुरी का कायल हो जाता है।
जाँचिए अपनी समझ
खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।
एकांकी की शुरुआत में कर्नल जंगल में डेरा डालकर किसे ढूँढ़ रहा है?
रहस्यमय सवार कर्नल के खेमे में किस बहाने से आता है?
एकांकी के अंत में सबसे चौंकाने वाली बात क्या है?
अभ्यास
पहले अपना उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए। उत्तर की लंबाई पर ध्यान दीजिए — लघु उत्तर में 2-3 वाक्य, दीर्घ उत्तर में पूरा अनुच्छेद।
सरल
कर्नल और उसकी सेना जंगल में क्यों डेरा डाले हुए थे?
कर्नल और उसकी अंग्रेज़ सेना जंगल में इसलिए डेरा डाले हुए थी ताकि वे अवध के विद्रोही नवाब वज़ीर अली को पकड़ सकें। वज़ीर अली ने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ बगावत कर दी थी और जंगलों में छिपकर उनसे लड़ रहा था। इसी कारण अंग्रेज़ उसे ढूँढ़ने जंगल में आ डटे थे।
रहस्यमय सवार खेमे में क्या लेने आया था, और जाते-जाते उसने क्या बताया?
रहस्यमय सवार कर्नल से कारतूस लेने आया था। उसने कर्नल को यह कहकर भरोसे में लिया कि वह भी वज़ीर अली को पकड़ना चाहता है। जाते-जाते उसने अपनी असली पहचान बताई — कि वह स्वयं वज़ीर अली ही है। यानी जिसे कर्नल ढूँढ़ रहा था, वही खुद आकर उसी से कारतूस ले गया।
मध्यम
वज़ीर अली के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
वज़ीर अली अवध का विद्रोही नवाब और इस एकांकी का नायक है। उसके चरित्र में कई बड़ी खूबियाँ हैं।
पहली, वह बहुत बहादुर है — वह अकेले ही, बिना डरे, अपने सबसे बड़े दुश्मन के खेमे में घुस जाता है। दूसरी, वह बेहद चतुर है — वह भेस और बातों से कर्नल का भरोसा जीतकर उसी से कारतूस ले लेता है। तीसरी, वह सच्चा देशभक्त है — वह अपने लिए नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों के खिलाफ़ आज़ादी की लड़ाई जारी रखने के लिए जान जोखिम में डालता है। चौथी, वह दृढ़निश्चयी है — पकड़े जाने का डर भी उसे झुका नहीं पाता। इस तरह उसमें साहस, बुद्धि और देशप्रेम का सुंदर मेल है।
'कारतूस' एक सफल एकांकी है। एकांकी की विशेषताओं के आधार पर इसे समझाइए।
एकांकी एक ही अंक में पूरा होने वाला छोटा नाटक है, और “कारतूस” इसकी हर विशेषता को पूरा करती है।
पहली बात, इसकी पूरी घटना एक ही जगह — कर्नल के खेमे में — और थोड़े-से समय में घटती है। दूसरी, इसमें पात्र बहुत कम हैं — मुख्यतः कर्नल, लेफ़्टिनेंट और सवार। तीसरी, पूरी कथा एक ही मुख्य घटना (कारतूस की माँग और पहचान के खुलासे) के इर्द-गिर्द घूमती है। चौथी, यह पूरी तरह संवाद-प्रधान है — कहानी पात्रों की बातचीत से ही आगे बढ़ती है। और सबसे बड़ी बात, इसका अंत एक ज़ोरदार चरम बिंदु पर होता है, जहाँ पहचान खुलते ही पाठक चौंक उठता है। इतने छोटे आकार में रोमांच और कसावट पैदा करना ही इसे एक सफल एकांकी बनाता है।
चुनौती
'कारतूस' एकांकी के आधार पर बताइए कि लेखक देशभक्ति और सच्ची वीरता के बारे में क्या संदेश देना चाहता है? विस्तार से समझाइए।
“कारतूस” हबीब तनवीर की एक रोमांचक एकांकी है, जो देशभक्ति और सच्ची वीरता का गहरा संदेश देती है। यह एकांकी अवध के विद्रोही नवाब वज़ीर अली के साहस और चतुराई पर आधारित है।
इस एकांकी के ज़रिए लेखक सबसे पहले यह संदेश देता है कि सच्चे देशभक्त अपनी जान की भी परवाह नहीं करते। वज़ीर अली अपने ही दुश्मन के खेमे में अकेले घुस जाता है, क्योंकि उसके लिए आज़ादी की लड़ाई अपनी जान से बड़ी है। गुलामी उसे मंज़ूर नहीं, और कोई भी ख़तरा उसे झुका नहीं सकता।
