यह दंतुरित मुसकान और फसल
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए — आपने कभी किसी छोटे बच्चे को हँसते हुए देखा है? जब कोई नन्हा शिशु अपने नए-नए निकलते दाँतों के साथ खिलखिलाकर मुस्कुराता है, तो आस-पास के सब लोग रुक जाते हैं। कितना भी थका या परेशान आदमी हो, उस मुस्कान को देखकर उसके चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती है। यह छोटी-सी मुस्कान इतनी ताकतवर क्यों है?
इस पाठ में कवि नागार्जुन की दो कविताएँ हैं, और दोनों जीवन की दो सुंदर सच्चाइयों को छूती हैं।
पहली कविता “यह दंतुरित मुसकान” एक पिता की आँखों से अपने नन्हे शिशु की पहली मुस्कान को देखती है। वह मुस्कान इतनी मोहक है कि कठोर, उदास, यहाँ तक कि पत्थर जैसे कठोर मन वाला इंसान भी पिघल जाता है।
दूसरी कविता “फसल” एक बहुत बड़ी बात बहुत सरलता से कहती है — फसल किसी एक चीज़ से नहीं बनती। उसमें अनगिनत नदियों का पानी, असंख्य लोगों के हाथों का श्रम, मिट्टी का गुण और सूरज-हवा का मेल — सब छिपा होता है।
दोनों कविताएँ हमें सिखाती हैं कि जीवन से, नन्हे शिशु से, और मेहनत से प्यार कैसे करना है। इसीलिए यह पाठ परीक्षा के बाद भी मन में रह जाता है।
कवि-परिचय (नागार्जुन)
कविता समझने से पहले उसके रचयिता को थोड़ा जान लें — इससे कविता का भाव और साफ़ हो जाता है।
मूल भाव
दोनों कविताओं को जोड़ने वाला एक धागा है, जिसे पहले समझ लेना ज़रूरी है।
इस पाठ का मूल भाव है — जीवन के प्रति गहरा प्रेम और कृतज्ञता। पहली कविता में यह प्रेम नन्हे शिशु के नए जीवन और उसकी निश्छल मुस्कान के लिए है। दूसरी कविता में यह प्रेम उस श्रम और सहयोग के लिए है, जिससे फसल — यानी जीवन का अन्न — पैदा होता है। दोनों में कवि छोटी-सी दिखने वाली चीज़ के पीछे छिपी बड़ी सुंदरता को हमारे सामने खोल देता है।
दोनों कविताएँ अलग-अलग विषय पर हैं, पर दोनों की आत्मा एक है। नीचे चित्र 5.3 में दोनों को आमने-सामने रखकर यह अंतर और समानता देखिए।
📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: ये कविताएँ अभी कॉपीराइट के अधीन हैं, इसलिए इनका पूरा मूल पाठ यहाँ नहीं दिया गया है। कृपया मूल कविताएँ अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “क्षितिज भाग 2” में पढ़ें। नीचे हमने उनका सरल अर्थ और सप्रसंग व्याख्या दी है — पुस्तक के साथ इसे पढ़कर आप कविताओं को पूरी तरह समझ सकते हैं।
कविता 1 — यह दंतुरित मुसकान
पहली कविता एक पिता का मन है। बहुत दिनों बाद वह अपने नन्हे शिशु को देख रहा है, और बच्चे की पहली दंतुरित मुस्कान उसके मन को छू जाती है।
पहले शीर्षक का एक शब्द साफ़ कर लें, वरना पूरी कविता अधूरी समझ आएगी।
भावार्थ
