माता का अँचल

Chapter 1 · Hindi · Class 10 20 min read

इस पाठ का महत्व

ज़रा सोचिए — जब आप बहुत छोटे थे और अचानक कोई चीज़ आपको डरा देती थी, तो आप सबसे पहले किसके पास भागते थे? ज़्यादातर बच्चों का एक ही जवाब होता है — माँ के पास। चाहे दिनभर हम किसी और के साथ खेलते रहें, असली डर के क्षण में पैर अपने-आप माँ की ओर ही मुड़ जाते हैं।

यह पाठ ठीक इसी बात को बहुत सुंदर ढंग से दिखाता है। यह एक छोटे गाँव के बच्चे की कहानी है। वह दिनभर अपने बाबूजी (पिता) से चिपका रहता है — उनके साथ पूजा करता है, खेलता है, उनकी मूँछें नोचता है, कुश्ती लड़ता है। ऐसा लगता है मानो उसकी दुनिया बाबूजी से ही बनी हो। पर जब खेलते समय एक साँप उसे डरा देता है और उसे चोट लग जाती है, तो वह घबराया हुआ बच्चा अपने प्यारे बाबूजी को भी छोड़कर सीधे माँ के अँचल में जा छिपता है।

यह पाठ केवल एक प्यारी-सी बचपन की याद नहीं है। यह चुपचाप एक गहरी बात कहता है — माँ का स्थान दुनिया में कोई और नहीं ले सकता। इसी वजह से यह पाठ परीक्षा के बाद भी जीवनभर याद रह जाता है, सिर्फ़ अंकों के लिए नहीं।

मूल भाव

इस पाठ का मूल भाव है — माँ का असीम, बिना-शर्त वात्सल्य। बच्चा भले ही दिनभर पिता के साथ रहे और खेले, पर असली डर और पीड़ा के क्षण में उसे सबसे गहरी और सुरक्षित शरण माँ के अँचल में ही मिलती है। यही माँ के प्रेम की सबसे बड़ी विशेषता है।

आगे बढ़ने से पहले एक शब्द साफ़ कर लेते हैं, जो इस पाठ में बार-बार आएगा।

📖 मूल पाठ कहाँ पढ़ें: इस पृष्ठ पर हमने पाठ का विस्तृत सार और व्याख्या दी है। पूरा मूल पाठ अपनी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक “कृतिका भाग 2” में पढ़ें, और इस व्याख्या के साथ मिलाकर समझें।

पाठ का सार

इस पाठ के लेखक हैं शिवपूजन सहाय। आइए कहानी को सरल भाषा में, क्रम से समझते हैं।

यह एक गाँव के परिवार की बात है। एक छोटा बच्चा है, जिसका असली नाम तारकेश्वरनाथ है। पर उसके बाबूजी उसे प्यार से “भोलानाथ” कहकर पुकारते हैं। (मैया उसे “तारकेश्वरनाथ” ही कहती है।)

भोलानाथ का अपने बाबूजी से बहुत गहरा लगाव है। सुबह बाबूजी जब पूजा करते, तो वह भी उनके पास बैठ जाता। बाबूजी उसके माथे पर तरह-तरह के तिलक लगाते, उसे सजाते। फिर दोनों साथ में खाना खाते — बाबूजी उसे अपने हाथ से ग्रास (कौर) खिलाते। भोलानाथ बाबूजी की मूँछें नोचता, उनके साथ कुश्ती लड़ता, और बाबूजी हार जाने का नाटक करके उसे खुश कर देते। दिनभर वह बाबूजी के साथ ही चिपका रहता।

इसके बाद वह अपने दोस्तों के साथ खेलने जाता। बच्चों के खेल बहुत प्यारे और गाँव के जीवन से भरे थे। वे घरौंदा (मिट्टी का छोटा घर) बनाते, खेती-बारी का खेल खेलते, झूठ-मूठ की बारात निकालते और मेला लगाते। कभी वे रसोई बनाने, खाना पकाने का खेल खेलते। इन खेलों में पूरा गाँव का जीवन झलकता था।

