सूरदास के पद
इस पाठ का महत्व
ज़रा सोचिए — जिसे आप दिल से चाहते हैं, अगर वह दूर चला जाए, तो आपके मन में क्या-क्या उठता है? पहले गहरी याद और तड़प आती है। फिर कभी हल्का गुस्सा, कभी शिकायत — “तुमने मुझे ऐसे क्यों छोड़ा?” और अगर कोई आकर कहे, “अरे, भूल जाओ उसे, मन को कहीं और लगा लो,” तो शायद आपको और भी चिढ़ हो। आप कहेंगे — “तुम्हें क्या पता, मेरा प्यार कितना सच्चा है!”
यह पाठ ठीक इसी भाव की कहानी है। कृष्ण गोकुल छोड़कर मथुरा चले जाते हैं। वे अपने मित्र उद्धव के हाथ गोपियों के लिए एक संदेश भेजते हैं — पर वह संदेश प्रेम का नहीं, बल्कि “निर्गुण योग” का है, यानी “कृष्ण को भूलकर एक निराकार ब्रह्म का ध्यान लगाओ।” लेकिन कृष्ण-प्रेम में डूबी गोपियाँ यह सूखा उपदेश सुनने को तैयार ही नहीं। वे उद्धव को मीठे-मीठे व्यंग्य से, अपनी विरह-वेदना से और प्यार-भरे तानों से ऐसा घेर लेती हैं कि बेचारे ज्ञानी उद्धव की एक न चले।
यह पाठ केवल कुछ पुराने पद नहीं हैं। यह दिखाता है कि सच्चा, जीवित प्रेम किसी ठंडे-सूखे ज्ञान से कहीं बड़ा है। यही बात इसे परीक्षा के बाद भी याद रखने लायक बनाती है।
कवि-परिचय
सूरदास हिंदी के सबसे बड़े भक्त-कवियों में से एक हैं। उन्हें भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा का, और खासकर कृष्ण-भक्ति का, सबसे बड़ा कवि माना जाता है। कहा जाता है कि वे जन्म से या बाद में नेत्रहीन (दृष्टिहीन) थे, फिर भी उन्होंने कृष्ण की बाल-लीला, प्रेम और सौंदर्य का इतना सजीव वर्णन किया कि पढ़कर सब कुछ आँखों के सामने जीवित हो उठता है। उनका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है “सूरसागर”। उनकी रचनाएँ ब्रजभाषा में हैं, जो बहुत कोमल और मधुर बोली है। यहाँ दिए गए पद उनके प्रसिद्ध प्रसंग “भ्रमरगीत” से लिए गए हैं।
आगे बढ़ने से पहले इस प्रसंग का एक शब्द साफ़ कर लेते हैं, जो बार-बार आएगा।
मूल भाव
इन पदों का मूल भाव है — सगुण, साकार प्रेम की निर्गुण ज्ञान पर जीत। उद्धव गोपियों को निराकार ब्रह्म और योग का उपदेश देने आते हैं, पर कृष्ण के रूप, लीला और स्मृति से बँधी गोपियाँ इस सूखे ज्ञान को ठुकरा देती हैं। वे अपनी विरह-वेदना, उपालंभ (ताना) और मीठे व्यंग्य से यह दिखा देती हैं कि सच्चे प्रेम के सामने कोरा ज्ञान फीका है।
पूरे प्रसंग को एक नज़र में समझने के लिए, नीचे चित्र 1.1 देखिए।
मूल पाठ और व्याख्या
अब चारों पदों का मूल पाठ क्रम से पढ़ते हैं, और हर पद के तुरंत बाद उसका भावार्थ सरल हिंदी में खोलते हैं। पहले मूल पंक्तियाँ, फिर उनका अर्थ — इस तरह आपको शब्द भी मिलेंगे और भाव भी।