दूसरा बड़ा संदेश है कि सच्ची वीरता केवल ताकत की नहीं, साहस और बुद्धि के मेल की बात है। वज़ीर अली सीधे हमला करके कारतूस छीन भी सकता था, पर तब शायद वह पकड़ा जाता। उसने बुद्धि का इस्तेमाल किया — भेस बदलकर, खुद को दुश्मन बताकर, कर्नल का भरोसा जीतकर कारतूस ले लिया और सुरक्षित निकल गया। यह दिखाता है कि असली जीत हिम्मत और सूझबूझ, दोनों से मिलती है।
तीसरा, एकांकी यह भी दिखाती है कि सच्ची वीरता दुश्मन के दिल में भी सम्मान जगा देती है — अंत में कर्नल भी वज़ीर अली की हिम्मत का कायल हो जाता है। इस तरह लेखक यह सिखाता है कि देश के लिए मर-मिटने का जज़्बा, अदम्य साहस और तेज़ दिमाग़ — यही एक सच्चे वीर की पहचान हैं। यही इस पाठ का सबसे बड़ा संदेश है।
एकांकी के अंत में जब सवार अपनी पहचान बताता है, तब कर्नल पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्यों? समझाइए।
एकांकी के अंत में जब वह रहस्यमय सवार बताता है कि वह स्वयं वज़ीर अली है, तो कर्नल पहले तो पूरी तरह हैरान रह जाता है। जिस दुश्मन को पकड़ने के लिए उसने पूरी सेना के साथ जंगल छान मारा था, वही दुश्मन खुद उसके खेमे में आया, उसी से कारतूस ले गया, और बेधड़क निकल भी गया — यह बात उसकी कल्पना से परे थी।
पर ध्यान देने वाली बात यह है कि कर्नल के मन में नफ़रत या केवल गुस्सा नहीं, बल्कि प्रशंसा का भाव जागता है। वह वज़ीर अली की अद्भुत हिम्मत और चतुराई का कायल हो जाता है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कर्नल खुद एक सैनिक है, और एक सच्चा सैनिक बहादुरी की क़द्र करना जानता है — चाहे वह दुश्मन की ही क्यों न हो। वज़ीर अली ने जो किया, वह असाधारण साहस और सूझबूझ का काम था। ऐसी वीरता देखकर कुछ देर के लिए दुश्मनी का भाव पीछे चला जाता है और मन में सहज ही सम्मान उमड़ आता है। यही एकांकी का सबसे बड़ा संदेश भी है — सच्ची वीरता दुश्मन के दिल में भी सम्मान जगा देती है।
सारांश
याद रखने योग्य सब कुछ, संक्षेप में:
- “कारतूस” हबीब तनवीर की लिखी एक एकांकी है, जो सच्ची देशभक्ति, साहस और चतुराई का संदेश देती है।
- घटना सन् 1857 के विद्रोह से कुछ पहले की है; अंग्रेज़ कर्नल अपनी सेना के साथ जंगल में डेरा डालकर विद्रोही नवाब वज़ीर अली को ढूँढ़ रहा है।
- कर्नल और लेफ़्टिनेंट की बातचीत से पता चलता है कि वज़ीर अली बहुत बहादुर और चतुर है, और अंग्रेज़ उससे परेशान हैं।
- रात को एक रहस्यमय सवार अकेले खेमे में आता है, खुद को वज़ीर अली का दुश्मन बताकर कर्नल से कारतूस ले लेता है (चित्र 14.1)।
- जाते-जाते वह अपनी पहचान बताता है — वह स्वयं वज़ीर अली ही था; यही एकांकी का चरम बिंदु है, और वह सुरक्षित निकल जाता है।
- पात्र (चित्र 14.2): वज़ीर अली — बहादुर, चतुर देशभक्त नायक; कर्नल — अंग्रेज़ अफ़सर जो अंत में उसकी हिम्मत का कायल; लेफ़्टिनेंट — कर्नल का सहायक; सवार — असल में वज़ीर अली का ही भेस।
- वज़ीर अली का चरित्र (चित्र 14.3): साहस, चतुराई, देशभक्ति और दृढ़ संकल्प का मेल; वह डर के आगे अपने लक्ष्य को रखता है।
- एकांकी विधा (चित्र 14.4): एक ही अंक, सीमित पात्र, एक मुख्य घटना, संवाद-प्रधान और चरम बिंदु पर तीव्र अंत — “कारतूस” इन सभी को पूरा करती है।
- केंद्रीय संदेश: सच्ची वीरता ताकत के साथ-साथ हिम्मत और बुद्धि से बनती है, और सच्ची वीरता दुश्मन के दिल में भी सम्मान जगा देती है।
आगे क्या
यह स्पर्श भाग 2 का आख़िरी गद्य पाठ था। यहाँ तक आप कविता और गद्य, दोनों के सफ़र पूरे कर चुके हैं — बधाई!