फिर आता है कहानी का सबसे बड़ा मोड़। एक दिन बच्चे नदी के किनारे, खेतों के पास खेल रहे थे। तभी अचानक एक साँप निकल आया। साँप को देखते ही सब बच्चे डर के मारे चीख-चिल्लाकर भागे। भागते समय भोलानाथ गिर पड़ा और उसे चोट लग गई। डरा हुआ, घायल और हाँफता हुआ बच्चा रोता-बिलखता घर की ओर दौड़ा।

रास्ते में उसे बाबूजी भी मिले — वही बाबूजी, जिनके साथ वह दिनभर लगा रहता था। पर इस डर और पीड़ा के क्षण में वह बाबूजी के पास भी नहीं रुका। वह सीधा मैया के पास पहुँचा और उसके अँचल में मुँह छिपाकर रोने लगा। माँ ने उसे गोद में उठा लिया, उसके आँसू पोंछे, उसकी चोट को प्यार से सेंका और दुलार से चुप कराया। यहीं पर कहानी अपने सबसे गहरे भाव पर पहुँचती है — माँ की गोद ही बच्चे की असली शरण है।

पूरी कहानी की रूपरेखा एक नज़र में देखने के लिए, नीचे चित्र 1.1 देखिए।

माता का अँचल पाठ का कथा-वक्र
Figure 1.1 — यह कथा-वक्र पाठ की पूरी कहानी को एक पहाड़ी के आकार में दिखाता है। (1) आरंभ — बचपन का सुख, जहाँ बच्चा दिनभर पिता के साथ रहता है, उनके साथ पूजा और खेल करता है। (2) चढ़ाव — बच्चों के अपने खेल जैसे घरौंदा, खेती-बारी, बारात और मेला। (3) चरम या मोड़ (सबसे ऊँचा बिंदु, लाल रंग में) — खेलते समय अचानक साँप का भय और गिरकर चोट लगना। (4) उतार — डरा-घबराया बच्चा सबको छोड़कर घर की ओर दौड़ता है, रास्ते में मिले पिता के पास भी नहीं रुकता। (5) अंत — वह माँ के अँचल में जा छिपता है और वहीं उसे शरण और सांत्वना मिलती है। बाएँ से दाएँ पढ़ने पर पता चलता है कि कहानी कैसे सुख से उठकर भय के शिखर पर पहुँचती है और फिर माँ की गोद में आकर शांत होती है।

आइए गहराई से समझें

अब केवल “क्या हुआ” से आगे बढ़कर “ऐसा क्यों है” समझते हैं। यही इस पाठ की असली गहराई है।

पात्र — भोलानाथ, बाबूजी और मैया

इस पाठ में तीन मुख्य पात्र हैं। हर एक का स्वभाव अलग है, और यही अंतर पाठ का अर्थ बनाता है। नीचे चित्र 1.2 में तीनों को साथ-साथ देखिए।

तीन मुख्य पात्रों का पात्र-चित्र
Figure 1.2 — यह पात्र-चित्र पाठ के तीन मुख्य पात्रों का स्वभाव दिखाता है। पैनल (क) भोलानाथ — कहानी का बालक, जिसका असली नाम तारकेश्वरनाथ है। वह मासूम, भोला, चंचल और खेलप्रिय है, दिनभर पिता से जुड़ा रहता है, पर असली पीड़ा और डर के क्षण में माँ की ओर भागता है; उसका बाल-मन बहुत कोमल है। पैनल (ख) बाबूजी — बच्चे के पिता, जो बहुत स्नेही और सरल हैं, बच्चे को प्यार से 'भोलानाथ' कहते हैं, दिनभर उसके खेल-साथी बने रहते हैं, उसके साथ पूजा, कुश्ती करते हैं, उसे मूँछ नोचने देते हैं और खूब लाड़ लड़ाते हैं। पैनल (ग) मैया — बच्चे की माँ, जो स्नेहमयी और ममतामयी है; दिन में बच्चे के साथ कम रहती है पर बंधन बहुत गहरा है; वह संकट की असली शरण है, उसका वात्सल्य बिना-शर्त है, और वह अँचल में छिपाकर बच्चे का डर मिटाती और उसकी चोट सेंकती है।