पद 1 — “ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी”
ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोर्यौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।
इस पद में गोपियाँ उद्धव पर मीठा-सा व्यंग्य कसती हैं। वे कहती हैं — “ऊधौ, तुम तो बहुत बड़भागी (भाग्यशाली) हो!” पर यह तारीफ़ नहीं, ताना है। उनका मतलब है — तुम कृष्ण के इतने पास रहे, फिर भी उनके प्रेम की डोर (सनेह तगा) से अछूते रहे; तुम्हारा मन कभी अनुराग में रँगा ही नहीं। वे कहती हैं कि तुम तो ऐसे हो जैसे कमल का पत्ता (पुरइनि पात), जो पानी में रहकर भी उसके रस से नहीं भीगता; या जैसे पानी में रखी तेल की गागर, जिस पर पानी की एक बूँद भी नहीं ठहरती। तुमने तो प्रेम की नदी में पाँव तक नहीं डुबोया, और न तुम्हारी दृष्टि कृष्ण के रूप-सौंदर्य पर मोहित हुई। अंत में वे खुद पर हँसती हैं — “हम तो भोली-भाली अबला हैं, जो गुड़ में लिपटी चींटी की तरह कृष्ण-प्रेम में ऐसी फँसी हैं कि छूट ही नहीं सकतीं।” यानी इस “सौभाग्य” में असल में बड़ा अभाग छिपा है — जिसने सच्चा प्रेम जाना ही नहीं, उसका जीवन सूना है।
पद 2 — हारिल की लकड़ी
मन की मन ही माँझ रही।
कहिये जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।
इस पद में गोपियों की विरह-वेदना और शिकायत खुलकर सामने आती है। वे कहती हैं — हमारे मन की बात मन में ही रह गई, किससे कहें? कोई कहने लायक ही नहीं बचा। पहले हमें एक आस का सहारा था — कि कृष्ण लौट आएँगे; इसी आस के बल पर हम तन-मन की विरह-व्यथा सह रही थीं। पर अब तुम्हारे ये योग के संदेश सुन-सुनकर हम विरहिनें विरह की आग में और जल रही हैं। हम तो जिधर से सहारा (गुहार) चाहती थीं, उसी तरफ़ से दुख की धार बह निकली — यानी जिस कृष्ण से सुख की उम्मीद थी, उन्हीं ने यह सूखा ज्ञान भेज दिया। सूर कहते हैं — अब गोपियाँ धीरज कैसे धरें, जब कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा ही नहीं निभाई? यह उनका गहरा उपालंभ (उलाहना) है।
पद 3 — कृष्ण ही हारिल की लकड़ी
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।
इस पद में गोपियाँ अपने अटूट प्रेम की दृढ़ता बताती हैं। वे कहती हैं — हमारे लिए तो कृष्ण ही हारिल पक्षी की लकड़ी जैसे हैं। हारिल पक्षी अपने पंजों में हमेशा एक लकड़ी कसकर पकड़े रहता है, कभी नहीं छोड़ता। उसी तरह गोपियों ने मन, वचन और कर्म से नंद के बेटे कृष्ण को अपने हृदय में दृढ़ता से पकड़ रखा है। जागते-सोते, सपने में, दिन-रात उनके मन में बस “कान्ह-कान्ह” की रट लगी रहती है। ऐसे में उद्धव का योग-संदेश उन्हें कड़वी ककड़ी जैसा लगता है — जिसे न वे निगल सकती हैं, न मन स्वीकार करता है। वे ताना देती हैं — “तुम तो हमारे लिए ऐसी बीमारी (ब्याधि) ले आए, जो हमने न कभी देखी, न सुनी, न की।” अंत में वे कहती हैं कि यह योग उन्हें जाकर सौंपो जिनका मन चकरी (घूमते लट्टू) की तरह चंचल और अस्थिर है — हमारा मन तो कृष्ण पर अडिग है, इसकी हमें ज़रूरत ही नहीं।