कवि कहता है — हे शिशु, तुम्हारी यह दाँतों वाली मुस्कान सचमुच अनोखी है। यह इतनी सुंदर है कि इसे देखकर मरा हुआ-सा, सूखा हुआ मन भी जी उठता है। जैसे कमल का फूल तालाब छोड़कर मेरी झोंपड़ी में खिल गया हो, वैसा ही चमत्कार तुम्हारी मुस्कान ने कर दिया है।
कवि आगे कहता है कि पत्थर भी पिघलकर पानी हो सकता है — मतलब, तुम्हारी मुस्कान इतनी कोमल है कि सबसे कठोर मन भी पिघल जाए। तुम्हें छूकर तो धूल भी कमल जैसी सुंदर लगने लगती है।
फिर एक प्यारा भाव आता है। कवि बहुत दिनों से घर से दूर था, इसलिए शिशु उसे पहचान नहीं पाता — वह अनजान निगाहों से, तिरछी नज़र से उसे देखता है। पर जब माँ बच्चे को बताती है कि यही तुम्हारे पिता हैं, तब बच्चा मुस्कुरा देता है। कवि कहता है — यह मेल, यह पहचान माँ के कारण ही संभव हुई। माँ ही वह कड़ी है जो पिता और शिशु को जोड़ती है।
कविता का एक मार्मिक अंत यह है — कवि कहता है कि अगर मैं तुम्हें पहले से जानता, तो आँखों से ही तुम्हारा स्वागत करता; पर मैं तो नया-नया आया हूँ, इसलिए मेरी आँखें तुम्हें भरपूर देख भी नहीं पा रहीं।
शिशु-सौंदर्य और मुस्कान का प्रभाव
अब सबसे गहरा सवाल — एक नन्हे बच्चे की मुस्कान इतनी ताकतवर क्यों होती है कि कठोर, पत्थर-दिल इंसान भी पिघल जाए? यह कविता का असली मर्म है, और इसे कवि ने यूँ ही नहीं कह दिया — इसके पीछे एक सच्चा कारण है।
शिशु की मुस्कान में कोई चालाकी, कोई दिखावा, कोई स्वार्थ नहीं होता। बड़ों की हँसी में अक्सर कुछ-न-कुछ छिपा होता है — औपचारिकता, मतलब, या बनावट। पर शिशु की मुस्कान बिल्कुल निश्छल (बिना किसी छल के, बिल्कुल साफ़) होती है। वह नए जीवन, मासूमियत और पवित्रता का प्रतीक है।
जब इतनी सच्ची और निर्मल चीज़ हमारे सामने आती है, तो हमारे मन की कठोरता टिक नहीं पाती। कठोरता तो दुनिया के कड़वे अनुभवों से बनती है। पर मासूमियत के आगे वह पिघल जाती है — ठीक वैसे ही जैसे गरमी पाकर बर्फ़ पिघल जाती है। इसी को कवि “पत्थर पिघलकर पानी होना” कहता है।
यह बात देखने में कैसी लगती है, यह चित्र 5.1 साफ़ कर देता है।
अब दूसरा गहरा सवाल — कवि शिशु से अपने मेल का श्रेय माँ को क्यों देता है? क्योंकि बच्चा कवि को नहीं पहचानता था; उसके और पिता के बीच की दूरी को मिटाने वाली कड़ी माँ ही थी। माँ ने ही बच्चे को बताया कि ये तुम्हारे पिता हैं, और तभी बच्चा मुस्कुराया। माँ ही वह सेतु (पुल) है जो परिवार के रिश्तों को जोड़ती है। शिशु का सौंदर्य, उसका पालन और रिश्तों की यह बुनावट — सब में माँ की भूमिका सबसे बड़ी है। इसीलिए कवि कृतज्ञता से माँ को याद करता है।
कवि ने शिशु की मुस्कान देखकर कहा कि 'पत्थर भी पिघलकर पानी हो सकता है।' इसका क्या अर्थ है?