भोलानाथ एक मासूम, भोला-भाला और चंचल बच्चा है। उसका मन बहुत कोमल है। वह दिनभर खेलता है और बाबूजी से बहुत प्यार करता है। पर जब असली डर आता है, तो उसका बाल-मन उसे माँ की ओर ले जाता है। यही उसके चरित्र की सबसे सच्ची बात है।

बाबूजी बहुत स्नेही और सरल व्यक्ति हैं। वे बच्चे के साथ बच्चे बन जाते हैं — कुश्ती में हार जाने का नाटक करते हैं, उसे सजाते हैं, उसके साथ हँसते-खेलते हैं। उनका प्यार दिखता है, बहता है, हर पल साथ रहता है।

मैया दिन में बच्चे के साथ कम दिखती है, क्योंकि वह घर के कामों में लगी रहती है। पर उसका प्यार सबसे गहरा है। उसका प्यार शोर नहीं करता, पर संकट के समय वही सबसे बड़ा सहारा बनता है।

Concept check

भोलानाथ दिनभर बाबूजी के साथ रहता है, फिर भी डर के समय वह माँ के पास क्यों भागा?

परिवेश — गाँव का जीवन और बचपन के खेल

पाठ का परिवेश एक छोटा गाँव है। लेखक ने गाँव के बचपन को बहुत जीवंत ढंग से दिखाया है — खेत, नदी, मिट्टी, और बच्चों के सीधे-सादे खेल।

बच्चों के खेल इतने विस्तार से क्यों दिए गए हैं? इसका एक खास कारण है। लेखक चाहता है कि पाठक गाँव के मासूम बचपन को महसूस करे, उसे जिए। घरौंदा बनाना, खेती-बारी का खेल, झूठ-मूठ की बारात और मेला — ये सब दिखाते हैं कि बच्चे अपने आस-पास के बड़ों के जीवन को ही खेल में उतार लेते हैं। इन खेलों से गाँव का पूरा जीवन और बचपन की निश्छलता (सादगी और भोलापन) हमारी आँखों के सामने जीवित हो उठती है। यह सिर्फ़ खेलों की सूची नहीं, बल्कि एक पूरे संसार का चित्र है।

केंद्रीय भाव — माँ का अँचल और वात्सल्य

इस पाठ का दिल है — माँ का वात्सल्य। पहले एक शब्द साफ़ कर लें, ताकि भाव पूरी तरह समझ आए।

पूरा पाठ धीरे-धीरे एक ही बात की ओर बढ़ता है — माँ का अँचल बच्चे के लिए सबसे सुरक्षित जगह है। पूरे पाठ के विषय कैसे इसी केंद्रीय भाव से जुड़े हैं, यह नीचे चित्र 1.4 में देखिए।

पाठ के मुख्य विषयों का विषय-जाल
Figure 1.4 — यह विषय-जाल पाठ के मुख्य विषयों को जोड़कर दिखाता है। बीच के पीले घेरे में पाठ का केंद्रीय भाव है — 'माँ का अँचल'। इससे चार विषय जुड़े हैं। 'मातृ-वात्सल्य' — माँ का असीम और बिना-शर्त प्रेम। 'मासूम बचपन' — बच्चों के खेल, चंचलता और कोमल बाल-मन। 'ग्रामीण जीवन' — गाँव, खेत, मेला और आंचलिक (देहाती) रंग। 'सुरक्षा और शरण' — डर के समय माँ की गोद ही बच्चे का सबसे बड़ा आश्रय। यह जाल दिखाता है कि ये चारों अलग-अलग विषय नहीं हैं, बल्कि सभी एक ही केंद्रीय भाव, यानी माँ के अँचल और उसके वात्सल्य, से जुड़े हुए हैं।