पद 4 — कृष्ण से राजधर्म की अपेक्षा
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगैं के, पर हित डोलत धाए।
अब अपने मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।
अंतिम पद में गोपियाँ कृष्ण पर तीखा पर मर्यादित व्यंग्य करती हैं। वे भौंरे (मधुकर/उद्धव) से कहती हैं — “अब समझ आ गया, कृष्ण राजनीति पढ़कर आए हैं!” कृष्ण पहले से ही बहुत चतुर थे, अब तो उन्होंने गुरु के पास बड़े-बड़े ग्रंथ भी पढ़ लिए। उनकी बुद्धि कितनी बढ़ गई — यह हमें उनके भेजे योग-संदेश से ही पता चल गया। फिर ताना है — “पहले के लोग तो भले होते थे, जो दूसरों के भले के लिए दौड़ते-फिरते थे। पर कृष्ण तो हमारे मन ही चुराकर ले गए; अब क्या वे उन्हें लौटाएँगे?” गोपियाँ चुभता प्रश्न पूछती हैं — “जो दूसरों को अन्याय (अनीति) छोड़ने का उपदेश देते हैं, वे खुद अन्याय कैसे कर सकते हैं?” और अंत में सीधी चोट — सूर कहते हैं, असली राजधर्म तो यही है कि राजा अपनी प्रजा को सताए नहीं, उसका दुख दूर करे। यानी कृष्ण राजा बनकर अपनी प्रजा (गोपियों) को विरह में तड़पाकर राजधर्म के उलट काम कर रहे हैं।
आइए गहराई से समझें
अब केवल “क्या कहा” से आगे बढ़कर “ऐसा क्यों” समझते हैं। यही इन पदों की असली गहराई है।
गोपियों का सगुण प्रेम बनाम उद्धव का निर्गुण योग
इस पूरे पाठ की रीढ़ यही टकराव है। एक तरफ़ गोपियाँ हैं, दूसरी तरफ़ उद्धव। पहले दो ज़रूरी शब्द साफ़ कर लेते हैं।
अब सबसे बड़ा प्रश्न — गोपियाँ उद्धव का निर्गुण योग ठुकरा क्यों देती हैं? कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं। आइए कारण समझें। गोपियों का प्रेम साकार और जीवित है — वह कृष्ण के रूप, उनकी मुरली, उनकी हँसी, और साथ बिताए हर मीठे पल की स्मृति से बँधा है। उनके लिए प्रेम कोई विचार नहीं, बल्कि एक जीता-जागता अनुभव है। अब उद्धव कहते हैं — “इस सब को छोड़ दो, और एक ऐसे ब्रह्म का ध्यान करो जिसका न रूप है, न नाम।” पर एक माँ से कहो कि “अपने बच्चे को भूलकर ‘मातृत्व’ नाम के विचार से प्यार करो” — क्या वह मानेगी? वैसे ही, निराकार, अमूर्त ब्रह्म गोपियों के जीवित, साँस लेते कृष्ण-प्रेम की जगह नहीं ले सकता। इसीलिए वे उसे ठुकरा देती हैं।
इस टकराव को आमने-सामने रखकर चित्र 1.2 में देखिए।
गोपियाँ उद्धव के योग-संदेश को 'कड़वी ककड़ी' जैसा क्यों कहती हैं?