कविता 2 — फसल
अब दूसरी कविता पर आते हैं। ऊपर से यह एक सीधी-सी कविता लगती है — फसल के बारे में। पर इसमें एक बहुत बड़ी सोच छिपी है।
भावार्थ
कवि एक सवाल पूछता है — फसल क्या है? और फिर खुद ही जवाब देता है।
फसल किसी एक नदी का पानी नहीं है — यह तो एक नहीं, दो नहीं, बहुत सारी नदियों के पानी का जादू है। फसल किसी एक-दो आदमी के हाथों की मेहनत नहीं है — यह असंख्य लोगों के हाथों के स्पर्श की गरिमा है, यानी अनगिनत मेहनती हाथों की कमाई।
कवि आगे कहता है कि फसल में मिट्टी का गुण-धर्म घुला है, और सूरज की किरणों तथा हवा की थिरकन (हल्की हलचल) का मेल भी समाया है। मतलब — पानी, मेहनत, मिट्टी, सूरज और हवा, ये सब मिलकर फसल बनाते हैं।
फसल कैसे बनती है — श्रम + प्रकृति का सहयोग
अब सबसे ज़रूरी सवाल — कवि बार-बार यह क्यों कहता है कि फसल किसी एक चीज़ से नहीं बनती? यहाँ “कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं” वाली बात आती है। हम रोज़ रोटी खाते हैं और मान लेते हैं कि अनाज तो “बस उग आता है”। पर कवि इस सोच को तोड़ना चाहता है।
कवि का संदेश यह है — फसल किसी एक का चमत्कार नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम और प्रकृति के सहयोग की साझी देन है। ज़रा सोचिए, एक रोटी आपकी थाली तक कैसे पहुँची:
- पानी — एक नहीं, अनेक नदियों, बारिश और सिंचाई का पानी।
- श्रम — खेत जोतने वाले, बीज बोने वाले, फसल काटने वाले, ढोने वाले — अनगिनत हाथ।
- मिट्टी — जिसमें पौधे को बढ़ने के लिए गुण और पोषण मिले।
- सूरज और हवा — जिनके बिना पौधा हरा होकर अनाज नहीं बना सकता।
इनमें से एक भी न हो, तो फसल नहीं होगी। इसीलिए फसल पर किसी एक का हक़ नहीं — यह हर मेहनतकश हाथ और पूरी प्रकृति की मिली-जुली कमाई है। यही कवि का प्रगतिवादी संदेश है — श्रम का सम्मान करो, और हर हाथ के स्पर्श की गरिमा को पहचानो।
यह पूरी बात चित्र 5.2 में एक नज़र में दिख जाती है।
कवि के अनुसार फसल 'हाथों के स्पर्श की गरिमा' है। इस पंक्ति में किसका सम्मान छिपा है?
काव्य-सौंदर्य (बिंब, अलंकार, भाषा)
अब देखते हैं कि नागार्जुन ने इन भावों को इतना सुंदर कैसे बनाया। इसके लिए पहले तीन शब्द साफ़ कर लें।
इस कविता के काव्य-सौंदर्य के सारे टुकड़े नीचे चित्र 5.4 में एक साथ देखिए, उपमा अलंकार के उदाहरण के साथ।
संक्षेप में, दोनों कविताओं की भाषा-शैली की खूबियाँ नीचे तालिका में देखिए।
| खूबी | यह दंतुरित मुसकान | फसल |
|---|---|---|
| मुख्य बिंब | कमल, चाँदनी, झोंपड़ी का दीप | नदियाँ, मिट्टी, सूरज, हवा |
| प्रमुख अलंकार | उपमा, रूपक (मुस्कान का सौंदर्य) | मानवीकरण (हवा की थिरकन) |
| भाव | कोमल वात्सल्य, ममता | श्रम और सहयोग का सम्मान |
| भाषा | सरल, कोमल, चित्रमयी | सरल, सहज, ठेठ खड़ी बोली |
ध्यान दीजिए — दोनों कविताओं में भाषा बहुत सरल है, फिर भी भाव बहुत गहरा है। यही नागार्जुन की कला है।
आम भूलें
ये वे गलतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक में “ऐसा क्यों लगता है” वाला भाग जाल दिखाता है, और “असल बात” उसे सुधार देती है।
'दंतुरित मुसकान' का मतलब है किसी बड़े आदमी की दाँत दिखाती हँसी।
'दाँत' और 'मुस्कान' सुनते ही मन में किसी की भी दाँत दिखाती हँसी का चित्र बन जाता है, इसलिए लगता है कि यह किसी की भी हो सकती है।