अब सबसे ज़रूरी प्रश्न — कुछ भी अपने-आप मान लेने योग्य नहीं है। आइए तीन गहरे “क्यों” समझते हैं।

क्यों, दिनभर पिता से जुड़े रहने पर भी, बच्चा डर के क्षण में माँ की ओर भागा? यही पाठ का असली मर्म (गहरी बात) है। इसका उत्तर सरल पर गहरा है — पिता और माँ के प्रेम का स्वभाव अलग है। पिता का साथ आनंद और खेल का साथ है। वह सुख के पलों में मज़ा देता है। पर असली डर और पीड़ा के क्षण में बच्चे को जो चीज़ चाहिए, वह है बिना-शर्त सुरक्षा, गोद और दिलासा — और यह सबसे गहराई से माँ के अँचल में मिलती है। इसीलिए, अपने प्यारे बाबूजी को भी छोड़कर, बच्चा सीधा माँ के पास भागा। यह दिखाता है कि माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता।

क्यों, लेखक ने पहले पिता-पुत्र के प्रेम को इतने विस्तार से दिखाया? यह लेखक की बहुत सोची-समझी कला है। अगर पूरे पाठ में बच्चे का माँ से ही गहरा लगाव दिखाया जाता, तो अंत में उसका माँ के पास भागना कोई खास बात न लगती। पर लेखक पहले यह दिखाता है कि बच्चा दिनभर पिता के साथ ही चिपका रहता है, मानो पिता ही उसका सबकुछ हों। इसी से अंत का विरोधाभास (उल्टी, चौंकाने वाली बात) और भी गहरा हो जाता है — जिस पिता के साथ वह दिनभर रहा, संकट में उसे भी छोड़कर माँ के पास गया। इस तुलना से यह बात और मज़बूती से उभरती है कि माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता।

क्यों, बचपन के खेल इतने विस्तार से दिए गए? ताकि गाँव के मासूम बाल-जीवन की निश्छलता पाठक के सामने जीवंत हो उठे, जैसा हमने ऊपर ‘परिवेश’ में देखा।

पिता और माता के स्नेह का अंतर

इस पाठ की सबसे बड़ी सीख यहीं छिपी है — पिता और माता का प्रेम दोनों सच्चे हैं, पर उनका स्वभाव अलग है। नीचे चित्र 1.3 दोनों को आमने-सामने रखकर यह अंतर साफ़ करता है।

पिता और माता के स्नेह की तुलना
Figure 1.3 — यह चित्र पिता और माता के स्नेह का अंतर दो पैनलों में दिखाता है। पैनल (क) पिता का स्नेह — यह दिनभर का खेल-साथी वाला प्रेम है। पिता दिन में, हर समय बच्चे के साथ रहते हैं, उसके साथ पूजा कराते हैं, कुश्ती लड़ते और मूँछ नोचने देते हैं, उसे तरह-तरह से सजाते-खिलाते हैं; इसका भाव है आनंद, मनोरंजन और अपनापन; पर डर के क्षण में बच्चा यहाँ नहीं रुका। बीच में लाल तीर 'संकट आने पर' की ओर इशारा करता है। पैनल (ख) माता का स्नेह — यह संकट की असली शरण है। माँ का प्रेम डर, चोट और पीड़ा के क्षण में काम आता है; वह बच्चे को अँचल में छिपा लेती है, उसके आँसू पोंछती और चोट सेंकती है, उसे सुरक्षा और दिलासा देती है; इसका भाव है गहरा, बिना-शर्त वात्सल्य और सुरक्षा। यहीं बच्चा दौड़कर पहुँचा — और यही पाठ का मर्म है।