विरह-वेदना और उपालंभ
गोपियों के मन में एक साथ कई भाव उठते हैं। दो ज़रूरी भाव हैं — विरह और उपालंभ। पहले एक शब्द साफ़ कर लें।
गोपियों के तीनों प्रमुख भाव — विरह, उपालंभ और व्यंग्य — एक ही जड़ से निकलते हैं। यह चित्र 1.3 में देखिए।
गोपियों की विरह-वेदना बहुत गहरी है। कृष्ण के बिना उनका हर पल भारी है। पहले उन्हें कृष्ण के लौटने की आस थी, उसी आस के सहारे वे जी रही थीं। पर उद्धव का योग-संदेश उस आस को भी छीन लेता है — इससे उनका दुख और बढ़ जाता है। उनका उपालंभ भी इसी से जुड़ा है — वे कृष्ण से शिकायत करती हैं कि “हमने तुम्हें अपना सब कुछ दिया, और बदले में हमें यह सूखा ज्ञान मिला?” यह शिकायत गुस्से की नहीं, गहरे प्रेम की है — और इसीलिए और भी मार्मिक (दिल को छू लेने वाली) है।
गोपियों का व्यंग्य और वाक्-चातुर्य
गोपियाँ भोली ज़रूर हैं, पर बातचीत में बहुत चतुर हैं। उनका वाक्-चातुर्य (बोलने की कुशलता) ही इन पदों की जान है। सबसे बड़ा व्यंग्य “बड़भागी” शब्द में छिपा है।
अब सोचिए — गोपियाँ उद्धव को व्यंग्य में “बड़भागी” क्यों कहती हैं? ऊपर से तो यह तारीफ़ लगती है, पर भीतर गहरा ताना है। गोपियों के अनुसार, उद्धव कृष्ण के इतने पास रहकर भी उनके प्रेम में कभी नहीं डूबे — वे प्रेम और विरह दोनों के सुख-दुख से अछूते रह गए। गोपियों की नज़र में यह सौभाग्य नहीं, बल्कि दुर्भाग्य है। उनका तंज़ यह है कि जिसने सच्चा प्रेम कभी जाना ही नहीं, उसका जीवन अधूरा है — भले ही वह विरह की पीड़ा से बच गया हो। प्रेम की पीड़ा भी अपने-आप में एक सौभाग्य है, और उससे वंचित रहना असली अभाग है। इसी उलटे अर्थ के कारण यह व्यंग्य इतना तीखा और सुंदर बन जाता है।
इस दोहरे अर्थ को चित्र 1.4 में खोलकर देखिए।
काव्य-सौंदर्य — भाषा और अलंकार
इन पदों की सुंदरता केवल भाव में नहीं, उनकी भाषा और शिल्प में भी है। पहले भाषा की बात।
इनकी भाषा ब्रजभाषा है — मथुरा-वृंदावन के इलाके की बोली। यह बहुत कोमल, मधुर और गेय (गाने लायक) है। इसमें माधुर्य गुण भरा है, यानी पढ़ते ही मन में मिठास घुल जाती है। यही कोमलता कृष्ण-प्रेम और विरह के नाज़ुक भावों के लिए एकदम सही है।
अब अलंकारों की बात। एक शब्द पहले समझ लें।
इन पदों के प्रमुख अलंकार और ब्रजभाषा की मिठास को एक साथ चित्र 1.5 में देखिए।
अब एक खास “क्यों” — सूर रोज़मर्रा की ब्रज की चीज़ों (कमल-पत्ता, तेल की गागर, हारिल पक्षी) का उदाहरण क्यों देते हैं? इसके दो कारण हैं। पहला, ये चीज़ें गोपियों के रोज़ के जीवन की हैं, इसलिए वे अपनी बात सहज और सच्चे ढंग से कह पाती हैं। दूसरा, और गहरा कारण — ये उदाहरण एक ही बात बार-बार पक्की करते हैं — “अछूता और अटल रहना।” कमल पानी में रहता है, पर भीगता नहीं; तेल की गागर पानी पर तैरती है, पर उस पर पानी ठहरता नहीं। इनसे गोपियाँ ताना मारती हैं कि उद्धव भी कृष्ण के पास रहकर प्रेम से अछूते रहे। और दूसरी तरफ़ हारिल पक्षी अपनी लकड़ी कभी नहीं छोड़ता — इससे गोपियाँ अपना अटल, न छूटने वाला प्रेम दिखाती हैं। इस तरह छोटे-से रोज़ के चित्र से सूर बड़ी गहरी बात मन में बैठा देते हैं।