असल में 'दंतुरित मुसकान' खास तौर पर उस नन्हे शिशु की मुस्कान है, जिसके मुँह में पहले-पहल छोटे दाँत निकल रहे हैं। यह बच्चे के नए जीवन और बढ़ने का निशान है, इसीलिए यह इतनी अनमोल और कोमल है। कविता पूरी तरह शिशु के सौंदर्य पर केंद्रित है।
'पत्थर पिघलकर पानी होना' का मतलब है कि सचमुच पत्थर पिघल जाता है।
वाक्य में 'पत्थर' और 'पानी' सीधे-सीधे आए हैं, इसलिए इसे शब्दशः (जैसा लिखा है वैसा) पढ़ने पर लगता है कि किसी असली पत्थर की बात हो रही है।
यह एक लाक्षणिक (भाव वाली) बात है, सीधी नहीं। यहाँ 'पत्थर' का अर्थ है कठोर, भावहीन हृदय, और 'पिघलकर पानी होना' का अर्थ है कोमल और स्नेह से भर जाना। कवि कहना चाहता है कि शिशु की मुस्कान सबसे कठोर मन को भी कोमल बना देती है।
'फसल' कविता सिर्फ़ खेती और किसान के बारे में जानकारी देती है।
कविता का नाम ही 'फसल' है और इसमें नदी, मिट्टी, सूरज जैसी खेती से जुड़ी चीज़ें आती हैं, इसलिए लगता है कि यह बस फसल उगाने की जानकारी है।
कविता का असली संदेश गहरा है। कवि बताना चाहता है कि फसल किसी एक चीज़ या एक व्यक्ति की देन नहीं, बल्कि अनेक नदियों के पानी, असंख्य हाथों के श्रम और प्रकृति के सहयोग की साझी कमाई है। यह श्रम के सम्मान और सामूहिक सहयोग की कविता है, सिर्फ़ खेती की जानकारी नहीं।
जाँचिए अपनी समझ
खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।
'दंतुरित मुसकान' किसकी मुस्कान है और वह खास क्यों है?
कवि के अनुसार शिशु से उसका मेल और पहचान किसके कारण संभव हुई?
'फसल' कविता का केंद्रीय संदेश क्या है?
शिशु की मुस्कान कठोर मन को भी क्यों पिघला देती है?
अभ्यास
पहले अपना उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए। उत्तर की लंबाई पर ध्यान दीजिए — लघु उत्तर में 2-3 वाक्य, दीर्घ उत्तर में पूरा अनुच्छेद।
सरल
'दंतुरित मुसकान' का क्या अर्थ है? यह मुस्कान किसकी है?
दंतुरित मुसकान का अर्थ है — दाँतों वाली मुस्कान। यह उस नन्हे शिशु की मुस्कान है, जिसके मुँह में पहले-पहल छोटे-छोटे दाँत निकल रहे हैं और जो हँसते समय झलकते हैं। यह बच्चे के नए जीवन और बढ़ने का निशान है, इसलिए माता-पिता के लिए बहुत प्यारी और अनमोल होती है।
कवि के अनुसार फसल किन-किन चीज़ों से मिलकर बनती है? कोई चार बातें लिखिए।
कवि के अनुसार फसल चार चीज़ों के मेल से बनती है। पहला, अनेक नदियों का पानी — एक नहीं, बहुत सारी नदियों का जल। दूसरा, असंख्य लोगों के हाथों का श्रम और स्पर्श — अनगिनत मेहनती हाथ। तीसरा, मिट्टी का गुण-धर्म, जिसमें पौधा बढ़ता और पोषण पाता है। चौथा, सूरज की किरणों और हवा का मेल, जिनके बिना पौधा अनाज नहीं बन सकता।
मध्यम
कवि शिशु से अपने मेल और पहचान का श्रेय माँ को क्यों देता है? समझाइए।
कवि बहुत दिनों से घर से दूर था, इसलिए नन्हा शिशु उसे पहचानता नहीं था। बच्चा उसे अनजान और तिरछी निगाहों से देखता था, क्योंकि उसके लिए पिता एक अजनबी थे। ऐसे में दोनों के बीच की दूरी को मिटाने वाली कड़ी माँ बनी। जब माँ ने बच्चे को बताया कि ये तुम्हारे पिता हैं, तभी बच्चा सहज होकर मुस्कुराया। इसलिए कवि कहता है कि शिशु से उसका मेल और यह मधुर पहचान माँ के कारण ही संभव हो पाई। माँ ही वह सेतु है, जो पिता और संतान के रिश्ते को जोड़ती है — और इसी कारण कवि कृतज्ञता से माँ को याद करता है।
'फसल' कविता में 'हाथों के स्पर्श की गरिमा' और 'मिट्टी का गुण-धर्म' से कवि क्या कहना चाहता है?