संक्षेप में, दोनों प्रेमों की तुलना नीचे देखिए।

पिता और माता के स्नेह का अंतर — एक तालिका में
आधारपिता (बाबूजी) का स्नेहमाता (मैया) का स्नेह
कब साथदिनभर, हर समयज़रूरत और संकट के समय सबसे गहरा
स्वरूपखेल, हँसी, मनोरंजन का साथीगोद, अँचल, सुरक्षा की शरण
किन क्षणों मेंआनंद और सुख के क्षणों मेंडर, चोट और पीड़ा के क्षणों में
अंत में बच्चा किसके पास गयापास से होकर निकल गया, रुका नहींसीधा अँचल में जा छिपा

इस तालिका से साफ़ है कि दोनों का प्रेम कम-ज़्यादा नहीं है — बस अलग-अलग तरह का है। और संकट के क्षण में बच्चे की पहली पुकार माँ ही होती है।

भाषा-शैली — आंचलिक शब्द और बाल-मनोविज्ञान

लेखक की भाषा इस पाठ की एक बड़ी खूबी है।

पहली बात — पाठ में आंचलिक शब्द (किसी खास इलाके या गाँव में बोले जाने वाले शब्द) भरपूर हैं।

इन आंचलिक शब्दों और लोकगीतों-तुकबंदियों से पाठ में गाँव की मिट्टी की महक आ जाती है। पढ़ते समय लगता है मानो हम सचमुच उस गाँव में, उन बच्चों के बीच खड़े हैं।

दूसरी बात — लेखक का बाल-मनोविज्ञान का चित्रण बहुत सूक्ष्म है। बाल-मनोविज्ञान का अर्थ है — बच्चों के मन, उनकी सोच और भावनाओं को समझना और दिखाना। लेखक ने बच्चों के खेल, उनकी नकल करने की आदत, उनका डर, और संकट में माँ की ओर भागना — ये सब इतनी सच्चाई से दिखाए हैं कि हर पाठक को अपना बचपन याद आ जाता है। यही इस संस्मरण को इतना सजीव और मन को छू लेने वाला बनाता है।

आम भूलें

ये वे गलतफ़हमियाँ हैं जिनमें छात्र अक्सर फँस जाते हैं। हर एक को ध्यान से पढ़िए — “ऐसा क्यों लगता है” वाला भाग जाल दिखाता है, और “असल बात” उसे सुधार देती है।

⚠️ Common mistake
What students think

पाठ का नाम 'माता का अँचल' है, इसलिए इसमें ज़्यादातर माँ और बच्चे के साथ की बातें हैं।

Why it seems right

शीर्षक में 'माता' शब्द है और अंत भी माँ के अँचल पर होता है, इसलिए स्वाभाविक रूप से लगता है कि पूरा पाठ माँ के इर्द-गिर्द ही घूमता होगा।

What actually happens

असल में पाठ का अधिकांश हिस्सा बच्चे के पिता (बाबूजी) के साथ बिताए समय का है — पूजा, खेल, कुश्ती, मूँछ नोचना। माँ का अँचल केवल अंत में, संकट के क्षण में आता है। लेखक ने जान-बूझकर पहले पिता का साथ इतना दिखाया, ताकि अंत में माँ की शरण का महत्व और गहरा लगे।

⚠️ Common mistake
What students think

बच्चा माँ के पास इसलिए भागा क्योंकि वह पिता से कम और माँ से ज़्यादा प्यार करता था।

Why it seems right

चूँकि वह डर के क्षण में पिता को छोड़कर सीधा माँ के पास गया, इसलिए लगता है कि शायद उसे माँ ज़्यादा प्यारी थी और पिता कम।

What actually happens

ऐसा नहीं है। बच्चा पिता से भी बहुत प्यार करता था और दिनभर उन्हीं के साथ रहता था। पर पिता का प्रेम खेल और आनंद का है, जबकि माँ का अँचल संकट में सबसे गहरी, बिना-शर्त सुरक्षा देता है। यह कम-ज़्यादा प्यार का मामला नहीं, बल्कि दोनों प्रेमों के अलग स्वभाव का मामला है।