आम भूलें
ये वे गलतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक को ध्यान से पढ़िए — “ऐसा क्यों लगता है” वाला भाग जाल दिखाता है, और “असल बात” उसे सुधार देती है।
गोपियाँ उद्धव को 'बड़भागी' कहकर सचमुच उनकी तारीफ़ कर रही हैं।
शब्द 'बड़भागी' का सीधा अर्थ 'बहुत भाग्यशाली' होता है, और वाक्य भी ऊपर से प्रशंसा जैसा सुनाई देता है, इसलिए पहली बार पढ़ने पर इसे सच्ची तारीफ़ समझ लेना स्वाभाविक है।
यह तारीफ़ नहीं, बल्कि गहरा व्यंग्य है। गोपियाँ ताना मार रही हैं कि उद्धव कृष्ण के पास रहकर भी प्रेम और विरह से अछूते रहे — यानी उन्होंने प्रेम का सुख कभी जाना ही नहीं। गोपियों की नज़र में यह सौभाग्य नहीं, दुर्भाग्य है।
गोपियाँ कृष्ण से नाराज़ हैं और उन्हें छोड़ देना चाहती हैं, इसलिए वे शिकायत करती हैं।
वे कृष्ण और उद्धव दोनों को तीखे ताने देती हैं और 'तुमने अच्छा नहीं किया' जैसी बातें कहती हैं, इसलिए लगता है मानो उनके मन में प्रेम कम और रोष ज़्यादा है।
उनकी शिकायत उपालंभ है — प्यार-भरा उलाहना, गुस्सा नहीं। वे कृष्ण को छोड़ने की बात तो सोच भी नहीं सकतीं; वे तो उन्हें 'हारिल की लकड़ी' की तरह कसकर पकड़े हैं। शिकायत असल में उनके गहरे प्रेम और विरह से उपजती है।
उद्धव बुरे या मूर्ख हैं, इसलिए गोपियाँ उन्हें हरा देती हैं।
पूरे प्रसंग में गोपियाँ उद्धव के हर तर्क की काट कर देती हैं और वे निरुत्तर रह जाते हैं, इसलिए लगता है कि शायद उद्धव कमज़ोर या नासमझ रहे होंगे।
उद्धव बड़े ज्ञानी और कृष्ण के घनिष्ठ मित्र हैं। बात केवल इतनी है कि सूखा निर्गुण ज्ञान गोपियों के जीवित, साकार प्रेम के सामने टिक नहीं पाता। यह उद्धव की हार नहीं, बल्कि कोरे ज्ञान पर सच्चे प्रेम की जीत दिखाने का सूर का तरीका है।
जाँचिए अपनी समझ
खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।
उद्धव गोपियों के पास क्या संदेश लेकर आते हैं?
गोपियाँ अपने अटूट कृष्ण-प्रेम को किस उदाहरण से समझाती हैं?
गोपियाँ उद्धव को 'बड़भागी' किस भाव से कहती हैं?
अंतिम पद में गोपियाँ कृष्ण को किसकी याद दिलाती हैं?
अभ्यास
पहले अपना उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए। उत्तर की लंबाई पर ध्यान दीजिए — लघु उत्तर में 2-3 वाक्य, दीर्घ उत्तर में पूरा अनुच्छेद।
सरल
गोपियों ने उद्धव को कमल के पत्ते और तेल की गागर के समान क्यों कहा?
गोपियों ने उद्धव की तुलना कमल के पत्ते और तेल की गागर से इसलिए की, क्योंकि दोनों ही पानी में या पानी के पास रहकर भी उससे अछूते (बिना भीगे) रहते हैं। कमल का पत्ता जल में रहकर भी गीला नहीं होता, और तेल लगी गागर पर पानी की बूँद नहीं ठहरती। इसी तरह उद्धव कृष्ण के इतने पास रहकर भी उनके प्रेम में कभी नहीं डूबे — वे प्रेम और विरह दोनों से अछूते रह गए। यह गोपियों का व्यंग्य है।
'हारिल की लकड़ी' से गोपियाँ क्या कहना चाहती हैं?