इन दोनों पंक्तियों से कवि फसल के पीछे छिपे श्रम और प्रकृति दोनों को सम्मान देता है। ‘हाथों के स्पर्श की गरिमा’ से कवि का आशय है — फसल किसी एक-दो लोगों की नहीं, बल्कि असंख्य मेहनतकश हाथों के श्रम की देन है; इन हाथों के स्पर्श में, यानी इनकी मेहनत में एक महिमा और सम्मान है। ‘मिट्टी का गुण-धर्म’ से कवि बताता है कि फसल में सिर्फ़ इंसानी मेहनत ही नहीं, बल्कि मिट्टी के अपने गुण और पोषण-शक्ति का योगदान भी घुला है। मिलाकर कवि यह कहना चाहता है कि फसल मानवीय श्रम और प्राकृतिक देन — दोनों के सहयोग से बनती है।
चुनौती
नागार्जुन की दोनों कविताएँ अलग-अलग विषय पर हैं — एक शिशु पर, दूसरी फसल पर। फिर भी दोनों की आत्मा एक है। यह समानता समझाते हुए बताइए कि दोनों किस तरह जीवन के प्रति प्रेम दिखाती हैं।
ऊपर से देखने पर दोनों कविताएँ बिल्कुल अलग लगती हैं। ‘यह दंतुरित मुसकान’ एक नन्हे शिशु की पहली मुस्कान और उसके कोमल सौंदर्य की कविता है। यह वात्सल्य, ममता और मासूमियत का भाव जगाती है। दूसरी ओर ‘फसल’ खेत, श्रम और किसान की कविता है। यह श्रम और सामूहिक सहयोग के सम्मान का भाव जगाती है।
पर दोनों की आत्मा एक है — जीवन के प्रति गहरा प्रेम और कृतज्ञता। पहली कविता में यह प्रेम नए जीवन के लिए है — शिशु, जो अभी-अभी इस दुनिया में आया है और जिसकी निश्छल मुस्कान कठोर मन को भी पिघला देती है। दूसरी कविता में यह प्रेम उस श्रम और प्रकृति के लिए है, जिनसे जीवन का आधार, यानी अन्न (फसल) पैदा होता है।
दोनों में कवि एक छोटी-सी दिखने वाली चीज़ — एक मुस्कान, एक फसल — के पीछे छिपी विशाल सुंदरता और महिमा को हमारे सामने खोलता है। दोनों यह सिखाती हैं कि जीवन के हर रूप को, चाहे वह नन्हा शिशु हो या मेहनत से उगा अन्न, प्रेम और सम्मान की दृष्टि से देखना चाहिए। यही नागार्जुन की मानवीय और जीवन से भरी दृष्टि है।
सारांश
इस पाठ से अब आप ये बातें खुद समझाकर बता सकते हैं —
- पाठ में नागार्जुन की दो कविताएँ हैं — “यह दंतुरित मुसकान” और “फसल”।
- दंतुरित मुसकान का अर्थ है नए दाँतों वाली शिशु की मुस्कान, जो उसके नए जीवन का प्रतीक है।
- शिशु की मुस्कान निश्छल और मासूम होती है, इसलिए वह कठोर, पत्थर-दिल मन को भी पिघला देती है — मासूमियत के आगे कठोरता टिक नहीं पाती।
- कवि शिशु से अपने मेल का श्रेय माँ को देता है, क्योंकि माँ ही पिता और संतान को जोड़ने वाली कड़ी है।
- ‘फसल’ कविता का संदेश है कि फसल किसी एक चीज़ या व्यक्ति की देन नहीं है।