अब आगे आपके लिए है संचयन भाग 2 — यह आपकी पूरक पाठ्यपुस्तक (supplementary reader) है। इसमें लंबी, मन को छू लेने वाली कहानियाँ हैं, जिन्हें आराम से, मज़े लेकर पढ़ने के लिए रखा गया है। इसका पहला पाठ है “हरिहर काका” (मिथिलेश्वर) — एक बूढ़े, अकेले आदमी की मार्मिक कहानी, जिसमें रिश्तों के स्वार्थ और इंसानी लालच का सच सामने आता है। ध्यान वही रखिए जो अब तक रखा — केवल “क्या हुआ” नहीं, बल्कि लेखक जो महसूस कराना चाहते हैं और उसका संदेश क्या है, यह समझना।
Frequently Asked Questions
कारतूस एकांकी का सारांश क्या है?
यह हबीब तनवीर लिखित एकांकी है जिसमें अवध के नवाब वज़ीर अली की अंग्रेज़ों के खिलाफ़ बगावत को दिखाया गया है। वज़ीर अली अंग्रेज़ कर्नल के खेमे में अकेले घुसकर उसी से कारतूस माँग लेता है और सुरक्षित निकल जाता है — यही इस एकांकी का रोमांच है।
कारतूस पाठ में वज़ीर अली कौन था?
वज़ीर अली अवध के नवाब थे जिन्हें अंग्रेज़ों ने सत्ता से हटा दिया था। वे अंग्रेज़ों के कट्टर विरोधी थे और उनके खिलाफ़ सशस्त्र संघर्ष कर रहे थे। उनकी बहादुरी और चतुराई इस एकांकी में बहुत प्रभावशाली ढंग से दिखाई गई है।
कारतूस एकांकी में अंग्रेज़ कर्नल का वज़ीर अली के प्रति क्या रवैया था?
कर्नल वज़ीर अली को पकड़ने के लिए जंगल में डेरा डाले हुए था। वह उसे खतरनाक और बहादुर मानता था। जब वज़ीर अली खुद उसके खेमे में आकर कारतूस माँगकर चला जाता है, तो कर्नल हैरान रह जाता है और उसके साहस की तारीफ करता है।
कारतूस एकांकी में कारतूस का क्या महत्व है?
कारतूस बंदूक की गोलियाँ होती हैं जो लड़ाई में ज़रूरी होती हैं। वज़ीर अली का दुश्मन के खेमे में जाकर कारतूस माँगना उसकी अदम्य हिम्मत और चालाकी का प्रतीक है। यह दिखाता है कि सच्चा देशभक्त कितना निडर होता है।
कारतूस एकांकी के लेखक हबीब तनवीर कौन थे?
हबीब तनवीर हिंदी रंगमंच के महान नाटककार और निर्देशक थे। उन्होंने लोक परंपराओं और इतिहास को मिलाकर अनेक यादगार नाटक लिखे। 'कारतूस' उनकी ऐसी ही एक रचना है जो ऐतिहासिक पात्र वज़ीर अली पर आधारित है।