हारिल एक पक्षी है, जो अपने पंजों में हमेशा एक लकड़ी कसकर पकड़े रहता है और उसे कभी नहीं छोड़ता। गोपियाँ इस उदाहरण से कहना चाहती हैं कि कृष्ण ही उनके लिए वह लकड़ी हैं, जिन्हें उन्होंने मन, वचन और कर्म से कसकर थाम रखा है। जैसे हारिल अपनी लकड़ी नहीं छोड़ता, वैसे ही गोपियाँ कृष्ण को कभी नहीं छोड़ सकतीं। यह उनके अटूट और अडिग प्रेम को दिखाता है।
मध्यम
गोपियाँ उद्धव के निर्गुण योग के संदेश को क्यों स्वीकार नहीं करतीं? कारण सहित समझाइए।
गोपियाँ उद्धव का निर्गुण योग-संदेश इसलिए स्वीकार नहीं करतीं क्योंकि उनका प्रेम सगुण और साकार है। उन्हें कृष्ण का रूप, उनकी मुरली, उनकी लीला और साथ बिताए मीठे पलों की यादें प्यारी हैं। उनका प्रेम एक जीवित अनुभव है, कोई सूखा विचार नहीं।
उद्धव उन्हें एक ऐसे निराकार ब्रह्म का ध्यान करने को कहते हैं जिसका न रूप है, न नाम। पर यह निराकार, अमूर्त ज्ञान गोपियों के जीते-जागते कृष्ण-प्रेम की जगह नहीं ले सकता। उनके लिए यह उपदेश कड़वी ककड़ी जैसा बेस्वाद है, जिसे वे न निगल सकती हैं, न मन से स्वीकार कर सकती हैं। इसीलिए वे इसे पूरी तरह ठुकरा देती हैं और अपने सगुण प्रेम पर अडिग रहती हैं।
गोपियों की विरह-वेदना और उपालंभ का वर्णन कीजिए। उद्धव के आने से उनका दुख क्यों बढ़ जाता है?
गोपियाँ कृष्ण के बिना गहरी विरह-वेदना में डूबी हैं। उनका हर पल कृष्ण की याद और तड़प में बीतता है। पहले उन्हें कृष्ण के लौटने की एक आस थी, और इसी आस के सहारे वे विरह की पीड़ा सह रही थीं।
पर उद्धव का योग-संदेश उनकी यह आस भी छीन लेता है — क्योंकि अब लगता है कि कृष्ण लौटेंगे ही नहीं, बल्कि उन्हें भुलाने का उपदेश भेज रहे हैं। इसी से उनका दुख और बढ़ जाता है। यहीं से उनका उपालंभ (प्यार-भरी शिकायत) फूट पड़ता है — वे कृष्ण से उलाहना देती हैं कि “हमने तुम्हें अपना सब कुछ सौंप दिया, और बदले में तुमने यह सूखा ज्ञान भेज दिया?” यह शिकायत गुस्से की नहीं, गहरे प्रेम की है, और इसीलिए और भी मार्मिक है।
चुनौती
'सूरदास के पद' के आधार पर बताइए कि गोपियों के माध्यम से सूरदास सगुण प्रेम और निर्गुण ज्ञान के बारे में क्या संदेश देना चाहते हैं? विस्तार से समझाइए।
“सूरदास के पद” भ्रमरगीत प्रसंग से लिए गए हैं, जिनमें गोपियों और उद्धव के संवाद के ज़रिए सूरदास एक गहरा संदेश देते हैं। कृष्ण मथुरा चले जाने के बाद उद्धव के हाथ गोपियों के लिए निर्गुण योग का संदेश भेजते हैं — यानी साकार कृष्ण-प्रेम छोड़कर निराकार ब्रह्म का ध्यान लगाने का उपदेश।
पर गोपियाँ इस ज्ञान को ठुकरा देती हैं, क्योंकि उनका प्रेम सगुण और साकार है। वे कृष्ण का रूप, मुरली, लीला और स्मृतियों से बँधी हैं। उनके लिए प्रेम एक जीवित अनुभव है, जिसकी जगह कोई रूपहीन, सूखा ज्ञान नहीं ले सकता। वे इस संदेश को ‘कड़वी ककड़ी’ कहती हैं और कृष्ण को ‘हारिल की लकड़ी’ की तरह कसकर पकड़े रहने की बात करती हैं। साथ ही वे उद्धव पर मीठा व्यंग्य करती हैं — उन्हें ‘बड़भागी’ कहकर ताना देती हैं कि प्रेम से अछूते रहना असल में दुर्भाग्य है।
इन सबके माध्यम से सूरदास यह संदेश देते हैं कि सच्चा, जीवित प्रेम कोरे, सूखे ज्ञान से कहीं बड़ा और श्रेष्ठ है। प्रेम की पीड़ा भी अपने-आप में एक सौभाग्य है, और जिसने प्रेम जाना ही नहीं, उसका जीवन अधूरा है। सगुण भक्ति की यही महिमा सूर इन पदों में स्थापित करते हैं — कि भगवान को रूप और प्रेम के साथ अपनाना, निराकार ध्यान से कहीं अधिक सरस और सच्चा मार्ग है।
इन पदों के काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए। भाषा और अलंकारों का इनमें क्या योगदान है?