- फसल अनेक नदियों के पानी + असंख्य हाथों के श्रम + मिट्टी के गुण + सूरज-हवा के मेल से बनती है — यह सामूहिक श्रम और प्रकृति की साझी देन है।
- दोनों कविताओं की आत्मा एक है — जीवन और श्रम के प्रति गहरा प्रेम और सम्मान।
- दोनों की भाषा सरल, सहज और चित्रमयी है, फिर भी भाव बहुत गहरा है।
आगे क्या
अगला पाठ है पाठ 6 — “संगतकार” (कवि: मंगलेश डबराल)। “फसल” में आपने पढ़ा कि बड़ी से बड़ी चीज़ अनेक लोगों के मिले-जुले श्रम से बनती है। “संगतकार” इसी विचार को संगीत की दुनिया में ले जाती है। संगीत के मंच पर मुख्य गायक की आवाज़ तो सब सुनते हैं, पर उसके पीछे एक संगतकार होता है, जो चुपचाप अपनी आवाज़ मिलाकर मुख्य गायक को सँभालता और निखारता है। यह कविता उन सब “पीछे रहने वाले”, सहयोग देने वाले लोगों के महत्व और गरिमा को सामने लाती है — ठीक उन्हीं अनगिनत हाथों की तरह, जो “फसल” में छिपे थे।
Frequently Asked Questions
यह दंतुरित मुसकान कविता का सारांश क्या है?
एक पिता अपने नवजात शिशु की पहली मुस्कान को देखता है — उसके छोटे-छोटे नए दाँत निकल रहे हैं। वह मुस्कान इतनी मोहक है कि कठोर से कठोर मन भी पिघल जाता है। कवि नागार्जुन इस साधारण पल को असाधारण काव्य-सौंदर्य से चित्रित करते हैं।
फसल कविता का मुख्य भाव क्या है?
'फसल' कविता बताती है कि एक फसल किसी एक तत्व से नहीं बनती। उसमें अनगिनत नदियों का पानी, हज़ारों लोगों के हाथों का श्रम, मिट्टी की उर्वरता और सूरज-हवा का सहयोग — सब शामिल होता है। यह कविता श्रम और प्रकृति के सामूहिक योगदान का उत्सव है।
दंतुरित मुसकान कविता में माँ की क्या भूमिका है?
कविता में माँ ही वह केंद्र है जिसके कारण शिशु जीवित, स्वस्थ और मुस्कुराता है। कवि परोक्ष रूप से दिखाते हैं कि माँ के स्नेह और देखभाल के बिना यह मुस्कान संभव ही नहीं होती। माँ का प्रेम ही शिशु की मुस्कान की असली ताकत है।
नागार्जुन की काव्य-शैली की क्या विशेषता है?
नागार्जुन प्रगतिशील कवि हैं। उनकी कविता सरल, स्वाभाविक और ज़मीन से जुड़ी होती है। वे साधारण जीवन के छोटे-छोटे पलों — शिशु की मुस्कान, किसान की मेहनत — में गहरी मानवीय सच्चाइयाँ खोज लेते हैं।
यह दंतुरित मुसकान और फसल कविताओं में क्या साझा विषय है?
दोनों कविताएँ साधारण जीवन में असाधारण सौंदर्य और सच्चाई खोजती हैं। 'दंतुरित मुसकान' मानवीय प्रेम और नई ज़िंदगी की खूबसूरती दिखाती है, जबकि 'फसल' सामूहिक श्रम और प्रकृति के मेल की महिमा गाती है। दोनों में नागार्जुन की मानवतावादी दृष्टि झलकती है।