⚠️ Common mistake
What students think

बच्चे का असली नाम भोलानाथ है, क्योंकि बाबूजी उसे यही कहते हैं।

Why it seems right

पूरे पाठ में बाबूजी उसे बार-बार 'भोलानाथ' कहकर पुकारते हैं, इसलिए पढ़ते समय वही नाम मन में बैठ जाता है।

What actually happens

बच्चे का असली नाम तारकेश्वरनाथ है। 'भोलानाथ' तो बाबूजी का दिया हुआ प्यार का नाम (उपनाम) है। मैया उसे 'तारकेश्वरनाथ' ही कहती है। दोनों नामों का अंतर परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है।

जाँचिए अपनी समझ

खुद को परखिए। पहले एक उत्तर चुनिए, फिर व्याख्या पढ़कर “क्यों” समझिए।

कहानी के बालक का असली नाम क्या है, और बाबूजी उसे प्यार से क्या कहते हैं?

खेलते समय अचानक क्या हुआ, जिसके बाद बच्चे घबरा गए?

डर और चोट के बाद बच्चा सबको छोड़कर सीधे किसके पास गया, और क्यों?

लेखक ने पहले पिता-पुत्र के प्रेम को इतने विस्तार से क्यों दिखाया?

अभ्यास

पहले अपना उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर टैप करके आदर्श उत्तर देखिए। उत्तर की लंबाई पर ध्यान दीजिए — लघु उत्तर में 2-3 वाक्य, दीर्घ उत्तर में पूरा अनुच्छेद।

सरल

easy

बालक भोलानाथ अपने बाबूजी के साथ दिनभर क्या-क्या करता था? कोई तीन बातें लिखिए।

easy

'अँचल' शब्द का इस पाठ में क्या अर्थ और महत्व है?

मध्यम

medium

बच्चों के खेलों का वर्णन कीजिए। लेखक ने इन खेलों को इतने विस्तार से क्यों दिखाया?

medium

भोलानाथ डर और चोट के बाद रास्ते में मिले बाबूजी के पास क्यों नहीं रुका? इससे माँ के प्रेम की कौन-सी विशेषता उजागर होती है?

चुनौती

challenge

'माता का अँचल' पाठ के आधार पर बताइए कि लेखक पिता और माता के प्रेम के माध्यम से क्या संदेश देना चाहता है? विस्तार से समझाइए।

challenge

इस पाठ की भाषा-शैली की विशेषताएँ बताइए। आंचलिक शब्दों और बाल-मनोविज्ञान का इसमें क्या योगदान है?

सारांश

याद रखने योग्य सब कुछ, संक्षेप में:

  • “माता का अँचल” शिवपूजन सहाय का लिखा एक संस्मरण है, जो गाँव के बचपन की सच्ची याद पर आधारित है।
  • बालक का असली नाम तारकेश्वरनाथ है; बाबूजी उसे प्यार से “भोलानाथ” कहते हैं, मैया उसे तारकेश्वरनाथ कहती है।
  • बच्चा दिनभर बाबूजी के साथ रहता है — पूजा, खाना, कुश्ती, मूँछ नोचना — और खूब लाड़ पाता है।
  • बच्चों के खेल गाँव के जीवन से भरे हैं — घरौंदा, खेती-बारी, बारात, मेला — जो मासूम बचपन और ग्रामीण जीवन को जीवंत करते हैं।
  • कहानी का मोड़: खेलते समय साँप निकल आता है, बच्चे डरकर भागते हैं, भोलानाथ गिरकर घायल हो जाता है।
  • डरा-घायल बच्चा रास्ते में मिले बाबूजी के पास भी नहीं रुकता, सीधा माँ के अँचल में जा छिपता है — यही पाठ का मर्म है।
  • केंद्रीय भाव (चित्र 1.4): माँ का अँचल और बिना-शर्त वात्सल्य; इससे जुड़े विषय — मासूम बचपन, ग्रामीण जीवन, सुरक्षा-शरण।
  • पिता बनाम माता का स्नेह (चित्र 1.3): पिता दिनभर का खेल-साथी; माँ संकट की असली शरण। दोनों सच्चे, पर स्वभाव अलग।
  • लेखक ने पहले पिता का प्रेम विस्तार से दिखाया ताकि अंत का विरोधाभास गहरा लगे — माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता।
  • भाषा-शैली: सजीव आंचलिक भाषा और सूक्ष्म बाल-मनोविज्ञान, जो पाठ को सच्चा और हृदयस्पर्शी बनाते हैं।