“सूरदास के पद” का काव्य-सौंदर्य इनकी भाषा और शिल्प दोनों में झलकता है। इनकी भाषा ब्रजभाषा है, जो बहुत कोमल, मधुर और गेय है। इसमें माधुर्य गुण भरा है, जिससे कृष्ण-प्रेम और विरह के नाज़ुक भाव सहज ही मन को छू जाते हैं। यह कोमल भाषा इन भावों के लिए एकदम उपयुक्त है।
अलंकारों का प्रयोग भी पदों की सुंदरता बढ़ाता है। अनुप्रास अलंकार से नाद-सौंदर्य (ध्वनि की मिठास) पैदा होती है, जैसे एक ही वर्ण की लड़ी पंक्ति को सुरीला बना देती है। उपमा अलंकार से गोपियाँ अपनी बात चित्रमय ढंग से कहती हैं — जैसे उद्धव को कमल-पत्र और तेल की गागर के समान बताना। रूपक अलंकार में वे कृष्ण को सीधे ‘हारिल की लकड़ी’ कह देती हैं, जिससे उनका अटूट सहारा स्पष्ट होता है। दृष्टांत अलंकार से वे रोज़मर्रा के उदाहरण देकर गहरी बात समझाती हैं।
सबसे बड़ी खूबी है सूर का रोज़ की चीज़ों से गहरी बात कहना और गोपियों का वाक्-चातुर्य (बोलने की कुशलता)। इन सबके मेल से ये पद सरल होते हुए भी बहुत गहरे और प्रभावशाली बन पड़े हैं — यही सूरदास की काव्य-कला की असली पहचान है।
सारांश
याद रखने योग्य सब कुछ, संक्षेप में:
- ये पद सूरदास के प्रसिद्ध “भ्रमरगीत” प्रसंग से लिए गए हैं; इनकी भाषा ब्रजभाषा है।
- प्रसंग (चित्र 1.1): कृष्ण मथुरा चले जाते हैं और उद्धव के हाथ गोपियों को निर्गुण योग का संदेश भेजते हैं।
- विरह में डूबी गोपियाँ यह सूखा ज्ञान ठुकरा देती हैं और अपने सगुण, साकार कृष्ण-प्रेम पर अडिग रहती हैं (चित्र 1.2)।
- वे उद्धव को व्यंग्य में “बड़भागी” कहती हैं — ताना कि वे प्रेम-विरह से अछूते रहे, इसलिए असल में अभागे हैं (चित्र 1.4)।
- उद्धव को वे कमल-पत्ता और तेल की गागर जैसा कहती हैं (अछूता रहना); अपने प्रेम को हारिल की लकड़ी बताती हैं (अटूट पकड़)।
- उनके तीन प्रमुख भाव (चित्र 1.3): विरह-वेदना, उपालंभ (प्यार-भरी शिकायत), और मीठा व्यंग्य।
- योग-संदेश उन्हें “कड़वी ककड़ी” जैसा लगता है — जीवित प्रेम के सामने रूपहीन ज्ञान फीका है।
- अंतिम पद में वे कृष्ण को राजधर्म की याद दिलाती हैं — राजा का कर्तव्य प्रजा का दुख हरना है, बढ़ाना नहीं।
- काव्य-सौंदर्य (चित्र 1.5): ब्रजभाषा का माधुर्य; अलंकार — अनुप्रास, उपमा, रूपक, दृष्टांत; गोपियों का वाक्-चातुर्य।