आगे क्या

अगले पाठ “साना-साना हाथ जोड़ि…” (मधु कांकरिया) में आप गाँव के बचपन से निकलकर हिमालय की गोद में, सिक्किम की यात्रा पर चलेंगे। यह एक यात्रा-वृत्तांत है — जहाँ लेखिका बर्फ़ से ढके पहाड़, झरने, बौद्ध मठ और वहाँ के लोगों के जीवन का सजीव वर्णन करती हैं। जहाँ “माता का अँचल” माँ के प्रेम की गहराई दिखाता है, वहीं अगला पाठ प्रकृति की सुंदरता और मेहनतकश पहाड़ी जीवन के प्रति प्रेम और संवेदना जगाता है। ध्यान वही रखिए — केवल “क्या हुआ” नहीं, बल्कि लेखिका जो महसूस कराना चाहती हैं और उसका संदेश क्या है, यह समझना।

Frequently Asked Questions

माता का अँचल पाठ का सारांश क्या है?

यह पाठ लेखक शिवपूजन सहाय का बचपन का संस्मरण है। एक छोटा बच्चा 'भोलानाथ' दिनभर अपने बाबूजी के साथ खेलता और रहता है, पर जब एक साँप उसे डरा देता है तो वह घबराकर माँ के अँचल में जा छिपता है। इस पाठ का मुख्य भाव है कि माँ का वात्सल्य और सुरक्षा का अहसास संसार में अद्वितीय है।

भोलानाथ कौन है और उसके बाबूजी उससे कैसा स्नेह रखते थे?

भोलानाथ इस पाठ का मुख्य पात्र है, जिसका असली नाम तारकेश्वरनाथ है। उसके बाबूजी उसे बहुत प्यार करते थे — उनके साथ पूजा करना, खेलना, उनकी मूँछें नोचना सब भोलानाथ की दिनचर्या थी। बाबूजी पिता और मित्र दोनों की तरह उसके साथ रहते थे।

माता का अँचल पाठ में माँ और बाबूजी के स्नेह में क्या अंतर दिखाया गया है?

बाबूजी भोलानाथ के खेल के साथी थे और दिनभर उसके साथ रहते थे, पर उनका स्नेह खेल-मनोरंजन तक सीमित था। माँ का स्नेह गहरा और सुरक्षित था — असली डर के क्षण में बच्चा बाबूजी को छोड़ सीधे माँ की गोद में भाग गया, यही दोनों के स्नेह का सबसे बड़ा अंतर है।

इस पाठ में 'अँचल' किस बात का प्रतीक है?

अँचल साड़ी या ओढ़नी का वह छोर है जिसमें माँ बच्चे को छिपा लेती है। इस पाठ में यह सिर्फ़ कपड़ा नहीं, बल्कि माँ की गोद, उसकी सुरक्षा और असीम प्यार का प्रतीक है। यही पाठ का शीर्षक भी है और मुख्य संदेश भी।

माता का अँचल पाठ के लेखक कौन हैं और यह किस विधा में लिखा गया है?

इस पाठ के लेखक शिवपूजन सहाय हैं। यह एक संस्मरण है, यानी लेखक ने अपने बचपन की सच्ची और यादगार घटना को जीवंत भाषा में लिखा है। इसमें गाँव के जीवन, बाल-स्वभाव और माँ के वात्सल्य का बहुत मार्मिक चित्रण है।