- मूल संदेश: सच्चा प्रेम कोरे ज्ञान से बड़ा है — सगुण भक्ति की महिमा।
आगे क्या
अगले पाठ “राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद” (तुलसीदास) में आप सूर के कोमल विरह-संसार से निकलकर एक तीखे, गरमागरम संवाद में पहुँचेंगे। यह रामचरितमानस से लिया गया है। इसमें सीता-स्वयंवर के समय राम के शिव-धनुष तोड़ने पर क्रोधी परशुराम भड़क उठते हैं, और चतुर लक्ष्मण अपने मीठे पर तीखे व्यंग्य से उन्हें जवाब देते हैं। जहाँ सूर के पदों में विरह और प्रेम का माधुर्य है, वहीं अगले पाठ में वीर रस, व्यंग्य और वाक्-चातुर्य का रोमांच है। ध्यान वही रखिए — केवल “किसने क्या कहा” नहीं, बल्कि हर पात्र ऐसा क्यों बोलता है और संवाद के पीछे का भाव क्या है, यह समझना।
Frequently Asked Questions
सूरदास के पद का सारांश क्या है?
कृष्ण मथुरा जाने के बाद उद्धव को गोपियों के लिए निर्गुण योग का संदेश देकर भेजते हैं। गोपियाँ यह ठंडा उपदेश मानने से इनकार कर देती हैं और मीठे-मीठे व्यंग्य से उद्धव को घेर लेती हैं। वे कहती हैं कि कृष्ण का सगुण प्रेम छोड़कर निराकार ब्रह्म का ध्यान वे नहीं लगा सकतीं।
उद्धव और गोपियों के बीच विवाद का मुख्य कारण क्या है?
उद्धव निर्गुण (निराकार) ब्रह्म की उपासना का संदेश लाते हैं, जबकि गोपियाँ कृष्ण के सगुण (साकार) प्रेम में इतनी डूबी हैं कि वे किसी अन्य उपाय को अपना ही नहीं सकतीं। यही निर्गुण बनाम सगुण का टकराव ही पद का केंद्रीय विवाद है।
सूरदास के पद में 'ऊधौ तुम हौ अति बड़भागी' का व्यंग्य क्या है?
गोपियाँ उद्धव को 'बड़भागी' कहकर व्यंग्य करती हैं — वे कह रही हैं कि तुम भाग्यशाली हो जो प्रेम के बंधन से मुक्त हो, पर असल में यह बात उनकी दया और चुटकी है। उद्धव को प्रेम की गहराई का अनुभव ही नहीं है, इसीलिए वे इतने 'भाग्यशाली' हैं।
सूरदास के पद में कौन-कौन से अलंकार हैं?
इन पदों में अनुप्रास (बार-बार एक ही वर्ण का प्रयोग), रूपक (उद्धव को कमल-दल से जोड़ना), उपमा और व्यंग्योक्ति प्रमुख अलंकार हैं। ब्रजभाषा का मधुर प्रवाह इन्हें और भी सुंदर बनाता है।
सूरदास के पद का केंद्रीय संदेश क्या है?
पाठ का मुख्य संदेश है कि सच्चा, जीवित प्रेम किसी ठंडे-सूखे ज्ञान या उपदेश से कहीं बड़ा होता है। गोपियाँ दिखाती हैं कि हृदय का भक्ति-प्रेम तर्क और योग से परे है।